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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 104

From जैनकोष



संजमतव झाणज्झयणविणाणए गेण्हये पडिग्गहणं।

वंचइ गिण्हइ भिक्खु ण सक्कदे वज्जिदुं दुक्खं।।1॰4।।

   संयम की साधना के लिये साधुवों द्वारा प्रतिग्रहण की स्वीकरता―यह भिक्षु, यह साधु प्रतिग्रहण को ग्रहण करता है तो वह संयम तप ध्यान अध्ययन और विज्ञान के लिए करता है, प्रतिग्रहण करने का अर्थ है कि किसी शुद्ध भोजन करने वाले गृहस्थ ने साधु को पड़गाहा तो उसके पड़गाहन को स्वीकार कर लेना (अच्छा चलो), चलते हुए मुख से नहीं कहते, मगर प्रतिग्रहण सुनकर जो साधु चल देते हैं गृह में उसे कहते हैं कि प्रतिग्रहण को स्वीकार कर लिया। औरों का तो नियंत्रण होता है चौबीस घंटे, 12 घंटे पहले या कुछ घंटे पहले मगर साधु का नियंत्रण तत्काल का है और वह भी स्वरूप स्वीकार करे या न करे। उस तात्कालिक घर पर आये हुए साधु को बुलाने का नाम है प्रतिग्रहण। उसे आमंत्रण कह लीजिये। बुला रहे हैं। प्रतिग्रहण कर लीजिए कि इस आहार दान के प्रति उनको ग्रहण किया जा रहा है, उनको लिया जा रहा है। जिसका बिगड़ कर शब्द बना पड़गाहन, तो उस प्रतिग्रहण को साधु स्वीकार करते हैं संयम के लिए शरीर में थोड़ी शक्ति रहेगी, देखभालकर चलना बनेगा, ध्यान भी बनेगा। तो संयम की साधना के लिए प्रतिग्रहण की स्वीकारता होती है।
   तप ध्यान अध्ययन विज्ञान के लिये साधुवों द्वारा प्रतिग्रहण की स्वीकारता―तप की सिद्धी के लिए भी प्रतिग्रहण की स्वीकारता है, क्योंकि शरीर में सामर्थ है तो अनशन आदिक तपश्चरण कर लेंगे आगे। प्रायश्चित आदिक तपश्चरण कर सकेंगे। तो तपश्चरण की शुद्धि के लिये, ध्यान और अध्ययन की शुद्धि के लिये यद्यपि साधुवों में इतना बल है कि एक माह भी आहार न मिले, पुराणों में तो वर्णन आया है कि एक वर्ष आहार न मिले तिस पर भी वे प्रसन्न रहा करते थे। अपने अविकार ज्ञानस्वभाव का अनुभव जो उन्होंने पाया है उसकी इतनी महिमा है कि वर्ष भर भी आहार न मिले तो भी ग्लानि नहीं आती। अप्रसन्नता बना लेने से अध्ययन और ज्ञान की साधना न चलेगी। तो ये साधु जन इस ज्ञान के प्रयोजन के लिए प्रतिग्रहण स्वीकार करते हैं। और यदि इन भावों को लेकर नहीं हैं साधु, कुछ जिह्वा लोलुपी या कुछ रसास्वाद किसी कारण से आहार भी ग्रहण करता है तो वह दुःखों से मुक्त नहीं हो सकता। अन्यथा उस प्रकार के आहार को साधु ग्रहण नहीं करता। तो यह आहार ग्रहण करने का प्रयोजन कुछ-कुछ इन गाथाओं में बताया गया है। अब इसी संबंध में और भी आगे स्पष्टीकरण किया जायेगा।


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