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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 8

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अनात्यार्थं बिना रागै: शास्ता शास्ति सतो हितं ।

ध्वनन् शिल्पिकरस्पर्शान्सुरज: किमपेक्षते ।।8।।

आप्तदेव का राग के बिना प्राणिहितकारी सहज उपदेश―इससे पहले श्लोक में तत्त्व के मूल उपदेष्टा आप्त भगवान के गुण बताये गये थे । अब यहाँ प्रभु की निरपेक्षता बतला रहे हैं । प्रभु अपनी खुदगर्जी के लिए नहीं, अपनी किसी इच्छा से नहीं, किंतु राग के बिना प्राणियों के हित का उपदेश करते हैं । जैसे कि बजाने वाले के हाथ से छुवा हुआ मृदंग आवाज देता हुआ क्या किसी की अपेक्षा करता है? नहीं, इसी तरह भव्य जीवों के भाग्य से वचन योग के प्रयोग से उपदेश होता है । वे प्रभु किसी की अपेक्षा नहीं करते । जितना यह धर्मोपदेश आज शास्त्रों में सो है तो अनेक आचार्यों का बनाया हुआ है लेकिन कपोल कल्पित नहीं है । जो ठीक अरहंतदेव की दिव्यध्वनि से चला आया हुआ है वही है । सो उन मूल उपदेष्टा अरहंत भगवान की बात कही जा रही है कि वह उपदेश अपने प्रयोजन के बिना देते हैं, राग के बिना देते हैं । तो वीतराग सर्वज्ञ हुए हैं, अब भव्य जीवों का भाग्य ही उसमें प्रबल निमित्त है कि प्रभु का उपदेश होता है और लोग समझते है, सुनते है । इस उपदेश में सर्वप्राणियों के हित्त की शिक्षा बसी हुई है । जैसे मेघ कुछ इच्छा नहीं रखते कि हम इस गाँव में बरसे पर जहाँ के नगरों के लोगों का पुण्योदय विशेष है वहाँ जाकर मेघ बरस जाते हैं । न लोगों ने मेघों को बुलाया न मेघों ने किसी गाम में जाने की इच्छा की, किंतु ऐसा ही सुयोग है कि वर्षा वहाँ होती है जहाँ के जीवों को, पुण्यशालियों को आवश्यकता है । याने सब पुण्यपाप के योग से होता है । कहीं तेज वर्षा हो गई तो वहाँ के लोगों का पापं का उदय समझिये पर भगवान की दिव्यध्वनि खिरती है वह केवल हित का उपदेश करने के लिए है ।

दृष्टांतपूर्वक प्रभु से सहज उपदेश प्राप्त होने का समर्थन―यहाँ दृष्टांत दिया है कि जैसे मृदंग बजाने वाले ने हाथ का प्रयोग किया याने निमित्त नैमित्तिक भाव बना, अब वहाँ जो मृदंग से आवाज निकली है सो वह किसी की अपेक्षा नहीं करती । वह उस मृदंग का ही स्वयं का परिणमन है । ऐसे ही प्रभु इच्छा के बिना धर्मोपदेश करते हैं । वह यद्यपि प्रभुदेह का ही परिणमन हो रहा है वचन वर्गणा का ही परिणमन हो रहा है मगर उसमें निमित्त पुण्यवान जीव हैं । जैसे आम के वृक्ष फलते हैं उन फलों का उपयोग आम खुद करते हैं क्या? नहीं । फल तो रहते हैं दूसरों के उपकार के लिए । नदियों में पानी बह रहा है तो क्या नदियाँ स्वयं उस जल को पीती हैं? नहीं पर लोगों का उपकार हो रहा, ऐसे ही प्रभु जिनेंद्रदेव का उपदेश होता है तो वहाँ कोई बाहरी प्रयोजन नहीं है पर भव्य जीवों के ही पुण्य के कारण उनका उपदेश हुआ करता है । तो यहाँ तक आप्त का स्वरूप बताया । आप्त मायने वीतराग सर्वज्ञ देव, जो कि दिव्यध्वनि करते हैं, धर्मोपदेश जिनका होता है वे कहलाते है आप्त । भगवान तो बहुत है मगर सभी भगवान आप्त नहीं कहे गए । सिद्ध भगवान उनसे कोई शास्त्र की परिपाटी नहीं चलती, अरहंत भगवान की ही दिव्यध्वनि खिरती है इसलिए उनको आप्त कहा गया है । आप्त का सीधा अर्थ है―पहुंचा हुआ उस विषय में व्यापक होना कहलाता है । सो जो रागद्वेष रहित है, सर्व का ज्ञाता है वह पुरुष सर्व उपदेशों का मूल प्रणेता होता है ।


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  • रत्नकरंड श्रावकाचार
  • प्रवचन
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