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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 10

From जैनकोष



दाणं पूजा मुक्खं सावयधम्मे ण सावया तेण विणा।

झाणाज्झयणं मुक्खं जइ-धम्मे तं विणा तहा सो वि।।1॰।।

   श्रावकों के कर्तव्यों में मुख्य दान और पूजा―इस गाथा में श्रावक धर्म और मुनि धर्म इन दोनों का वर्णन किया जा रहा है। दान और पूजा ये श्रावक धर्म में मुख्य बताये गए हैं, क्योंकि इनके बिना वह श्रावक ही नहीं कहलाता। यद्यपि ध्यान और अध्ययन ये भी कर्तव्य हैं मगर कोई श्रावक ऐसी स्वच्छंदता में आये, भावुकता में आये कि बस ध्यान और अध्ययन इन दो से बढ़कर कुछ नहीं इसलिए ध्यान और अध्ययन में रहें, बाकी पूजा दान आदि के इन पचड़ो में पड़ने से क्या फायदा? ऐसी दृष्टि अगर श्रावक अवस्था में होती है तो वहाँ कषायों की तीव्रता कारण है ऐसी भावना बनाने पर क्योंकि सर्व प्रकार के लोगों का तो संग मिलता है। उनसे बातचीत चलती है, उनका आदर भी किया जाता है। गृहस्थावस्था में रहकर न जाने किन-किन पुरुषों का आदर नहीं किया जाता। व्रतहीन हो, ज्ञानहींन हो, आचरणहीन हो, अन्याय में भी लगा रहता हो कैसा भी कोई हो, धन कमाने के प्रसंग में भी और आदत बनने से जब चाहे भी उनसे वार्ता चलती है और उस संग प्रसंग से पापकर्म का बंध चलता है। मलिनता बढ़ती है तो ऐसी तो स्थिति में रहे और प्रभुपूजा का क्या करना। दान का क्या करना, उस ओर से उदासी रखे अथवा कुछ घृणा जैसी दृष्टि से भी देखने लगे और ध्यान और अध्ययन की ही एक भावुकता में विशिष्टता बताकर दान और पूजा से दूर रहे तो उसके ध्यान और अध्ययन में भी अतिशय नहीं जगता, इस कारण बताया है कि श्रावकों के लिए दान और पूजा ये दो मुख्य कर्तव्य है। इन दो कर्तव्यों के बिना वह श्रावक हीं नहीं कहला सकता।
   साधुवों के कर्तव्यों में मुख्य ध्यान और अध्ययन में ध्यान का कथन―और, यतियों के लिए क्या कर्तव्य हैं? ध्यान और अध्ययन। यदि साधु में ध्यान और अध्ययन की बात न हो और वह मंदिर के शृंगार या अनेक प्रकार के अन्य प्रदर्शनों में अपना उपयोग लगा दे और उस ही में वह तृप्त रहा करे तो मुनिव्रत का उद्देश्य अभी उसके नहीं रहा। इसे कहते हैं लौकिकी वृत्ति/गृहस्थ करें ऐसा तो उनके लिए यह गुण हैं और अगर साधु करें ऐसा तो उनके लिए यह अवगुण हैं। साधुवों को तो ध्यान और अध्ययन ये दो कर्तव्य मुख्य बताये गए हैं। ध्यान में किसी शुद्ध तत्त्व की ओर उनका चित्त लगा रहता है। मनन चलता है। उसका जानन चलता रहता है यह तो है मुनिजनों का ध्यान। जो वास्तव में विरक्त हैं। अपने आत्मस्वभाव की ओर ही जिनकी दृष्टि बनी है, उसी के पौरुष में रहते हैं उनको यह भगवान आत्मा प्राप्त हो जाता है। तो उन मुनिजनों को जंगल में एकांत में लोक में सबसे महान वस्तु आत्मस्वरूप परमात्मा जब मिल गया तो अब उन्हें अन्य संसार की बातों से प्रयोजन ही क्या रहा? अपने प्रभु से बात करते हुए वे अपने में अंतः प्रसन्न रहते हैं। यही कारण है कि मुनिजन जंगल में रहते हुए भी ऊबते नहीं हैं, बल्कि इस सहज अंतस्तत्त्व की दृष्टि में रमकर पता नहीं पड़ता कि इतना समय इतना बड़ा दिन कैसे व्यतीत हो गया। साधुवों का मुख्य कर्तव्य हैं ध्यान। देखो ध्यान बिना कोई नहीं रह रहा। प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी ओर का ध्यान बनाये रहते हैं कोई स्त्री के ध्यान में बैठा होगा तो कोई पुत्र के ध्यान में, कोई अपनी कीर्ति के ध्यान में तो कोई अपनी महत्ता समझने के ध्यान में, कोई प्रभु के ध्यान में तो कोई स्वाध्याय के ध्यान में। क्या कहा जा रहा है उसका अर्थ समझने के ध्यान में कोई बैठा हैं। ध्यान सबके लगा है। उन ध्यानों में शुद्ध तत्त्व की ओर ध्यान जाय तो वह ध्यान प्रशंसनीय है और बाकी संसार की जिन-जिन बाह्य बातों में ध्यान लग रहा वह तो सब अतत्त्व है। मायारूप है। माया में ध्यान लगाने का फल शांति नहीं है, अशांति है। तो साधुओं का कर्तव्य है ध्यान।
   साधुजनों के कर्तव्यों में मुख्य ध्यान और अध्ययन में अध्ययन का कथन―साधुवों का, दूसरा कर्तव्य है अध्ययन। सर्वज्ञदेव द्वारा प्रणीत शास्त्रों में, ऋषिजनों द्वारा प्रणीत शास्त्रों में जो कुछ कहा गया है वह तत्त्व क्या है और उसे अपने आप पर घटित करना। अगर बाहरी वस्तुओं का वर्णन है तो वह पर है, उससे मेरा हित रंच नहीं है। इस तरह का ध्यान बनेगा, मनन बनेगा और स्व की अगर चर्चा है तो अपने आप के गुणों के स्मरण में ध्यान चलेगा। तो यह जो अध्ययन है, जिसमें वस्तुविषयक परिचय चल रहा है वहाँ रागद्वेष प्रसंग न होने से मुनिजन निराकुल रहा करते हैं। तो यह यती जनों का यती धर्म में ध्यान और अध्ययन मुख्य हैं। यहाँ भी यदि ध्यान और अध्ययन नहीं हैं तो वह मुनि नहीं हैं। उसका मुनिभेष में रहकर परिश्रम करना बेकार है। ध्यान तो आत्मा को पवित्र निराकुल रखने का था। पर बाह्य विषयों में उपयोग लगा हो तो वहाँ न निराकुलता आ सकती और न संसार से निवृत्त होने का उपाय पाया जा सकता। तो यह श्रावक धर्म और मुनिधर्म के लिए उपदेश किया गया है कि श्रावकजन तो दान और पूजा को अपना मुख्य कर्तव्य समझें और बिना नागा दान पूजा का कर्तव्य निभाते रहें और साधुजन ध्यान और अध्ययन के वातावरण में रहकर अपना समय गुजारें तो यह प्रवृत्ति इस जीव को हितकारी है और निकट काल में वह अपने आप के स्वरूप को निरखकर अपने आपमें मग्न हो सकेगा।


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