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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 132

From जैनकोष



रयणत्तय करणत्तयजोगत्तय गुत्तित्तयविसुद्धेहिं।

संजुत्तो जोई सो सिवगइपहणायगो होई।।132।।

   रत्नत्रय से युक्त योगी की शिवगति पथनायकता―अंतरात्मा का यह प्रकरण चल रहा है। मोक्षमार्ग का पथिक कहो, अंतरात्मा कहो, उसके वर्णन में कह रहे हैं कि जो इन बातों से संयुक्त है वह योगी मोक्षमार्ग का पथिक है। यह विधि रूप से वर्णन चल रहा है। जो रत्नत्रय से युक्त है सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र इन तीन गुणों की जहाँ विशेषता है वह है मोक्षमार्ग का पथिक। सम्यग्दर्शन में अपने आत्मा के सहज अविकार ज्ञानस्वरूप में यह मैं हूँ ऐसी प्रतीति रहा करती है। जितने भी पदार्थ होते हैं संसारी जीवों के उन प्रवृत्तियों की दिशा का मूल है श्रद्धान जिसका जिस ढंग का श्रद्धान होता है उसकी उस माफिक प्रवृत्तियाँ होगी। तो जिस अपने अविकार सहज स्वरूप में आत्मत्व का श्रद्धान है उसकी सारी प्रवृत्तियाँ इस आत्मविकास से संबंध रखती हुई होंगी। जिसका श्रद्धान सही है उस का सम्यग्ज्ञान है। जिसका सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान है उसकी क्रिया सम्यक्चारित्र है। वह क्रिया आयगी अंतः क्रिया, जो बाह्य पदार्थों से तो उपेक्षा कराये और अंतस्तत्त्व की ओर ले जाय। वही तो चारित्र है। तो ऐसा रत्नत्रय से युक्त योगी मोक्षमार्ग का नायक है।
   करणत्रय से तथा गुप्तित्रय से युक्त योगी की शिवगति पथनायकता―करणत्रय से युक्त योगी शिवगति पथनायक है। यह करणत्रय मोक्षमार्ग में प्रगति करने वाला है। तीन कारण होते हैं। आत्मा की विशुद्धि में बढ़ाने के लिए। वे करण क्या है? अंधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण। करण मायने साधकतमभाव। साधन जहाँ ये तीन परिणाम हुए तो जिस प्रयोजन के लिए हुए उसकी सिद्धि हो जाती है। यह परिणाम कई कामों के लिए हुआ करता है। सम्यक्त्व पाने के लिए, चारित्र पाने के लिए और भी कार्य बीच में आते हैं। अंतःकरण करना, अनंतानुबंधी को बिल्कुल बदल देना, ऐसे बहुत से कार्य हैं जिनमें तीन करण दो करण आया करते हैं। तो जो इन कारणों से युक्त है वह योगी मोक्षमार्ग का नायक है। जो तीन गुप्तियों से युक्त है―(1) मनोगुप्ति, (2) वचनगुप्ति और (3) कायगुप्ति, इन तीन गुप्तियों से जो संयुक्त है वह पुरुष मोक्ष मार्ग का नायक है। मन जिसके पूर्ण वश है। कैसा ज्ञान प्रकाश जगता है योगियों के कि ज्ञान प्रकाश जिस तरह मन को हुक्म करता, बैठाता रहता, चिंतन करता, मनके वश योगी नहीं, किंतु योगी के वश में मन है, वचन पर वश करना तो बहुत ही आसान है। थोड़ा ज्ञानबल चाहिए भीतर में थोड़ा ज्ञानबल के कारण आनंद का अनुभव होना चाहिए कि उसके वचन वश हो जाते। कम बोलना, हितकारी बोलना, प्रिय बोलना ये तत्काल भी शांति करते हैं और भविष्य में भी शांति मिलती है तो जो इन तीन गुप्तियों से युक्त है और विशुद्धि परिणामों से युक्त हैं वह पुरुष मोक्षमार्ग का नायक होता है।


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