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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 127

From जैनकोष



मोक्खगइगमण कारणभूयाणि पसत्थ पुण्णहेऊणि।

ताणि हवे दुविहप्पा वत्थसरूवाणि भावाणि।।127।।

   मोक्षगतिकारणभूत व प्रशस्त पुण्यभावों का प्रताप―पहली गाथा में बताया था कि जो-जो दुःख रूप भाव हैं वे सब बहिरात्मा के भाव हैं। अब यहाँ बतला रहे हैं कि जो मोक्ष गति के लिए गमन में कारण भूत है याने जिन भावो में होते हुए मोक्ष में गमन होता है और जो प्रशस्त पुण्य के हेतुभूत हैं और वे अंतरात्मा और परमात्मा के वस्तु स्वरूप से कहे गए हैं देखिये प्रशस्त पुण्य इसकी परंपरा मोक्ष साधक भावों से जुड़ाकर लौटाती है मगर ऐसा प्रशस्त पुण्य का बंध पुण्य की चाह से नहीं होता किंतु अविकार सहज ज्ञान स्वरूप उपासना की दृढ़ता होते हुए भी जो राग शेष रहता है शुभराग, पंच परमेष्ठी संबंधित राग वह प्रशस्त पुण्य बंध का कारण बनता है देखिये राग पुण्य बंध का कारण नहीं प्रशस्त पुण्या का कारण नहीं किंतु ज्ञान विकास होते संते रहने वाला राग प्रशस्त पुण्य का कारण है। कोई चपरासी फिरता रहता है तो लोग उसकी अधिक अहमियत नहीं समझते और वह किसी अफसर या मिनिस्टर के साथ जा रहा हो तो उसका भी महत्त्व बढ़ जाता है। तो राग राग प्रशस्त पुण्य का कारण नहीं किंतु कारण तो राग है मगर सम्यग्दृष्टि अविकार सहज स्वरूप के अनुभव वाले इस सहज स्वभाव में प्रीति रखने वाले भव्य पुरुष के जो शेष राग है वह प्रशस्त पुण्य बंध का कारण है। इसी वजह से इस गाथा में कह रहे हैं कि जो मोक्ष गमन के लिए कारणभूत है और प्रशस्त पुण्य के हेतुभूत है वह अंतरात्मा और परमात्मा के भावात्म से कहे गए हैं याने ये अंतरात्मा के भाव है।
   अविकार सहज ज्ञान भाव के संदर्शन में सकल संकटों का अभाव―भैया ज्यादह उल्झन की बात जरा भी नहीं है। या रंच भी उलझन का कुछ काम नहीं हैं सम्यग्दृष्टि का काम, ज्ञानी का काम, मोक्ष चाहने वाले का काम केवल एक ही है। अपने अविकार सहज ज्ञान स्वभाव को आत्मा रूप से स्वीकार करना इस ही रूप में अपना अनुभव करना अनुभव करने के बाद न इससे चिगा जा सके। तो ऐसी प्रतीति रखना यह बात जिसके हो गई उसकी सब समस्याओं का समाधान उसे कुछ सिखाना नहीं पड़ता कि तुम इस तरह शुभभाव करो तुम इस तरह से अमुक क्रिया करो उसकी वृत्तियाँ ही इस तरह की होती हैं। जो चरणानुयोग में बताया गया है। ऐसा ज्ञानी का प्रवर्तन है, चरणानुयोग के अनुसार ज्ञानी को चलना चाहिए और ज्ञानी स्वयं सहज जिस ढंग से चलते हैं वह चरणानुयोग में मिलता है कभी यहाँ से चरणानुयोग देखें। कभी चरणानुयोग को अपने आत्मा में देखे चाहिए बस एक कला वह क्या है अपनी ही सत्ता के परके संग बिना अपने ही स्वरूपतः जो कुछ स्वभाव है उस रूप अपने को स्वीकार कर लें यह बात जिसके आ जाय उसने सर्व अर्थो की सिद्धि पा ली और जिसके यह प्रतीति अनुभूति न बने वह चाहे धर्म के नाम पर कितने ही व्रत, तप, उपवास या ऊँची बात कर ले मगर कर्म का निर्जरण और सम्वर नहीं होता। यह तो तात्कालिक उपाय है तपश्चरण कि अशुभोपयोग मिट जाय पर मौलिक उपायों में निज सहज ज्ञान स्वरूप में अपने आत्मपने का अनुभव होना, जीवन में सब यह ही काम करना है अपने आप के अंदर में अपने को सहज ज्ञानमात्र अनुभव करें बाहरी पदार्थों में तो बड़ी हठ हो जाती है कि मैं तो करके ही रहूँगा। जरा उस अंतः स्वरूप की भी तो हठ बनावें कि मैं तो अपने को इस सहज ज्ञानस्वभाव रूप ही मानूँगा। सारा जगत चिल्लाये ये नाम ले लेकर पर मैं चौंकूगा नहीं। मैं तो निर्मल हूँ। शुद्ध चैतन्य मात्र हूँ इसकी भी तो हठ बने जिसने यह तत्त्व पाया उसके समस्त संकट दूर हो जाते हैं।


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