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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 93

From जैनकोष



गृहहारिग्रामाणां, क्षेत्रनदीदावयोजनानां च ।

देशावकाशिकस्य, स्मरंति सीम्नां तपोवृद्धा: ।। 93 ।।

देशावकाशिक व्रत में क्षेत्र की मर्यादा रखने की पद्धति―अब देशव्रत में क्षेत्र की मर्यादा किस ढंग से की जाती है इसका वर्णन इस छंद में किया गया है । तप में बढ़े हुए जो गणधर देव हैं वे बतलाते हैं कि देशावकाशिक व्रत में इस तरह की मर्यादा की जाती है गृह की मर्यादा करना―आज के दिन मैं घर से बाहर न जाऊंगा । कोई मोहल्ले की मर्यादा कर ली, ग्राम की मर्यादा कर ली, क्षेत्र की मर्यादा कर ली कि मैं इतने क्षेत्र से बाहर न जाऊंगा इतने समय तक अथवा नदी बन का नाम लेकर मर्यादा करना यह देशावकाशिक व्रत में मर्यादा की पद्धति है । इस मर्यादा का उल्लंघन करने का अर्थ इतना भर है । ऐसा संकल्प करके करना गृह की मर्यादा है । देखिये देशव्रत में, क्षेत्र की मर्यादा तो कर ली कि इतने से बाहर मेरा संबंध न होगा, पर उसको निर्दोष निभाना । उससे बाहर किसी को भेजना भी नहीं, बाहर से बुलाना भी नहीं, कोई चीज बाहर से मंगाना भी नहीं । एक बहुत नियंत्रण का काम है और इसीलिए यह शिक्षाव्रत में लिया गया है।


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  • रत्नकरंड श्रावकाचार
  • प्रवचन
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