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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 117

From जैनकोष



णियअप्पणाणझाणज्झायण-सुहामियरसायणप्पाणं।

मोत्तूणक्खाणसुहं जो भुंजइ सो हु बहिरप्पा।।117।।

    बहिरात्मत्व का प्रसार―इससे पहली गाथा में यह बताया था कि बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा के भेद को जानो बहुत कहने से क्या प्रयोजन? देखिये धर्म मार्ग में लगने वाले को सर्वप्रथम यह तो जानना ही चाहिए कि बहिरात्मा कौन, अंतरात्मा कौन और परमात्मा कौन? इन शब्दों से ही इसका अर्थ ध्वनित हो जाता है। बहिरात्मा, बाहरी पदार्थों को आत्मा मानना उसे कहते हैं बहिरात्मा। जो अपना स्वरूप है उस सब को अपना आत्मा समझना बहिरात्मा है। यह बात संसार में लेने की है, पूर्ण अकल्याण की है, बाहर की चीज क्या-क्या है? चेतन अचेतन परिग्रह, देह और कर्म, और भीतर चलो तो रागादिक भाव कर्म, और भी सूक्ष्म देखिये तो जो अपूर्ण विकास है वह भी परभाव है। जैसे पूर्ण विकास हुआ क्यों? वह हुआ है परद्रव्य के विपाक का निमित्त पाकर। क्षयोपशम भी है तो आखिर कहाँ तो देशघाती का उदय है। गुणस्थान 14 बताये गए, जिसमें 13 गुणस्थान आश्रव के कारण हैं। सुनते हुए थोड़ा बोझ लगता होगा कि कहीं 13वाँ गुणस्थान या 11वाँ 12वाँ गुणस्थान जहाँ वीतराग है वहाँ भी आश्रव बताया है। तो देखिये गुणस्थान को दोष दृष्टि से देखिये-गुणस्थान आत्मा का स्वरूप नहीं है, पर ये बने हैं तो कोई दोष रह गया इस कारण बने हैं 13 वें गुणस्थान में भले ही आत्म विकास है, केवल ज्ञान है। सर्व कुछ होकर भी यह 13वाँ गुणस्थान योग की वजह से बना है, मोह के कारण से तो 12 गुणस्थान हैं और योग के निमित्त से दो गुणस्थान हैं। 13वाँ और 14वाँ मगर 14वाँ है योग रहित 13वाँ है योग सहित, तो जो योग सहितपना है उसके कारण आश्रव है और इस विधि से कर्मों के भी ये ही नाम पड़ जाते हैं जो ये 13 गुणस्थान हैं। यद्यपि प्रकृतियों के नाम अलग-अलग दिए गए हैं 148, पर उनके भेद प्रभेद, विकास अनुभाव इन सब को निरख कर बताया गया है कि 13 गुणस्थान आश्रव के कारण हैं। मूल में मिथ्यात्व अविरति कषाय और योग ये चार आश्रव के हेतु भूत है पर 13 गुणस्थान इन चार के ही विस्तार हैं, मतलब यह है कि इनमें उस कमी को देखना कि किस कारण यह कमी है और कमी है तो आश्रव है।
   बहिरात्मा अंतरात्मा व परमात्मा का संक्षेप में अनुदर्शन―भैया बहुत उच्च बात न देखें तो इतना तो देखना ही चाहिए कि ये कुटुंबादिक चेतन परिग्रह अन्य धन संपत्ति, अचेतन परिग्रह और देह यह भी अचेतन परिग्रह, कर्म अचेतन परिग्रह और रागादिक भाव चिदाभास जिसे निश्चय से अचेतन कहा है उस रूप अपने को जो मानता है उसको कहते हैं बहिरात्मा और जो इस रूप अपने को नहीं मानता, केवल सहज ज्ञानस्वरूप आत्मा का जो निरुपाधि शाश्वत स्वभाव है उसमें ही यह मैं हूँ, ऐसा जो अनुभव करता है उसे कहते हैं अंतरात्मा और इस ही ज्ञायकस्वभाव के अनुभव की दृढ़ता के बल से जो आत्मा में परम विकास होता है उसे कहते हैं परमात्मा। तो ये तीन भेद जानना प्रत्येक धर्मार्थों को आवश्यक है।
    बहिरात्मा, अंतरात्मा व परमात्मा का तथ्य जाने बिना व्यवहार धर्मप्रयोगों को असफलता―तो यदि बहिरांतः परमात्मत्व तथ्य न जाने फिर पूजा का क्या अर्थ? मंदिर जाने का क्या मतलब? स्वाध्याय का क्या प्रयोजन? जाप का क्या मतलब? ये सब अर्थहीन हैं, निरर्थक हैं। यदि इतना भी बोध नहीं है कि बहिरात्मा और अंतरात्मा व परमात्मा क्या कहलाते तो ये सब बातें भले ही थोड़ा पुण्य बाँध देवें मगर संसार से मुक्त होने का उपाय नहीं बन सकता, और पुण्य ही पुण्य में कौन सा तथ्य है कितनी ही बार पुण्य किया होगा, कितने ही बार राजा महाराजा हुए होंगे, देव भी हुए होंगे पर उस पुण्य से पूरा पड़ा क्या! पुण्य तो ज्ञानी को सहज मिलता है। ये किसान भुस के लिए गेहूँ नहीं बातें खेती नहीं करते, खेती करते हैं अन्न उत्पन्न करने के लिए जो अन्न उत्पन्न करने के लिए प्रयत्न करेगा उसको भुस न मिलेगा क्या? अरे उसको भुस तो मिल ही जायगा, पर उसकी दृष्टि उस भुस पर नहीं होती। भुस के लिए वह खेती नहीं करता। खेती करता है अन्नोपार्जन करने के लिए। ऐसे ही ज्ञानी पुरुष पुण्य बाँधता है मगर वह पुण्य के लिए अपनी वृत्ति नहीं कर रहा। वह तो मोक्ष मार्ग में चल रहा। मोक्ष का आधारभूत जो ज्ञायक स्वरूप है उसका लक्ष्य कर रहा। उसकी ही भक्ति में रह रहा। अब उसके पुण्य बँधता है तो वह भुस की तरह। उसका आदर नहीं है ज्ञानी के कि इस पुण्य को वह बड़ा महत्त्व दे सके। वह यह नहीं सोचता कि इस पुण्य से मैं सुखी हो जाऊंगा, संकटहीन हो जाऊंगा, पर होता है, पुण्य बँधता है। जैसे कोई पुरुष ट्रेन से पुरुष बंबई जा रहा हो तो उसका लक्ष्य तो बंबई पहुँचने का है, टिकट भी बंबई का है, उसका उपयोग भी बंबई की ओर लगा है, मगर बीच के सैकड़ों स्टेशनों से गुजरे बिना वह बंबई तो नहीं पहुँच सकता। वे स्टेशन तो मिलते ही हैं। तो ऐसे ही जो मोक्ष का अर्थी पुरुष है, मुक्त स्वभाव रूप जो आत्मा का शुद्ध स्वभाव है उसकी दृष्टि रखता है और उस समय उसके मन वचन काय योग की सहज से पुण्य बँधता है, पर पुण्य में ज्ञानी को आस्था नहीं। तो इस तरह बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा का भेद जिनको ज्ञात नहीं है उसकी पूजा जाप स्वाध्याय, व्रत तप आदिक को जो भी धार्मिक क्रियायें की जा रही हैं उनसे लाभ क्या मिलता उनको सो तो बताओ?
   धर्म का त्वरित फल लाभ―धर्म का फल है शांति। पुण्य का फल मिलेगा बहुत देर में और धर्म का फल मिलेगा तुरंत। आज पुण्य बँधा, देव आयु बँधी तो उसका फल मिले बहुत दिनों बाद, इस जीवन में पुण्य का फल मिलना बहुत कठिन है। इस भव में पुण्य किया जाय, उसका फल आगे कभी मिलेगा मगर धर्म अभी किया जाय जो उसी समय मिलेगा फल। धर्म का फल है शांति और धर्म नाम है विकार रहित अपना जो स्वतः सिद्ध ज्ञानस्वरूप है, उसमें यह मैं हूँ इस प्रकार का अनुभव होना यह है धर्म, यदि कोई इस ज्ञानमात्र भाव की उपासना में है तो क्या उस समय वह अशांत है? उसे तो तत्काल शांति है और भविष्य में शांति की धारा बहेगी। इससे पहले की गाथाओं में बताया है―बहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्मा। इसके भेद को जरूर जानो। जब यह मैं हूँ कुछ तो उसके ही तो दशायें हो सकती है, या तो शुद्ध परिणति में चले या अशुद्ध परिणति में चले। अशुद्ध परिणति में चलेगा तो वह बहिरात्मा संसार में रुलने वाला अज्ञानी है। शुद्ध परिणति में चलेगा तो वह ज्ञानी है, अंतरात्मा है और शुद्ध परिणति में चलते रहने का आखिर अंतिम फल क्या होगा कि यह वीतराग शुद्ध आनंदमय अपना पद पा लेगा।
   बहिरात्मा के स्वरूप का दिग्दर्शन―पूर्व गाथा में जो यह संकल्प किया गया था कि इन तीन भेदों को जानना आवश्यक है। उसमें अब यहाँ बहिरात्मा का स्वरूप कह रहे हैं। कौन है बहिरात्मा? जो निज आत्मा के ज्ञान, ध्यान अध्ययन के सुखामृत रसायन का पान छोड़कर इंद्रिय के सुखों को भोगता है वह है बहिरात्मा। इंद्रिय का सुख कल्पित है, असार है, उसकी मान्यता अज्ञानमय है और अपने आत्मा का ज्ञान ध्यान अध्ययन बने तो उस आनंद की कोई उपमा नहीं दी जा सकती। सांसारिक सुखों की तो उपमा चलती है, कोई पूछे कि अमुक मिठाई में कैसा आनंद है? तो वह दूसरी किसी मिठाई का नाम लेकर कहता है कि उस अमुक मिठाई जैसा उसमें आनंद है और और भी सांसारिक सुखों के लिए उपमा बन सकती किंतु अपने इस अविकार ज्ञानस्वरूप आत्मा का ज्ञान श्रद्धान आचरण इस ही में उपयोग, इस ही अंतस्तत्त्व रमण यदि हो सके तो उसके अलौकिक आनंद है। उस आनंद को तो यह जीव ग्रहण करता नहीं, उसकी तो सुध लेता भी नहीं और बाह्य अक्ष्य सुखों की महिमा बताता है। इंद्रिय सुखों को भोगता है, ये सब बहिरात्मापन के लक्षण हैं धन्य हैं वे आत्मा जिनको सांसारिक सुख सुहाता ही नहीं है। एक निज अंतस्तत्त्व का ज्ञान ध्यान बने वहाँ ही उपयोग रहे केवल यह भी भावना बनाना है। पर अज्ञानी जीव एक तो सुध ही नहीं अपनी और बाह्य इंद्रिय सुखों में रमता है। यह बहिरात्मा का लक्षण है।


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