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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 133

From जैनकोष



बहिरब्भंतरगंथविमुक्को सुद्धोवजोयसंजुत्तो।

मूलुत्तरगुणपुण्णो सिवगइपहणायगो होई।।133।।

   बाह्याभ्यंतर ग्रंथविमुक्त योगी की शिवगति पथनायकता―जो पुरुष बहिरंग अंतरंग परिग्रह से विमुक्त है वह मोक्ष मार्ग का पथिक है। दो ही तो रास्ते हैं―संसार में रुले या मोक्ष में पहुँच जाय। जब इन दो रास्तों में से जो रास्ता रुचे उस पर चलना आसान है। संसार मार्ग का रास्ता तो प्रायः रोज ही मिला जीवों को कभी-कभी यह जीव परेशान होकर भले ही कह बैठे कि संसार में कुछ नहीं है, असार है, विडंबना है मगर यह कुछ शोक में आकर कह रहा कुछ भीतर की बुद्धि से नहीं कह रहा, कुछ ऐसा ही कहने में वह अपनी चतुराई समझ रहा। उसे रुच रहा भीतर में वही सब। एक कोई बुड्ढा बाबा अपने घर के सामने चबूतरे पर अधिकतर बैठा करता था। उसके घर 4-6 नाती पोते भी थे, सो प्रतिदिन वे नाती पोते उसे बहुत हैरान किया करते थे। कहीं सिर पर चढ़ना, कहीं मूछ पकड़ना, कहीं हाथ पैर झकझोरना तो वह बूढ़ा बाबा अपने उन नाती पोतों से बहुत तंग आ गया था, क्योंकि रोज-रोज उसकी यही हालत हुआ करती थी। एक दिन वह बूढ़ा अपने उसी चबूतरे पर बैठा हुआ रो रहा था। वहाँ से निकला एक संन्यासी उस संन्यासी ने उस बूढ़े बाबा से रोने का कारण पूछा तो उसने रोने का करण यह बताया कि महाराज हमारे नाते पोते हमें बहुत हैरान करते हैं। तो संन्यासी बोला क्या हम तुम्हारा यह दुःख मेंट दें।....हाँ-हाँ मेंट दीजिए, आप की बहुत बड़ी कृपा होगी। देखिये उस बूढ़े बाबा ने समझा कि शायद संन्यासी जी कोई ऐसा मंत्र पढ़ देंगे कि फिर से नाती पोते हमें तंग न करेंगे बल्कि हमारे चरणों में लोटते फिरेंगे पर संन्यासी ने क्या कहा। बाबा जी आप घर छोड़ दीजिए और हमसे साथ चलिये बस तुम्हारा यह दुःख दूर हो जायगा। तो संन्यासी की इस प्रकार की बात सुनकर वह बूढ़ा बाबा बहुत झुंझलाया, बोला कि अरे हमारे नाती पोते हमारे ही रहेंगे, हम उनके बाबा ही रहेंगे, तुम तीसरे कौन आ गए बीच में फूट डालने वाले? इतनी बात सुनकर संन्यासी आगे बढ़ गया। तो बात यह कर रहे कि जिस बात से ये जीव दुःखी होते जाते उनको ही अपनाते जाते। एक घर के काम की ही बात नहीं, प्रत्येक कार्य की यही बात है। तो जहाँ इन बाहरी बातों में रुचि लगी है वह है संसार का मार्ग और मोक्ष का मार्ग क्या है? मोक्ष में रहेगा यह जीव अकेला, विकसित पूर्ण अनंत आनंदमय, अनंत ज्ञानमय, उससे बढ़कर कुछ वैभव नहीं है। जीव की ऐसी शुद्ध स्थिति बनती है कि अनंत काल तक यह ही स्थिति रहती है। तो जिसको केवल रहना है उसको अब भी यहाँ अपने कैवल्य स्वरूप को निरखना चाहिए। कैवल्य के आश्रय से केवल बनेंगे, अद्वैत के आश्रय से अद्वैत बनेंगे। तो ऐसे ये दो मार्ग हैं। संसार मार्ग तो परिग्रह में आसक्त रहना है, मोक्ष मार्ग है परिग्रह से उपेक्षा करना और शुद्ध ज्ञान स्वरूप को निहारना। तो जो योगी बाह्य और आभ्यंतर परिग्रहों से विमुक्त है वह मोक्ष मार्ग का पथिक है।
   शुद्धोपयोग संयुक्त योगी की शिवगति पथनायकता―जो योगी शुद्धोपयोग से संयुक्त है वह मोक्ष मार्ग का नायक है शुद्धोपयोग उसे कहते हैं जहाँ रागद्वेष रंच न रहें और यहाँ ज्ञान की बर्तना ही चल रही है, जानन-जानन चल रहा है। कोई पुरुष शहर में सड़क से जा रहा वह सैकड़ों पुरुषों को देख रहा है और चलता जा रहा है कि ये सब लोग जा रहे हैं और वहाँ ही कोई परिचय का आ जाय, मानों ससुराल का आदमी दिख जाय तो झट उससे गले से गले मिलने लगते हैं। तो जानते नहीं क्या कि रागद्वेष रहित जानन क्या कहलाता है और रागद्वेष में लिप्त हो क्यों रहे? इसका पता तो है मगर ऐसा ही ऊपरी पता है। जो रागादिक विकारों से निराला ज्ञानी है, जिसको निज अंतस्तत्त्व का अनुभव जगा है। वही पुरुष ज्ञानवृत्ति कर सकता है। बाकी तो सामने कोई वस्तु नहीं है तो बड़ी शांति से बैठे हैं। यह भी एक कठिन बात है, मगर शांति तो मूल में है ही नहीं और जो शुद्धोपयोग है, रागद्वेष रहित ज्ञान की वर्तना है, यह जिसे प्राप्त हुआ है वह तो मोक्षमार्ग का प्रगतिशील नायक है। जिन योगियों का उपयोग शुद्धोपयोग नहीं है वे शुभोपयोग भी करते हैं और मुनि ही कहलाते हैं और वह शुभोपयोग एक पात्रता बनाये रखता है मगर शुद्धोपयोग में जो पायगा उसकी प्रतीति रहती है। तो जो योगी शुद्धोपयोग से युक्त है वह मोक्ष पद का नेता है।
   मूलोत्तर गुणसमृद्ध योगी की शिवगति पथनायकता―जो योगी मूलगुण और उत्तर गुणों से पूर्ण है वह मोक्षमार्ग का नेता है। साधु के मूल गुण 28 बताये गए हैं। 5 इंद्रिय के विषयों का निरोध, छः आवश्यक कर्तव्यों का पालन, स्नान का त्याग, दंतमंजन का त्याग भूमि पर सोना, वस्त्र का त्याग, केशों का लुंच करना, एक बार शुद्ध भोजन करना, खड़े-खड़े भोजन करना, 5 महाव्रतों का पालन, 5 समितियों का पालन ये साधुवों के मूल गुण हैं। इनकी विराधना नहीं है, इनका पालन है। और उत्तरगुण कहलाते हैं विशेष साधना। रात्रिभर ध्यान करना, कायोत्सर्ग से ध्यान करना, वर्षाकाल, शीतकाल, ग्रीष्मकाल की साधनायें करना, तपश्चरण करना ये सब उत्तरगुण कहलाते हैं। तो जो मूलगुण और उत्तरगुणों से परिपूर्ण हैं वे योगी मोक्षमार्ग के नायक हैं। यहाँ अंतरात्माओं की तारीफ बतायी जा रही है। कि वे इस प्रकार अपने शुद्ध स्वरूप के अभिमुख रहा करते हैं।


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