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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 119

From जैनकोष



देहकलत्तंपुत्तंमित्ताई विहावचेदणा रूवं।

अप्पसरूवं भावइ सो चेव हवेइ बहिरप्पा।।119।।

   बहिरात्मा पुरुष कौन है उसका और भी वर्णन किया जा रहा है। जो शरीर स्त्री, पुत्र, मित्र आदिक को अपने रागादिक भावों को आत्मस्वरूप मानता है वह जीव बहिरात्मा है। लगता तो ऐसा होगा कि पुत्र को कौन मानता है कि यह मैं हूँ? उसको तो कह देता है हर कोई कि यह मेरा पुत्र है पर यह मैं हूँ, ऐसा कौन बोलता है। फिर आत्मस्वरूप मानने का अर्थ क्या? स्त्री को मेरी तो कोई कह दे पर यह मैं हूँ ऐसा कौन कहता है? फिर इसको आत्मस्वरूप मानने की बात क्यों कही जा रही है? सो भाई भीतर का आशय देखो, पुत्र स्त्री की बात तो पीछे रहो, अगर घर की या दुकान की जरा सी ईंट खिसक जाती है तो वहाँ तो ईंट खिसकी और यहाँ इसका दिल खिसक जाता है। ऐसा ही कुछ संबंध है कि वहाँ बाह्य पदार्थ यों खराब हो तो यह भी गंदा बन जाता, दुःखी हो जाता। मान लो कुछ चल रहा दुकान गोदाम या कुछ भी चीज तो इसके मायने क्या हैं कि उसने अपना आत्मस्वरूप मान रखा है। अगर भिन्नता का ज्ञान हो तो किसी भी स्थिति में यह सम्यग्ज्ञानी जीव दुःखी नहीं हो सकता। सम्यग्ज्ञान का ही यह प्रताप है कि उसे अब आकुलता नहीं हो सकती। नरकगति का भी सम्यग्दृष्टि जीव हो, सम्यग्दृष्टि नार की और भी नारकी कुछ लड़के भिड़ते रहते हैं, अगर कोई उस सम्यग्दृष्टि नारकी पर प्रहार कर रहा है तो यह भी करता है। इतना सब कुछ होने पर भी वह अंतर में निराकुल है। क्योंकि वह अविकार ज्ञानस्वरूप को मानता है कि यह मैं हूँ और एक देवगति का जीव ऊंचा भी देव हो, स्वर्गवासी भी देव हो, जिसके अनेक देवियाँ हैं, बड़ा सुख है और वह उन देवियों में आशक्त है तो वर्तमान शांति की श्रद्धा देखो तो उस देव से वह नारकी भला है। अच्छा नरक गति के जीव तो सम्यक्त्व पा लेंगे मगर भोगों में आसक्त मनुष्य अज्ञान में ही रहेगा, वह सम्यक्त्व नहीं प्राप्त कर सकता। तो अज्ञानी मनुष्य तो ज्ञानी नारकी से भी निम्न पद में है। भोगासक्त होना महा पाप का काम है और उसकी प्रेरणा अज्ञान देता है। यह ही मैं हूँ, यह ही मेरा स्वरूप है, यह ही मेरा कल्याण है। सब बाहरी-बाहरी पदार्थों में ही बुद्धि रहती है। और ज्ञानी जीव गृहस्थी में भी रहता है, दुकान धंधा काम काज भी सब कर रहा है, भोगों को भी भोग रहा, अनेक प्रकार के झंझट भी चल रहे मगर कहीं भी उपयोग थोड़ी देर भटक जाय, किंतु आता है वह अपने स्वरूप की ही ओर। मैं हूँ यह शुद्ध ज्ञान स्वरूप। तो बहिरात्मा की बात कह रहे हैं। यह बहिरात्मा जीव शरीर कलत्र पुत्र मित्र और रागादिक विभाव, परभाव इन सब को आत्मस्वरूप मानता है, हुवाता है, अपने आपको मानता है ऐसा पुरुष, यह है बहिरात्मा।


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