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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 61

From जैनकोष



धनधंयादिग्रंथं परिमाप ततोऽधिकेषु नि: स्पृहा ।

परिमितपरिग्रह: स्यादिच्छापरिमाणनामापि ।। 61 ।।

श्रावकों के परिग्रहपरिमाण की महिमा―अब परिग्रह परिमाण अणुव्रत का स्वरूप कहा जा रहा है । देखिये गृहस्थ की सारी दशायें बदलने वाला निर्दोष और आत्मकल्याण में लगाने वाला यह परिग्रह परिमाणाणुव्रत है । धन धान्यादिक परिग्रहों का परिमाण कर लेना कि मैं इससे अधिक धन न रखूँगा । और इससे अधिक की वांछा भी न करुंगा, यह परिग्रह परिमाणाणुव्रत है । परिग्रह का परिमाण उतना रखना जितने में संतोष हो जैसी वर्तमान परिस्थिति है उससे कुछ अधिक भले ही हो मगर बहुत अधिक अतिक्रम न करना । जैसे कोई यों कहने लगे कि मैं दो हाथी रखूँगा, इतने घोड़े रखूँगा... तो परिमाण तो किया पर परिमाण संभव हुआ ही करना चाहिए । इसका नाम इच्छा परिमाण है । जिसके परिग्रह वर्तमान में कम है मगर परिमाण अधिक का रख ले तो इतना तो हो ही गया कि उससे अधिक परिग्रह की भावना न रहे चित्त में और इस कारण से निर्दोष है और बुद्धि में भी स्वच्छता आती है । परिग्रह यह समस्त पापों का मूल है । खोटा ध्यान इसी परिग्रह भावना से होता है । परिग्रह भावना से तो त्यागी व्रती मुनियों पर भी संदेह होने लगता है । एक कथानक है ऐसा कि एक श्रावक के यहाँ मुनिराज ने आहार किया । उस घर कहीं कोई रत्न रखा था, उसे किसी मुर्गी ने खा लिया था पर घर वालों ने समझा कि मुनिराज उठा ले गए । अब वह गृहस्थ पहुंचा जंगल में मुनिराज के पास और ऐसी-ऐसी चर्चायें उनसे करने लगा कि जिन में यह भाव भरा था कि हे मुनिराज तुम मेरा रत्न घर से चुरा लाये हो । आखिर बाद में एक योग ऐसा हुआ कि उस मुर्गी ने उस रत्न को कय कर दिया, वहाँ वह रत्न पाकर अपनी भूल पर उस गृहस्थ को भारी पछतावा हुआ । तो इस परिग्रह के लगाव में बड़े-बड़े संदेह और दुर्भाव बन जाते है । किसी ने मानो बैंक में कुछ रकम जमा कर रखा है तो उसके मन में कभी-कभी ऐसा संदेह हो जाता कि कहीं यह बैंक फेल न हो जाय और हमारी रकम डूब जाय । तो इस प्रकार के संदेह उत्पन्न करने वाले परिग्रह से तो विरक्त ही रहना चाहिए । और उसे अत्यंताभाव वाला निरखना चाहिए ।

सहजात्मस्वरूप के अनुभव की परमकला की महिमा―भेदविज्ञान से, वस्तुस्वरूप के परिचय से कौनसी ऐसी कला प्रकट हो जाती है जिससे यह जीव निशंक होकर मोक्षमार्ग में बढ़ता है । वह कला है वस्तुस्वरूप के परिचय की । देखिये बड़ी-बड़ी चर्चायें तो दूर रही, जो साधारण गुण बताये गए है वे सब द्रव्यों में पाये जाते है उन साधारण गुणों की दृष्टि से ही एकदम भान हो जाता कि एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के साथ रंच भी संबंध नहीं है । तो साधारण गुण 6 बताये गये हैं―(1) अस्तित्व―याने पदार्थ में सत्ता बनी रहे । (2) वस्तुत्व―द्रव्य अपने स्वरूप से सत् रहे, पर रूप से असत् रहे, लो इसी ने भेदविज्ञान जगा दिया । जब प्रत्येक पदार्थ अपने ही द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से सत् है तो अब संबंध क्या-रहा? न एक द्रव्य दूसरे में गया, न क्षेत्र, काल, भाव दूसरे में गया । जो यह कहा जाता है कि अमुक का प्रभाव अमुक पर पड़ गया सो क्या यह सही बात है कि एक का प्रभाव दूसरे में आ जाय? वस्तु स्वरूप यह है कि दूसरा इस ही योग्य था कि उसे देखकर वह अपने में ऐसा प्रभाव बना लेता है । प्रत्येक पदार्थ अपने ही चतुष्टय में है, अपने ही द्रव्य से है, अपने ही प्रदेश से है, अपनी ही परिणति में है, अपने ही गुणों में है । एक का दूसरे के साथ रंच संबंध नहीं है । चाहे अन्य पदार्थ चेतन हों या अचेतन, यह जीव अनादिकाल से अब तक जो भ्रमता चला आया है उसका कारण है कि यह अपने सहज आत्मस्वरूप को नहीं पहिचान पाया । यह मैं एकत्वविभक्त हूँ । समग्र अन्य पदार्थो से अत्यंत जुदा हूँ और अपने आपके एकत्वस्वरूप में तन्मय ऐसा यह मैं सहज परमात्म पदार्थ हूँ । ऐसे अनुभव से सहज ही सकल कर्म संकट दूर हो जाते है ।

विनश्वर समागम की प्रीति की व्यर्थता―देखिये कुटुंब में स्त्री पुत्रादिक में थोड़ी देर को राग दिया जा रहा है, जिंदगीभर भी करे तो वह थोड़ी देर को ही तो कहलाया । अनंत काल के सामने यह 100―50 वर्ष का जीवन क्या गिनती रखता? पर इतने छोटे से जीवन में जो रागभाव किया उसका फल संसार की इन कुयोनियों में भ्रमण करना होता है और फिर भला बतलावो इससे पहले भव में कोई अधिक वर्ष तो नहीं गुजरे हैं । किसी के 40 वर्ष गुजरे किसी के 50 वर्ष गुजरे तो इससे पहले जो हम किसी पूर्वभव में थे, वहाँ भी तो समुदाय होगा, समागम था, कुटुंब था । उस कुटुंब में अनुराग जो किया उस अनुराग के फल में आज तक क्या संतोष मिल रहा? क्या सुख मिल रहा? तो जैसे पहले के समागमों से मेरे को कोई शांति नहीं, सुख नहीं वैसे ही आज भी जो समागम पाया उस समागम से भी कोई संतोष या सुख नहीं मिल सकता । तो वास्तव में परिग्रह तो मूर्छा है । तो ये पदार्थ जायेंगे कहां? कहीं लोक से बाहर तो न पहुंच जायेंगे । ये वहीं रह रहे हैं, बस उनको अपना लिया, उनमें राग किया, मूर्छा उनमें होने लगी, परिग्रह बन गया तो इस जीव का बाहरी पदार्थ तो कुछ है ही नही । कभी नहीं है । तीन काल में भी कोई दूसरा पदार्थ मेरा कुछ न हो सकेगा । अत्यंताभाव है पर यह मोही आत्मा अपने आपके स्वरूप में न टिककर चेतन अचेतन पदार्थों में अनुराग बनाता है, मोह बनाता है और उससे ही अपना बड़प्पन मानता है ।

परिपूर्ण नि:संग एकत्व की स्थिति में परम आनंद का स्थायित्व―इस प्राणी को यह खबर नहीं है कि जितना मैं अकेला होता जाऊंगा उतना ही मेरा बड़प्पन बढ़ता जायगा । स्वर्णकिट्टकालिमा मलों से मलिन है और वह स्वर्ण उन मैलों में घुलमिलकर रह रहा है और जब अग्नि ताप आदिक के द्वारा उसका मैल जल जाता है, दूर होता है । स्वर्ण अपनी अकेली अवस्था में आता है तब उस स्वर्ण का बड़प्पन बढ़ जाता है । यहाँ हम आप भी ये तीन चीजों के पिंडोला दिख रहे हैं―(1) शरीर, (2) कर्म और (3) जीव । ये तीनों ही मिलकर रह रहे है तो उसका फल क्या हो रहा कि जीव भी बिगड़ रहा, कर्म भी बिगड़ रहे शरीर भी बिगड़ रहा । जो परमाणु आज शरीर रूप में बने हुए हैं जब मैंने उन्हें ग्रहण न किया था तब वे कितनी अच्छी शकल में थे, उनमें हाड़, मांस, लोहू आदिक थे क्या? अरे वे गंदी हालत में न थे । पर उन परमाणुवों को जैसे ही ग्रहण किया वैसे ही हड्डी, मांस, खून आदि नाना प्रकार की अपवित्र चीजें बन जाती है । तो लो शरीर बिगड़ा कि नहीं बिगड़ा? इन तीन के मेल मिलाप से किसका भला है? किसकी सुंदरता है? कर्म की बात देखो―जब तक वे कार्माण वर्गणा रूप में थे, उनको कर्मत्व न बनाया गया था । तब तक वे अनुभाग से रहित थे । जैसे ही अशुद्ध विकार का निमित्त पाकर वे कार्माण वर्गणायें कर्मरूप बनी, उनमें अनुभाग आ गया और जैसे सिनेमा के पर्दे पर जो कुछ भी चित्र आप निरखते हैं वह फिल्म की रंगाई कहो गंदगी कहो बस वही-वही झलकती रहती है । तो ऐसे ही मुझ आत्मा में जो विकार झलक रहे वह कर्म की गंदगी ही झलक रही । कर्मरूप बंधे तो कर्म में ऐसे अनुभाग की गंदगी आयी और जीव में वह दिख ही रही है कितनी हालत बुरी है । यह अपने आप में नहीं टिक पाता, निर्विकल्प नहीं हो पाता शांत नहीं रह पाता । तो इन तीन के मोह में तीनों ही तो बिगड़ गए । अकेला हो जाय तो लो शरीर के परमाणु भी भीतर न रहे । शरीररूपता को छोड़कर जैसी शकल पहले थी उस शकल में आ गए । यों वे भी ठीक रहे, अकर्मरूप हो गए, कार्माणवर्गणायें वे भी ठीक रही, और सबसे निराला अकेला यह चैतन्य स्वरूप हो गया, मायने सिद्ध भगवान हो गया तो यह भी अनंतकाल के लिए, सदा के लिए सब ठीक हो गया ।

सर्वव्रत शील सद्ध्यानों का आधार सहजात्मस्वरूप परिचय―अहो जो बात सदा के लिए भली मिल सकती है उसकी उपासना नहीं है, ऐसा प्रबल मैल छाया है, और जो अध्रुव है, भिन्न है, विपत्तियों का धाम है ऐसे परपदार्थों में इस मोही का उपयोग उलझा हुआ है । सो जिसने अपने आत्मा का यह स्वरूप जाना वह परिग्रह से विरक्त रहता है और जिसके परिग्रह से विरक्ति है वे ही परिमाण कर पाते है और उस परिग्रह के परिमाण को निभा लेते है, अन्यथा सम्यग्ज्ञान हुए बिना भावुकता में कुछ भी व्रत ग्रहण कर लेने पर वे निभ नहीं पाते, क्योंकि भीतर ज्ञान प्रकाश उतना हो नहीं सकता । इससे परिग्रहपरिमाण अहिंसाव्रत सभी का मूल है अपने आपके अविकार चैतन्यस्वरूप का अनुभव पा लेना और उस स्थिति में सहज आनंद जगेगा उसके अनुभव के बल से स्पष्ट उसे जाहिर हो गया कि अन्य समस्त समागम मेरे लिए सारभूत नहीं । मैं अपने ही अनंत ऋद्धि संपन्न इस चैतन्यस्वरूप में ही मग्न रहूं । इस ही में मेरी पवित्रता है और सदा के लिए कल्याण है ।

कषाय के आश्रयभूत बाह्यपरिग्रह के त्याग से शांति के उपाय की संभवता―इस जीव को कष्ट देने वाला कषायभाव है । भीतर में जहाँ क्रोध, मान, माया, लोभादिक कोई कषाय जगी तो उस कषाय से यह भगवान आत्मा वहीं ही तप्त हो जाता है और ये जितने परिग्रह है अंतरंग परिग्रह बहिरंग परिग्रह, चेतन परिग्रह, अचेतन परिग्रह, ये सभी कषायभाव को बढ़ाने के साधन हैं, इस कारण परिग्रह का त्याग करना बना । त्याग न बने तो परिमाण करना यह आत्मकल्याण के लिए लाभदायक है । एक प्रश्न है कि बतलावो कौनसा पुरुष है ऐसा जो स्त्रीजनों के वश में नहीं है? कौनसा पुरुष है काम विकार से जिसका मन् खंडित नहीं हुआ है, कौनसा पुरुष है ऐसा जो इंद्रिय के द्वारा जीता नहीं गया? और कौनसा पुरुष है वह जो कषाय से संतप्त न हो? ये चार प्रश्न किये है इनका उत्तर एक है । जिसने अंतरंग और बहिरंग परिग्रह का त्याग किया । जो अंतर बाह्य परिग्रहों को ग्रहण नहीं करता वह पुरुष है ऐसा जो स्त्रीजनों के वश नहीं है, जिसका मन कामवासना से खंडित नहीं हुआ, जो इंद्रिय के द्वारा जीता नहीं गया, जिसे कषायों ने दबाया नहीं । वह पुरुष है जिसने किं अंतरंग बहिरंग सर्व परिग्रहों का त्याग किया । धर्मसाधना की सबकी अभिलाषा बनी है । मंदिर आते हैं, जल्दी नहायेंगे, स्वाध्याय करेंगे, अनेक कार्य करेंगे । सबके चित्त में भाव है कि मैं धर्मसाधना करूं । मगर धर्मसाधना की मौलिक विधि, सिस्टेमेटिक विधि यह है कि पहले भीतर का वह ज्ञान प्रकाश पायें जिसमें अपने का और परकार सही-सही बोध हो । यह तत्त्वज्ञान हुए बिना धर्मपालन हो ही नहीं सकता । धर्म के नाम पर मंदकषाय है, उसके पुण्य हो जायगा, पर जिसे कहते हैं कि मोक्ष में लग गया, मोक्षमार्ग में आ गया, वह बात न हो पायगी जिसके स्वपर विवेक वाला तत्त्वज्ञान नहीं है । तो यहाँ इसी बात को देखिये कि यह मैं अमूर्त ज्ञानमात्र स्वयं स्व सहज ऋद्धि अतिशयों से संपन्न हूँ, जिसका प्रभाव यह है कि यह दु:खी न रहे । वह सब कला मेरे में है । ऐसा स्वरूप मेरे में है और इसे छोड़कर मायने अपने सिवाय जगत में जितने भी पदार्थ हैं चेतन अचेतन जितने भी समागम हैं ये समागम मेरे हित के काम में न आ पायेंगे, बल्कि इनमें लगाव, मन होने से मेरा बिगाड़ चल रहा है । यह बात खूब ध्यान में जमा लीजिए ।

ममत्वत्याग बिना धर्मवत्सलता की असंभवता―भैया ! मरते समय तो ध्यान में आ ही जायगी यह बात, प्राय: आ ही जाती । जब जान रहे कि मैं जा रहा हूँ, मर रहा हूँ, यह धन, मकान, ये सब मेरे क्या काम के हैं । पड़े रहेंगे, मुझ से बिल्कुल भिन्न हैं । अज्ञानी होंगे तो संक्लेश करेंगे कि हाय यह सब छूटा जा रहा, ज्ञान होगा तो मरण समय में विरक्ति बढ़ेगी । तो आखिर मरण समय में यह बात कुछ ध्यान में आयगी । भला है कि अपने जीवन में ही यह बात समझ लीजिए । यदि यह स्पष्ट प्रकाश रहे कि ये चेतन अचेतन सभी पदार्थ मेरे से अत्यंत भिन्न हैं, इस समय भी ये मेरे हित के काम नहीं है । बल्कि इनका ख्याल करके जो राग बन रहा है और द्वेष बन रहा है वह मेरे अहित में है । यह बात ध्यान में जमी हो तो धर्मपालन की बात बनेगी और परिग्रह की तृष्णा का भाव चित्त में है तो वहाँ धर्मपालन की बात न बन सकेगी । दोउ काम नहीं होय सयाने । भोग विषय और मोक्ष में जाने । जैसे एक म्यान में दो तलवार नहीं समा सकते ऐसे ही एक उपयोग में परिग्रह की तृष्णा बनी रहे विषयों की तृष्णा बनी रहे और मोक्ष मार्ग भी चलता रहे । ये दो बातें कभी नहीं हो सकती हैं । चाहे एक म्यान में दो तलवार जबरदस्ती करके डाल भी दी जायें यह तो संभव हो सकता क्योंकि म्यान कुछ बड़ी बन सकती, मगर मोक्षमार्ग में ये दोनों बातें एक साथ न चलेंगी कि इंद्रिय विषयों की तृष्णा भी बनी रहे और मोक्षमार्ग भी चलता रहे । आखिर कितना सा जीवन है? यदि अपने भाव निर्मल बन सके तो इस भव में भी सुखी रहेंगे और आगे भी सुखी रहेंगे । और यदि भाव बुरे रहे दूसरे के अहित के रहे, दूसरों पर कषायों के रहे तो इस समय में भी चित्त दुःखी रहेगा, और जो खोटा बंध किया उसके फल में आगे भी दुःख मिलेगा ।

विवेकबल से आत्मसंबोधन में बुद्धिमानी―भैया, विवेकी बनें । छोटे बच्चों को तो खूब समझा लेते, देखो बेटा राजा बेटा बनो राजा बेटा ऊधम नहीं करते, हठ नहीं करते, तुम तो राजा बेटा हो । अरे जरा अपने भी ऊपर इस उपयोग को समझालो कि ऊधम न करो, अन्य पदार्थों की ओर ही उपयोग लगाकर अपना जीवन मत खोवो, तुम तो भगवान स्वरूप हो। तुम्हारे में तो बड़े ज्ञान और आनंद का अतिशय पड़ा हुआ है। जरा समझा लो अपने को। और न समझावोगे तो बरबाद कौन होगा? खुद ही तो बरबाद होगा। सो काम, स्त्री, तृष्णा इनके वश वही पुरुष हैं जो अंतरंग और बहिरंग परिग्रहों को ग्रहण करता है, जो ग्रहण न करे वह निमित्ताधीन नहीं। जो लोभ का त्याग कर निर्दोष रसायन से निर्दोष हुआ है वह इस दुष्ट तृष्णा को खतम कर देता है। इस जीव को मथ-मथकर पीड़ित करने वाला कषाय तृष्णा है परिग्रह की तृष्णा, सो ऐसा जानकर श्रावकजन परिग्रह परिमाण करके रहे जिसका उद्देश्य सही बना उसके तो चलेगा जीवन में योग्य आचार और जिसने अपना उद्देश्य ही नहीं बनाया है सही उसका जीवन अटपट चलेगा और कभी शांति न मिल जायगी । जैसे नाव को पतवार से कितने ही लोग खेवे तो उससे तो नाव आगे बढ़ती चली जायगी मगर नाव किस दिशा में जाय यह उस नाव के पीछे रहने वाले कर्णधार पर निर्भर है। कर्णधार का नाम है दिशा देना । कर्णधार जिस दिशा का संकेत देगा नाव उस तरफ बढ़ जायगी । तो ऐसे ही समझ लो, यह जीव क्या-क्या पुरुषार्थ नहीं कर रहा, सभी उद्यम कर रहा, तेज उद्यम कर रहा, लड़ने वाले लड़ाने का उद्यम कर रहे, धनार्जन करने वाले धनार्जन का उद्यम कर रहे, और यहाँ वहाँ जिसको जो रुचता है वह उसका उद्यम कर रहा, सो चल तो रहा यह जीव बहुत तेज मगर सम्यग्दर्शनरूप कर्णधार जिसके पास है वह मोक्षमार्ग में तेज चल रहा और सम्यग्दर्शन का कर्णधार जिसके नहीं है वह अटपट तेज चल रहा है ।

वैभव के लगाव की निपट बेहोशी―राजा भोज एक बहुत बड़ा ज्ञान प्रिय माना जाता था । ज्ञान की बात सुनने पर मनमाना पुरस्कार दिया करता था । एक बार एक कवि को बहुत दिनों से कुछ नहीं मिला, भूखों रहने लगा तो उसने सोचा कि अब क्या करूं, चोरी ही करना चाहिए । मगर छोटे लोगों के यहाँ क्या चोरी करना, राजा के यहाँ ही चोरी करना चाहिए । सो एक दिन रात्रि के समय मौका पाकर वह राजा के भवन में घुस गया । उसको छिपने को कोई ठीकठीक जगह न मिली तो राजा के पलंग के नीचे ही छिप गया । राजा आया, शयन करने लगा । अब उसे नींद आये नहीं सो एक रचना करने बैठ गया । अपने वैभव का वर्णन उस रचना में करने लगा । छंद के तीन चरण तो बन गये, चौथा चरण नहीं बन पा रहा था, सो वे तीनों चरण बार-बार दुहरा रहा था, चौथा चरण उससे बने ही नहीं । वे तीन चरण इस प्रकार थे―

चेतोहरा: युवतय: सुहदोऽनुकूला: । सद्वंधवा, प्रव्रतिगर्भगिरश्व भृत्या: । गर्जंति दंतिनिवहास्तरला: तुरंगा: ।

उन्हें सुनकर उस चोर कवि से न रहा गया और नीचे से बोल उठा―सम्मीलने नयनयोर्न हि किंचिदस्ति । अब राजा के तीन चरणों में तो यह लिखा था कि मेरे पास चित्त को हरने वाली इतनी स्त्रियां हैं, इतने घोड़े हिनहिनाते हैं, इतने हाथी गरजते हैं, इतने आज्ञाकारी नौकर हैं, सभी लोग हमारे बड़े आज्ञाकारी हैं । तो उस चोर कवि ने चौथे चरण में यह कहा कि आँखें मीच जाने पर ये सब कुछ नहीं रहते है । तो उस चौथे चरण को सुनकर सहसा ही अवाक रह गया, (सोचकर) अरे यह कौन बोला (नीचे देखकर) अरे भाई तुम कौन हो? चोर (बाहर निकलकर) राजन् मैं चोर हूँ ।... नहीं-नहीं तुम चोर नहीं, तुम तो हमारे गुरु हो । हम अभी तक बहुत भूल में थे । अपने प्राप्त वैभव को ही हम अपना सर्वस्व समझ रहे थे, पर तुमने मुझे संबोधा कि आंखें मीच जाने पर फिर ये अपने कुछ न रहेंगे । आखिर उस चोर कवि ने अपनी बात सुनाया, राजा ने बड़ा पुरस्कार देकर विदा किया । तो उस चोर कवि की बात अपने ऊपर क्यों न घटावें । केवल बोलने सुनने के लिए वह बात नहीं है । भीतर में अपनी-अपनी बात सब निहारो, क्योंकि इस संसार में खुद के खुद ही जिम्मेदार हैं । इन असार भिन्न सत्ता वाले पदार्थों के बारे में, इन चेतन अचेतन पदार्थों के विषय में कल्पनायें, रागद्वेष, हठ, और आसक्ति चल रही है क्या, इसका विचार तो करले । अगर हठ और आसक्ति चल रही है तो समझो कि हम पर बहुत बड़ी विपत्ति छायी है, निकट काल में ही बड़ा कष्ट मिलेगा।

बाह्य वैभव न होने पर भी मूर्च्छा के कारण कष्टाक्रांतता―जितने भी कष्टकारी कदम है उन सबका आधार है मूर्छा । मूर्छा को ही भगवान ने परिग्रह बताया है । तब बाह्य परिग्रह चाहे कम हो पर मूर्छा अधिक हो तो वह तो बड़ा परिग्रह कहा जायगा । जिसके बाह्यपरिग्रह अधिक है और मूर्छा अल्प है तो वह अल्प परिग्रह कहा जायगा । बाह्य परिग्रह से रहित तो दीन दरिद्री भी हैं पर उनके अंतरंग परिग्रह तो लगा है विकट । और ऐसे कितने ही मनुष्य हैं जो कि जन्म के बाद से ही मांगना शुरु कर देते हैं । 4-6 वर्ष के बालक अब भी स्टेशनों पर बस अड्डों पर मांगते हुए पाये जाते हैं । वें तो बेचारे फटे पुराने वस्त्र पहने रहते, कोई टूटा फूटा एल्मोनियम या टीन का बर्तन रखे रहते, मांगते खाते अपना समय बिताते हैं । पास में एक पैसा नहीं । बड़े नम्र भी दिखाई पड़ते है दूसरों के द्वारा अपमानजनक शब्द भी सुनकर हंस हँसकर टाल देते हैं लगता तो ऐसा है कि निष्परिग्रह तो वास्तव में वे हैं, पर ऐसी बात नहीं है । उनके पास तो कुछ नहीं है, पर मूर्छा उनको इतनी होती कि वे दुनिया का सारा वैभव चाहते हैं अंतरंग परिग्रह उनके साथ बड़ा तेज लगा है । तो उन्हें परिग्रह का महापाप लगता है, विषयों की बात देखो―कभी इन्होंने मिठाई विशेष नहीं खायी, बड़े अच्छे शौक के वस्त्र भी नहीं पहिना, जिनका न विवाह हुआ, न स्त्री, न बच्चे, न पेट भर खाने को ही मिला, सोना, रत्न, हीरा जवाहरात कभी देखा नहीं, धन वैभव जिनके पास कभी जमा हुआ नहीं, रहने को जिनके पास कुटी तक नहीं मगर भीतर में उनकी ममता देखो तो विकट मूर्छा है, वहाँ इतने विकल्प चलते है कि आत्मा के स्वरूप की सुध लेने का वहाँ अवकाश ही नही । सो बाह्य परिग्रहों को परिग्रह कहा जाय, पाप कहा जाय तो भिखारियों के पास तो कुछ नहीं है, तो क्या वे निष्परिग्रह हैं? धर्मात्मा है? नहीं ।

बाह्य परिग्रह के लगाव के रहते अंतरंग परिग्रह त्याग की असंभवता―अच्छा, कोई यह पूछ सकता है कि अंतरंग परिग्रह को ही जब परिग्रह माना जाता तो बाह्य परिग्रह कितना ही बना रहे उससे नुकसान क्या? तो उसका भी उत्तर खुद समझ लीजिए । बाह्य परिग्रह निकट है, सम्हालते, रखते हैं, तद्विषयक राग और आसक्ति है ना, ये ही मूर्छा के कारण बन जाते है । सो बाह्य परिग्रह मूर्छा का कारण है इसलिए त्यागने योग्य है और अंतरंग परिग्रह तो साक्षात् इस भगवान आत्मा को मथता रहता है सो त्यागने योग्य है । दोनों ही परिग्रही का त्याग अहिंसा कहलाता है । मूर्छा साक्षात् हिंसा है । अनंत ऐश्वर्य शक्तिवान भगवान आत्मा को जो मथ डाले उस भाव को तो हिंसा ही कहा जायगा । सो परिग्रह को सर्व अनर्थ का कारण जानकर इसका परिमाण करना और परिमाण के बाहर के परिग्रह में रंच भी आकांक्षा न होना यह श्रावक का मुख्य कर्तव्य है । धर्मपालन की दिशा परिग्रह परिमाण के बाद मिलेगी । सो आज परिग्रह परिमाण के बाबत चर्चा तक भी नहीं चलती और धर्म करना, धर्म करना, इस नाम पर उत्सव समारोह मंदिर पूजा, विधान यज्ञ आदिक सब कुछ चलते है । पर यह बात चित्त में अभी तक भी नहीं प्राय: आज तक कि परिग्रह का परिमाण किए बिना ये सब बातें थोथी हैं, क्योंकि बाह्य पदार्थ विषयक तृष्णा संस्कार तो यहाँ बना है और इस संस्कार वाले हृदय में धर्म की बात का स्थान मिले यह कैसे हो सकता है? परिग्रह का परिमाण करने वाले के तृष्णा का संस्कार नहीं रहता । यद्यपि परिग्रह निकट है और उसकी व्यवस्था भी बनायी जा रही है, फिर भी परिमाण होने से वह तृष्णा का संस्कार न रहेगा, क्योंकि उसके बाहरी कोई आकांक्षा ही नहीं है ।

परिग्रह परिमाणव्रती ज्ञानी के हृदय में महारंभी धनिकों के प्रति दया का भाव―बड़े-बड़े धनिकों को देखकर अज्ञानी को अचरज सा होता और कुछ यों लगता कि सुखी तो ये हैं क्योंकि उन बड़े धनिकों की मुख मुद्रा भी अच्छी है, उनके साथ दो तीन सिपाही भी चल रहे है । लोगों के मिलने का तांता भी चल रहा है । लगता है कि ये बड़े सुखी होंगे, और इतना धन हो तब ही ठीक है । यह कल्पना अज्ञानियों के हुआ करती है । ज्ञानीजन तो उस बड़े धनिक को देखकर दया करते हैं कि यह कितना अधिक दु:खी है । कितना अधिक परिग्रह में इसका चित्त चलता रहता है । और अपने आत्मा भगवान के स्वरूप की ओर आने का इसे मौका ही नहीं रहता है । यह बड़े कष्ट में है । ज्ञानी को तो यों दया आयगी, लालच आने की बात तो बिल्कुल दूर है । बड़े पुरुषों की देखकर ज्ञानी के चित्त में लालच न आयगा, किंतु दया आयगी, क्योंकि वह जानता है कि परिग्रह में इसका इतना उपयोग फंसा है कि इसको अपने आत्मस्वरूप की भी कुछ सुध नहीं है । तो परिग्रह परिमाण में गुण परखिये―श्रावक के धर्म का मूल आधार परिग्रह का परिमाण है, तृष्णा का परिहार है । गृहस्थाचार में रहे, वह चाहे थोड़ा परिग्रह रखे चाहे बहुत, पर परिमाण रहे तो उसको धर्म का प्रकाश मिलता है । परिग्रह बिना गृहस्थ के पास परिग्रह न हो तो वह भी कौड़ी का नहीं । खुद का जीवन न चलेगा, ढंग से रह न सकेगा, सो परिग्रह बिना काम तो नहीं चलता मगर परिग्रह के पीछे ही मरना और जीवन लगा देना, यह कौनसी बुद्धिमानी है? हो रहा है जैसा उदय है, आ रहा है जैसा उदय है, घर में रह रहे है सो पुरुषार्थ करने की बात है, कर रहे पर उस ही में अपना दिल बसाये रहना यह तो जीव को बेकार खो देना है । परिग्रह का परिमाण होना और पाये हुए परिग्रह से भी विरक्त रहना यह ज्ञानी श्रावक की चर्या होती है । घर गृहस्थी में अनेक घटनायें आती हैं और पद-पद पर फिर आये, खर्च करे, काम चलेगा । पर यह तो एक काम चलाऊ की ही बात चित्त में रहनी चाहिए । उसके बारे में और देख देखकर खुश होना । रखना जोड़ना, उसकी तृष्णा होना, यह तो अनर्थ के लिए है । सो परिग्रह का परिमाण करना और रखे हुए परिग्रह में भी विरक्त रहना ।

बाह्य पदार्थों से उपयोग हटाकर सहजात्मस्वरूप में उपयोग लगाने में ही आत्मरक्षा―भैया, आखिर है तो बाह्य पदार्थ । इनसे इस मेरे आत्मा में कोई अतिशय प्रकट नहीं हो सकता सो भीतर एक निष्परिग्रह अपने स्वरूप का आलोकन तो करें । इस आत्मा के साथ क्या चिपटा है? आप अपने मकान से चलकर यहाँ शास्त्रसभा में आये तो बताओ आपके साथ आपका घर, परिजन, धन दौलत कुछ चिपक आया है क्या? अरे सब जहाँ के तहां पड़े हैं, आप अकेले यहाँ आये हैं, आपके साथ जो यह शरीर लगा है वह भी आपका नहीं है, आप से अत्यंत भिन्न है । भले ही एक क्षेत्रावगाह है मगर स्वरूप तो अत्यंत जुदा है । सो इन जुदे पदार्थो की दृष्टि में, इनके अनुराग में भगवान आत्मा की बरबादी ही है, लाभ कुछ नहीं है । सो अपने आपको किसी समय निसंग तो परखिये―अमूर्त ज्ञानमात्र आकाशवत् निर्लेप किंतु चेतन गुण से अधिक यह मैं आत्मा अन्य किसी चीज को ग्रहण नहीं कर सकता हूँ । केवल यहां भाव बनाता रहता हूँ । भावों के सिवाय और कुछ काम नहीं कर पाता । तो बाह्य परिग्रह मेरा क्या है? कुछ भी नहीं । ऐसा एक बार दृश्य तो अंदर समाये और सबसे निराला यह ज्ञानमात्र अमूर्त अंतस्तत्त्व दृष्टि में आये तो एक ऐसा अलौकिक सहज आनंद जगेगा कि जिसके अनुभव के बाद स्पष्ट निर्णय होगा कि किसी भी बाह्य पदार्थ में मेरा कुछ नहीं है । मैं अपने आप में लीन होऊं तो मेरी रक्षा है । बाह्य पदार्थों की ओर उपयोग लगाऊं तो वहाँ मेरी बरबादी है ।

परिग्रह परिमाणव्रती सद्गृहस्थ की ऋण न लेने की अर्थनीति―श्रावक के 5 अणुव्रतों में यह परिग्रह परिमाण अणुव्रत का वर्णन चल रहा है । परिग्रह परिमाण गृहस्थ के लिए अतीव आवश्यक है । क्योंकि ऐसा किये बिना संतोष न रहेगा, धर्म में मन न रहेगा और तब ही तो चित्त में यह बात रहती है कि धर्म के लिए हमें समय कम है । समय कैसे कम है, पर परिग्रह का परिमाण न होने से तद्विषयक तृष्णा का संस्कार रहने से उसका विकल्पों में ही सारा समय जाता है । उन विकल्पों के कारण धर्म में चित्त नहीं जमता । तो परिग्रह परिमाण गृहस्थ के लिए अतीव आवश्यक है । परिग्रह परिमाण की भावना रखने वाले परिग्रह का परिमाण करने वाले गृहस्थ अपनी अर्थ नीति की कला का भली प्रकार ध्यान रखते हैं । कभी ऋण नहीं लेते । कर्ज लेकर अपनी आवश्यकता को पूर्ण नहीं करते, फिर कोई कहे कि आवश्यकता है तो क्या करें तो कौन कहता कि आवश्यकता है? जैसा चित्त बनाया वैसी अपनी आवश्यकता रह जाती है । इसका यकीन न आये तो अपने से गरीबों की ओर दृष्टि दो उनका कैसे गुजारा होता है? तो ऋण लेकर पीछे उसका भाव अधीर हो जाता है । उसके प्रति लोगों की प्रतीति नहीं रहती । सोचेंगे कि यह ऋण लेता है, इसके कुछ होगा नहीं । यह कर्ज से अपना गुजारा चलाता है यों दीनता प्रकट हो जायगी । एक बार प्रतीति बिगड़ी पीछे आजीविका का ढंग बनना भी कठिन हो जाता है, इस कारण यह कला जरूर गृहस्थों को ध्यान में रखना है कि आजीविका के अनुकूल खर्च करें । किसी अन्य पुण्यवान को आधिक खर्च करते हुए देखकर अपने में यह तृष्णा नहीं करता । अपना खर्च अपनी आमदनी के अंदर रखना अन्यथा यश धर्म और नीति तीनों ही खतम हो जायेंगे, न उसका धर्म में चित्त रहेगा न यश रहेगा । और क्या करना? कुछ उसे मार्ग भी न सुहायेगा । इससे जीवन में महान् कार्य तो धर्म में उपयोग रखना समझियेगा । बाहरी बातें जैसे गुजरनी हों गुजरें । कोई कहे कि इससे तो लोक में यश न फैलेगा? यश वांछनीय तत्त्व नहीं है । यदि चाहते ही तो लोक में यश फैलने के अनेक उपाय हैं । धन से यश नहीं फैला करता है । धन वाले भी यदि परोपकार न करें, धर्म के कार्यों में न खर्च करें तो वहाँ यश कहां फैलता? यश के तो अनेक उपाय है तन से, मन से, वचन से और धन से दूसरी का उपकार करने में यश फैलता है । अगर कर्ज लेकर या अपनी भीतरी नीति बिगाड़कर जीवन चलाया तो वह सारा जीवन अंधेरे में रह जाता है । यदि यह जीवन उज्जल रहे, भले ही एक मनुष्यभव में थोड़ा खर्च कम करके रहें भोगोपभोग के साधन न बनें और शांत रहें तो यहाँ ही ऐसा पुण्यरस बढ़ेगा कि इस भव के बाद वह महान् ऋद्धि वाला देव भी हो जायगा । फिर खूब ऋद्धि संपन्न रहेगा तो अपने धर्म को कभी न बिगाड़ना, इसी में ही बुद्धिमानी है ।

परिग्रहपरिमाणव्रती सद्गृहस्थ की आय से कम खर्च करने की अर्थनीति―अपनी आय से कम खर्च हो और अपना कुलवानपना रहे । यदि यह सही बात रहेगी तो धर्म में उसका चित्त चलेगा । आवश्यकता की बात दो ही तो है―उन ढाकने को दो कपड़े, पेट भरने को दो रोटियां । इतना साधन हर एक के सुलभ है । किंतु जो और बात विशेष बढ़ा रखी है कि मुझे दुनियां में यह दिखाना, ऐसी जो अनेक बनावट करते हैं वे विपत्ति के साधन हैं, अन्य बातें आप में पुण्योदय के अनुकूल स्वयं होगी । एक बात यह है कि खर्च कम करना, सात्विक वृत्ति से रहना । उदाहरण के लिए लीजिए । जो लोग बीड़ी पान आदिक पीने खाने में रोज 8- 10 रुपये खर्च कर डालते है वे यदि बीड़ी सिगरेट पान आदि का प्रयोग न करें तो लाभ भी है और फिजूल खर्च से भी बच जायेंगे । अनेक खर्च फिजूल के ऐसे हैं जो व्यर्थ के हैं, बुद्धि को बिगाड़ने वाले हैं । अरे आज सुयोग से जैन शासन मिला है । सद्गृहस्थ हुए हैं तो अपना कर्तव्य है कि सात्त्विक वृत्ति से रहकर धर्मकार्यों में विशेष उपयोग लगायें ।

अनुकूल बाह्य सामग्रियों के सान्निध्य में धर्मसाधन की सुविधा―कोई कह सकता कि धर्म साधना तो आत्मा के अधीन है अर्थ अर्जन की समस्या अलग है । वह पूर्वकर्म के अधीन है या वर्तमान व्यापार के अधीन है । तो धर्मसाधना तो स्वयमेव बन जायेगी उसकी क्योंकि वह स्वाधीन है, फिर इतना जोर क्यों दिया जा रहा कि घर में रहते हुए अर्थनीति का सदाचार रखियेगा, जिससे कभी कर्जदार न बनें और विकल्प तरंग न बढ़ाने पड़े, क्योंकि धर्म साधना तो खुद के अधीन की बात है । समाधान, बात तो सही है, धर्म की साधना आत्मा के आश्रय से होती है । लेकिन धर्मसाधना हो सके उसकी पात्रता तो पुण्य कर्म के उदय से बनेगी । जैसे मनुष्य हुए, नीच, चांडाल, दरिद्री हुए तो वहाँ तो उसके अनुरूप भाव चलेंगे, संक्लेश के भाव रहेंगे, धर्मसाधना की पात्रता न हो पायगी, उत्तम कुल में जन्म पाना, उत्तम कुल में उल्पन्न होना, अच्छे देश में होना, इंद्रियां परिपूर्ण होना, शरीर रोग रहित हो, अच्छी संगति मिले, आजीविका स्थिरता से हो ऐसी पुण्योदयजन्य बाह्य सामग्री जहाँ मिलती है वहाँ ही धर्म ग्रहण और धर्म का सेवन बनता है । तो धर्मसेवन यद्यपि आत्मा के ही अधीन है मगर ऐसा आत्माधीन धर्म का पालन उसके बनता है जिसके ऐसी बाह्य सामग्री है । अत: पुण्य करना, अर्थ नीति व्यवस्थित रखना यह गृहस्थजनों का एक आवश्यक कार्य है ।

सदाचारी मनुष्य की आजीविका की सुविधा―जो मनुष्य सत्पात्र रहेगा, न्याय अन्याय का विवेक रखेगा, सबसे प्रिय वचन बोलेगा, दूसरे के धन पर निगाह न डालेगा, अन्य स्त्रियों से विमुख रहेगा, आलस्य और प्रमाद न करेगा, धीर रहेगा ऐसे पुरुष की आजीविका का लाभ होना सुगम है । अब भी देखा जाता है कि घर में रहने वाला दुकान में रहने वाला नौकर यदि ईमानदार है तो उसकी सब चाह करते हैं और उसकी आजीविका आदि का बहुत विशेष ध्यान रखते है और एक बार कोई बेईमानी से वह धन हड़प ले तो उस नौकर के प्रति लोगों को प्रतीति नहीं रहती और धन भी उसके पास नहीं रह पाता क्योंकि फाल्तू अनाप सनाप बिना कमाये, बिना सदाचार के जो धन मिला है वह टिक नहीं पाता । जैसे विवाह करने में लोग दहेज अधिक मांग लेते है तो चूंकि उनको मुफ्त मिलता दूसरे का धन, दूसरे का दिल दुखाकर मिला तो वह धन उनके पास टिक नहीं पाता, ऐसे ही अटपट वृत्ति से पाया हुआ धन टिकता नहीं है । और टिके या न टीके, उसका क्या ख्याल करना? जरा अपने आत्मा का तो ध्यान रखो । मेरे परिणाम सदैव निर्मल रहें ताकि मेरा भविष्य सुंदर रहे । तो श्रावक पद में भले प्रकार धर्म साधना करें, ऐसी भावना रखने वाले को परिग्रह का परिमाण अवश्य रखना चाहिए ।

सद्गृहस्थ का कुटुंबीजनों को संबोधने का कर्तव्य―यहां एक समस्या सामने आ सकती है कि लोग जब समझाते हैं कि तुम अपना श्रद्धान सही रखो और अपने मन को समझा लो । और अगर हम सात्विक वृत्ति से रहने लगे, धर्म कार्यों में चित्त लगाने लगे, तो फिर घर में जो कुटुंबीजन हैं माता-पिता वगैरह उनका क्या करेंगे? तो उसका उत्तर है कि तुम उन कुटुंबीजनों को समझावोगे कि देखो तुम लोगोंने पूर्व जन्म में दान नहीं दिया, व्रत का पालन नहीं किया, भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक नहीं रखा, अन्याय कुछ नहीं गिना, दूसरों का धन हरा, तो उन पूर्व जन्म के पापकर्मों का उदय है जो अपने को एक दरिद्रता प्राप्त हुई है, विशेष धन नहीं मिला है, मगर इसकी परवाह क्या करना? जितना अपनी आजीविका में प्राप्त होता है उतने में ही गुजारा करके धैर्य रखना यह कर्त्तव्य है अन्यथा आगे भी दुःख सहने पड़ेंगे । इससे धर्म में प्रीति करो । इस प्रकार से कुटुंबीजनों को समझाना है । यदि दूसरे धनिकों के आभरण शृंगार, आभूषण आदिक निरखकर उनका मौज, मोटर आदिक देखकर तुम भी आकांक्षा करोगे, भीतर में मंथन मचावोगे तो मरकर तिर्यंच होना पड़ेगा, फिर क्या बीतेगी? इससे इस समय मनुष्य हैं, श्रेष्ठ मन मिला है, उत्तम समझ आ सकती है कि दुनिया से आँखे मींच लो और अपना जैसे भला होता हो वैसी प्रवृत्ति करो । इस प्रकार ज्ञानी पुरुष निर्धन अवस्था में कुटुंबीजनों को समझाता है और उन्हें भी धर्म मार्ग में लगाता है । और देखो जो आज स्थिति मिली है निर्धनपने की उस स्थिति में जिन शासन का सहारा लेकर धर्म में प्रीति लगाकर संतोषवृत्ति में रहा जाय तो वहाँ तो ऐसी कर्मनिर्जरा होगी जैसी कि मुनिजन बड़े तपश्चरण करके कर्मनिर्जरा करते हैं । सो जिसे जो कुछ भाग्योदय से प्राप्त हुआ उस ही के अंदर व्यवस्था बनायें और परिग्रह का परिमाण रखें, ऐसे श्रावकजन इस भव में भी प्रसन्न रहते हैं, निर्मल रहते हैं और भविष्य में भी उनका आत्मा प्रसन्न रहेगा । ऐसी परिग्रह परिमाण व्रत की बात कहकर अब उसके अतिचार बतलाते है जो दोष परिग्रह परिमाण व्रत वाले को न करना चाहिए ।


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