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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 103

From जैनकोष



‘‘बहुदुक्खभायणं कम्मकारणं भिण्णमप्पणो देहो।

तं देहं धम्माणुट्ठाणकारणं चेदि पोसए भिक्खू।।1॰3।।’’

   रसरुधिरमांसमेदा स्थिमय शरीर की सेवा का प्रयोजन जीवन में धर्मानुष्ठान―अचेतन भिन्न अशुचि स्कंधों से बना हुआ है और फिर भी यह आवश्यक पड़ गया है कि साधु ऐसे शरीर की भी कुछ रक्षा बनाये रहें। तो इसका कारण क्या है? धर्मसेवन धर्मसेवन से ही उन्हें प्रीति है जैसे किसी पुरुष की ससुराल से कोई दो चार लोग आ गए हैं तो वह पुरुष उन लोगों की बड़ी खातिर करता है। चाहे वे परिचित हों चाहे अपरिचित। किसी भी ढंग के हों, पर उनकी सेवा खुशामद पूछताछ करता है, मगर उस पूछताछ के बीच ससुराल वालों की अथवा गृहिणी की खबर ले ही लेता है। तो जो इतने सत्कार किए जा रहे हैं उस-उस गाँव के अन्य लोगों के तो इसमें प्रयोजन है कि ससुराल के परिवार की हमको सही खबर मिल जाय कि वे कुशल हैं। तो ऐसे ही इस शरीर की सेवा साधु करता है। जो शरीर भिन्न है, निंद्य है तो क्यों करता है कि मुझे अपने धर्म की बातें साधने का अवसर मिल जाय। तो शरीर की जो सेवा है साधुवों द्वारा वह मात्र धर्म सेवन के लिए है, उनको शरीर से प्रेम नहीं होता। यह शरीर मांस, रुधिर, मलमूत्र आदिक से भरा हुआ है, सो खुद अपने आप में नजर कर लें कि इस शरीर में ऐसे ही अपवित्र पदार्थ भरे पड़े हुए हैं। तो जो शरीर मल, रुधिर, मांस आदिक से भरा हुआ है वह शरीर है उस शरीर की भी सेवा साधुवों को करनी पड़ती है। तो क्यों करनी पड़ती है? अपने आत्मा की धर्मसाधना का अवसर पाने के लिए। क्योंकि शरीर और जीव का ऐसा संबंध बन रहा है कि भिन्न द्रव्य होने पर भी कि शरीर में कुछ बाधा हो, तीव्र भूख हो, पिपासा हो, तो उनको धर्मध्यान में भाव नहीं रहता तो करनी पड़ रही है ऐसे दुर्गंधमय शरीर की सेवा उसका प्रयोजन है धर्मसेवन।
   मलमूत्रमयकृमिवहुल शरीर की सेवा का प्रयोजन जीवन में धर्मानुष्ठान―इस शरीर में मल, मूत्र, पीप जैसे गंदे तत्त्व भी पड़े हैं और ये गंदे पदार्थ न रहें शरीर में तो यह मनुष्य जिंदा भी न रह सकेगा। आयुर्वेद के अनुसार तो करीब ढ़ाई सेर मल इस शरीर के अंदर हर समय रहना ही चाहिए। जिन लोगों का स्वास्थ्य अच्छा है और ठीक-ठीक शौच जाते हैं और कहते हैं कि आज पेट बिल्कुल साफ है तो देखो कहाँ साफ है? उनके पेट में तो अभी ढाई सेर के करीब में मल भरा हुआ है। ऐसा यह दुर्गंध वाला शरीर है मूत्र भी बताया गया है, कुछ न कुछ मूत्र हरदम रहेगा ही, पूरा न निकलेगा। कोई इंजन तो नहीं है जो कि पेंच खोला जाय तो पूरा निकल जायेगा। इस शरीर में कुछ न कुछ मूत्र भरा ही रहेगा। तो ऐसे दुर्गंधमय शरीर की यह साधु क्यों सेवा करता है? लगता तो यों हैं कि शीघ्र समझने के लिए ऐसा पर साधुजन जानते हैं कि वे शरीर की प्रीति से कुछ नहीं करते, किंतु धर्म की प्रीति से करते हैं। मेरे को आत्मस्वभाव की आराधना का खूब अवसर मिले इसके लिए शरीर की स्थिति बनाये रहते हैं। जीव लोक में अनेक प्रकार के ये नारकी, पशु पक्षी देव मनुष्य हैं, पर उन सब जीवों में एक मनुष्य भव ही ऐसा है कि जहाँ संयम की ऊंची, साधना बनायी जा सकती है। तो इस मनुष्यभव को कुछ समय कायम रखने के लिए ही साधुजन आहार लेते हैं।
   दुर्गंध अशुचि शरीर की सेवा का प्रयोजन जीवन में धर्मनुष्ठान―यह शरीर का वर्णन चल रहा है कि कैसा यह अपवित्र शरीर है, फिर भी साधुजन इसको धर्म साधना के ख्याल से कायम रखने के लिए इसको आहार देकर सम्हाले रहते हैं। उन्हें शरीर से ममता रंच भी नहीं होती, शरीर से प्रीति रंच भी नहीं होती, अपने आप के धर्म की रक्षा के लिए, रत्नमय की शुद्धि के लिए आत्मा का सही श्रद्धान रहे, ज्ञान रहे और उस ही में रमण रहे मात्र इसके लिए साधु इस शरीर की स्थिति बनाते हैं। कैसा है यह शरीर? दुर्गंध और अशुचि पड़ा हुआ हैं। पसीना आये तो शरीर से दुर्गंध आने लगती है। यह शरीर महा दुर्गंधित और अपवित्र है। पानी से नहा ले कोई तो उस नहाये हुए पानी से कोई दूसरा नहीं नहाता, अपवित्र शरीर से संबंध हुआ इसलिए जल भी अपवित्र हो गया। इतना है यह अपवित्र देह और फिर भी इस देह की स्थिति साधु बनाये रखते हैं। आहार लेते हैं तो लगता तो कुछ बेजोड़ काम मगर शरीर के लिए कुछ नहीं कर रहे साधु। अपने आत्मा के लिए ही कर रहे। आत्मध्यान बने, ऐसी स्थिति के लिए आहार ग्रहण करते।
   अशुचि दुर्गंध अनित्य अचेतन शरीर की सेवा का प्रयोजन जीवन में धर्मानुष्ठान―कैसा है यह शरीर चर्ममय, चमड़ा ही चमड़ा जिस पर रोम भी नहीं कि यह किसी काम आ जाय। पशुओं के रोम तो काम आ जाते पर इस मनुष्य के रोम भी काम नहीं आते। पशुओं की चाम काम आती है, पर इस मनुष्य का चाम भी कुछ काम नहीं आता। पशुओं की तो हड्डी भी काम में लोग ले लेते हैं। पर मनुष्य की तो हड्डी भी काम में नहीं आती। तो यह शरीर किस काम का है? एक बेकार सा है और फिर भी इस शरीर की हिफाजत रखता है साधु। अगर उस शरीर के प्रति मोह रखे तब तो कोई कह सकता कि उनको शरीर के प्रति मोह है इसलिए शरीर की सम्हाल करते, पर ऐसी बात नहीं होती। साधुजनों को इस शरीर के प्रति मोह नहीं होता, जिनके ज्ञान है ऐसे विवेकी साधु इस शरीर की रक्षा करते हैं। ज्ञान, संयम, ध्यान, अध्ययन, तपश्चरण की शुद्धि की भावना है, ऐसा शरीर यह अपवित्र चीजों से बना है, इसके अतिरिक्त और भी देखिये तो यह शरीर अनित्य है और अचेतन है। शरीर विनाशीक है, नष्ट हो जायगा अवश्य। इस शरीर से प्रीति क्या करना? जिन जिनको शरीर मिला है, इन सबका शरीर अवश्य नष्ट होगा। मगर ध्यान में कोई नहीं रख रहा यह बात और इसलिए उल्टे रास्ते पर चलना बनता है। तो यह शरीर अनित्य है। और अचेतन है, अपने आपसे यह विरुद्ध है। ऐसे इस शरीर की साधुजन हिफाजत केवल अपने ज्ञात ध्यान के लिए ही करते हैं।
   धर्मानुष्ठान के निमित्त पतनशील भी शरीर का साधुवों द्वारा पोषण―यहाँ यह बताया जा रहा है कि शरीर जैसा असार अशुचि भिन्न है जिससे इस जीव का कोई वास्तविक नाता नहीं। केवल निमित्त नैमित्तिक भाव में बंधन है भिन्न स्वरूप वाला है। शरीर की किसी चेष्टा से आत्मा का कुछ होता नहीं, फिर भी छोटे लोग मोही लोग शरीर को सेवा करें तो करें उनके मिथ्यात्व का उदय है मगर साधुजनों को भी क्या हो गया कि वे आहार लेते हैं। शरीर की सेवा करते हैं। इसका प्रयोजन यहाँ बताया गया। प्रयोजन है यह कि वे धर्मसाधना के लिए ऐसा करते हैं जबकि अज्ञानी जीव इस शरीर को ही अपना सर्वस्व स्वरूप जानकर इसमें कामूढ़ रहते हैं। और ज्ञानी साधु संत उस शरीर को सेवक की नई धर्मसाधना के प्रयोजन से इसका पोषण करते हैं। कैसा है यह शरीर? पतनशील है, गिरने की ओर है मनुष्य को देखो जब बालक है तब तो उसके शरीर का नाम देह है, क्योंकि देह उसे कहते हैं जिसमें उपचय हो। काय उसे कहते हैं जहाँ परमाणुओं का ढेर लगा हो। बच्चे के काय को कहते हैं काय और देह, मगर जहाँ अवस्था आधी से ज्यादह हो गई मायने 5॰ साल से ऊपर हो गया तो उसके देह को देह और काय मत कहो। उसको कहो शरीर। बच्चों का देह शरीर नहीं है। बूढ़ों का शरीर काय नहीं है। यह शब्दार्थ की बात कह रहे हैं। शरीर का अर्थ हैं शीर्यते इति शरीर जो गलता रहे, सड़ता रहे, शीर्ण होता रहे। उसे कहते हैं शरीर। जो शरीर मिला है उसका पतन अवश्य है अर्थात् मरण आवश्य है। तो ऐसे पतनशील शरीर में ज्ञानी जीव क्यों आहार आदिका सेवन करते हैं? तो उसका कारण है धर्मानुष्ठान।
   बहु दुःख भाजन शरीर का धर्मानुष्ठानार्थ साधुवों द्वारा सावधि पौषण―यह शरीर बहुत दुःखों का घर है सारे दुःख इस शरीर के कारण लगे हैं। खूब ध्यान दो जो भूख प्यास, ठंडी गर्मी आदि की वेदनायें होती हैं। वे सब इस शरीर के कारण होती हैं। बताया है कि इस शरीर में जितने रोम हैं। उतने प्रकार के रोग हैं। तो ये रोग इस शरीर के कारण ही तो हैं। जिनका कठिन कष्ट भोगना पड़ता है। तो यह शरीर बहुत दुःखों का घर है। तो एक दम शरीर में जो बाधा हुई वह तो शरीर के कारण है यह तो सब लोग मान लेंगे पर एक बात भी सोचना चाहिए कि किसी का कोई रिश्तेदार गुजर गया था कुटुंब का कोई गुजर गया उसमें यह कष्ट क्यों मानता? शरीर में न बुखार आया, न खांसी आयी, न फोड़ा फुंसी फूटी। दूसरा कोई था वह जीव में देह में रहा, इससे क्यों कष्ट मान रहे? तो इसका भी कारण शरीर है, वह कैसे कि इस शरीर में है आत्म बुद्धि कि यह हूँ मैं और तब जो संबंधित लोग हैं, कल्पना से जिनको मान रखा है। उन शरीरों को जानता है कि ये मेरे हैं कुटुंबादिक तो उनका वियोग होने पर जो कष्ट माना जाता है उसका भी कारण यह शरीर रहा। न हो शरीर, हो केवल आत्मा तो उसको कोई दुःख का प्रसंग भी है क्या? तो यह शरीर बहुत दुःखों का भाजन है, अच्छा कुटुंब और रिश्तेदार की बात से भी आगे बढ़ो मानो चार साथी चले जा रहे हैं, मार्ग में दो रास्ते मिले और दोनों ही रास्ते आगे चलकर एक जगह मिल जायेंगे जिससे भी चलना पड़ेगा अब एक पुरुष कहता है कि इस रास्ते से चलें दूसरा कहता है नहीं इससे चलें। और उसकी बात न चली तो वह कष्ट मानता है अरे भाई क्या बिगड़ गया तेरा? तू क्यों कष्ट मान रहा है? उसको हुआ बिगाड़ से राग हाय मेरी बात न रही, इसका वह कष्ट मानता है। शरीर को उस समय इसने माना कि मैं हूँ और शरीर के वचन निकले, मनके विचार बने और उसकी पूर्ति नहीं हुई तो कहता है कि हाय मेरी बात न रही, अब मैं किस काम का? अच्छा यह भी जाने दो। कोई आदमी एक कोट बनवाता है दर्जी से उस कोट में सिर्फ एक कंधे की जगह थोड़ी सिलवट पड़ गई तो वह बाबू बोलता है दर्जी अरे तू ने मेरा नाश कर दिया। अरे कहाँ नाश हुआ? वह कोट ही तो है, ये क्या भाव जग रहे हैं, और उससे कष्ट क्यों मानता है कि वह शरीर को ही मानता है कि यह मैं हूँ और उसके लिए यह फिट न रहा, इसकी शोभा न रही यह सड़ पड़ गई। तो बहुत दुःख का भाजन जो शरीर है इसकी सेवा साधु करते हैं समय पर परिस्थितिवश। अपराध मगर करना पड़ता है, वह क्यों? धर्म साधना के निमित्त। जीवन रहेगा तो ज्ञान ध्यान की साधना बनाई जा सकेगी।
   कर्मकारणभूत भी शरीर का धर्मानुष्ठान के निमित्त साधुवों द्वारा सावधि पोषण―यह शरीर है कर्म का कारण। मन, वचन, काय की क्रिया वह इस शरीर की ही तो चल रही है अथवा शुभ अशुभ कर्म बंध इस शरीर से मन, वचन, काय के योग से ही तो होता रहता है। यद्यपि आश्रव और बंध का कारण है जीव का विभाव विकार मगर शरीर रहित जीव के कहीं विभाव अथवा विकार हुआ करते हैं क्या? जहाँ शरीर है वहाँ विकार चलते हैं और थोड़ी-थोड़ी बातों में किसी ने कुछ प्रतिकूल कह दिया तो हाय माथा ठनक गया। बुखार हो गया, पेटदर्द करने लगा। बेहोशी हो गई, हाय मेरा कुछ भी न रहा। यहाँ बड़े-बड़े राजघराने की पुराणों में कथा सुनी होगी, एक कथा आयी है कि दशरथ की रानियों को गंधोदक लाने के लिए दो एक पहरेदार गए तो एक कोई बूढ़ा पहरेदार था। सो जवान जो सखियाँ थी दासियाँ थी वे ता झट-झट गंधोदक ले आयीं, अब एक रानी को गंधोदक लाते हुए बहुत बूढ़ा पहरेदार दिखा सो उस पहरेदार से चलते न बने लाठी के सहारे से रुक-रुककर चलना पड़ा, बहुत देर में पहुँचा सो जब वह जल्दी न पहुँचा तो रानी बीमार पड़ गई। किस बात की बीमारी थी, इसकी दशरथ महाराज ने कोई परवाह न की और उसे तो जल्दी गंधोदक पिलवा दिया और मेरे को कुछ नहीं। बुखार चढ़ गया, क्या होगा? बीमार सी हो गई। वहां दशरथ को खुद जाना पड़ा समझाने, इतने में आ गया वह बूढ़ा कायल सो एक तो वैसे ही हफकी चल रही थी, दूसरे जब डाट सी लगी तो उसका तो होश हवाश बिगड़ गया, फिर उसने वृद्धावस्था का जो वर्णन किया उसको सुनकर दशरथ को वैराग्य हो गया।
   पर्यायबुद्धि के कारण रंच-रंच प्रतिकूलता में अज्ञानी की बोखलाहट―साधारण बातों में हम लोगों का क्यों चित्त उद्विग्न हो जाता? इस शरीर में आत्मत्व का अभ्यास बनाये हुए हैं। जब तक आत्मस्वरूप में आत्मत्व का दृढ़ अभ्यास न होगा तब तक न शांति मिलेगी न भविष्य में मोक्ष मार्ग की बात मिलेगी। इस कारण सब कुछ समर्पण करके, न्योछावर करके गाली गलौचों को फूल समझ कर इस कान से सुना ओर उस कान से निकाल दिया। दूसरों की अटपट प्रवृत्ति देखकर बस यह ज्ञान करें कि इसके ऐसी ही कषाय का उदय है ऐसे अज्ञानभाव का उदय है अतः इसकी ऐसी ही प्रवृत्ति हो रही। उससे मेरा क्या? मेरा तो मेरे भावों से सब कुछ होगा अपने भावों में अविकार सहज स्वरूप ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व की भावना दृढ़ बनायें। दुनिया कुछ करे धर्म के नाम पर या लौकिक प्रगति के नाम पर जैसा जो कुछ करते हों सो करें पर अपने को तो यह भाव होना चाहिये कि मेरे राम को तो अपने आपके शुद्ध स्वभाव की दृष्टि दृढ़ बनाना है। दुनिया कुछ करे। और यह है मार्ग अपने को शांति के लाभ का। तो जो आत्मस्वरूप के विरुद्ध वासनायें बनाते हैं चित्त में उनसे होता है कर्म बंध तो उस कर्मबंध का कारण क्या है? तो कारण तो साक्षात् कषाय भाव है, मिथ्यात्व भाव है मगर आश्रय को तो देखिये शरीर में ममता है शरीर को आपा माना है, इस कारण ये सब कठिन स्थितियाँ आयी हैं, ऐसे शरीर की भी साधुजन आहार आदिक से सेवा किया करते हैं, सो सेवा करना उनके जीव का लक्ष्य नहीं है, किंतु धर्म साधना में सुविधा मिलती है इस कारण वे आहार करते हैं।
   आत्मा से अत्यंत भिन्नस्वरूप भी देह का धर्मानुष्ठान के निमित्त साधुवों द्वारा सावधि पोषण―यह देह आत्मा से अत्यंत भिन्न है। कहाँ तो यह चित्प्रकाशमात्र आत्मा और कहाँ रूप, रस, गंध, स्पर्श का पिंड ये पुद्गल स्कंध। जाति जरा भी नहीं मिलती, अत्यंत भिन्न है। सुजाति भी नहीं, और देखो यह कठिनाई कि आत्मा का अपनी जाति से तो बंध होता नहीं और हो रहा है विजातीय से। आत्मा की जाति है आत्मा दूसरा जीव। तो कोई जीव क्या किसी दूसरे से बँधता है? कल्पना करके मान लेवे अपना बंधन वह तो है दूसरी बात पर जैसे देह का और कर्म का बंधन है, इतना नहीं मान रहे, भिन्न जान रहे फिर भी बंधन तो चल रहा है। ऐसा बंधन क्या किसी जीव का किसी जीव से हो पाता है? नहीं हो पाता, और हो रहा है इस विजातीय शरीर से कर्म का बंधन। तो यह देह आत्मा से अत्यंत भिन्न है न जाति का ना, पाँति का ऐसा है यह देह, उस देह में जो व्यामुग्ध होता है। वह कर्म बंधन करता है। वह जन्म मरण की परंपरा बढ़ाता है मिथ्या दृष्टि का स्वरूप जब बताते हैं तो सीधा इस देह को ही कहते हैं। ‘‘देह जीव को एक गिने बहिरातम तत्त्व मुधा है’’ जो शरीर और जीव को एक मानता है बहिरात्मा है, उससे भी और भीतरी बात है जो जीव और कर्म को एक मानता है वह बहिरात्मा है, और भी भीतरी बात देखो क्रिया को और आत्मा को एक मानता है वह बहिरात्मा है और भी अंदर चलो जो विचार विकल्प राग को और आत्मा को एक मानता है वह बहिरात्मा है। पर समग्र बहिरात्माओं के जितने भी लक्ष्य हैं उन सब लक्षणों में प्रतिनिधि यह है ‘‘देह जीवन को एक गिने, बहिरातम तत्त्व सुधा है।’’ जो शरीर को और जीव को एक मानता है वह बहिरात्मा है। तो आत्मा से यह देह अत्यंत भिन्न है। ऐसे भिन्न देह की सेवा साधु जन किसी समय क्यों किया करते हैं? धर्म साधना के नियमित सेवा क्रिया आहार लेना इतना ही पोषण मात्र वह सब होता है धर्म साधना के लिए, इसलिए भिक्षु साधु धर्म साधन के कारण इस देह को पोषकता है यह प्रकरण करता है साधुओं की चेष्टा का। तो बहुत सी गाथायें तो दोष बताने में आयीं कि जो ऐसे दोष करता है वह साधु नहीं, अब यह गाथा में साधु की वृत्ति बताने के लिए है कि साधु जन किस तरह रहते हैं अपने उपयोग वह कहाँ रखते हैं, शरीर के प्रति उनका क्या व्यवहार है, इस प्रकार उनकी चर्चा और वृत्ति के बारे में कुछ साधु ये गाथायें चल रही हैं। इन दो गाथाओं में बताया गया है कि भिक्षु जो शरीर का पोषण करते हैं। वह धर्मानुष्ठान के लिए।
   इस गाथा में भिक्षु शब्द दिया है। बहुत सुंदर प्रयोग वह कहलाता है कि जो एवंभूतनय का संग करे। जिस शब्द का जो अर्थ है उस क्रिया की बात बोलते समय में उस ही शब्द का प्रयोग करे वह एक उत्तम वाक्य प्रयोग कहलाता है। भिक्षु मायने भिक्षा वृत्ति से अर्थात् आहार को खोजने के लिए, निर्दोष आहार तलाशने के लिए जो चर्या करता है उसको कहते हैं भिक्षु। भैक्ष्यं अमृतं, भैक्ष्य को अमृत कहते हैं याने भिक्षावृत्ति में प्राप्त हुए आहार को अमृत कहा गया है। भिक्षा शब्द का बड़ा ऊँची अर्थ है मगर दरिद्र, रोगी भिखारियों ने इस भिक्षा शब्द की मिट्टी पलीत करा दी। भिक्षा कहते हैं बिना किसी शल्य के बिना आरंभ परिग्रह के ज्ञान ध्यान में लीन रहने वाले जन जिस समय क्षुधा से पीड़ित हुए कि धर्म ध्यान में बाधा आने लगी तो वे भ्रमण करते हैं और कोई श्रावक बड़ी भक्ति दिखाकर नमस्कार करके बारबार प्रार्थना करे कि महाराज आहार ग्रहण करने की कृपा कीजिए। वहाँ अगर निर्दोष आहार मिले तो उस आहार को ग्रहण करना ऐसा आहार कहलाता है भैक्ष्य और यह बताया है अमृत क्योंकि उसके न पहले न उसके बाद किसी भी प्रकार की चिंता और शल्य इस जीव के नहीं रहती।


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