• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 118

From जैनकोष



किंपायफलं पक्कं विसमिस्सिदमोदमिव चारुसुहं।

जिब्भसुहं दिट्ठिपियं जह तह जाणक्खसोक्खं कि।।118।।

   इंद्रियज सुखों की कष्टफल स्वरूपता―इससे पहले की गाथा में बताया है कि बहिरात्मा इंद्रिय जन्य सुखों को भोगता है, तो वे सुख कैसे हैं उसका वर्णन इस गाथा में किया है। ये इंद्रिय जन्य सुख, संसार के सुख ऐसे हैं कि जैसे कोई किंपाक फल को खाकर उसमें मौज मानता है, किंपाल फल होता है कोई विषफल जो कि ऊपर से बहुत सुहावना लगता है और उसको खा ले कोई तो मृत्यु हो जाय। तो जरा मीठा होने से उसके स्वाद में आकर उसके लोभी बनकर उस विषफल को कोई खा ले तो जैसे यह एक असार काम है, अथवा विष से मिले हुए लड्डू कोई खाले तो वह असार काम है इसी तरह ये सभी इंद्रिय जन्य सुख ये मात्र दृष्टि प्रिय हैं। तत्काल कुछ मन को रमाने वाले हैं, किंतु ये सब संसार के क्लेशों को बढ़ाने वाले हैं।
   इंद्रियज सुखों की दुःखफलरूपता का उदाहरण पूर्वक समर्थन―एक बार कोई चार डाकू कहीं से दो लाख का धन चुरा कर लाये। वे रात को किसी जंगल में ठहर गए। जब कुछ प्रभात हुआ तो उनमें यह सलाह हुई कि अब धन तो बँटेगा ही पर धन बँटने से पहले बाजार से खूब मिठाईयाँ मंगा कर खाई जावें, बाद में धन बाँट लेंगे। सो उनमें से दो चोर तो पास के नगर से मिठाई खरीदने गए और दो चोर उस धन की रखवाली करने के लिए रह गए। अब मिठाई खरीदने जाने वाले दोनों चोरों के मन में आया कि इस मिठाई में विष मिला कर उन दोनों को खिला दिया जाये वे दोनों मर जायेंगे तो हम तुम दोनों को एक-एक लाख का धन मिल जायगा, नहीं तो आधा-आधा लाख ही मिलेगा। सो वे तो चले विष मिली बहुत सुंदर मिठाई लेकर और इधर धन की रखवाली करने वाले दोनों चोरों ने सलाह किया कि हमारी ओर जो हो उसे हम गोली से सूद कर देंगे और तुम्हारी ओर जो हो उसे तुम गोली से सूट कर देना। वे दोनों मर जायेंगे जो हम तुम दोनों एक-एक लाख का धन बाँट लेंगे। ठीक है। आखिर दो चोर तो विषभरी बड़ी सुहावनी मिठाई लेकर चले और दो चोर अपनी-अपनी बंदूक तान कर बैठ गए। जब पास में आ गए तो दोनों चोरों को गोली से सूट कर दिया। वे तो मर गए अब शेष बचे दोनों चोरों ने आराम से बैठकर उस विषभरी मिठाई को खा लिया तो वे भी मर गए। सारा का सारा धन ज्यों का त्यों पड़ा रह गया। तो यहाँ दृष्टांत में यह बात कह रहे कि जैसे बड़े सुहावने मोदक हों पर उनमें मिला हुआ हो विष तो उनके खाने का फल मृत्यु है खोटा है। भले ही खाने में मधुर लगे व देखने में भी बड़े सुहावने लगें, पर उनके खाने का फल अत्यंत कटुक है। उनका फल विनाश है, ऐसे ही जो ये इंद्रिय जन्य सुख है ये देखने में भले ही बड़े सुहावने लगें, भोगने में भी भले ही बड़े सुखद प्रतीत हों पर इनका फल अत्यंत कटुक है। जो उन विषय सुखों में आशक्त है, जिनकी खोंटी भावना है वे पुरुष अपना घात करते हैं, संसार में रुलते हैं। तो जो इंद्रिय सुखों का प्रेमी है वह पुरुष बहिरात्मा है बहिरात्मा मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी मोही, मूढ़ किन्हीं भी शब्दों से कहो, जन्म मरण की परंपरा को बढ़ाने वाला दुःखी जीव है।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार_-_गाथा_118&oldid=82301"
Categories:
  • रयणसार
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 17 May 2021, at 11:57.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki