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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 9

From जैनकोष



आप्तोपज्ञमनुल्लंघ्यमदृष्टेष्टविरोधकं ।

तत्त्वापदेशकृत् सार्वं शास्त्रं कापथघट्टनं ।।9।।

आगम की आप्तोपज्ञता होने से प्रामाणिकता―पहले बतलाया था कि आप्त, आगम और तपस्वी इनका यथार्थ श्रद्धान होना सम्यग्दर्शन है । तो उनमें से आप्त का तो वर्णन किया, अब इस श्लोक में आगम का वर्णन कर रहे है । आगम, शास्त्र ये सब पर्यायवाची शब्द हैं, शास्त्र कौनसा उत्तम है? हितवादी । तो उसका विशेषण इस श्लोक में दिया है कि पहले तो वह शास्त्र आप्त के द्वारा कहा हुआ होना चाहिए । मूल अधिकारी आप्त कहलाता है, उनका कहा हुआ है यह सब धर्मोपदेश । देखिये कैसा विचित्र काम है, आश्चर्यजनक काम है कि भगवान रागद्वेष रहित हो गए और उसके फल में सर्व के मात्र ज्ञाता दृष्टा बने हुए है । उनका सर्वांग से दिव्योपदेश होता है । वह कैसे नहीं प्रामाणिक है? तो प्रथम तो वह सर्वज्ञ वीतराग देव का कहा हुआ होना चाहिए । जैसे इसके बाद दूसरे ने सुना, दूसरे से तीसरे ने सुना, और सैकड़ों लोगों में वह बात फैल जाय तो भी जिज्ञासा यह रहती है कि यह बात मूल में किसने कहा? यदि वह प्रामाणिक पुरुष हैं तो सर्व लोग उस वाणी का विश्वास कर लेते हैं बिना ही परीक्षा किए कि यह सही है । और परीक्षा करने पर तो सही उतरती ही है । तो शास्त्र है आप्त द्वारा कहा गया ।

आगम की अनुल्लंघयता―दूसरा विशेषण है शास्त्र का कि जिसके सिद्धांत का कोई उल्लंघन न कर सके । कोई भी उसका खंडन न कर सके, ऐसा निर्दोष वचन है आप्त के द्वारा कहा गया । हम आप आजकल सुन रहे हैं पर जिस जमाने में आप्त सर्वज्ञ बने हुए थे उनकी दिव्यध्वनि खिरती थी, लोग उसे सुनकर धर्मलाभ लेते थे । वह तो बड़ा ही अद्भुत वातावरण था, प्रभु की वाणी किसी के द्वारा खंडित नहीं की जा सकती । प्रभु की वाणी याने शास्त्र आगम और प्रत्यक्ष से बाधारहित हे । न तो उस कथन में आगम से बाधा आती और न अनुभव प्रत्यक्ष से बाधा आती । जैसे प्रभु ने बताया कि जो भी जगत में सत् है । जो भी वस्तु है वह प्रतिक्षण उत्पाद व्यय धौव्यमय है । उत्पाद मायने उत्पन्न होना, व्यय मायने नष्ट होना और धौव्य मायने बना रहना, सो देख लो प्रत्येक पदार्थ बनता है, बिगड़ता है और बना रहता है । आत्मा पर भी घटा लो यह मैं आत्मा बनता हूँ बिगड़ता हूँ और बना रहता हूँ । जो नई पर्याय पायी वह तो इसका बनना कहलाया और जो पुरानी पर्याय विलीन हुई वह इसका व्यय कहलाया, पर मूलभूत पदार्थ वह है ही जिसमें इतना अवसर आया । तो यह शास्त्र अनुलंघ्य है किसी के द्वारा उल्लंघन में नहीं आ सकता ।

आगम की अदृष्टेष्टविरोधकता, तत्त्वोपदेशकारिता―परमार्थप्रतिपादक आगम में प्रत्यक्ष अनुमान से विरोध नहीं है । ऐसा यह शास्त्र तत्त्व का उपदेश देने वाला है । शास्त्र किसलिए है कि उनके अध्ययन से, मनन से ऐसा ज्ञानप्रकाश जगे कि जिसमें ज्ञान ही ज्ञान समाया हो, रागद्वेष की कालिमा न सुहायी हो तो अविरुद्ध वचन हैं, तत्त्व का उपदेश करनेवाला है । आत्मा को मुक्ति कैसे मिलती है? आत्मा का सही स्वरूप श्रद्धान में लायें, ज्ञान में लायें । और उस ही के अनुरूप अपना आचरण बनायें तो यह है सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र । प्रभु की वाणी में अनुयोग तो अनेक है पर संक्षेप करिये तो जो दूसरों को बाधा करने वाले न हों वे वचन सत्य वचन है । आगमवचन तत्त्व का उपदेश करने वाले है और खोटे मार्ग का विनाश करने वाले है । यदि शास्त्र स्वाध्याय न हो, ज्ञान की बात चित्त में न आये तब यह जीव न जाने कैसे मार्ग को अपना लेगा कि वह अपना बुरा करेगा । तो जो शास्त्र है वह शास्त्र है वह तत्त्व का उपदेश करने वाला है ।

आगम की सर्वहितकारिता―आगम सार्व मायने सबके लिए हितकारी है । आज संप्रदाय अनेक हैं और सभी संप्रदायों के कुछ सिद्धांत हैं मगर उनके मूल प्रणेता रागी द्वेषी न हों और अपनी यशकीर्ति के लोलुपी न हों तो उनके वचन सत्य हों अन्यथा सब एकांत रूप निकलेंगे । स्याद्वाद शासन में द्रव्य और पर्याय दो की दृष्टि चलती है । जो सदा रहे सो द्रव्य । जो क्षण-क्षण में नई घटना हो सो पर्याय । दो की दृष्टि चलती हैं जो सदा रहे सो द्रव्य, जो क्षण-क्षण में नई घटनायें हों सो पर्याय तो जब दो दृष्टियां है, पदार्थ में दो बातें है तो द्रव्य दृष्टि से पदार्थ को नित्य कहा जायगा और पर्यायदृष्टि से पदार्थ को आत्मा अनित्य कह दिया जायगा । जब पर्याय की दृष्टि रखते हैं तो अनित्य और जब द्रव्य की दृष्टि रखते हैं तो नित्य । जैसे एक आदमी 60-70 वर्ष का है । बताओ वह वही है या कुछ नया-नया बन गया? वह तो वही एक आदमी है पर उसके जितने भाव बनते, जितनी लीलायें करते वे उनसे अनेक तरह का भी आत्मा बन गया । तो ऐसे ही आत्मद्रव्य वह एक रूप है और आत्मा में जो प्रवृतियां हैं वे अनेक बन जाती है । तो तत्त्व का उपदेश भरा हुआ है जैन सिद्धांत में मनोविनोद के लिए या फाल्तू बात के लिए जैन शासन में कुछ कहा नहीं गया । ऐसा सब जीवों का हित करने वाला शास्त्र है ।

आगम की कापथपरिहारकता―आगम खोटे मार्ग का खंडन करने वाला है । जो उपदेश का मूल प्रणेता है उसकी मुद्रा, उसका आचरण उसका ज्ञान उत्कृष्ट होना ही चाहिए । नहीं तो उसके उपयोग में प्रमाणता न रहेगी । जो पुरुष दोषवान हो उसके वचनों में प्रामाणिकता नहीं आती । भले ही वह ठीक बोले मगर स्वयं ही जब वह उस उपदेश से दूर है तो उपदेश में प्रामाणिकता कहां से आयेगी? सो देख लो आप्त भगवान कुछ भी जिनके परिग्रह नहीं है, जो समवशरण आदिक विभूति रचते हैं तो वे देव और देवेंद्र अपनी भक्ति से रचा करते हैं, पर प्रभु का उसमें कुछ लगाव नहीं है । जबकि अनेक विडंबनायें पायी जाती हैं अन्य दार्शनिकों के मूल गुरु या देवताओं के । कोई चूहे की सवारी करता फिर भी भगवान कहलाता, कोई शेर की सवारी करता है फिर भी वह भगवती कहलाता । न जाने कैसे-कैसे रूपक हैं । जिनका दर्शन करते ही लोग उन्हें शुद्ध समझ लेते हैं और उनकी भक्ति में रहते हैं । अरे प्रभु के तो केवल शरीरमात्र रह गया, न वहाँ कपड़े हैं, न सवारी, न अनेक तरह के भोजन हैं, न कोई वाहन, न त्रिशूल, न स्त्री पुत्रादिक । उनके तो केवल दिव्य देह है । उनके मुख से, उनके सर्वांग से निकला हुआ दिव्यध्वनिरूप उपदेश पूर्ण प्रामाणिक है और उसी परंपरा से आज ये शास्त्र चले आये है ।

आगम की प्रामाणिकता की अनुभवसिद्धता―शास्त्र प्रामाणिक है यह बात इस तरह भी जानी जाती कि उसमें जो कुछ लिखा है वह अपने अनुभव में सत्य उतरा है । कोईसा भी विषय ले लो । जैसे दार्शनिक लोग पदार्थ कितने ही प्रकार के मानते हैं, जैनी भी मानते, पर अन्य के द्वारा बताये गए पदार्थ में प्रकार यों उचित ठीक नहीं पड़ते कि कुछ तो दुबारा कह दिए गए कुछ कहे ही नहीं गए । जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आत्मा, मन । दिशा आदिक बोलते हैं तो पृथ्वी जल, अग्नि, वायु ये सब पुनरुक्त हो गए, ये भिन्न-भिन्न चीज नहीं हैं । एक पुद्गल की ही जातियाँ हैं, चारों के चारों पुद्गल हैं । अगर ये भिन्न-भिन्न द्रव्य होते तो कभी भी एक दूसरे रूप न बदल सकते थे । यह द्रव्य की पहिचान है । पृथ्वी कभी जल बन जाती तो । चंद्रकांति मणि भी तो चंद्र का सामना पाकर पिघल जाती है । पिपरमेन्ट, कपूर और अजवाइन का फूल है तो ये सब पिंडरूप, पृथ्वीरूप, और इन तीनों को इकट्ठा कर दिया जाय शीशी में तो जल रूप बन जाता है । अगर ये द्रव्य मूलत: अलग-अलग होते तो एक दूसरे रूप कभी न बन सकते । जैसे जीव और पुद्गल ये अलग-अलग पदार्थ है तो जीव कभी पुद्गल न बन सकेगा, पुद्गल कभी जीव न बन सकेगा । जो 6 प्रकार के द्रव्य जैन शासन में कहे उनमें कोई भी द्रव्य किसी दूसरे द्रव्य रूप तीन काल में नहीं बन सकता । जीव, पुद्गल, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य और कालद्रव्य, इनमें से कोई भी द्रव्य किसी दूसरे द्रव्यरूप बन सकते हैं क्या? नहीं बनते । और इन छहों के अलावा कोई द्रव्य तो नहीं कि जो छूट गया हो, इसलिए जैन शासन में जो 6 प्रकार बताये है पदार्थ के, वे बिल्कुल संगत है । पर अन्यत्र जो पदार्थ के प्रकार बताये सो कुछ तो दुहरा दिया और कुछ छूट गए । धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य की कोई चर्चा ही नहीं जानते । जो गमन में हेतु है वह धर्मद्रव्य है । जो स्थिति में कारण है वह अधर्मद्रव्य है । इसकी तो कहीं चर्चा भी नहीं होती । तो जैन शासन में जो कुछ ऐसा कहा गया है वह सिस्टेमेटिक और प्रामाणिक है ।

वीतराग सर्वज्ञदेव के ही आगमप्रणेतृत्व की संभवता―यहां यह बतला रहे हैं कि शास्त्र के मूलत: प्रणेता वीतराग सर्वज्ञ होना चाहिए । जिसके चारित्र में राग की घटना पायी जाती है और कभी से ही किसी भी शृंगारदशा में वे भगवान कहे गए तो जो रागी हो उसके वचनों में प्रामाणिकता कैसे हो? जैन शासन में तो तीर्थकर या- अन्य कोई जो भगवान बने है सो केवल ज्ञान होने पर ही उन्हें भगवान कहा गया है । उससे पहले नहीं । 24 तीर्थंकर हुए मगर वे जन्म से भगवान नहीं हुए, उनकी दीक्षा होगी, मुनि होंगे, फिर तपश्चरण होगा, केवल ज्ञान होगा तब प्रभु कहलायेंगे । सो अनेक तीर्थंकरों ने विवाह भी किया मगर उस समय तो वे भगवान न थे । जब सबका त्याग किया, आत्मस्वरूप में रमण किया तब वे भगवान कहलाये । सो जो सर्वज्ञ न हो वह सही बात कैसे बता सकता? जो वीतराग न हो वह सब बात सही कैसे बता देगा? तो आगम का मूल प्रणेता वही है जो वीतराग है और सर्वज्ञ है ।

आगम की हेयापादेय विवेक संपादकता―शास्त्र आप्तोपज्ञ है जिनमें न प्रत्यक्ष से बाधा है न अनुमान से । वे शास्त्र हैं, उनके अनुसार चलना, उसमें लिखे हुए तत्त्व का विनय करना यह मोक्षमार्ग में चलना है । आगम वही है जिसमें सर्व तत्त्वों का ठीक निर्णय मिले । हेय क्या, उपादेय क्या, छोड़ने योग्य क्या चीज है और ग्रहण करने योग्य क्या चीज है? छोड़ने योग्य तो वह है जो मेरे स्वरूप में नहीं स्वभाव में नहीं । जैसे बाहर पड़ा हुआ धन वैभव दौलत यह सब हेय है कर्म विपाक का जो प्रतिफलन है वह सब हेय है । जिसने यह जान लिया कि यह परद्रव्य है, यह परभाव है इससे मेरे आत्मा का कुछ भी संबंध नहीं है तो उसने तो छोड़ दिया जो छोड़ने का था, और ग्रहण कर लिया जो ग्रहण करने योग्य था । यह मोही जीव धन वैभव बंधु पुत्रादिक सब कुछ छोड़ सकता है, किंतु अपने यश की वांछा नहीं छोड़ पाता । कैसा है प्रबल उपर्सग इस जीव पर कि अपना सब कुछ छोड़ सकता है पर अपने यश की इच्छा नहीं छोड़ पाता । और जो यश चाहता है समझिये कि उसे आत्म तत्त्व को पहिचान ही नहीं । किसका यश चाहते? सो जो आत्मा का परिचय कर लेने वाला है उसको यश को चाह नहीं होती । अरे किन में यश चाहते? जगत में जितना जो कुछ दिखता है चह सब मायास्वरूप है । माया किसे कहते हैं? अनेक पदार्थों का मिलकर रूप बना उसका नाम माया है । बतलावो जो कुछ दिख रहा है, इसमें कोई चीज सत्य भी है क्या? परमार्थ भी है क्या? इसमें कोई भी परमार्थ नहीं है । जो कुछ आँखों दिख रहा है, जो कुछ सबके प्रयोग में आ रहा है वह मिथ्या है, परमार्थ नहीं, मायारूप है । तो अज्ञानीजन माया में ही तो सिर भिड़ा रहे हैं।

आगमोपदेश का मुख्य प्रयोजन मोहापहरण―मेरा अणुमात्र भी किसी परपदार्थ से परमार्थत: कुछ संबंध नहीं है, यह बात आगम ने ही तो बताया । जाना हमने अपने अनुभव से किंतु यह सब प्रकट हुआ है शास्त्र से । उससे ही हमने द्रव्य गुण पर्याय की बात सीखी । उससे ही हमने स्वरूपास्तित्त्व का बोध किया और उसके ही प्रताप से मोह दूर हुआ। सर्व उपदेशों का सार यह है कि मोहों को दूर करें। जब तक मोह लगा है तब तक कष्ट ही कष्ट है । राग और प्रीति नहीं छूटती है तो न छूटे, फिर छूट जावेगी किंतु मोह तो पूर्णतया छोड़ देना चाहिए । मोह में यह भाव रहता है कि यह मेरा ही है, इससे ही मेरी जिंदगी है, इससे ही मेरा महत्त्व है, इसके बिना मेरा अस्तित्व ही न रहेगा, ऐसा पर पदार्थो में मोह होना यह जीव के लिए कष्टदायी है । सो मोह न हो उस शिक्षा को कहते हैं वास्तविक शिक्षा । किसी से कहा जाय कि मोह न करो तो ऐसा कहने मात्र से उसका मोह न छूटेगा । और जब यह जान जायेगा कि प्रत्येक वस्तु जो दिखती है वह मायारूप है और मुझ से अत्यंत भिन्न है, सारहीन है, उसका मोह छूट जायगा । तो जैसे मोह मिटे वैसा उपदेश सुनना, उसे अनुसार चलना ये सब बातें इस जीव के लिए लाभदायक हैं ।


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