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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 78

From जैनकोष



बधबंधच्छेदादेर्द्वेषाद्रागाच्च परकलत्रादे: ।

आध्यानमपध्यानं, शासति जिनशासने विशदा: ।। 78 ।।

अपध्यान नाम के अनर्थदंड का स्वरूप―अपध्यान बहुत बड़ा पाप है । जैन शासन के तत्त्व को जानने वाले जिन धर्म की उपासना करने वाले श्रावक जैन अपध्यान की बात को बसाये रहते हैं । वासना बनाये रहें यह बहुत एक सोच की बात है । अपध्यान में क्या चिंतन चलता है? दूसरे का बध होना, बंधन होना, छेदन होना, किसी पुरुष को कष्ट पहुंचे, इसका अपमान हो ये बातें सोचना यह अपध्यान है, क्यों सोची जाती है? राग से या द्वेष से । राग से तो यों समझिये कि हमें किसी मित्र से राग है और उस मित्र का किसी दूसरे से द्वेष है तो उसके बारे में खोटा सोचने लगना यह रागवश ही खोटा सोचा गया । जिसका खोटा सोचा गया उससे सीधा द्वेष नहीं है, पर वह मित्र का बैरी है इसलिए मित्र के रागवश बुरा विचार कर लेता, द्वेष से बुरा विचार करता । नहीं सुहाता कोई या अपने यश का राग है तब दूसरे का द्वेष होने लगा, तो राग से द्वेष से किसी भी दूसरे जीव का बध बंधन सोचना, अपमान सोचना यह सब अपध्यान है । जरा अपने इस सहज स्वरूप के दर्शन करके निरखिये तो चित्त में ऐसा कार्य करने से फायदा क्या मिलता है? जो होता है सो होने दो, तुम तो सहज ज्ञानस्वरूप हो । बस देखते जानते रहो, सर्व के ज्ञाता द्रष्टा बनो, इससे गृहस्थ के धर्मपालन में और आजीविका के कार्य में फर्क नहीं आता, ऐसी अटपट बाहरी बातों में अपना दिल जोड़ना, अपध्यान करना, खोटा चिंतन करना यह शोभा की बात नहीं है, बड़प्पन की भी बात नहीं है । इतना उदारचित्त होना चाहिए कि सब जीवों के प्रति सुखी होने की भावना रहे । जब कभी धर्म का व्याख्यान करना पड़े तब बात यह ही तो सब बोलेंगे । सो करनी भी ऐसी ही करें उसी प्रकार करें जिस तरह हम मित्रों में या भरी सभा में बोल सकते, उस तरह का अपना व्यवहार भी बनायें ।

अपध्यान से हटकर सद्ध्यान में रहने का कर्त्तव्य―भैया, जो बुरी बात है उसे सभा में कोई बोल नहीं सकता । प्रयोग कर के देख लो, हां अगर उद्दंड पापी गुंडों की ही सभा हो कोई तो वहाँ जैसा चाहे कोई बोल ले, मगर धर्मसभा एक अच्छी समाज की सभा है और उसमें किसी को खड़ा किया जाय कि यह बोलेंगे तो मन में चाहे पाप की बात हो, पर वह मुख से बोल नहीं सकता । जो बात मुख से नहीं बोली जा सकती वह बात क्या करने लायक है? वह इतनी गंदी बात है कि मुख से बोले नहीं हिंसा की, झूठ की, चोरी की, कुशील की, तृष्णा की, लोभ की, परिग्रह की । तो ऐसी बातों का दूसरे के लिए क्यों खोटा ध्यान करना? स्वयंभूरमण समुद्र में एक बहुत बड़ा मच्छ रहता है जो मुँह बाये पड़ा रहता है, उसके मुख में हजारों मच्छियाँ आती-जाती रहती है फिर भी वह मुँह बाये पड़ा रहता है और उस ही के कान में या आँख में एक छोटासा तंदुल मत्स्य होता है वह उस दृश्य को देखकर अपना माथा धुनता है, करम ठोकता है, सोचता है कि यह महा मच्छ तो बड़ा बेवकूफ है । यह मुँह बाये पड़ा रहता है और हजारों मछलियां इसके मुख में आती-जाती किलोले करती रहती हैं, यदि मैं इसकी जगह होता तो एक भी मछली बचने न देता । अब देखिये इस प्रकार का खोटा ध्यान करने के फल में वह तंदुल मत्स्य मरकर 7वें नरक में जन्म लेता । तो जब धर्म के लिए हम आपका सारा प्रसंग है तो चित्त को इतना स्वच्छ और उदार क्यों नहीं बना पाते कि किसी भी मनुष्य के बंध बंधन का, बरबादी का, अपयश का, अपमान का मैं कभी भी चिंतन न करूं । ऐसा दिल बनाना चाहिए नहीं तो यह अपध्यान नाम का बहुत बड़ा अनर्थदंड लगता रहेगा, लाभ की बात कुछ नहीं है और मोह पाप में डूब जायगा, यह है अपध्यान ।

अपध्यान के दुश्चिंतनों के उदाहरण―यह अपध्यानी पुरुष रागद्वेष ऐसे परिणाम में चिंतवन करता है कि इसका लड़का मर जाय, स्त्री मर जाय, इसे बड़ा बुरा दंड मिले, इसके नाक, कान छिद जाये, आजीविका नष्ट हो, इंद्रियां नष्ट हों, इसका लोक में अपमान हो आदिक । सब जीवों में सहज परमात्मस्वरूप की निरख क्यों नहीं करते? यह मनुष्यभव बारबार मिलेगा क्या? और मानों जो भी काम किये जा रहे है उनसे आत्मा को कोई लाभ पहुंचता है क्या? बड़े ठाठ की हवेली बना ली जाय तो उससे आपके आत्मा को क्या लाभ मिला? उसमें से शांति निकली क्या? बहुत बड़ा परिवार गोष्ठी, पार्टी खूब बना ली जाय तो बताओ उसमें आपने हैरानी पाया या कुछ शांति? व्यर्थ की अटपट बातें, यहाँ वहाँ की गप्प सप्प । बुरा सोचना, इसमें कोई लाभ पाया है क्या? देखो कोई किसी दूसरे के बारे में बुराई की बात कहता है तो कान में धीरे से कहता है, याने मुख से जोर से भी नहीं बोलता है । जैसे कि कुत्ते ने यदि रोटी चुराया तो वह छिपकर पूँछ दबाकर आवाज न कर के चुरायगा । तो चोरी-चोरी दूसरे की बुरी बात कहनी पड़ती है, तो एक इसी से ही अंदाज लगावो कि जो बात हम दूसरे से ऐसा सोचकर कहें कि दूसरा कोई सुन न ले, चोरा चारी कहें तो समझ लीजिए कि बात स्वयं की भी अनर्थ के लिए है । व्यर्थ में अपध्यान न करना ।

अविकार चिद्ब्रह्म की आराधना के प्रसाद से अपध्यान से पूर्णतया हटने का अनुरोध―भैया, खुले साहस यह विश्वास आप रख रहे ना कि कभी तो हम मोक्ष जायेंगे । कभी तो हम परमात्मा बनेंगे, तो वहाँ क्या होता है? एक शुद्ध गुण । विकास तो उसका सेंपुल अभी से क्यों नहीं करते? थोड़ा अपने में स्वच्छता लायें, गुण विकास करें, यह करना प्रारंभ तो कर दे । अगर एकदम हम बुरे-बुरे ही रहे और हम सोचें कि किसी दिन हम परमात्मा बन जायेंगे तो ऐसा हो सकता क्या? नहीं हो सकता । लो अपने आप में इतना तो निर्णय करे कि मुझ को अपध्यान नहीं करना । कहा तो गया यह अनर्थ दंड मगर यह तो साक्षात् बहुत बड़ा पाप है । ऐसे अनर्थ दंडों से विरक्त होना अनर्थ दंडव्रत है । अब यहाँ देखिये―अकिंचित्कर कहा है समयसार में, अनर्थक्रियाकारी भी कहा है, ये दोनों शब्द रख लेना । जैसा मैं दूसरे के बारे में सोचता हूँ क्या मेरे सोचने से वह काम होता है? नहीं होता, मेरा सोचना प्रवृत्ति है । कुछ भी पर्याय हो वह मेरे प्रदेश में ही होगी, मेरे प्रदेश से बाहर नहीं हो सकती । बुरा सोचना अपध्यान करना, यह मेरे में ही तो समायेगा। सोचें कि इस पर आपत्ति आ जाय तो आपके सोचने से वह आपत्ति में आ गया क्या? कदाचित आपत्ति में भी आ जाय आपकी खोटी करने से तो उस करनी से आपत्ति में नहीं आया वह किंतु काल उसके भी पाप का उदय था इसलिए आपत्ति में आ गया, पर आपके सोचने से आपत्ति में नहीं आता। तो अनर्थ क्रियाकारी मायने सोचने का जो काम है वह काम वहां नहीं हुआ और इसीलिए अकिंचित्कर जो आपने दूसरे के बोरे में सोचा कि दुखी करूं, यह आपत्ति डालूँ तो इस सोचने से नहीं हुआ वहाँ इस कारण आपका सोचना अकिंचित्कर है । कोई लाभ देने वाला नहीं है, फिर क्यों दूसरे के कुछ भी विचार करें । मेरा जैसा भाव मेरी जैसी चेष्टा वह मेरे लिए है, उसके बारे में भी अपने मन की करूं तौ यह चेष्टा मेरे लिए है । ऐसा वस्तुस्वरूप जानकर इस अपध्यान नाम के खोटे पाप से बचना ही चाहिए ।


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