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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 120

From जैनकोष



इंदियविसयसुहाइसु मूढमई रमइ ण लहइ तच्चं।

बहुदुक्खमिदि ण चिंतइ सो चेव हवेइ बहिरप्पा।।120।।

   मूढमति का इंद्रिय विषय सुखादि में रमण―जो इंद्रिय विषय सुख आदिक में रमते हैं वे तत्त्व को नहीं प्राप्त करते और ये इंद्रिय सुख, ये बाह्य समागम, यह पर पदार्थों का लगाव, यह बहुत दुःखरूप है, ऐसा यह चिंतन ही नहीं करता, यह है बहिरात्मा का लक्षण। लोक में चूँकि बहिरात्माओं की संख्या अधिक है, इनमें खुद भी कमजोरी है अपना आचरण बनाने में और चूँकि ऐसा ही लोगों को दिख रहा है इसलिए ये भी अपना आचरण दूषित रखने की जो उमंग रखे रहते हैं और चूँकि अंतरात्मा बिरले ही हैं सो उनका समर्थन कौन करेगा? जिसको जो प्रिय है वह उसी का ही तो समर्थन करेगा। ज्ञान और वैराग्य का स्वरूप ही जो नहीं समझते ऐसे ये संसार के बहुसंख्यक पुरुष ज्ञान का समर्थन कैसे करेंगे? तो ज्ञानी को अपने आपके विश्वास में खड़ा रहना पड़ता। कि दुनिया की ओर दृष्टि दें और उनसे कोई प्रेरणा की आशा रखे तो यह बात कठिन सी है, असंभव सी है, तत्व ज्ञानी तो खुद के ही ज्ञान बल पर खड़ा रहता है और कुछ थोड़े बहुत ज्ञानी जन मिलते हैं तो वे ही उसका अनुमोदन कर पाते हैं। तो बहिरात्मा इंद्रिय विषय सुखादिक में मोहित रहते हैं।
   बहिरात्मावों को संसार बर्द्धक प्रवृत्तियाँ―यदि आपस में मिलेंगे बहिरात्मा तो कभी क्या यह बात भी पूछ सकते हैं कि आपको आत्मा का सुध रहती है ना, कुछ आनंद आत्मा का कभी-कभी पा लेते हो ना...वे यह कैसे पूछें? वे तो पंचेंद्रिय के विषयों की ही बात करेंगे। खाने पीने की ही बात बतायेंगे आराम से ठाठ से रहने की बात करेंगे। मगर अपने आप पर कुछ दया तो करना है। जिस में अपने आत्मा की रक्षा, हो केवल उसका ही भाव रखियेगा। संसार में जिसने शरीर पाया है जिस पुण्योदय से मनुष्यभव मिला है वह उतना है ही कि यह भूखा प्यासा तड़फ कर न मरेगा, उसे योग मिलेगा ही फिर किसलिए बड़ी-बड़ी आशायें और तृष्णायें रखना कि मैं इतना धनिक बनूँ इतना संग्रह करूँ, यह किसलिए किया जाता है। दो रोटी और दो कपड़ों के सिवाय और आपके क्या काम आता है शरीर की दृष्टि से? और आत्मा की दृष्टि से तो केवल एक अपने आत्म स्वरूप का ध्यान, मैं हूँ यह अविकार ज्ञानस्वरूप। इसका अनुराग, इसकी भक्ति, इसकी सुध पुण्य बंध अतिशय पूर्वक करती है और मोक्ष मार्ग की धारा बनाये रहती है। मगर इसका ज्ञान बहिरात्मा को कहाँ? वह तो विषय सुखों में ही रमता है। वह तत्व का लाभ नहीं ले पाता। यह सारा जंजाल, यह सारा संग दुःखरूप है ऐसा चिंतन जो नहीं करता। ऐसी बातें जहाँ पायी जाती हैं वह बहिरात्मा है और बहिरात्मा की स्थिति बड़ी दयनीय है। इस स्थिति को छोड़कर अंतरात्मा होने का ही उपदेश आचार्यों ने किया है।


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