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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 131

From जैनकोष



मूढत्तय सल्लत्तय दोसत्तय दंडगारवत्तयेहिं।

परिमुक्को जोई सो सिवगइपहणायगो होई।।131।।

   मूढत्रय रहित योगी की शिवगति पथ नायकता के वर्णन के प्रसंग में देव मूढता का निरूपण―शिवगति का पथनायक कौन होता है, यह इस प्रकरण में पूर्व की भाँति बताया जा रहा, जो तीन मूढ़ताओं से परिमुक्त हो जाता है वह योगी मोक्ष पथ का नायक है। तीन मूढ़तायें हैं देवमूढ़ता, गुरुमूढ़ता और लोकमूढ़ता। देवमूढ़ता का अर्थ है कि जो यथार्थ देव है उसको देव न मानकर रागी द्वेषी जीवों में देवपने की कल्पना करके उनकी भक्ति में रहे वह देवमूढ़ता है। मूढ़जनों के कितने की देवता बन गए। कुछ के तो नाम नियत से हैं और कुछ ऐसे अनियत से हैं कि जो चाहे नाम कह डालो। पत्थर इकट्ठे हों कहीं रास्ते में उन्हें देखकर उस पर एक पत्थर फेक देना ताकि उस देवता की वृद्धि होती रहे वह पत्थर उनका देवता हो गया। बेल के पेड़ होते हैं, उनमें लोग प्रायः कुछ कपड़े का एक लंबा चिथड़ा सा फैलाकर बाँध देते हैं। बस वह चिथड़ा देव हो गया। लोग वहाँ से निकलते और वे अपने-अपने चिथड़े भी बाँध देते। तो देव के चारित्र पसंद करते हैं मोहीजन कि जिनमें राग की बात आती है। चोरी की बात आये, राग की बात आये, द्वेष की बात आये। जैसे भगवान ने उसकी मदद किया, उसका विनाश किया, उसको अपने साथ ले गए। उसे बरबाद कर दिया। उसे यों अभिशाप दे दिया। न जाने कितनी ही तरह की कथायें देव के विषय में प्रसिद्ध कर रखी हैं। अरे दे तो सब एक समान हैं। उनमें रागद्वेष की वृति नहीं होती। जो वीतराग है, सर्वज्ञ है वह कहलाता है देव। तो ऐसे वीतराग सर्वज्ञ में देवत्व तो माने नहीं और शस्त्रधारी को स्त्री पुत्र रखने वाले को, युद्ध करने वाले को, कितने ही ऐसे प्रसंगों में रत पुरुष को देव माने तो यह है देवमूढ़ता।
   गुरुमूढ़ता―जो संसार शरीर और भोगों से विरक्त हैं, सहज ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व में रमने की धुन रख रहे हैं वे कहलाते हैं गुरु, पर मोही जीवों ने न जाने किस किसमें गुरुपने की कल्पना कर ली है। जो भभूत रमायें, शस्त्र लें जटा रखाये या नाना प्रकार के काय क्लेशों को कर रहे, अपनी गद्दी रखते। महल मकान जायदाद के अधिकारी भी बने हुए हों, गाँजा, सुल्फा आदिक अनेक प्रकार के व्यसनों में रत हों, ऐसे पुरुषों को प्रायः लोग गुरु मानकर सेवा भक्ति किया करते हैं। वे गुरु नहीं है, उनमें मोह बन गया है लोगों का कि ये गुरु हैं। यह ही तो गुरुमूढ़ता है।
   लोकमूढ़ता की हैरानियाँ―लोकमूढ़ता लोक में जैसी धर्म के कार्यों में प्रसिद्धि कर दी हो उसमें कुछ विवेक न करके उस ही मार्ग पर चले वह कहलाती है लोकमूढ़ता जैसे किसी नदी में स्नान कर रहे और स्नान करके दो सीढ़ी और ऊपर पैर रख कर आये और किसी ने प्रतिकूल बोल दिया तो झट आग बबूला हो गये। तो बताओ कहाँ गई वह पवित्रता? किसी पर्वत से गिर गए। किसी समुद्र में नहा लिया या और-और प्रकार की क्रियायें कर डाला। कैसे-कैसे पर्व मनाये जाते हैं कि जिनमें सर्वज्ञ और वीतराग के स्मरण का संबंध ही नहीं है। तो यह सब कहलाती है लोक मूढ़ता। लोक मूढ़ता सिखाने वाले गुरु भी हैरान हो जायेंगे। एक ऐसी ही घटना है कि कोई संन्यासी कमंडल लिए नदी में स्नान करने जा रहा था तो रास्ते में सोचा कि कमंडल कहाँ रख दें। तो उसकी बुद्धि में यह बात आयी कि इस नदी का जो यह सब रेत है उसके बीच किसी जगह एक गड्ढा सा बनाकर कमंडल रख दें। सो उस कमंडल को बालू से ढाँक दिया। और वह दी में नहाने चला गया। उस संन्यासी को धूल का ढेर लगाते हुए कई लोगों ने देख लिया था सो देखने वाले लोगों ने समझा कि यहाँ कोई देव रहता है तभी तो संन्यासी ने बालू का ढेर लगाया। सो वहाँ उन लोगों ने भी अपने बालू के ढेर लगाये, अन्य मुसाफिरों ने भी अनेक ढेर लगा दिया। अब कमंडल वाला संन्यासी नहाकर आया तो अब कमंडल कहाँ देखे वहाँ पर बहुत से ढेर लग गए।
   लोक मूढ़ता का एक चित्रण तथा मूढ़त्रय रहित योग की आशंका―अब उधर से निकला कोई दूसरा संन्यासी उसके हाथ में था एक लड्डू। वह लड्डू उसके हाथ से छूटकर एक जगह गिर पड़ा। वहाँ पर पड़ा था गोबर या मल। वह लड्डू उससे भिड़ गया पर उस संन्यासी ने उसे उठाकर पोंछ कर अपने पास रख लिया अब रख तो लिया पर उसको इस बात की शंका बनी रही कि कहीं मुझे इस गंदी जगह से लड्डू उठाते हुए किसी ने देख न लिया हो, सो उसने उस गंदी जगह को ढांकने के लिए उस पर कुछ फूल बिखेर दिया। वह विष्टा उन फूलों से ढक गया। अब देखने वाले लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि यहाँ कोई गंदी चीज पड़ी थी। उसे देखकर उधर से आने जाने वाले लोगों ने यह समझा कि यहाँ पर कोई फुल्लन देवी है सो लोगों ने उस पर फूल डालना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में वहाँ पर फूलों का बहुत बड़ा ढेर लग गया। तो वहाँ पर किसी विवेकी पुरुष ने सोचा कि हमें देखना चाहिए कि इन फूलों के ढेर के अंदर क्या चीज है जिस पर फूलों का इतना बड़ा ढेर चढ़ रहा है। उसने हिम्मत की क्योंकि मिथ्यारूढ़ि को दूर करने में बड़ी हिम्मत की आवश्यकता है। तो उन फूलों को अलग किया तो क्या देखा कि वहाँ वह विष्टा उनका देवता पड़ा था (हँसी)। तो कितनी ही रूढियाँ ऐसी होती हैं कि जिन पर लोग कुछ विचार नहीं करते जैसी परंपरा चली आयी है उस परंपरा के अनुसार वृत्ति बना लिया करते हैं। तो यह देखना कि जिन क्रियावों का संबंध, जिस पर्व का संबंध, जिस क्षेत्र का संबंध सर्वज्ञ वीतराग ज्ञान स्वरूप आत्मा से जुटा हुआ है वह तो है धर्म की बात और जहाँ वीतराग सर्वज्ञ देव की स्तुति से नहीं जुटा है वह धर्म सही नहीं है। चाहे वह कितना ही कुछ करे इस तरह की अगर बुद्धि नहीं है तो उसके लिए वह धर्म नहीं है। तो जो पुरुष तीन मूढ़ताओं से रहित होता है। वह मोक्षमार्ग में आगे बढ़ता है वह अंतरात्मा कहलाता है।
   त्रिशल्य परिमुक्त योगी की शिवगति पथनायकता―कल बताया गया था कि जो तीन मूढ़ताओं से मुक्त है वह योगी शिवगतिपथ का नायक है। अब कह रहे हैं कि तीन शल्यों से परिमुक्त योगी मोक्षपथ का पथिक है वे शल्य तीन हैं (1) मिथ्यात्व, (2) माया और (3) निदान। मिथ्यात्व शल्य तो स्पष्ट है। जहाँ मिथ्यात्व है, पर द्रव्य में अहंकार अनुभव है, पर वस्तु को अपने की मान्यता है, जहाँ स्वभाव और परभाव का भेद नहीं ज्ञात है, ऐसी अज्ञान स्थिति को कहते हैं मिथ्याशल्य शल्य नाम इसलिए रखा कि जैसे कोई अभी पैर में या कहीं काँटा चुभ जाय तो उसकी शल्य रहती है दुःख होता है। तो उस शल्य की तरह जहाँ शल्य बनी रहे याने ये तीन काँटे हैं मोक्षमार्ग में जाने वाले के लिए। दूसरी शल्य है माया। मायाचार कपट बहुत बुरी कषाय है। जहाँ कपट है वहाँ धर्म का लेश भी नहीं हैं। मन में और है। वचन से और कह रहे, करेंगे कुछ और ऐसी जो कुछ बुद्धि है, वासना है जहाँ कि वह चतुराई समझता है वह कपट है और कपट का बड़ा खाद्य फल है। जो कपट से परिमुक्त है वही मोक्ष पथ का नायक है। तीसरा शल्य है निदान। आगे के लिए कोई ऐसी वा´छा करना, धर्म कार्य करना, मैं आगे इंद्र होऊं, राजा होऊं धनिक होऊं, ऐसी आशा को निदान करते हैं। इस अज्ञानी जीव को अपने आनंद निधान निज तत्त्व का परिचय नहीं है इस कारण इन बाहरी पौद̖गलिक भावों को तरसता रहता है उस बेचारे को यह पता नहीं कि राजा बनकर क्या मिल जायगा? जीव को शांति है सम्यग्ज्ञान से उत्पन्न हुए संतोष में। धनी बन कर क्या मिल जायगा? धन के प्रसंग में उस ओर ही उपयोग बनाये रखने में अहंकार दुर्बुद्धि और असंतोष आदि सभी ऐब आ जाते हैं और मुक्त होने पर सब छूट जाते हैं पर इस ज्ञान का अपने तत्त्व की सुध न होने से वह बाह्य पदार्थों में रमा करता है। इन तीनों शल्यों से जो मुक्त है वह ही योगी मोक्षमार्ग का पथिक होता है।
   ज्ञानी के किंकर्तव्यविमूढ़ता का अभाव―एक कवि ने कहा है कि ‘‘यौवनं धन संपत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता। एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्।।’’ याने ये चार चीजें जवानी, धनसंपदा, प्रभुता और अज्ञान इनमें से एक-एक हो तो वह भी अनर्थ करने वाली है, फिर चारों मौजूद हैं उसके अनर्थ का, विनाश का तो कहना ही क्या है। तो इन तीन शल्यों से सहित प्राणी ऐसी ही विडंबना में पड़ते हैं पर ज्ञानी जीव इन तीन शल्यों से मुक्त हैं। उसको अपने मार्ग का प्रकाश मिला है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं बनता। मुझे क्या करना चाहिए? कैसे मेरा भला हो? यह उसको शंका नहीं है। उसे स्पष्ट प्रकाश प्राप्त है कि मुझे यह करना चाहिए। अपने आप के स्वरूप में रमना चाहिए। और दूसरों का जो भाव हो सो करें। मुझ राम को तो यही करना है, ऐसा स्पष्ट निर्णय है ज्ञानी जीव को तो यों जो तीन शल्यों से मुक्त है वह योगी मोक्षमार्ग का पथिक है।
   दोषत्रयविमुक्त योगी की शिवगति पथनायकता―जो तीन दोषों से मुक्त है वह योगी अंतरात्मा है। मोह राग द्वेष और इन दोषों में केवल आकुलता ही मिलती है। ज्ञानी मोह से तो रहित होते ही हैं। ज्ञानी नाम ही उनका है जिन्होंने मोह को नष्ट कर दिया। मोह अर्थात् अज्ञान। पदार्थ की स्वतंत्र सत्ता न जान सके और एक का दूसरे में संबंध स्वामित्व जानना तो ऐसा ज्ञान जहाँ बसा है वही तो मोह है, ऐसा अज्ञानी कहीं ज्ञानी कहला सकता है? प्रत्येक ज्ञानी मोह से तो रहित होता ही है, उसने और स्पष्ट बता दिया। अब किसी ज्ञानी के रागद्वेष चलते भी हैं तो उन राग द्वेषों में राग न होने से वे राग द्वेष इनके कहे नहीं जाते। कर्मों के उदय हैं ऐसा बानक बनता है, पर इनके उन विकार भावों से प्रीति नहीं है। तो यह जीव इन तीन दोषों से रहित है, जो मोक्षमार्ग का पथिक हो रहा। राग में राग न होने से राग की वेदना को भोगता हुआ भी वह राग का ज्ञाता कहा जाता है, कर्ता नहीं कहा जाता जिसमें राजी हो उसका यह जीव कर्ता बनता है। तो यह ज्ञानी तीनों दोषों से मुक्त है।
   दंडत्रय परिमुक्त योगी की शिवगति पथनायकता―ज्ञानी सम्यग्दृष्टि योगी पुरुष तीन दंडों से रहित है। तीन दंड कहलाते हैं मन, वचन, माया। मन की प्रवृत्ति, उमंग वचन की प्रवृत्ति उमंग, काय की प्रवृत्ति उमंग ये तीन दंड है। दंड पा रहा है मनोयोग, वचन योग, काय योग, इसका जो दुष्टा प्रवर्तन है वह इस जीव के लिए दंड है, पर होगा कोई मूर्ख ऐसा कि दंड पा रहे हैं। दंड में लग रहे हैं और उस ही में खुश हो रहे हैं। मन, वचन काय की प्रवृत्तियों में ही अपना कर्तव्य पालन समझते हैं। इससे होता क्या है कि मन के इस प्रवर्तन से इसका परिर्पूण ज्ञान नहीं हो पाता। परिपूर्ण ज्ञान निरपेक्ष है। असहाय है, स्वाश्रयसिद्ध है, वह मन के बेग वाले पुरुषों को कैसे प्राप्त हो सकता ऐसे ही वचन और काय के वेग वाले पुरुषों को परिपूर्ण ज्ञान और आनंद नहीं प्राप्त हो सकता, इसी कारण तो योगी पुरुष मन, वचन, काय को वश में करके केवल एक ज्ञानबल से ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व को निहारता रहता है जो यह विशुद्ध चैतन्य पिंड चिद्धत्ति प्रकाश प्रतिहास मात्र स्वतः सिद्धः अंतस्तत्त्व है यही मैं हूँ और इस अंतस्तत्त्व की वृत्ति जयवंत हो। अन्य कुछ करने की भावना ज्ञानी की नहीं है। तो यह ज्ञानी तीन दंडों से रहित है।
   गारवत्रय परिमुक्त योगी की शिवगति पथनायकता―योगी पुरुष जो मोक्षमार्ग का पथिक है वह तीन गारवों से रहित है। गारव मद को कहते हैं। ऋद्धिगार, रसगारव और सातगारव। कोई मुनि कोई ऋद्धि पा लेंगे थोड़ी बहुत। खास ऋद्धियों में तो घमंड होता ही नहीं पर कुछ छोटी-छोटी मोटी बात मिल गई तो उसका अहंकार बनता कि मैं ऋषि हूँ इनमें मैं प्रधान हूँ, सही हूँ, यह है ऋषिगारव। रसगारव किसी योगी को भोजन रसपूर्ण मिलता है और लोगों की भी ऐसी ही भावना है, आकर्षण है। बताओ कुछ ठीक लगता क्या कि संग में तो बहुत से लोग हैं उन्हें नहीं पूछा जा रहा, पर उनमें से एक को पूछा जा रहा? ठीक तो नहीं लगता और इसी प्रकार तो उसे अपने आप में रस लोभ का घमंड बन जाता है। सातगौरव जिसकी सेवा बहुत होती हो, जो बहुत साता में, सुख में, आराम में रहता हो, जिस पर लोगों का ऐसा आकर्षण बना हो वह उस साता का गौरव करता है। उसके चित्त में घमंड आता है कि मैं बहुत श्रेष्ठ हूँ। लोगों की मुझ पर बहुत अधिक भक्ति है। मेरे को साता सुख शांति के लिए क्षणमात्र में साधन जुटा दिया करते हैं। ऐसी अपनी पायी हुई साता की स्थिति में योगी घमंड करता है। तो जो ऐसी साता ऋद्धि इस आदिक में घमंड करता हो वह योगी नहीं है। इन तीनों गारवों से जो रहित है वह ही योगी मोक्ष मार्ग का नायक है।


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