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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 130

From जैनकोष



मिस्सोत्ति बाहिरण्या तरतमया तुरिय अतंरप्पजहण्णा।

सत्तोत्तिमज्झिमंतर खीणुत्तर परमजिणसिद्धा।।130꠰꠰

   स्वसमय परसमय के प्रसंग में त्रिविध आत्मावों का निरीक्षण―मिश्र गुणस्थान तक याने मिथ्यात्व गुणस्थान, सासादन सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन तीन गुणस्थानों में बहिरात्मा हैं मगर क्या तृतीय गुणस्थान वाले प्रथम गुणस्थान की तरह निपट बहिरात्मा हैं। इसमें तार्तम्य है। मोटे बहिरात्मा तो मिथ्यादृष्टि जीव हैं और उनसे मंदता लिए हुए द्वितीय गुणस्थान और उससे भी अधिक मंदता लिए हुए तृतीय गुणस्थान हैं। ये तीनों बहिरात्मा कहलाते हैं। इन तीन गुणस्थानों में अशुभ परिणाम अशुभोपयोग की बात बतायी जाती है। उस अशुभोपयोग में भी गुणस्थान के अनुसार तार्तम्य है मगर हैं मैं अशुभोपयोगी और चतुर्थ गुणस्थान से लेकर शुभोपयोग ही चलता है। तो यहाँ बतला रहे हैं कि मिश्र गुणस्थान तक तो बहिरात्मा है और चौथे गुणस्थान वाला जघन्य अंतरात्मा है और इससे ऊपर 7 तत्त्व मायने 5वें से लेकर 11वें गुणस्थान तक तरतमता को लिए हुए मध्यम अंतरात्मा होते हैं। यह विषय ऐसा है कि जैसा मूड बनाया और जिस दृष्टि से देखा थोड़ा बहुत मध्यम उत्तम की बात बताने में कमी वैसी की बात कही जा सकती है।
   जघन्य मध्यम व उत्तम अंतरात्मा का विश्लेषीकरण―यहाँ बतला रहे कि जघन्य अंतरात्मा तो अविरत सम्यग्दृष्टि है, जिसके कोई व्रत नहीं है व्रत लेने के भाव भी नहीं होते। यद्यपि यह त्रस जीवों की हिंसा नहीं कर रहा, यह ज्ञानी सम्यग्दृष्टि जीव अनर्गल वृत्ति नहीं कर रहा मगर पाप का त्याग करने के लिए संकल्प बना लेना और गुरु समक्ष व्रत को ग्रहण करना, यह बात अभी यह चतुर्थ गुणस्थान वर्ती नहीं कर पाया है। तो ये तीन हैं बहिरात्मा और चौथे गुणस्थान वाला है जघन्य अंतरात्मा याने अंतरात्माओं से छोटे दर्जे का अंतरात्मा और 5वें से 11वें गुणस्थान तक भव्य अंतरात्मा कहलाते हैं। इस मध्यम अंतरात्मा में बहुत आपस में तार्तम्य है। 5वें गुणस्थान वाले में प्रत्यारव्यानावरण कषाय चल रही है और जहाँ 11वें गुणस्थान में कषायों का उपशमन तो है मगर कषाय का सत्ता में सद्भाव है और उसका उपशम का समय पूरा हो रहा है। तो ये कषायें उमड़ती हैं और इसकी नीचे गिरना पड़ता है। यह मध्यम अंतरात्मा है और उत्तम अंतरात्मा क्षीणमोह गुणस्थानवर्ती जीव हैं जहाँ कषायें बिल्कुल नष्ट हो गई। वीतराग दशा है। कषाय उमड़ने की भी संभावना नहीं है और वह अंतर्मुहूर्त में ही केवलज्ञानी परमात्मा बनेगा तो ये क्षीण कषाय गुणस्थान वाले जीव उत्तम अंतरात्मा हैं और प्रभु अरहंत देव परमात्मा। ये परमात्मा हैं और इनको यहाँ स्वसमय बताया है।
   सम्यग्दृष्टि का आत्म विकास के लिये पौरुष―ज्ञान हो गया सम्यग्दृष्टि जीव के, मगर इसकी विवशता तो देखो, यह तज नहीं सकता, कुछ न कुछ संपर्क चलेगा। बाह्य पदार्थों का संचय, लोगों का समागम, सब के प्रति व्यवहार यह आवश्यक सा है, जैसे वह पुरुष कैसे स्वसमय कहलायगा? एक तो है संतुष्ट रहने की आदत रखने वाला और एक है प्रगति की भावना रखने वाला। दो तरह के जीव होते तो उनकी प्रकृति अलग-अलग हो जाती है। कुछ थोड़ा बहुत ऊपरी व्रत धर्म क्रिया की और उसमें संतुष्ट हो गए, अपने को कृतार्थ मानने लगे। हम खूब कर रहे हैं, सब कुछ ठीक चल रहा है। तो ऐसी इस अपनी क्रिया में ही संतुष्ट होने वाले जीव ये उन्नति नहीं कर पाते और एक प्रगति की भावना रखने वाले यह उन्नति करते हैं। अपने दोषों को निरख-निरखकर, उन दोषों का उपमर्दन करके उनको मूल से नष्ट करना चाहते हैं। जैसे रुई धुनने वाला धुनिया एक-एक पूनी को, छोटे-छोटे उस कपास पिंड को देख देखकर, निरख-निरखकर उसे तांते के पास ले जाकर धुनता रहता है। उस समय वह इस बात का ध्यान रखता है कि रुई का कोई भी हिस्सा बिना धुने न रह जाय, उसके धुनने में देर लगती है। तो ऐसे ही प्रगति की भावना वाले ज्ञानी पुरुष अपने आप में दोषों को ढूंढ़ता है और दोषों के परिहार की शुद्ध सही भावना बनाता है। तो यहाँ स्वसमय और परसमय का यह विभाग बतलाया है कि स्वसमय तो परमात्मा अरहंत देव हैं।


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