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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 128

From जैनकोष



दव्वगुणपज्जएहिं जाणइ परसमय ससमयादिविभेयं

अप्पाणं जाणइ सो सिवगइपहणायदो होई।।128।।

   द्रव्य गुण पर्यायों से स्वसमय व परसमय के विभेद को जानने वाले के शिवगति पथनायकता―मोक्षमार्ग पथिक कौन है इसका वर्णन इस गाथा में किया है। जो द्रव्य गुण पर्यायों के द्वारा परसमय और स्वसमय आदिक भेद वाले आत्मा को जानता है वह मोक्षमार्ग का नायक होता है। अंतरात्मा ज्ञानी सम्यग्दृष्टि जीव पर समय स्वसमय में द्रव्य गुण पर्याय को जानता है। इस ग्रंथ में स्वसमय तो परमात्मा को कहा जायेगा और परसमय मिथ्यात्व लेकर 14 वें गुण स्थान तक के जीवों को कहा जायेगा। तो अंतरात्मा स्वसमय और परसमय का भेद समझता है यह भेद जाना जायेगा पर्यायों से क्योंकि द्रव्य और गुण ये तो सब जीवों में समान हैं द्रव्य है चिन्मात्र। गुणों का भेद न कर गुणों को तो द्रव्य में ही मिलाकर जो अभेद रूप को ध्रुव तत्त्व को निरखा जाता है। वहाँ द्रव्य का ज्ञान होता है तो द्रव्य दृष्टि से सर्व जीव समान हैं। चाहे स्वसमय हो या परसमय हो गुणों की दृष्टि से भी सब जीव समान हैं। गुण कहते हैं पदार्थों में सदा रहने वाली शक्तियों को। शक्तियाँ सदा रहती हैं। चाहे परसमय हो तो वहाँ भी शक्ति हैं स्वसमय हो वहाँ भी शक्ति है। तो शक्ति की अपेक्षा से परसमय और स्वसमय का भेद नहीं बनता। भेद बनता है तो पर्यायों के द्वारा बनाता है। परसमय कौन है, यह बात बहुत विस्तार से बता दी गई है। जिसका पर वस्तुओं से किसी भी प्रकार का रागद्वेष का प्रवर्तन चले वह परसमय है। अथवा जो दर्शन ज्ञान चारित्र स्वरूप में पूर्णतया स्थित नहीं होता है वह परसमय है। तो परसमय में तरतमता बहुत है एक तो मोही मिथ्या दृष्टि जीव पर समय है। वे तो बिल्कुल ही परसमय है। वहाँ तो अंश मात्र भी ज्ञान का काम नहीं है और जो ज्ञानी हुए हैं सम्यग्दृष्टि हुए हैं वे भी जब तक वीतराग और सर्वज्ञ नहीं होते तब तक उन्हें भी परसमय कहा गया है। इस ग्रंथ में आगे की गाथाओं में यह बात स्पष्टतया स्वयं ग्रंथकार कहेंगे कि परसमय तो परमात्मा होने से पहले तक है और परमात्मा स्वसमय है।
   स्वसमय परसमय का समीक्षण व द्रव्य गुण कृत साम्य का संदर्शन―यद्यपि यहाँ परसमय पहिले से 12 वें गुणस्थान तक के जीवो को परसमय कहा है तो भी एक होता है दर्शनमोहकृत परसमय। एक होता है चारित्रमोहजनित परसमय। इनका अंतर बहुत बड़ा है अंतरात्मा ज्ञानबल से कर्म शत्रु का हनन करता रहता है मगर उसको भी चूँकि वह अपने स्वरूप में मग्न नहीं हुआ है इसलिए परसमय कहते हैं। एक विवक्षा से देखा जाय तो परसमय तो है बहिरात्मा और स्वसमय है सम्यग्दृष्टि जन व परमात्मा और उनमें तरतमता लगायी जाये तो पूर्णतया स्वसमय है परमात्मा उससे पहिले जीव अपूर्ण स्वसमय है परसमय है यहाँ विवक्षा भेद से कुछ भी कहा जावे तो यही आता है कि जिन जीवों को वीतरागता और सर्वज्ञता प्राप्त हुई है वे अभी अल्पज्ञानी छद्मस्थ छोटी स्थिति में हैं जिनको अभी ज्ञान स्वरूप नहीं जगा आत्मा स्वरूप का और विकार का कर्म का शरीर का स्वरूप ज्ञात नहीं हुआ भेद विज्ञान नहीं जगा, वह है बहिरात्मा और मोटा परसमय तो अब भेद किस तरह से निरखना है? द्रव्य और गुण से तो समता विदित होती है सो यह भी लाभदायक है। जब स्वसमय परमात्मा अरहंत सिद्ध की तुलना करने पर अपने द्रव्य और गुण की तुलना विदित होती है तो वह भी वह उमंग लाता है मैं यह ही तो हूँ ‘मैं वह हूँ जो हैं भगवान। जो मैं हूँ वह हैं भगवान।’ यह द्रव्य और गुण की दृष्टि से ही तो है। कोई अंतर नहीं। वही द्रव्य है, वही गुण है वही पदार्थ है पर ‘अंतर यही ऊपरी जान, वे विराग यहँ राग वितान।’ ऊपरी के मायने व्यवहार पर्याय। पर्यायकृत अंतर है। इस अंतर को ऊपरी अंतर क्यों कहा है? द्रव्य में अंतर नहीं हैं। द्रव्य का अंतर भीतरी अंतर है द्रव्यतः अंतर जीव पुदगल में पाया जाता है। पर जीव-जीव में चाहे वह कोई भी जीव हो उनमें द्रव्यतः अंतर नहीं पाया जाता। पर्यायतः अंतर पाया जाता है। तो यह ही ऊपरी अंतर है कि प्रभु तो विराग हैं और यहां राग का फैलाव चल रहा है तो पर्याय से ही अंतर जाना गया।
   परमात्मा व अपरमात्मा में पर्यायकृत अंतर तथा इस अंतर को मेटने का स्वयं में सुगम उपाय―यह पर्याय का अंतर हम में और प्रभु में जो है सो प्रभु की पर्याय में तो कुछ बदलना चाहिए नहीं, वह तो स्वभाव के अनुकूल शुद्धपरिणमन है। परिवर्तन तो हम आपके हैं जो राग अवस्था में चल रहे हैं। बाह्य पदार्थ के विकल्प में लग रहे हैं, ये विकल्प न रहें और अपने आप के सहज ज्ञानस्वरूप का अनुभव ही रहे, यह स्थिति चाहिए। तो यह मिल कैसे सकता? उसका उपाय है द्रव्य और गुण की उपासना। देखो द्रव्य गुण पर्याय इन तीन का अखाड़ा जमघट कैसा सुंदर बन रहा कि प्रभु में और मुझमें द्रव्य और गुण का अंतर नहीं है, केवल पर्याय का अंतर है। तो पर्याय में रहने वाला यह अंतर मिटने का उपाय द्रव्य और गुण की उपासना है। वह उपासना कि अपने द्रव्य को देखिये अपनी शक्ति को निहारिये मैं अविकार सहज ज्ञानस्वभाव अंतस्तत्त्व हूँ। जो मैं हूँ जो अपने आपकी सत्ता में हूँ, वह तो निराबाध है और यही है उसमें विरूपता या अंतर आने का अवकाश नहीं है। स्वरूप दृष्टि करने पर जीव संकटहीन हो जाता है। जीवों को मोहवश यह लोकव्यवहार तकलीफ दे रहा है। लोक व्यवहार यहाँ हमारा व्यवहार सबको प्रिय रहे, सब मुझ पर खुश रहें, सब मुझे अच्छा कहें, मेरी कहीं कोई निंदा न हो, मुझको ही लोग यहाँ का खास बोलें आदिक जो कल्पनायें हैं, ये कल्पनायें इस परमात्मतत्त्व का घात करने वाली हैं। हाँ कोई स्थिति है, उसमें बड़े चाव से कहा जाता है कि अपना व्यवहार बड़ा सही रखना चाहिए और सही ढंग चलना चाहिए। कोई व्यवहार में कमी न रहे, सबके अनुकूल रहें ठीक रहें, देखिये लोग यह बात सुनकर बड़े खुश होते हैं। इसके बाद उच्च विचार अगर परमार्थ से देखा जाय तो यह कषायाश्रित विचार है। जिसने अविकार ज्ञानस्वभाव की उपासना की उसका अभेद अनुभव किया उसकी निगाह में व्यवहार का महत्त्व न रहा, उसका लोक में व्यवहार होता ही सही ढंग का। जो अविकार सहज ज्ञानस्वरूप की उपासना में आया है और वह जिसे रुचिकर लगा है वह हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह, तृष्णा लालच इनके भाव को पसंद भी करेगा क्या? उसका व्यवहार तो सही होगा ही। मगर व्यवहार मुझे करना है सही व्यवहार रहे, ऐसी वांछा जो उसके लिये कलंक है। जो परमार्थ चिन्मात्र का रुचिया है और उस ही में मग्न होना चाहता है उसके लिये जानबूझकर उपयोग गड़ाकर व्यवहार करना एक यह विडंबना सी लगती है। हाँ बात फिर झट व्यवहार पर आ जायेगी। क्योंकि इस ज्ञान स्वरूप में डूबने का, उसको दृष्टि में लिए रहने का हम लोगों को अभ्यास नहीं है। जब परमार्थ स्वरूप में मग्न होने का अभ्यास नहीं तो यह उपयोग बाहर ही तो कुछ करेगा। जब यह उपयोग बाहर कुछ करता है तो वहाँ विवेक जरूर चाहिए कि हमारे प्रयत्न हमको अपने स्वरूप के दर्शन का अपात्र न बना दें यह विवेक चाहिए।
   ज्ञानियों के अंतर्दर्शन की लौकिक जनों को अनभिज्ञता―अज्ञानियों की श्रद्धा चक्षु से यदि देखें तो ज्ञानी जीव लौकिक जनों की दृष्टि में अटपट है, क्योंकि वह तो अपने आप के स्वभाव में ही मग्न होने की धुन रखता है, मगर जिस तरह के लौकिक काम अज्ञानी मिथ्यादृष्टि चाहता है उस तरह का काम वहाँ देखा नहीं जाता। उनकी निगाह में कुछ उनकी बुद्धि की तुलना में वे हल्के हैं मगर जाननहार पुरुष की स्थिति यह है कि तत्त्व को जानने वाला गूँगा, बहिरा, और आलसी बन जाता है जिसने अपने अविकार सहज ज्ञानस्वरूप का अनुभव पाया और उस अनुभव में सहज आनंद का अनुभवन भी पाया उसको अब बाहर क्या चाहिए? इसलिए वह बोले क्यों? उसे कभी बोलना भी पड़ता तो वह बोलता हुआ भी बोल नहीं रहा। तत्त्व ज्ञानी पुरुष गूँगा बन जाता है। लोग क्या कहते हैं किस ढंग के लोग हैं किसने मेरी निंदा की, किसने मेरी प्रशंसा की, क्या हो रहा है। बाहर में क्या स्थितियाँ चल रही हैं बात आती है मगर वह सुन ही नहीं रहा है। वह सुन रहा है अपने ब्रह्मस्वरूप की अंतः प्रेरणा की आवाज। बाहर की आवाज उसके सुनने में नहीं आती। तत्त्व पुरुष तो बहिरा बन गया। तत्त्वज्ञ पुरुष आलसी बन गया। कितना आलसी? उतना आलसी कि वह अपनी आँख की पलकों को बंद करने और उठाने में भी आलस कर रहा है इतनी भी उसके लिए एक उमंग नहीं चल रही है आँखे खोले तो, आँखे बंद तो करे। जैसा है वैसा बना रहे इतना आलसी बन गया यह तत्त्व ज्ञानी पुरुष। फिर उसके हाथ पैर की क्रियावों की तो बात ही क्या कही जाय? अर्थात वह निष्क्रिय स्वरूप की भावना करता है। ऐसा अविकार सहज ज्ञान स्वभाव का अनुभव यह ही अमृत है, इस अमृत का जिसने पान किया उसकी दुनिया निराली बन जाती है।
   ज्ञानी संतों की अलौकिकी वृत्ति―संतजन कहते हैं कि मुनियों की अलौकिक वृत्ति है देह के भेष का नाम मुनि नहीं है किंतु अविकार ज्ञानस्वभाव की उपासना में जिसकी दृढ़ता बन गई है उन ज्ञानियों का नाम मुनि है और वे ज्ञानी मुनि अलौकिक वृत्ति वाले होते हैं। मोटी-मोटी बात तो थोड़ी यह भी जान सकते हैं। गृहस्थ बैठकर खाते, मुनि खड़े होकर खाते ऐसी उल्टी वृत्ति ज्ञानियों की होती है गृहस्थों का अनेक लोगों के बिना मन नहीं लगता किंतु ज्ञानी का इन अनेक लोगों में मन ऊब जाता। कैसी उल्टी चाल चल रहा यह ज्ञानी? अज्ञानी जन उस ज्ञानी को कैसा अच्छा देखेंगे? उल्टा-उल्टा सोचेंगे। अज्ञानियों से उल्टे ही चल रहे हैं। अज्ञानीजनों को इंद्रिय के विषय रुचिकर लगते हैं अमुक खेल देखा, अमुक भोजन बनाया, अमुक खाया ये कैसी फूल मालायें हैं? जैसा मिला खाकर चल दिया न मिला तो चल दिया। जरा सी विधि में गड़बड़ी हो गई तो भाग गए। अरे ऐसी ऐंठ क्यों करते हो ज्ञानी हम अज्ञानी जन तो खूब खाते हैं। तुम क्यों उल्टे-उल्टे चल रहे। ज्ञानी की दुनिया निराली है। ज्ञानी के हृदय को, ज्ञानी के सद्भाव को अज्ञानी जन पहिचान नहीं सकते। यह सारा अंतर आ कैसे गया? केवल एक कला के कारण। उसने अपने सहज स्वरूप का अनुभव कर लिया है। आत्मीय सहज आनंद का अनुभव बन गया है।
   ज्ञानियों के विपरीत समझ की अशक्यता―ज्ञानी को कोई उल्टा-उल्टा समझाये तो उसकी समझ में उल्टी समझ न आयेगी। जिसका भ्रम मिट गया है उसको कोई बहकाये तो वह बहक कैसे सकेगा? जिसको स्व और पर का स्पष्ट निर्णय है आनंद और कल्पना का। उसको कोई बहकाये तो कैसे बहक सकता? जगत के इन समस्त बाह्य पदार्थों का लगाव क्लेशरूप है। कोई पुरुष छोटी ही उम्र में घर छोड़कर विरक्त होता है तो परिवार के लोगों की समझ में नहीं आता। उनको यह भ्रम हो जाता है कि कुछ इसके दिमाग में कमी तो नहीं है। कोई स्क्रू ढीला तो नहीं हो गया। उनकी समझमें ही नहीं आता कि यह बिल्कुल ठीक काम कर रहा है। ज्ञानी की अलौकिक वृत्ति है और वह सब है प्रताप किसका? द्रव्य और गुण के सही स्वरूप के अनुभव का। सारा भेद सारी दुनिया सब इस पर्याय के अंदर से ही तो उल्झी हुई है। यही तो ममता है, सब पर्याय का आश्रय किए हुए है। इस कारण से ये संसार में सब जीव दुःखी होते जा रहे। जन्मते हैं, मरते हैं और कष्ट पाते हैं, क्योंकि इन्होंने पर्याय का आश्रय लिया है। ज्ञानी जीव में अभेद या प्रधानरूप से तो द्रव्य का आश्रय किया है और जब कभी वह भेद में नहीं टिक पाता तो गुण का आश्रय करता है। कभी किसी परिस्थिति में पर्याय की भी बात करता मगर वे बाह्य वचन और बाह्य क्रियावों से मन अंत तत्त्वों में ही पड़ा है। ज्ञानी का एक धुन की बात है। जिसके यहाँ कोई इष्ट गुजर गया अब उसको कोई सनीमा की बात कहे कि चलो सनीमा देखने तो बताओ उसके मन में क्या बात आयेगी? वहां सनीमा की बात उसको ना भायेगी अभी एक माँ जी न बताया था कि एक बकरे को कोई मुसलमान खूब सजा धजा कर मारने के लिए लिये जा रहा है। उसे फूलों से रंगों चाँदी के वस्त्रों से इन सब से बहुत-बहुत सजाया। वह बकरा सब बात समझ गया आखिर संज्ञा जीव तो है ही। तो उसके घर के लड़के को उस बकरे से बहुत प्यार था सो वह लड़का उस अवसर पर बकरे से चिपट गया और केला खिलाने लगा बकरा अपना मुख केले की तरफ करे ही नहीं इधर उधर अपना मुख घुमाता फिरे। उसे केला सुहाये ही नहीं क्योंकि उसका उपयोग इस ओर लगा था कि अब मेरी मृत्यु होने वाली है। देखिये जिसको फाँसी पर लटकाया जाता है। उससे फाँसी देने से पहले पूछा जाता है तुम्हें कौन सी चीज खाने की इच्छा है किससे मिलना है तो वह कुछ भी नहीं चाहता क्योंकि वह जानता है कि अब मेरी मृत्यु होने वाली है। उसे किसी चीज में उमंग न आयेगी। तो ऐसा ही समझिये कि जिन ज्ञानी अंतरात्मा पुरुषों को अपने अविकार सहज ज्ञान और आनंद का अनुभव हुआ है उसे अब कोई कितना ही बहकाये पर वह किसी भी बात से बहक नहीं सकता क्योंकि उसकी दृष्टि अपने अंत चित्प्रकाश की धुन में लगी है।
   आत्मा की सहज कला का सहज संदर्शंन―देखिये ज्ञानीपन की बात कोई बनाने से नहीं आती। अज्ञानीजन ज्ञानियों की बाह्य वृत्ति आदि नकल कर लें, पर उस नकल से ज्ञानी को जो सहज आनंद मिलता है वह तो न मिल पायेगा। क्योंकि ज्ञान कला उसने प्राप्त नहीं की। समयसार सुपुष्पसुमालया सहजकर्मकरेण विशोधया, परमयोगबलेन बशीकृतं सहजसिद्धमहं परिपूजये। सिद्धपूजा भवाष्टक का कोई सा भी पद ले लो द्रव्य का तो वहाँ एक संबंध बनाया गया है। गृहस्थों का दिल रखने के लिए। वह तत्त्व तो यह है कि यह जो समयसार की पुष्पमाला याने समयसार की कला जो कि सहज क्रिया रूप हाथ से ही शुद्ध बनती है उस माला को कोई बनायेगा तो सही इस समयसार माला को बनायेगा कौन? यही और यह पूजने किसको जा रहा है यह अपने सहज स्वरूप को अपने आप अपनी सत्ता से जो सत् है ऐसा जो अविकार सहज ज्ञान स्वरूप है उसको पूजने जा रहा है। अरे वह तो भाग रहा है यह भीतर का भगवान यह तो यहाँ खड़ा ही नहीं होता है। यह तो इससे कही भाग कर छुप गया है। नहीं-नहीं परमयोग के बल से वह वशीभूत हुआ है। वह उसकी ज्ञान दृष्टि से बंध गया है। भगवान जायगा कहाँ? ऐसा अपना अंतः विराजित प्रकाशमान शाश्वत सहज सिद्ध इस समय देव को मैं पूजता हूँ। यह ही पूजने वाला यह ही पुजने वाला इसी के ही कारण से यह पुजने वाला और पूजकर भी फल जो मिला वह यही फल है और इस दृष्टि से ही वह सब निकल रहा है और यहाँ ही विराजा है। इसका बाहरी कुछ भी प्रयोजन नहीं हैं। तो ऐसे अविकार सहज स्वरूप को जिसने जाना है और पर्याय कृत भेद को स्वसमय परसमय आदि का भेद समझा है वह पुरुष तो मोक्षमार्ग में गमन करने के लायक है अग्रणी होता है याने वह अंतरात्मा है। बस सर्व संकटों की औषधि एक है। जैसे घर के बाहर निकले तो सब लोग सताने लगे तो उसका उपाय है घर में घुस जाए किवाड़ लगा ले। यह उपयोग अपने घर से बाहर जब निकालता है। तो ये पंचेंद्रिय के विषय ये पूर्वबद्ध कर्म के विपाक जब ये सताते लगे हैं तो यह ही उपाय है कि वहाँ से हटकर अपने घर में आवो गुप्त होवो।


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