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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 155

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गंथमिणं जो ण दिट्ठइ ण हु मण्णइ ण हु सुणेइ ण हु पठइ।

ण हु चिंतइ ण हु भावइ सो चेव हवेइ कुद्दिट्ठी।।155।।

   रयणसार के न देखने न मानने वालों की दृष्टि की समीचीनता का निराकरण―जो पुरुष इस ग्रंथ को देखता नहीं, इस ग्रंथ को मानता नहीं। इस ग्रंथ को सुनता नहीं, इस ग्रंथ को पढ़ता नहीं वह पुरुष तो चिंतवन करता नहीं, जो मनुष्य भावना भाता नहीं वह कुदृष्टि होता है। यह प्रकृत प्रसंग होने से इस ग्रंथ के बारे में बात कहीं जा रही है कि जो इस ग्रंथ का अध्ययन आदि नहीं करता वह कुदृष्टि है। कुगुरु है। सद्बुद्धि से रहित है। पर इस ग्रंथ के कहने से मात्र यही अर्थ, इतना अर्थ न लगाना किंतु तत्त्व प्रतिपादक ग्रंथ, उनको जो पढ़ता गुनता नहीं है उसकी दृष्टि सही नहीं बनती। प्रथम बात कह रहे हैं कि जो इसे देखते नहीं है ऐसे कितने ही लोग हैं जिन्होंने सम्यक् शास्त्रों को देखा भी नहीं नाम तक भी नहीं जानते कि क्या-क्या नाम वाले ग्रंथ हैं। अब देखिये बड़े-बड़े आचार्यों ने हम आप जीवों पर कृपा करके यह जानकर कि जो भव्य इस जैन परंपरा में उत्पन्न होते रहेंगे वे इससे लाभ लेंगे। आचार्यों ने खूब पौरुष प्रयत्न करके तत्त्व को लिखा है और यहाँ हम ऐसे आलसी हुए कि इन तत्त्वों के सुनने की रुचि न जगे, उन शास्त्रों के प्रचार प्रसार के लिए भावना ही न जगे तो पढ़ना कहाँ, सुनना कहाँ। चिंतन कहाँ रहा? तो जब से सब बातें न रहीं तो उसमें सद्बुद्धि कहाँ से उत्पन्न हो? तो जो पुरुष इस ग्रंथ को देखता ही नहीं है उसको भली दृष्टि कहाँ से मिल सकती है? किसी ने देख भी लिया कि यह ग्रंथ है, इतना बड़ा है, कागज अच्छा है, कैटेगरी बढ़िया है, पर उसे बाँचा नहीं, उसका मनन नहीं किया तो उसको सही दृष्टि और बुद्धि नहीं मिल सकती। तो जो इस ग्रंथ को या ऐसे प्रतिपादक ग्रंथों को जो समझता ही नहीं वह सही दृष्टि को नहीं प्राप्त करता।
   रयणसार के न सुनने न पढ़ने न चिंतन न भावने वालों की दृष्टि की समीचीनता का निराकरण―जो रयणसार ग्रंथ को सुनता ही नहीं वह कुदृष्टि है। सुनने के मायने प्रीति पूर्वक सुनना। यों तो कहीं शास्त्र हो रहा हो और उसी रास्ते से जा रहे हों तो शास्त्र के शब्द तो कान में आयेंगे ही, तो क्या वह सुनना कहलाया? हित की भावना से रुचि करके एक प्रमुख साधन मानकर जो मानता है सुनना उसे कहते हैं। तो इस जीव ने इस ग्रंथ को सुना भी नहीं तो वह कैसे सही दृष्टि वाला हो? इस ग्रंथ को जो पढ़ता ही नहीं है उसको दृष्टि सही कैसे मिले? रत्नत्रय परिणाम क्या है, इसे वह क्या जानेगा जिसका अध्ययन इस समय रंच भी नहीं है तो जो जीव इस रत्नत्रय रयणसार को नहीं पढ़ता है वह कुदृष्टि है। इस रयणसार ग्रंथ का जो चिंतन नहीं करता वह भी कुदृष्टि है। ग्रंथ में क्या उपदेश भरा है उसका वाच्य क्या है वह भाव अपने में ही मिलाकर ग्रंथ जो-जो कुछ वर्णन करता है। वह बात अपने में ही मिलेगी। तो चिंतन करने का अर्थ क्या है कि अपने में उन प्रभावों को तकना, सो जो पुरुष इस ग्रंथ का चिंतन भी न करे वह कैसे दर्शन प्राप्त कर सकता। वह कुदृष्टि है। जो पुरुष इस रयणसार की भावना नहीं करता वह पुरुष कुदृष्टि होता है। जो तत्त्व कहा गया है इस रयणसार के उपदेश से, उसको भावे, अपने में डुबावें और उनकी अपने में घटावें तो उसका जो प्रयोजन है अविकार सहज ज्ञानस्वरूप की भावना रखना, उस परिणाम को प्राप्त करें, जो आनंद पा सकता है अपने भावों से, वह पुरुष सुदृष्टि होता है।


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