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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 115

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मूलुत्तुरुतरदव्वादो भावकम्मदो मुक्को।

आसवबंधणसंबर णि ज्जर जाणेइ किं बहुणा।।115।।

   द्रव्यकर्म नोकर्म व भावकर्म से विवित्त अंतस्तत्त्व के द्रष्टा के ज्ञान में समीचीनता―आचार्य देव यहाँ कहते हैं कि बहुत बात करने से लाभ क्या है? एक समस्त पर पदार्थों से निराला अपना ज्ञानस्वभावमय आत्मा

अपने उपयोग में दृष्टि में होना चाहिए। कैसा देखे अपने को? अभी तो मूल उत्तर कर्म प्रकृतियों से निराला है। मूल कर्म 8 ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय, वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र, ये 8 कर्म पुद̖गलमय है। पुद̖गल ही हैं, कार्माण वर्गणा जाति के स्कंध है। उन कर्म पुद̖गलों से निराले अपने आपको देखे वह है ज्ञानी। जैसे दर्पण के आगे कोई वस्तु आ जाय तो उस वस्तु के अनुरूप दर्पण में प्रतिबिंब हो जाता है, उस प्रतिबिंब का आधार उस समय दर्पण है, वह दर्पण से निराला नहीं है। अगर स्वरूप दृष्टि से देखा जायेगा तो दर्पण-दर्पण के स्वरूप में है, फोटो दर्पण में आकर भी दर्पण का स्वरूप नहीं है, दर्पण की उस काल की परिणति होने पर भी दर्पण का स्वरूप नहीं हैं। दर्पण तो अपने आप में जैसा कि वह अकेला पर संबंध बिना हो सकता हो वह है दर्पण का स्वरूप। तो ऐसे ही आत्मा का स्वरूप है स्वच्छ ज्ञान, केवल जानना, ज्ञान प्रकाश, चित्प्रकाश। अहो कैसा अद्भुत अनुपम पदार्थ है यह जिसकी उपमा किसी भी पदार्थ से की नहीं जा सकती। चैतन्य है, चित्प्रकाश रूप है, निरंतर जानन देखन प्रतिभासमय है, सो इस विवित्त स्वरूप को निरखे, द्रव्य कर्म से निराला निरखे, शरीर से निराला देखे तो वह पुरुष है वास्तविक ज्ञाता। और उसने इस तत्त्व को जाना। जैसे आगम में पाप कर्म का भी स्वरूप बताया है मगर उसके जानने की विधि क्या है कि यह हेय है, इस तरह से पाप का स्वरूप जाने ऐसे ही इस आत्मा में बहुत से द्रव्यभाव उत्पन्न होते रहते हैं। आकार भी बदलते। कषाय विकल्प भी बदलते, पर ये सब परिवर्तित होने पर भी आत्मा का जो शाश्वत स्वरूप है वह सदैव रहता है। तो वह आत्मस्वरूप मूल कर्म से निराला है। और उत्तर प्रकृतियों से निराला है, भाव कर्म से भी निराला है यह सहज परमात्मतत्त्व। भाव कर्म क्या? रागद्वेष विकार, कषाय विकल्प, जो-जो कर्मोदय का निमित्त पाकर होता है या कर्म जो उदीर्ण। आदिक दशाओं का निमित्त पाकर होते हैं वे कहलाते हैं परभाव। सो उन पर भावों से निराला भाव कर्म से निराला यह जीव अब भी है, उस निराले अंतस्तत्त्व की आराधना से ही तो मुक्ति प्राप्त होती है। निरालापन प्राप्त होता। तो कल्याण मार्ग में बढ़ने के लिए एक अपना यह अंतस्तत्त्व ही एक सहज मार्ग है।

   अंतस्तत्त्व के ज्ञाता के आस्रवादि तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान―जो पुरुष इस द्रव्य कर्म से, भाव कर्म से रहित तत्व को निरखता है उसी ने समझिये कि भाव आश्रव बंध संवर, निर्जरा तत्त्व के रहस्य को जाना, और जो इस तत्त्व को भूतार्थ विधि से देखता है उस पुरुष का निर्वाण होता है। वह पुरुष ज्ञाता होता है। वह पुरुष अंतरात्मा है, ऐसा निश्चय से जानना। आत्मा को तो सब जानते हैं। जो अज्ञानी हैं वे जान रहे हैं, पर वे जान रहे हैं अन्य पदार्थ रूप में तो जानना किसे चाहिए? आत्मा को कि यह मैं आत्मा स्वतंत्र स्वयं परिपूर्ण समस्त परभावों से निराला ज्ञानमात्र हूँ। ऐसी अभेद विधि से अपने आत्मा का कोई ज्ञान करता जाय तो उसको निर्वाण निकट है। तो बहुत कहने से क्या फायदा? एक ऐसा ही अपने आप को देखें कि मैं जो सहज सत् हूँ वह स्वयं सत् हूँ और अन्य समस्त द्रव्यों से निराला हूँ उस रूप अपने आप का अनुभव किया जाय, मैं यह हूँ। इसके प्रताप से निर्विकल्प दशा मिलती है और ऊपर के गुणस्थानों में चढ़ने की सुगमता मिलती है यह सर्व परभावों से निराले अपने ज्ञानमात्र स्वरूप के कल्याण का प्रारंभिक उपाय है।


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