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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 116

From जैनकोष



विसयविरत्तो मुंचइ विसयासत्तो ण मुंचए जोई।

वहिरंतरपरमप्पाभेयं जाणेह किं बहुणा।।116।।

   विषयविरक्तों की मोचन व विषयाक्तोंसत्तों का बंधन―जो विषयों से विरक्त हैं वे योगी तो कर्म से छूट जाते हैं किंतु जो विषयों में आशक्त हैं वे कर्म से नहीं छूटते। विषयों से विरक्ति किसके हो सकती है सही मायने में? जिसके विषय रहित निज सहज ज्ञान स्वभाव में यह ही मैं हूँ और इस सहज ज्ञान स्वरूप की वृत्ति होती है इसका ही मैं कर्ता हूँ और जो ज्ञान की वृत्ति होती है उसका ही मैं भोगने वाला हूँ, इस तरह जो अपने ज्ञान स्वभाव में अहं प्रत्यय रखता है, जो इस निज ज्ञायक स्वरूप को अपनी संपत्ति विभूति मानता है, जो इस ज्ञान के परिणमन को अपना कर्म मानता है और इन सब को करने वाला स्वयं इस तरह की प्रतीति रखता है याने उपयोग को सर्व विधियों से अपने आपके स्वरूप में रचाता है वह पुरुष सही मायने में विषयों से विरक्त हो सकता है। अन्यथा किन्हीं स्थितियों में विषय इच्छावों को दबा कर रह जाय कोई तो वह कहीं उखड़ पड़ता है। किसके विषय इच्छानुसार नहीं उखड़ सकते? वह है तत्त्वज्ञानी पुरुष। तो तत्वज्ञान के बल से निर्विषय अपने सहज हित की भावना के बल से जो विषयों से विरक्त होते हैं वे योगी कर्म से छूट जाते हैं किंतु जो विषयाशक्त हैं, विषयों में लीन हैं वे पुरुष कर्म से नहीं छूटते। विषयों में लवलीन कौन होता है? जिसको विषय रहित अपने आपके स्वरूप का परिचय नहीं। मैं वास्तव में क्या हूँ, केवल सहज ज्ञानज्योति मात्र। जानन ही जिसका काम है, जानन ही जिसका भोग है, ऐसे अविकार सहज ज्ञान स्वरूप में जिसको आत्मतत्त्व का परिचय हुआ है वह तो विषयों से विरक्त होता है, और जिसे इस आत्म तत्त्व का परिचय नहीं है तो उपयोग कहीं न कहीं रमेगा। उसको यदि अपना घर नहीं देते, अपने घर का कोई द्वार नहीं खाले कर रहते तो इस उपयोग को कहीं न कहीं रमे बिना चैन ही नहीं पड़ती उपयोग तो रमेगा। अब तक निज घर तो रमने के लिए मिला नहीं तो यह बाह्य पर पदार्थों में रमेगा। तो जो मूढ़ है, पर्याय को ही आत्मा मानते हैं वे पुरुष विषयाशक्त होते हैं, सो विषयाशक्त योगी कर्मों से छूट नहीं सकते।
   कर्मों से छूटने के लिये प्रारंभिक उपाय बहिरात्मा अंतरात्मा व परमात्मा के तथ्य का सुपरिचय―कर्मों से छूटने के लिए प्रथम कर्तव्य यह है कि बहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्मा के भेद को जान लिया जाय। बहिरात्मा जो ज्ञायक स्वरूप के अतिरिक्त अन्य भावों में यह मैं हूँ ऐसा अनुभव करे वह है बहिरात्मा। वह क्या हैं? अन्य-अन्य समस्त पुद̖गल द्रव्य। मुझसे अत्यंत भिन्न हैं। यह लगा हुआ शरीर मुझसे अत्यंत भिन्न है। जगत के समस्त पुद̖गल मुझसे अत्यंत भिन्न हैं, धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश द्रव्य और काल द्रव्य इन सब से मैं निराला हूँ। ऐसे सबसे निराले अपने ज्ञान स्वभाव को जो न पहिचान सके और तब होगा क्या कि इस देह को ही यह मैं हूँ ऐसा मानता रहे वह कहलाता है बहिरात्मा। बहिरात्मा होने में लाभ नहीं है, हानि है। तृष्णा बढ़ेगी, कषाय बढ़ेगी, अपने आपकी सुध नहीं है। जो देह को और विषय को एक समान मानता है वह बहिरात्मा है। जो कर्म विपाक के प्रभाव से प्रतिबिंब होता, फोटो होता उपयोग उस रूप परिणम जाय याने उपयोग उसे यह मैं हूँ ऐसा मान बैठे तो वह है बहिरात्मा। बहिरात्मा होकर ही तो अनादि से संसार में भ्रमण करते चले आये। जिस भव में गए उस भव को ही अपना सर्वस्व मानने लगे। आज मानो धनिक है, सेठ है, विद्वान हैं और मरकर बने कोई खोटी गति के जीव मानो कुत्ता ही बन गए। अब उस कुत्ते से मनुष्योचित भावना वासना पौरुष कहाँ से चलेंगे? तो जिसको हम मानते हैं कि यह मेरा सर्वस्व है, इस पौद्̖गलिक ठाठ को अपना ठाठ माने तो भव बदल जाने पर उस जीव के लिए यहाँ कुछ न रहा उपयोग में तो भी अनादि काल से यह जीव बहिरात्मा होकर चारों गतियों में भ्रमण कर रहा। अंतरात्मा, जो समस्त पर और परभावों से निराला ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व को निरखता है और उस ही में यह मैं हूँ, ऐसा अनुभव करता है वह पुरुष, वह जीव अंतरात्मा है, और जो परम आत्मा है, उत्कृष्ट आत्मा, वीतराग आत्मा, अपने ज्ञान स्वरूप में मग्न होने वाला आत्मा, वह परमात्मा है।
   दुर्लभ मानव जन्म में मिले हुए श्रेष्ठ मन का सदुपयोग करने का अनुरोध―इस संसार में भटकते-भटकते आज दुर्लभ मनुष्य जन्म पाया, इसका महत्त्व इस ही से ऑक लीजिए कि आज ऐसा मन मिला है कि जिसके बल से हम कल्याण के मार्ग में लगें तो यह मन उसमें मदद देता है और यदि न चाहें आत्मकल्याण तो, अन्य बातों में लगेगा। तो यह है एक अपूर्व अवसर कि जहाँ हम अपने आत्मा के सहज स्वरूप को जानें और इसही सहज स्वरूप में अपना अनुभव बनायें तो वह पुरुष कर्मों से छूट जाता है। छूटेगा तो सब जो इस भव में मिला पर मरने पर छूटा तो वह छूटा नहीं कहलाता। वह तो होता ही है एक कोई घर में वृद्ध आदमी था, उसके दो चार लड़के भी थे, मगर उस वृद्ध को इतनी तृष्णा थी कि वह दुकान की अथवा तिजोरी की चाभी खुद लिए रहता था। वह किसी को नहीं देता था। बहुत वृद्ध हो गया और मरणहार हो गया उसको भी भान हो गया कि अब इस शरीर को छोड़कर जायेंगे तो उस समय बेटों से बोलकर कहता है कि बेटो लो यह तिजारी की चाभी, तो बेटे कहते हैं कि दादा जी मुझे न चाहिए, तिजोरी की चाभी, आप ही अपने साथ लेते जाइये। अब मरने पर कहीं चाभी साथ जाती। तो मरने पर तो छूटेगा, मगर विवेक इस बात में है कि अपने ज्ञान बल के प्रयोग से सही बात जानते रहें। वे समस्त बाह्य पदार्थ मुझ से अब भी छूटे हुए ही हैं। उसमें मेरा कुछ नहीं लगा है। मैं अमूर्त ज्ञान स्वरूप आत्मा सब से निराला हूँ। मेरा किसी पदार्थ से कोई संबंध नहीं, ऐसा इन बाह्य पदार्थों से छूटा हुआ निरखें तो वह पवित्र आत्मा है। ज्ञान की ही तो बात है और ज्ञान ही से हम सुधर सकते, ज्ञान ही से हम उल्टे बन सकते। ज्ञान की ही सही वृत्ति होना कल्याण का उपाय है।
   सम्यग्ज्ञान के लिये उमंग की प्राकृतिकता―भैया, जो सही बात है उसके जानने में क्यों आलस्य करते? इस जीव की आदत है कि सच-सच जाने। प्रयोजन हो तो न हो तो पर सच्चा जानने की भावना रहती है जीव की। ऊपर से कोई हवाई जहाज उड़ रहा हो तो देखे बिना नहीं रहते। अरे भाई क्यों देखते हो? क्या उस जहाज में बैठना चाहते हो? क्या उस जहाज को रोक कर यहाँ नीचे लावोगे? क्या प्रयोजन है? जा रहा जहाज ऊपर, पर देखे बिना नहीं रहा जाता। ऐसा क्यों? तो जीव की आदत है यह कि जो कुछ हो सो जान लेवे कि है क्या? प्रत्येक पदार्थ ज्ञान में आता है शुद्धज्ञान हो तो, तो सत्यज्ञान के लिए आलस्य क्यों? सोच लीजिए कि क्या इन बाह्य पदार्थों में मेरी सत्ता कुछ बसी हुई है? कौन सा नाता है कि जिससे यह चीज आपकी कहलाये, यह ही निर्णय बनाओ। लोक व्यवहार में व्यवस्था जरूरी है कि यह घर इसका है, यह घर इसका है। व्यवहार में व्यवस्था है, पर वस्तु स्वरूप की ओर से देखो तो आपका आपके ज्ञान स्वरूप के अलावा कुछ है भी क्या लोक में? कुछ नहीं है। तो कैसा ज्ञानस्वरूप मैं हूँ उसको ही तो परखना है अंतरात्मा हो जायगा। तो कल्याण के लिए प्रथम कदम है बहिरात्मा और परमात्मा का भेद समझ लेना। जो पर पदार्थ को कर्म के उदय को, और रागादिक विकल्पों को अपना स्वरूप मानता है वह है बहिरात्मा और जो इससे निराले केवल सहज ज्ञान स्वरूप में ही यह मैं हूँ ऐसा अनुभव करता है वह है अंतरात्मा। अंतरात्मा होने में विलंब नहीं है फिर तो मुक्ति निकट काल में है और सम्यक्त्व होने का या कल्याण पाने का बिल्कुल सीधी बात है कि अपना जो अपने आप अपने ही सत्त्व से जो चीज हो सकती हो वही होवे। तो बहिरात्मा और अंतरात्मा में बहिरात्मा क्यों बनें। अंतरात्मा बनना चाहिए और चित्त में सदा सिद्ध प्रभु का ध्यान क्योंकि आत्मा की अंतिम पवित्र विशुद्ध अवस्था सिद्ध भगवान की परिणति है। सो चित्त में ॐ नमः सिद्धेभ्य अनंत आनंद जो बाह्य पदार्थों से विरक्त है आशक्त होकर क्या पा लेंगे? पंचेंद्रिय होकर विषयों के लोभी होकर पा क्या लेंगे? तो उस ओर से तो दृष्टि छोड़े और अपने आपका जो सहज स्वरूप है उसमें आत्मा का अनुभव करें सब संकट दूर होंगे।
   ज्ञानस्वरूप में मग्न होने पर सकल संकटों का पार्थक्य―कोई बड़ी नदी में एक कछुवा रहता था, पानी के अंदर रहता था तो उसका एक दिन भाव हुआ कि उस पानी के ऊपर अपनी चोंच निकाल कर थोड़ा आराम ले लूँ, सो पानी से बाहर अपनी चोंच करके वह तैरने लगा। थोड़ी ही देर में क्या देखा कि चारों ओर से अनेकों पक्षी उसकी चोंच को चोंटने लगे, वह बेचारा कछुवा कभी पूरब दिशा की ओर भागता तो कभी पश्चिम दिशा की ओर, सभी तरफ वह हैरान होकर भगता फिरता, बड़ा दुःखी हो रहा था। पर कोई विवेकी उसे समझा दे कि रे कछुवे तू क्यों व्यर्थ ही दुःखी हो रहा? अरे तेरे में तो एक ऐसी कला है कि यदि तू उस कला का उपयोग कर ले तो ये एक भी संकट न रहेगा। क्या है वह कला कि पानी के अंदर कोई दो चार अंगुल में अपनी चोंच को डुबा भर ले, फिर वे सारे पक्षी तेरा क्या बिगाड़ कर सकेंगे? यदि यह समझ ले वह कछुवा और अपनी चोंच के पानी के अंदर डुबा ले तो बस उसके सारे संकट एक साथ खतम, ऐसे ही हम आप संसारी प्राणी अपने उपयोग रूपी चोंच को बाहर में निकाले हुए इस संसार रूपी समुद्र में भ्रमते फिर रहे हैं, जिससे सैकड़ों प्रकार के संकट सामने खड़े हैं। कभी कोई संकट कभी कोई, कहीं चोर बदमाश सता रहे, कहीं सरकारी कानून हैरान कर रहे। कहीं नाते रिश्तेदारों की ओर से अनेक व्यंगात्मक बातें सुनने में आ रहीं कहीं पड़ोसियों की ओर से अपने उपद्रव ढाये जा रहे, क्या एक संकट है? पर इसे कोई समझा दे कि रे मूर्ख तू क्यों व्यर्थ में दुःखी हो रहा है? अरे तेरे में तो एक ऐसी कला है कि जिस कला का यदि प्रयोग करे तो ये सारे संकट एक साथ समाप्त हो जायेंगे। क्या है वह कला कि अपने ज्ञानरूपी समुद्र में अपनी उपयोग रूपी चोंच को डुबा ले ऐसा किया नहीं कि सारे संकट एक साथ समाप्त। फिर वे बाहरी उपद्रव इस जीव का कुछ बिगाड़ न कर सकेंगे।
   कषाय संकट के विनाश होने पर सकल संकटों का अभाव―ये क्रोध, मान, माया लोभादिक कषायें इस जीव के संकटों की मूल हैं। जहाँ अपने निज आत्म प्रदेशों में तत्त्वों में, अपने निर्विकल्प निस्तरंग ज्ञानसागर में डुबो देवे तो ये सारे संकट एक साथ ध्वस्त हो जाते हैं, और अपना जो भीतरी ज्ञान चक्षु है उसको साथ लिए हुए अपने इस ज्ञान सरोवर में मग्न रहता है। सारे संकट दूर हो जाते हैं। जैसे पानी कछुवा डुबकी लगा गया तो चारों ओर से आये हुए पक्षी उसको चोंच चोंट न सके, वह तो जल के अंदर मग्न हो गया, ऐसे ही जो उपयोग इन बाह्य समागमों के ख्याल छोड़कर जो मात्र ज्ञान स्वभाव का आलंबन लेने के लिए भीतर गया है, अभेद हुआ है उसको अब संकट कहाँ से हों। तो ये बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा के भेद से जो जानता है वह छूटता है कर्म से। परमात्मा हुआ वह पुरुष जिसकी दृष्टि में यह सहज ज्ञान स्वभाव सदा रहता है, तो ऐसे इस ज्ञान स्वभाव की उपासना के बल से योगीजन विषयों को छोड़ देते हैं। इससे अधिक कहने से लाभ क्या? बहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्मा के भेदों को जानकर विषयों से विरक्त होना चाहिए।


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