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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 9

From जैनकोष



दाणं पूजा सीलं उववासं बहुविहंपि रववण पि।

सम्मजुदं मोक्खसु हं सम्मबिणा दीहंससारं।।9।।

   सम्यक्त्व सहित दान की मोक्षसुखोपायसहायकता―श्रावक पद में दान, पूजा, शील, उपवास, इनकी प्रवृत्ति चलती हैं और वह तीर्थ प्रवृत्ति के लिए आवश्यक है, पर साथ में यह भी समझना चाहिए कि ये सभी कर्तव्य यदि सम्यक्त्व सहित हैं तो ये मोक्ष मार्ग के संपादन में मददगार हैं और सम्यक्त्वरहित किए जा रहे हैं तो वे दीर्घ संसार हैं अर्थात् जब तक सम्यक्त्व प्राप्त न होगा तब तक संसार की परंपरा ही यह बनाएगा। (1) दान―अपने और पराये अनुग्रह के लिए धन का उत्सर्ग करना, त्याग करना दान कहलाता है। दान में अपना उपकार क्या है कि तद्विषयक ममता दूर हुई और अपने भाव सही हुए। धर्म के प्रसंग में इतनी उमंग है और सामर्थ्य है, धनिक है तो यदि उस प्रसंग में त्याग नहीं किया जाता तो वह चिन्ह उमंग का नहीं कहलाता। उमंग उस ही को कहते हैं कि जिसकी उमंग हो उसके लिए सब कुछ समर्पण किया जा सके। तो दान में अपना अनुग्रह क्या हुआ कि ममता हटी और सद्भावना में वृद्धि हुई और दूसरे का अनुग्रह क्या है कि साधु संतों को, समाज को, जिज्ञासुओं को सब को उसका लाभ पहुँचेगा। तो श्रावक पद में रहकर दान भी मुख्य कर्तव्य हैं। अब साथ ही यदि दान प्रवृत्ति सम्यक्त्व सहित है तो वह मोक्ष सुख का कारण बनता है। तो इन सब आचरणों में जो विशेषता आती है वह सम्यक्त्व प्रताप से आती है। इसलिए श्रावकों का मुख्य ध्यान होना चाहिए तीन बातों पर। सम्यक्त्व प्रकट हो, सम्यक्त्व के योग्य अपनी साधना बनायें और दान एवं पूजा की प्रवृत्ति बनाये रहें। तो श्रावकों का कर्तव्यभूत जो दान है वह सम्यक्त्व सहित होता तो मोक्ष सुख में सहायक होता है और सम्यक्त्व रहित है तो उस दान से पुण्य बँध गया और उस पुण्य के फल में देव हो गया, सेठ हो गया, राजा हो गया। अब क्या करेगा वह? तो यह धन वैभव ऐश्वर्य मिल जाय तो प्रकृत्या अभिप्राय कुछ स्वच्छंद हो जाता है। विषय सुख की प्रीति में वह न्याय अन्याय भी नहीं गिनता, जिसके फल में कहो नरक आयु बँध जाय तो नरक जाना पड़े। अन्य कोई तिर्यंचायु बँधे तो वहाँ दुःख भोगना पड़े। तो सम्यक्त्वरहित श्रावकों के कर्तव्य से संसार में कुछ अच्छा पद सा मिल गया मगर उससे संसार का संकट नहीं टल सकता।
   सम्यक्त्व सहित पूजा की मोक्ष सुखोपाय सहायकता―श्रावक का दूसरा कर्तव्य इस प्रसंग में बताया गया पूजा। पूजा का पर्यायवाची शब्द है अर्चा और अर्चा का मित्र है चर्चा। प्रभु पूजा में प्रभु के स्वभाव की, स्वभाव विकास की दृष्टि रहती है और वही स्वभाव मेरे में है, यह बारबार ध्यान जगता है और ऐसा विकास मेरे को प्रकट हो यह भी भावना बनती है। तो श्रावक जो रात दिवस किसी चिंता और व्यवस्था में बना रहता है। अर्थोपार्जन के लिए नाना प्रकार के कार्य भी कर डालता है और जो कुछ पापार्जन होता है उस पापार्जन का प्रायश्चित अथवा पाप के धुल जाने का साधन कहो तो दान और पूजा बताया गया है। प्रभु पूजा में अपना चित्त लगे, प्रभु के गुणों का स्मरण हो, यह ध्यान में बैठे कि इस जगत में सारभूत चीज कुछ भी नहीं है। जो पद प्रभु को प्राप्त हुआ है, जो वीतरागता की स्थिति बनी है बस यह ही एक श्रेष्ठ पद है जिससे कि उद्धार होता है। बारबार ध्यान जगता है तो अपने स्वभाव की ओर दृष्टि आती है। इस प्रकार श्रावकों को कर्तव्य में यह पूजा भी मोक्षमार्ग में साधक है। जिस पुरुष को सम्यक्त्व उत्पन्न हुआ है, सम्यक्त्व का अर्थ है अपने आपके सहज स्वभाव की प्रतीति हो जाना। मैं क्या हूँ, इसका यथार्थ निर्णय हो जाना और उस ही में हित है ऐसी रुचि जग जाना ये सब सम्यक्त्व के चिन्ह हैं। धर्म मार्ग में प्रवेश उन ही जीवों का होता है जिन्होंने कम से कम बाहर में इतना निर्णय तो कर रखा हो कि यहाँ का यह सारा समागम मायारूप है और इस मायारूप समागम से मेरे आत्मा का उद्धार नहीं है। मैं जो परमार्थ हूँ वही मेरी दृष्टि में रहे, उस ही रूप मेरी अनुभूति बने यह ही कल्याण का उपाय है, यह ही मंगलमय स्थिति है। बाकी मायामय पदार्थों का समागम इस जीव के लिए हितरूप नहीं है। इतनी भावना जिसके पुष्ट हुई है उसका धर्म मार्ग में चलने में कोई बाधा नहीं आती। (2) प्रभु पूजा―इससे हम धर्म मार्ग के लिए अनेक बातें सीख जाया करते हैं। बारबार स्वभाव की आराधना करना, बारबार अपने आप की इस विकृत पर्याय की तुच्छता पर खेद ऐसा हितकारी खुद जिसमें भव-भव के पाप नष्ट करने का भी समावेश है। तो सम्यक्त्व सहित प्रभु पूजा इस ही को कहते हैं कि प्रभु स्वरूप और आत्मस्वरूप उसके मिलने से बन रही प्रभु की शक्तियाँ और अपने आत्मा की शक्तियाँ, इन को समान निरखा करें, रह गया अंतर एक पर्याय का। तो प्रभु की पर्याय स्वाभाविक है। उपाधि न रही तो अब उसका परिणाम स्वभावानुरूप ही होगा सो बना हुआ है। यहाँ उपाधि संसर्ग है तो उपयोग में यह कर्म दशाओं का नाच झलकता है और उससे यह उपयोग मलिन हो जाता है। अब इसके आगे जिसमें ज्ञानबल है वह उसका ज्ञाता रहता है। जिसमें ज्ञानबल नहीं है वह अज्ञानी मोही है, तो वह उस कर्मरस के नृत्य को अपना ही सर्वस्व समझकर हर्ष विषाद किया करता है। कितनी ही समस्याओं का सुलझन प्रभु पूजा के प्रसंग में हो जाता है।
   सम्यक्त्व सहित शील की मोक्ष सुखोपाय सहायकता―श्रावकों के कर्तव्य में यहाँ तीसरी चीज बता रहे हैं (3) शील―अपने सरल स्वभाव से रहना, मायाचार से न रहना, अपने आपके स्वरूप की ओर अभिमुख होते हुए अपने को प्रसन्न रखे रहना और अन्य विकार आदिक चेष्टायें उनसे विरक्त बने रहना यह कहलाता है शील। शील का प्रयोग आत्मा को अपने स्वरूप के अभिमुख करता है। इसका दूसरा नाम है ब्रह्मचर्य। ब्रह्म अर्थात् आत्मस्वरूप उसमें चरण करना, लीन होना, रमना यह कहलाता है ब्रह्मचर्य। जो इस परमार्थ ब्रह्मचर्य की धुन में रहते हैं उनके व्यावहारिक ब्रह्मचर्य सहज ही बना रहता है तो शील मोक्ष का साधन है। मोक्ष सुख के उपायों में सहयोगी है लेकिन कब? जब सम्यक्त्व सहित हो। सम्यक्त्व रहित होने पर तो इसमें पुण्य बंध हो जायगा मगर पुण्य के उदय में फिर क्या स्थिति होगी? समागम मिलेगा। ऐश्वर्य बढ़ेगा, तब वहाँ कुछ अभिमान भी जगेगा, दूसरों को तुच्छ भी गिनेगा, तो अन्याय की चेष्टायें भी हो जायेंगी। उसका फल है संसार में रुलना। तो सम्यक्त्व सहित इन कर्तव्यों के होने से तो मोक्षमार्ग में प्रगति बनती है और यह ही कर्तव्य सम्यक्त्व रहित होने पर कुगति का तो विनाश हो गया, तत्काल दुर्गति तो न होगी, सुगति मिलेगी, लेकिन वहाँ जो मायामय साधनों का प्रसंग आयगा, संयोग होगा उस प्रसंग में यह जीव अस्थिर हो जायगा और बाह्य विषय कषायों की ओर लग जायगा। उसका फल संसार में परिभ्रमण है।
   सम्यक्त्व सहित उपवास की मोक्षमार्गोपाय सहायकता―(4) चौथा कर्तव्य बताया है उपवास―उपवास में मुख्यता है अपने आपके आत्मा के समीप बसने की। उप समीपे बसनं उपचासं, अपने आपके निकट उपयोग का बना रहना उपवास है, अब उपयोग अपने निकट कैसे रहे उसके लिए कर्तव्य है कि बाहरी विकल्पों को त्याग दें। उन बाहरी विकल्पों में दुकान भी है, भोजन भी है। इन सब व्यवस्थाओं में न रहकर अनशन व्रत लेकर अपने आत्मा के स्वभाव की उपासना में समय बितायें, यह कहलाता है उपवास। अब उपवास में तो ये सभी बातें की जानी चाहिए। दुकान न करें, स्वाध्याय में अधिक रहें, मंदिर आदिक जैसे पवित्र एकांत स्थानों में धर्मसाधना करें और विकल्पों से दूर होने के लिए अनशन करें। वो अब सिर्फ एक अनशन तो सामने आ गया सो लोग कहते हैं कि अनशन करने का नाम उपवास है, पर अनशन किसलिए करना चाहिए था और किया गया वह उद्देश्य जिसकी दृष्टि में नहीं है उनके लिए शब्दार्थ के अनुसार यह तो कह सकते हैं कि अनशन किया है, किंतु यह नहीं कह सकते कि उपवास किया है। अनशन और उपवास ये दोनों सहयोगी हैं। मगर प्रसिद्धि में अनशन रह गया। आत्मा के समीप बसना है और आत्मस्वरूप की चर्या बनाना है। कहाँ रमना है यह उद्देश्य तो भूल गए केवल यह बात रही कि भोजन का त्याग। तो अनशन उपवास ये सब तपश्चरण कहलाते हैं। ये मोक्षमार्ग में साधन हैं पर सम्यक्त्व सहित हों तो ये मोक्षमार्ग में साधक हैं, और सम्यक्त्व रहित किये जायें तो ये सब तो मंद कषाय के अनुसार पुण्य बंध हो लेगा। शुभोपयोग बन लेगा, जिसके प्रताप से सद̖गति प्राप्त होगी। मगर उस सद̖गति में भी उपयोग सही रहे, सावधान रहे। धर्म की ओर रहे यह तो उस पुण्य ने ठेका नहीं लिया है हो भी सके न भी हो सके। तो प्रायः करके होता नहीं क्योंकि अनादि अज्ञान वासना में रंगा हुआ यह प्राणी मायामय पुद्गल का संयोग पाकर अपने आप के स्वरूप आराधना से च्युत हो जाता है। तो सम्यक्त्व रहित ये कर्तव्य तो लाभदायक न रहे। कुछ अंतर तो रहा, दुर्गति में नहीं गया, सुगति में पहुंच गया, लेकिन वहाँ ऐसे कारण कलाप मिल सकते हैं कि धर्म के प्रसंग में लग जायगा मगर लग भी सके, न भी लग सके। जब तक सम्यक्त्व न हो तब तक उसका संसार बना रहता है। तो ये सब श्रावकों के कर्तव्य सम्यक्त्व सहित होने से ये मोक्ष सुख के साधन बनते हैं और सम्यक्त्वरहित होने से दीर्घ संसार परिभ्रमण बना रहता है।


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