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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 77

From जैनकोष



परशुकृपाणखनित्रज्वलनायुधश्रृंगश्रृंखलादीनाम्।

वधहेतूनां दानं, हिंसादानं ब्रुवंति बुधा: ।। 77 ।।

हिंसादान नाम के अनर्थदंड का स्वरूप―जो हथियार जीववध के कारणभूत है उनका देना हिंसादान कहलाता है । बरछी, तलवार, कुदाली, आग, विष आदिक जो पदार्थ दूसरे के वध के कारणभूत हैं उनका दान करना, होते होंगे कोई ऐसे अज्ञानी मूर्ख दानी जो ऐसी चीजों का भी दान करें, कि लेते जावो हमारे पास से जितना चाहो यह सब अनर्थ दंड है । और पाप करने की बात जाने दीजिए । कोई अगर मांगे और यह अंदाज हो जाय कि यह किसी क्रोध में है और असमय में मांग रहा तो जो घर गृहस्थी के काम आते हैं चाकू, आग, खुरपा, आदिक इनको भी नहीं देता है । जिससे हिंसा उत्पन्न हो ऐसी वस्तु अन्य को देवे तो वह हिंसा दान नाम का अनर्थ दंड है । अब वैसे ही विचारो किसीने मांगा कि फावड़ा देना, तो सोचो तो सही कि वह उस फावड़े से क्या करेगा? वह गीली जमीन खोदेगा, कितने ही कीड़ों का उसमें घात होगा । तो गृहस्थ को यद्यपि अपने भाई चारा में पड़ोस में प्रेमियों से न निभेगा कि वह न दे, क्योंकि वह दूसरे की न देगा तो दूसरा भी कौन उसे देगा? तो चाहे न निभे, किंतु यह ध्यान रखना है कि जिस चाहे को न देना । काम क्या होगा उससे? वह जानता है कि जो साधर्मी जन हैं, दयालु हैं, हिंसा से डरते हैं और मांग लिया उन्होंने तो उसे विश्वास है कि ये जीव वध न करेंगे, पर जो जीव बध से डरते नहीं वहाँ तो एक ऐसी छोटी चीज को भी नहीं देता । देता है तो वह हिंसादान नाम का अनर्थ दंड है, फिर ऐसी चीज को बेचना नहीं । देखो यदि बहुत निर्दोष व्यापार की बात कही जाय तो कहने को क्या रह जाएगा? दो चार चीजें मुश्किल से रह पायेंगी । जैसे कपड़े की दुकान या सर्राफा । और यदि बहुत बारीकी से देखे तो न नमक की दूकान कर पायेंगे न गुड़ की । कितनी ही बातें ऐसी है कि जो निर्दोष विधि से चले तो सब व्यापार छूटता है, थोड़े रह जायेंगे, मगर जो साक्षात् बहुत बुरे है उनसे बचना ही चाहिए । तो ऐसी चीजों का बेचना हिंसादान अनर्थ दंड है । अथवा भाड़े पर फावड़ा, कुदाली आदिक उठाना यह काम भी न करना । यदि करे तो वह हिंसादान अनर्थ दंड है । अब कोई कहे कि ये तो जो बारह व्रत पाले उसकी बात कह रहे, हां बात ठीक है मगर जैन कुल में उल्पन्न होने के नाते नहीं भी बारह व्रत पाल रहे थाने अव्रती है तो भी चित्त गवाही देता हो सो तो सोचो―जिसमें हिंसा होती हो ऐसी वस्तुवों को देने, बेचने, भाड़ा देने आदिक को चित्त नहीं चाहता, तो अव्रतियों को भी जहाँ तक हो बचना ही चाहिए । पर व्रती श्रावक तो इस काम को करेंगे ही नहीं । अब अपध्यान नामक अनर्थ दंड कहते हैं ।


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  • रत्नकरंड श्रावकाचार
  • प्रवचन
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