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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 156

From जैनकोष



इदि सज्जणपुज्जं रयणसारगंथं णिरालसो णिच्चं।

जो पठइ सुणइ भावइ सो पावइ सासयं ठाणं।।156।।

   रयणसार के पठन श्रवण व भावन से शाश्वत स्थान की प्राप्ति―जो पुरुष रयणसार ग्रंथ को निराश होकर सदा पढ़ता है सुनता है भावना करता है वह पुरुष शाश्वत स्थान को प्राप्त करता है। यह रयणसार ग्रंथ या इसमें कहा हुआ वक्तव्यभाव यह सज्जनों के द्वारा पूज्य है। सज्जन इस तत्त्व की उपासना किया करते हैं। तो सज्जनों द्वारा पूज्य हैं। जो सज्जनों द्वारा पूज्य इस रयणसार ग्रंथ का निराश होकर सदा पढ़ना चाहिए और सुनना चाहिए। सुनने का और पढ़ने का समान ही परिणाम है। समान ही लाभ है। हाँ किसी परिस्थिति में उनकी उपयोगिता में अंतर आता है। कभी पढ़ना अधिक उपयोगी है। कभी सुनना अधिक उपयोगी है, पर है दोनों ही उपयोगी। सो जो पुरुष निरालंब होकर इस ग्रंथ को पढ़ता है और सुनता है और सुनता हुआ मनन करता है तो ऐसा पुरुष शाश्वत स्थान अर्थात् जहाँ से आत्मा कभी चलित नहीं होता उस स्थान को प्राप्त करता है। वह है शाश्वत स्थान मोक्षपद। सो आत्महित के लिए इस रयणसार की भावना मन, वचन, काय से भाते रहना चाहिए।
   निर्दोष उपदेश मनन से निर्दोष कर्तव्य पालन कर निर्दोष आनंद पा लेने का अनुरोध―इस रयणसार ग्रंथ में सम्यग्दृष्टि श्रावक के 77 गुण बताये हैं―8 मूलगुण, 12 उत्तर गुण याने व्रत, 7 व्यसनत्याग, 7 भयत्याग, 25 दोषत्याग, 5 अतीचारत्याग, 11 प्रतिमा 1 वैराग्य भावना व 1 भक्ति। श्रावकों को पूजा व दान के द्रव्य तो रंच भी नहीं ग्रहण करना चाहिए। पूज्य दान द्रव्य हरने के महादोष बताया है। स्वाध्याय और ज्ञान साधनों में विघ्न नहीं डालने का व ज्ञान साधनों की तन, मन, धन, वचन से पूर्ण शक्त्यनुसार सेवा करने का प्रमुख उपदेश किया गया है। रयणसार में कुतप, कुलिंग, कुज्ञान, कुव्रत, कुशील, कुशास्त्र कुनिमित्त की स्तुति प्रशंसा भी करने का निषेध किया गया है। रयणसार में सम्यक्त्व के निर्दोष पालन का महान उपदेश है। सम्यग्दृष्टि का अभिनंदन किया गया है। सम्यग्दर्शन से होने वाली सद्गति व मिथ्यादर्शन से होने वाली दुर्दशावों का इसमें वर्णन किया गया है। परमार्थ सहज ज्ञान स्वभाव के पाये बिना व्रत तप क्रियावों की निरर्थकता का इसमें विशेष वर्णन है। मिथ्यादृष्टियों की कुबुद्धि का विविध चित्रण किया गया है। जैसे―चाम हड्डी माँस खंड का लोभी कुत्ता मुनि को देखकर भोंकता है ऐसे ही पापी व्यक्ति मुनि को देखकर भोंकता है, याने निंदा करता है व ग्लानि करता है। रयणसार में धर्मध्यानी निष्परिग्रह, निःशल्य साधुवों को विशेष पात्र कहा गया है। पात्रदान करने वाले श्रावकों के भविष्य फल की बड़ी महिमा बताई गई है। विषय कषाय के आसक्तों की दुर्गति का भयावह इस ग्रंथ में किया है। श्रावकों
   सम्यग्दृष्टि के ज्ञानमद का अभाव―सम्यग्दृष्टि कौन होता है, इसका वर्णन कल विधि रूप से कहा गया था कि जो जीव निज धर्म में अनुरक्त हो, निज शुद्ध आत्मस्वरूप का प्रेमी हो, वीतरागधर्म को मानता हो, दुःख रहित हो, ऐसा सम्यग्दृष्टि का परिचय है। अब इस गाथा में निषेधमुखेन कह रहे हैं कि जिसमें ये 44 दोष न हों, ऐसा सम्यग्दृष्टि होता है। 8 मद, मद नाम है घमंड का। ज्ञानी सम्यग्दृष्टि जीव को मद नहीं होता। मद तो पर्याय बुद्धि में होता है। जिसने माना शरीर को कि यह मैं हूँ दूसरों के शरीर को माना कि ये और (अन्य) लोग है। शरीर में आत्मबुद्धि होते ही यह अपने को श्रेष्ठ समझने लगता है और दूसरों को तुच्छ, हल्का, लघु मानने लगता है। पर्याय बुद्धि में ऐसी ही बात हुआ करती है। 8 सहारे होते हैं घमंड करने के। उन सहारों से यह अज्ञानी घमंड करता है। समंत भद्राचार्य ने कहा है कि ‘‘ज्ञानं पूजा कुलं जतिर्बलमृद्धिं तपो वपुः, अष्टावाश्रित्य मानित्वं स्मयमाहुर्गतस्मयाः’’ 8 प्रकार के मद बताये हैं। (1) ज्ञानमद―ज्ञान हो गया, कुछ बोलने की कला आ गई, कुछ समझने की बात आ गई तो उस ज्ञान का मद करना। मैं बहुत समझदार हूँ, मेरे को बहुत ज्ञान है....., उस ज्ञान पर से घमंड आता है। उस अज्ञानी को यह पता नहीं कि आत्मा स्वयं सहज ज्ञानस्वभावमय है और उसका स्वभाव यदि प्रकट हो तो तीन लोक तीन काल के समस्त पदार्थ बिना ही चाहे विवश होकर झलकते ही हैं। प्रमेयत्व गुण है, सर्व द्रव्यों में पाया जाता है, जिसका अर्थ है कि इस गुण के प्रताप से पदार्थ ज्ञान के विषय होते हैं। जो भी सत् हैं उन सबको केवल ज्ञान में झलकना ही होता है, इतना महान ज्ञानस्वरूप है। उसके आगे मनः पर्याय ज्ञान तक भी अवधिज्ञान तक भी न कुछ चीज है, पर यह अज्ञानी कुछ थोड़ा सा ज्ञान प्राप्त करके उसका मद किया करता है। ज्ञानमद सम्यग्दृष्टि में नहीं होता, क्योंकि उसकी स्वभावपर दृष्टि है और स्वभाव विकास की ही धुन है, और विकास का भी पता है, परंतु वह ऐसे अल्पज्ञान में रम नहीं जाता। 
   सम्यग्दृष्टि के पूजामद कुलमद व जातिमद का अभाव―(2) पूजामद―कुछ बड़ा हो गया, लोक में कुछ प्रसिद्धि हो गई, कुछ लोग मानने लगे, कुछ लोगों से आदर सम्मान मिलने लगा तो उसका ही एक मद हो जाता कि मैं बहुत उत्कृष्ट हूँ, मेरा जगह-जगह बड़ा सम्मान होता है, स्वागत होता है, लोग मेरी बड़ी कीर्ति गाते हैं। जो मैं करता हूँ सो लोगों को मानना पड़ता है....आदिक अनेक प्रकार से अपने ऐश्वर्य का मद हो जाता है, यह है पूजामद। ज्ञानी जीव में यह बात नहीं होती। वह तो इस संसार पर्याय को तुच्छ गिर रहा है। इस भव को दृष्टि में लेकर घमंड कर ही कहाँ सकेगा? ज्ञानी जीव पूजामद से रहित होता है। (3) कुलमद―यह मद भी अज्ञानियों को सताया करता है। मेरे बाबा ऐसे थे, बड़े ऊँचे धर्मात्मा थे, बड़े धनिक थे। कदाचित यह गरीब भी हो जाय तो यह अपने पिता या बाबा के धनिकपने की प्रशंसा करके अपनी प्रशंसा समझता है। (4) जातिमद―कुल में अज्ञानियों को जातिमद भी हुआ करता है। मेरी माँ बड़े कुल की उत्पन्न हुई है, मेरे मामा राजा हैं मेरे नाना, मामा ये सब बड़ी महिमा वाले हैं। इस तरह उनका सहारा लेकर भी अपने आप में मद उत्पन्न करता है। सबका मूल है पर्यायबुद्धि। जब शरीर को माना कि यह मैं आत्मा हूँ तो उसमें सारे ऐब आ जाया करते हैं। उन ऐबों की जड़ मिटा दी जाय अर्थात् मोह, अज्ञान, पर्यायबुद्धि खतम कर दी जाय तो सारे ऐब दूर हो जाते हैं।
   सम्यग्दृष्टि के बलमद व ऐश्वर्यमद का अभाव―(5) बलमद―शरीर के बल का मद करना, बड़े भी करते, बच्चे भी करते। कोई बच्चा अगर शरीर से पुष्ट है, वल है उसके अंदर तो वह अनेक बच्चों को सताया करता है जिस चाहे बच्चे को वह पीटता है, मारता है। वह बड़ी उद्दंडता करता है और अपने बल के घमंड पर वह इतराता है। ये सभी मद पापकर्म का बंध करते हैं, और जो जैसा करता है उसका फल उसको भोगना पड़ता है। कर्मों को काटने के लिए एक बड़ा भारी पौरुष चाहिए, वह हर एक से नहीं बनता, किंतु जो मोक्षमार्गी है। मोक्षमार्ग में बढ़ रहे हैं वे ही निज सहज स्वभाव की आराधना के वल से उन कर्मों को काट सकते हैं, पर जनसाधारण, जीव साधारण तो जैसा करते हैं, वैसा ही फल उन्हें भोगना पड़ता है। भले ही आज न मालूम पड़े के मैं पाप करता हूँ, अन्याय करता हूँ, फिर भी कुछ दुष्प्रभाव नहीं पड़ रहा, लोग बराबर ज्यों का त्यों आदर करते हैं। किसी को पता भी नहीं होता है, मगर कार्यविधि तो इस जीव के साथ विस्रसोपचय की अनंत लगी हुई है, जहाँ इस जीव ने दुर्भाव किया, कषाय किया, खोंटे भाव किया, मायाचार किया उस ही समय कार्माण वर्गणायें कर्णरूप बन जाती हैं, इससे बढ़कर और दंड क्या होगा? जो लोग ऐसा सोचा करते हैं कि मेरे इस चरित्र को कोई नहीं जानता, मैं अन्याय करूँ, कुछ करूँ, पर उन बेचारों को यह पता नहीं कि प्रति समय भावानुसार अनंत कर्मों का बंध चल रहा है। सम्यग्दृष्टि जीव के किसी भी प्रकार का मद नहीं होता। बल पाया है मगर उसका उपयोग सम्यग्दृष्टि जीव करता है दूसरों की रक्षा करने में, दूसरों का उपकार करने में, न कि दूसरों को सताने में। (6) ऐश्वर्यमद―एक होता है ऐश्वर्यमद। कुछ वैभव पाया हो या किसी प्रकार का ऐश्वर्य पाया हो तो उसका मद हो जाता है। धन संपदा का नाम क्या रखा है? लोगों ने? दौलत। दौ कहते हैं दो (2) को और लत कहते हैं लात को। इस वैभव लक्ष्मी के दो लाते हैं―एक तो जब यह लक्ष्मी आती है तब छाती पर लात मारती है जिससे वह पुरुष अकड़ जाता है। छाती आगे फैलाकर चलता है घमंड में। दूसरे―जब यह लक्ष्मी जाती है तो पीठ पर लात मारकर जाती है। उसे बस नीचा (अधोमुख) रहना पड़ता है। और, यह धन वैभव इस आत्मा के लिए क्या वस्तु है? अज्ञानी जन ही इसका आदर करते हैं। ज्ञानी जानता है कि मेरा सर्वस्व आधार मेरा ही स्वरूप है। अपने स्वरूप में रूचि हो, अनुरक्ति हो, यहाँ ही संतोष करें तो इससे कर्म कटते हैं, मुक्ति मिलती है। और उसका आनंद वह जानता है पर अज्ञानी तो इन बाहरी रूप रंगों पर, वैभवों पर आशक्त हैं। ज्ञानी को कैसी ही संपदा, कैसा ही ऐश्वर्य, कैसा ही राज्यपाट मिला हो, उसको मद नहीं होता।
   सम्यग्दृष्टि के तपोमद व रूपमद का अभाव―(7) तपमद―अज्ञानी जनों को तपमद भी सताया करता है। लोगों को तपश्चरण दिखे―अरे ऐसा तप कर रहा और उस तपश्चरण के कारण लोगों के बीच अपने में एक अभिमान सा बना रहता कि मैं एक तपस्वी हूँ। लोग तपस्वी नाम लेकर गुण गायें तो इसके मन में बड़ा हर्ष होता है। तप के प्रति उसका अभिमान है। ज्ञानी जीव के तप का मद नहीं होता। ज्ञानी जीव के सहज तप हुआ करता है, क्योंकि उसके धैर्य है। वह अपने मार्ग में सही चल रहा है और वहाँ यदि कोई आपत्तियाँ आयें तो उनको समता से सहता है। (8) रूपमद―शरीर का मद। रूप क्या चीज है? अगर मान लो शरीर का चाम पीला है तो क्या उसमें दुर्गंध नहीं आती? उसमें पसीना नहीं आता क्या? उसमें कौन सा गुण आ गया है? सारा शरीर अपवित्र है। रूप का मद ज्ञानी पुरुष को नहीं होता और न ज्ञानी पुरुष रूप पर अनुरक्त होता है। ऐसे 8 मद जिसके न हों, ऐसा सम्यग्दृष्टि पुरुष होता है।
   सम्यग्दृष्टि के तीनों मूढ़तावों का अभाव―तीन मूढ़तायें भी सम्यग्दृष्टि पुरुष के नहीं हैं (1) देवमूढ़ता (2) लोकमूढ़ता और (3) पाखंड मूढ़ता। जो देव नहीं है, स्वार्थवश राग द्वेषी अनेक ऐसे अटपट चरित्र वाले देवों की बात सुनकर एक उमंग आना, उनके प्रति रुचि होना, आशक्ति होना, उनकी मान्यता करना यह सब देवमूढ़ता है। ज्ञानी पुरुष का देव एक ही है―अविकार ब्रह्म, दूसरा देव नहीं। णमोकार मंत्र में जो पंच परमेष्ठियों का वंदन है सो वहाँ 5 का वंदन नहीं, केवल एक अविकार शुद्ध चैतन्यस्वरूप का वर्णन है। किसी में वह कम विकसित है किसी में अधिक और किसी में पूर्ण विकसित है। केवल एक ही तत्त्व का वर्णन है, पर अज्ञानी जीव तो कितने ही देवता मानते हैं नाना रूपों में और उनकी आराधना करते हैं। उनकी आराधना करके अपनी मनोकामनायें पूर्ण करने में अपने जीवन की सफलता समझते हैं। ज्ञानी जीव में देवमूढ़ता नहीं होती और न कभी किसी कामना से, किसी सांसारिक इच्छा से देवपूजा भी करता, क्योंकि उसे कुछ चाहिए ही नहीं। पुण्योदय है तो बिना चाहे भी आता है और आकर भी नहीं चाहता, और पुण्योदय नहीं है तो पास में मिली हुई संपदा भी दूर हो जाती है। ज्ञानी जीव के देवमूढ़ता नहीं अब गुरुमूढ़ता कहो या पाखंड मूढ़ता कहो-ऐसे संन्यासी जिनका आचार विचार सही नहीं उन्हें गुरु समझकर उनकी पूजा आराधना करना यह पाखंड मूढ़ता है। लोकमूढ़ता तो दुनिया में बड़ी विचित्र है। न जाने किस किसको धर्म मान लिया है। कहीं कोई नदी में नहा लिया, कहीं किसी पर्वत से गिर लिया, तो उससे समझ लिया कि हम तर गए, हमें वैकुंठ मिल गया। कहीं रास्ते में चलते फिरते में कोई पत्थर दिख गया तो उसी को अपना देवता समझ लिया, उसी जगह कोई पत्थर उठाकर डाल दिया, अन्य मुसाफिर वहाँ से निकले तो उन्होंने भी एक-एक पत्थर उस जगह डाल दिया, बस उसे अपना देवता मानकर उसकी पूजा आराधना करके उससे अपनी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं। जरा भी कोई कष्ट हुआ तो वे समझते कि मेरे इस कष्ट को यह देवता मिटायेगा। रोग के नाम पर भी देवता का नाम रख देते―जैसे चेचक रोग हुआ तो शीतला माता नाम रख दिया। शीतला माता का नीर ढारो बस बीमारी शांत हो जायगी...ऐसी उनकी मान्यता हो जाती है। अरे उन बेचारों को अपने आपका माहात्म्य विदित नहीं है और बाहर में अनेक प्रकार की कल्पनायें करके दूसरों  की महिमा बढ़ाते हैं। इस संबंध में एक दृष्टांत है कि एक गाँव में किसी ग्वाले के घर 1॰॰ भैंसें पली हुई थी। चेचक का रोग ऐसा फैला कि उसकी सभी भैंसे मरने लगी। प्रतिदिन दो-दो तीन-तीन भैंसे मरती जा रही थी। वह बेचारा ग्वाला अपनी भैंसे बचाने के लिए शीतला माता की बहुत-बहुत पूजा प्रतिदिन कर रहा था। पर शीतला माता ने उसकी एक भी न सुनी, उसकी भैंसों का मरना बंद न हुआ। एक दिन उसने जिस बटरिया को शीतला माता मानकर पूजता था उसका फोड़ फाड़कर कई टुकड़े कर दिए और कहीं बाहर फेंक दिया। समय की बात कि उसकी वे शेष 5 भैंसे बच गई। तो भाई मरना जीना यह किसी देवी देवता के आधीन नहीं। लोग व्यर्थ ही अटपट कल्पनायें कर डालते हैं। ऐसी अटपट कल्पनायें ज्ञानी सम्यग्दृष्टि के हृदय में नहीं होती।
   अपने जीवन के ध्येय का निर्णय करने की प्राथमिकता―अब आप समझो कि इस लोक में जीकर हमें करना क्या है? क्या उद्देश्य है इस जीवन का? अगर धन संपदा बढ़ाते रहने का उद्देश्य बनाया है अपने जीवन का तो बताओ कभी मरना न होगा क्या? यहाँ का सब कुछ छोड़कर जाना न होगा क्या? अरे यहाँ का सब कुछ छोड़कर जाना होगा, जिंदगी भर जितनी जो कुछ धन संपदा जोड़ा उसे मरण काल में याद कर करके बड़ा दुःखी होना पड़ेगा―देखो मैंने जिंदगी भर बड़ा परिश्रम करके धन कमाया, पर आज यह हमसे छूटा जा रहा है। इस संक्लेश मरण के कारण आगामी काल में भी उस का घोर दुःख भोगना होगा। तो बताओ यहाँ सार किस बात में है? अपने जीवन का उद्देश्य क्या बनाया है? क्या परिवार के जीवन-संचालन का ही एक उद्देश्य है? यद्यपि गृहस्थावस्था में होने के नाते एक कर्तव्य है सो तो ठीक है पर जिंदगी भर वही एक ध्येय रखना, उसी से अपने जीवन की सफलता समझना, अपने आत्मा की सुध न रखना यह जो महा अज्ञान है। यदि आपने दूसरों के लिए बहुत कुछ कर दिया तो बताओ उसके फल में आप क्या लाभ पा लेंगे? आप तो जितनी अपनी निर्मलता बनायेंगे बस उतना भर लाभ पा लेंगे, बाकी अन्य कुछ आत्मलाभ नहीं है, तो जीवन के उद्देश्य का ही निर्णय करने को पड़ा है। अच्छा आप सभी लोग एक दो दिन में निर्णय करके बताना कि अपने इस जीवन का उद्देश्य क्या है? किसलिए जी रहे हैं मनुष्य बनकर? और उसकी बड़ी शोभा बनाकर, सोफासेट के पलंग में बैठकर, मौज मानकर आराम करना यह अपने जीवन का ध्येय बनाया है क्या? अरे इससे कुछ पूरा न पड़ेगा। कर्म कलंक से मलिन इस आत्मा को कहीं भी चैन न मिलेगा। इस ज्ञानानंद का निधान अपना यह ज्ञानानंद स्वरूप दृष्टि में होगा तो यह शांति पायगा।
   शांति पाने का उपाय अध्यात्मबोध व विरागपना―शांति पाने का उपाय सिर्फ आत्मा की उपासना के दूसरा नहीं है। खुद ही तो हूँ। मैं स्वयं सहज क्या हूँ, इसका निर्णय आये बिना शांति का रास्ता मिल ही नहीं सकता। वर्तमान जो रूप है यह तो एक छाया रूप है। मनुष्य हुए तो या देव हुए तो, ये सब मायारूप है। इनकी प्रीति से कुछ लाभ नहीं प्राप्त होता। अपना जो सहज स्वरूप है चैतन्यमात्र, केवल एक चिद्विलास तन्मात्र मैं हूँ। ऐसी भीतरी गहरी दृष्टि आये बिना जीवन बिल्कुल व्यर्थ है, क्योंकि जीवन का अंत होगा अज्ञानदशा रहेगी तो आगे पर्याय व्यामोह बना बनाकर यह जीव दुःखी रहा करेगा। सुखी तो स्वयं है यह जीव। आनंद तो इसका स्वरूप है। आनंद कहीं बाहर से नहीं लाना होता, बल्कि बाहरी पदार्थों पर दृष्टि रहे तो उससे आनंद का घात होता है। तो जीवन का ध्येय तो बनायें कि किसलिए जीवित हैं। गुजारे के साधन तो कर्मोदय के अनुसार थोड़े से पौरुष से ही हो जाते हैं। अगर होने को हुए तो थोड़े से पौरुष से थोड़े समय में हो जाते और न होने हुए तो चाहे कितना ही श्रम कर लिया जाय, कितना ही समय लगा दिया जाय पर नहीं हो पाता। तो अपना यह कर्तव्य है कि नियत समय में धन कमाने का पुरुषार्थ करें। उदयानुसार जो कुछ फल मिले बस उसमें ही संतुष्ट रहें। उसके प्रति तृष्णा न लायें कि मुझे तो इतना ही चाहिए। मुझे कुछ न चाहिए। जो परिस्थिति हो बस उसी में मैं गुजारा बना सकता हूँ, बस यही कला मरे को चाहिए, यह बात चाहें, तृष्णा न चाहें। होगा सब कुछ उदयानुसार मगर भीतरी भावना का फल जरूर अपना प्रभाव दिखाता है।
   तो ज्ञानी जीव इन सब आकुलताओं से क्यों दूर है? क्योंकि वह अपने शांति का धाम स्वयं यह भगवान सहज परमात्मतत्त्व ज्ञान में आया है। कभी-कभी लोग सोचते हैं कि बड़े-बड़े मुनिराज जिन्होंने करोड़ों की संपदा और राज्यपाट का त्याग किया वे जंगल में अकेले कैसे अपना समय व्यतीत करते होंगे? किससे वहाँ बातचीत की जाय? ऐसा लोग चाहते न? बात करने को न मिले कोई तो गृहस्थ लोग बड़ी जल्दी ऊब सा जाते हैं। मुनियों को भी तो चाहिए कोई बात करने को....। अरे अब अज्ञानीजनों को यह पता नहीं कि मुनियों को तो भगवान आत्मा मिल गया है और उससे वे शांतिपूर्वक बात किया करते हैं, उसी कारण उनको जंगल में ऊब नहीं आती। बल्कि समागमों के बीच, मायाचारियों के बीच लोगों को ऊब आनी चाहिए। और, मुनिजनों को मिला है सरल यथार्थ परमार्थ स्वरूप, सो उसकी दृष्टि करके, उसकी उपासना करके वे निरंतर तृप्त रहते हैं। सम्यग्दृष्टि ही निराकुल है। वह इन तीन मूढ़ताओं से दूर है। इस तरह इस गाथा में यह बतला रहे कि जिसके तीन मूढ़तायें नहीं हैं वह पुरुष सम्यग्दृष्टि होता है।
   सम्यक्त्वरहित बालतप से सिद्धि का अभाव―सम्यग्दृष्टि जीव के गाथोक्त 44 दोष नहीं होते हैं, इसका वर्णन चल रहा है। सम्यग्दृष्टि के मायने सही दृष्टि वाला। जैसा आत्मस्वरूप है अपने आप सहज, उस रूप में अपने को मानना, यह मैं हूँ। यह बात जिसमें आयी उसे कहते हैं सम्यग्दृष्टि। और मिथ्यादृष्टि इससे विपरीत सब कुछ रूप अपने को मानता है। कैसी श्रद्धा भरी है कि मैं इसका बाप ही तो हूँ, मैं इसका लड़का ही तो हूँ। मैं इसका पति हूँ। मैं पत्नी हूँ, मैं अमुक चीज का व्यापारी हूँ, अमुक नगर का निवासी हूँ अमुक बिरादरी का हूँ आदिक कितने ही रूपों में यह जीव अपने को मानता है। यह बात तो जाने दो, यदि कोई मुनि देहभेष को लक्षित कर ऐसी श्रद्धा रखे कि मैं मुनि हूँ तो उसके भी मिथ्यात्व है। श्रद्धा यह रहनी चाहिए सम्यग्दृष्टि जीव में कि मैं सहज चैतन्यमात्र अंतस्तत्त्व हूँ, इसका कोई बाहर में पहिचानन हार नहीं इससे कोई व्यवहार करने वाला नहीं, ऐसा अनादि अनंत चैतन्य स्वरूप मैं हूँ, जहाँ कहीं ग्रंथों में वर्णन आता है कि बड़ी ऊँची साधना करके भी, तपश्चरण करके भी, नवग्रैवयक तक उत्पन्न होकर भी अज्ञानी रहता, मिथ्यादृष्टि रहता, इसका कारण क्या है?
   खोटी वाणी में बोल जाय कोई और बोलने वाले पर रंच भी रोष न करे फिर भी अज्ञानी रहता है कोई तो उसका कारण क्या है? उसका कारण यह ही है कि अपने को वह सहज चैतन्यमात्र अनुभव नहीं कर पाया। जितनी समता चल रही है वह एक पर्यायबुद्धि पर चल रही है कि मैं मुनि हूँ, मुझे द्वेष न करना चाहिए मुझे राग न करना चाहिए, मुझे इस तरह से ईर्या पथ से चलना चाहिए, इस तरह आहार लेना चाहिए। लोग नमस्कार करें तो यों आशीर्वाद देना चाहिए। मैं मुनि हूँ। सुनने में तो बड़ा भला लग रहा होगा कि वह ठीक सोच रहा मगर वह अत्यंत गलत सोच रहा। वह चिंतन मोक्ष मार्ग में बाधक है। वह संसारी है। अज्ञानी है, जिसको अपने आत्मा के बारे में यह श्रद्धा है कि मैं साधु हूँ।
   अंतरात्मा साधु की श्रद्धा―कैसी श्रद्धा होती है सही मुनि को कि मैं सहज चैतन्यमात्र अंतस्तत्त्व हूँ। यह गुजारे का साधन है। मैं अंतरंग में ज्ञानमयी तपश्चरण करूँ, यह ही उसका एक ध्येय है और इसके लिए ही उसका वर्तमान भव है, पर मुझे कोई विघ्न न आये, विकल्प अधिक न जगे, ऐसा वातावरण मैंने इस निर्ग्रंथ पद में बनाया है। तो शांत वातावरण और विशेष विकल्प संक्लेश कल्पना न रहने के वातावरण में सही गुजारा हो, इसके लिए यह भेष बनाया है। यह भेष मैं नहीं हूँ, मैं एक चैतन्यमात्र अंतस्तत्त्व हूँ। इसका जिसने अनुभव नहीं किया ऐसा पुरुष कितना भी तपश्चरण करने पर अज्ञानी ही रहता, संसार में ही रुलता। रुड़की में हमसे एक भाई ने कहा कि यदि आप कहें तो मैं बताऊँ कि मुनियों को पद-पद पर गुस्सा क्यों आ जाती है? तो मैंने कहा अच्छा बताओ तो उसने बताया कि देखो मुनिजन अपने को ऐसा मानते कि मैं पूज्य हूँ, ये श्रावक लोग पूजने वाले हैं, इनको इस तरह से पूजना ही चाहिए, और वैसी बात जब बाहर में दिखती नहीं तो उन्हें गुस्सा आना प्राकृतिक बात है। तो मतलब क्या निकला कि ज्ञानी सम्यग्दृष्टि पुरुष को यह श्रद्धा होती है कि मैं चैतन्यमात्र अंतस्तत्त्व हूँ, मैं मुनि नहीं, मैं व्यापारी नहीं, मैं कुटुंब वाला नहीं। वे सब पर्यायबुद्धि की बातें जब चित्त में ठहरती है तो बोझ आ जाता है सिर पर। इसका आप सब लोग अनुभव भी कर रहे होंगे। लोग कहते हैं कि मुझ पर बड़ा भारी बोझ है और दिखता ऐसा है कि नंगे सिर खड़े हैं। कपड़े भी बहुत कम पहिने हैं। बोझ क्या आया उन पर? तो सही कहते हैं कि वे, मुझ पर बहुत भारी बोझ है काहे का? कल्पनाओं का। पर पदार्थ का बोझ नहीं। कोई आदमी सिर पर नहीं चढ़ा है। कोई पीट नहीं रहा है। पर कल्पनायें जो भीतर में बनी हैं कि मैं तो इतने बच्चों का पिता हूँ। मैं इसका अमुक हूँ। मेरा यह कर्तव्य है, मुझे ऐसा ही करना चाहिए। इस ही में मेरी श्रद्धा है, इस ही में मेरी प्रशंसा है, इस तरह की मिथ्या श्रद्धा जो बसी है उससे बोझ चढ़ गया है, तब फिर करना क्या चाहिए? श्रद्धा ऐसी बनावें जैसा कि ऊँचे मुनिराजों की होती है। श्रद्धा में गरीब न बनें। भले ही चारित्र नहीं है। श्रावक पद में है, गृहस्थी में है मगर सही श्रद्धा है तो आशय में उतना ही उन्नत रहता है जितना कि वास्तविक मुनिराज हुआ करते हैं। मैं केवल ज्ञानानंद घन चैतन्यस्वरूप वस्तु हूँ। मैं रागी भी नहीं हूँ। देखिये―राग का कितना घनिष्ट संबंध है इस जीव के साथ। राग प्रकृति का उदय आया और उसके उपयोग में छाया हुई, प्रतिफल न हुआ व बोलता भी नहीं है,
   इतने पर भी ज्ञानी पुरुष अपने को ऐसा स्वीकार करता है कि मैं राग नहीं हूँ। मैं रागी नहीं हूँ। राग पर्याय से परिणत होकर भी चूँकि वह स्वभाव को ही स्व मानने की धुन में है अतएव वह स्वभाव की ओर ही अभिमुख होकर जानता है कि मैं रागी नहीं। पर्यायतः रागी होकर भी उसकी श्रद्धा में स्वभाव ही आ रहा है कि मैं तो यह हूँ। इतना निरपेक्ष विरक्त भव्य जीव सम्यग्दृष्टि होता है। उसमें ये 44 दोष नहीं होते। अब आप जान जायें कि रात दिन जो यह श्रद्धा लादे फिर रहे हैं कि मैं अमुक स्थान का हूँ। अमुक घर का हूँ। ऐसे परिवार वाला हूँ, ऐसी पोजीशन का हूँ, ऐसी जो भीतर में श्रद्धा लादे फिर रहे हैं, यह कितना बड़ा भारी बोझ है, इस संसार में रुलाने वाला यह सब भार है। श्रद्धा पूर्ण सही होनी चाहिये। जो सही श्रद्धावान जीव है उसमें ये दोष नहीं होते, यह कथन इस गाथा में चल रहा है। कल बताया गया था कि उसमें 8 प्रकार के मद नहीं होते, तीन प्रकार की कलुषतायें नहीं होती। अब बताया जा रहा है कि उसमें अनायतन नहीं होते। अनायतन उसे कहते हैं जो धर्म के स्थान नहीं है उन स्थानों को अपनाना, जैसे कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु ये धर्म के स्थान नहीं है। इनमें स्वयं धर्मभाव नहीं और इनके मानने वालों में भी धर्मभाव नहीं। तो तीन अनायतन तो कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु हैं और तीन अनायतन इन तीनों के मानने वाले भक्तजन हैं। ये 6 अनायतन हैं। अनायतनों में मग्न न होना चाहिए। कुदेव कौन कहलाता है? जो देव तो नहीं हैं पर उनमें देवत्व की प्रसिद्धि कर रखी है, स्वयं कर रखी हो या दूसरों ने कर रखी हो, जो देव का स्वरूप नहीं है, ऐसे तो बहुत से जीव हैं। हम आप भी देव नहीं हैं मगर कुदेव क्यों नहीं कहलाते? देव तो नहीं है मगर देवपने की कुल्पित रुढ़ि चलती भी तो नहीं है। जो जीव देव नहीं और उनमें देवपने का चलन चल रहा हो वह कहलाता है कुदेव। कुदेव कौन बना देता है? अगर वही जीव स्वयं यह चाह रखता है कि लोग मुझे देव की तरह मानें तो उसने अपने को अपनी ओर से ही कुदेव कर डाला। और भक्तजन उस देव को विपरीत रूप में मानें, उसे अन्य देव समझे तो भक्तों ने कुदेव कर डाला। देव होता है सर्वज्ञ वीतराग, अब इसकी बारीकी पर जायें तो चाहे वीतराग प्रतिमा हो और भक्तजन यदि यह श्रद्धा रखते हैं कि भगवान मुझे इतना वैभव दो, जैसा कि प्रायः महावीर जी या पद्म पूरा ऐसे क्षेत्र है। जहाँ जाकर भक्तजन ऐसा सोचते हैं कि मुझे मुकदमा जीता दीजिए, ऊँचे आराम कर दीजिए। आप सब कुछ करने वाले हैं, ऐसी श्रद्धा वहाँ रखें तो भक्तों ने अपने लिए तो उसे कुदेव बनाया। हालांकि वह प्रतिबिंब एक सर्व साधारण के लिए है अतएव वह कुदेव की मूर्ति नहीं है। मगर इस लालसा वाले लोगों ने जिनके यह श्रद्धा बसी है कि मेरी सब कुछ घर गृहस्थी तो यह ही चलाते हैं, उन्होंने अपने भावों में उसे कुदेव समझ लिया। कुशास्त्र जो राग का और मोह का उपदेश दें वे सब कुशास्त्र कहलाते हैं। जिनमें ऐसा चरित्र हो महापुरुषों का नाम देकर कि जिनके चरित्र में यह ही बात दिखाई गई हो कि ऐसी प्रीति करना चाहिए, ऐसा सखियों से प्रीति करें, इस प्रकार से चीज चुराना, इस तरह खाना, इस तरह बच्चे होना आदिक बातें लिखी हों और उसे एक पूज्य माता का रूप दिया जाय, जिससे कि लोगों में राग बढ़े और मोह बढ़े। इस दिशा की ओर जो उपदेश करे उसे कहते हैं कुशास्त्र और फिर जैसा वस्तु का स्वरूप है उससे विपरीत वर्णन करे तो वे सब कुशास्त्र हैं, वे अनायतन हैं। और कुशास्त्र को मानने वाले जन वे सब अनायतन है। कुगुरु―जो विषयों कि वशीभूत हैं, अपने में संयम नहीं पाल सकते हैं, अनेक आरंभ रखते हैं, परिग्रह भी रखते हैं और मद्य पियें, तंबाकू पियें, भंग पियें याने अपने आराम में जरा भी दखल न दें, जिसमें अपना आराम समझा उसे पूरा चाहें।
   और फिर कोई ऐसा विचित्र भेष रख लें कि जिससे लोगों पर यह प्रभाव पड़े कि ये गुरु हैं साधु हैं और ये विनय से फिर मुझे मेरे मन की चीज प्रस्तुत करें, यह ही एक जिनकी प्रवृत्ति है वे गुरु नहीं कहला सकते। गुरु वे हैं जो राग द्वेष के वश न हों। जो किसी भी तरह का आरंभ परिग्रह न रखते हों, जिनका काम ज्ञान चर्चा, आत्मध्यान और तपश्चरण है। परमात्मस्वरूप में जिन की धुन है, अपनी समाधि की धुन है, ऐसे जो कल्याणार्थी जीव हैं वे हैं गुरु। और इससे विपरीत जो आशावान हैं, आरंभ परिग्रह में रत हैं। जो इंद्रिय को वश में नहीं रख सकते और कोई भेष बना लिया वे कुगुरु कहलाते हैं। वे खुद अनायतन हैं याने धर्म के स्थान नहीं हैं। और, ऐसे कुगुरु के जो सेवक हैं वे भी धर्म के स्थान नहीं है। ये 6 बातें सम्यग्दृष्टि जीव के नहीं पायी जाती। वह सच्चे देव सच्चे शास्त्र और सच्चे गुरु की ही सेवा भक्ति विनय रखता है, क्योंकि ज्ञानी पुरुष का ध्येय बना ही है यह कि मैं संसार के संकटों से छूटकर ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व में रमता हुआ परम आनंद पाऊँ। मुक्त होऊँ तो जो ऐसी अपनी धुन रखता है वह ऐसे ही देव, शास्त्र, गुरु का संग बनायगा, विपरीत न बनायगा। तो ज्ञानी जीव के अनायतन नहीं होते। 
   सम्यग्दृष्टि की साष्टांगता―सम्यग्दृष्टि पुरुष अष्टांग सहित होता है। वह आत्मस्वरूप में संदेह नहीं रखता। जिन वाणी में शंका न रखना (1) नि:शंकित अंग है। धर्मधारण कर भोग विषयों की वह आकांक्षा नहीं करता। आकांक्षा से उपेक्षा रखना यह (2) निःकांक्षित अंग है। कर्मोदयवश कोई विपत्ति में आये क्षुधा आदिक वेदनायें हो तो ऐसी विपत्ति के समय भी अपने आपको मलिन नहीं बनाता, उनका ज्ञाता दृष्टा रहता और जो साधुजन हैं वे रोगी हों, देह उनका मलिन हो तब भी उनसे घृणा नहीं करता और जैसे माता अपने बच्चे के प्रति घृणा नहीं करती चाहे टट्टी कर दे या पेशाब कर दें; उसके प्रति प्रेम ही रखती है, इसी तरह साधुजनों से प्रेम होना (3) निर्विचिकित्सा अंग है। अपने स्वरूप में अपने हितमार्ग में कभी बेसुध नहीं होना, किसी के बहकाये बहकता नहीं और कुदेव, कुशास्त्र कुगुरु के प्रति उसे श्रद्धा नहीं होती कि ये मोक्षमार्गी हैं, ये मेरे लिए आराध्य हैं, यह है (4) अमूढ़दृष्टि अंग। (5) उपगूहन अंग, (उपवृंहण) अपने ज्ञान स्वभाव के आलंबन से अपने विशुद्ध ज्ञान को विकसित करना और किसी धर्मात्मा पुरुष में किसी अशक्ति के कारण कोई दोष लग गया हो तो उस दोष को छुपाना याने समाज में अप्रभावना न बनाना यह उपगूहन अंग है। (6) स्थितिकरण अंग―स्वयं ऐसा सद्भाव बनाये कि विचलित हुए मन को फिर चरित्र में, श्रद्धा में स्थापित करें, मोक्ष मार्ग में बढ़ाये और दूसरे भी किसी कारण धर्म से च्युत हो तो तन से, मन से, वचन से, धन से सब प्रकार से उसकी मदद करके धर्म में स्थित कर दे। यह स्थितिकरण अंग है। (7) वात्सल्य अंग धर्मात्माजनों के प्रति निष्कपट प्रेम होना अहो यह भी रत्नत्रय के मार्ग में लगे है। बड़े पवित्र आत्मा हैं, ऐसी श्रद्धा और उत्सुकता से उनके प्रति अनुराग होना, सेवा होना, उनकी अनुमोदना होना यह है वात्सल्य और अपने स्वरूप को निरखकर यह सहज ज्ञानानंद स्वभाव है, उसमें अपने आप को रमाना यह वात्सल्य है। और, (8) प्रभावना अपने चरित्र द्वारा ज्ञान द्वारा लोगों में प्रभावना बने, स्वयं में प्रभावना बने, कोई अप्रभावना की बात न आये, यह है प्रभावना अंग। तो ये 8 अंग तो भूषण हैं सम्यग्दृष्टि के।
   सम्यग्दृष्टि के शंकादोष का अभाव―यदि 8 अंग के एवज में इसके विपरीत बात आये तो वह दोष है और सम्यक्त्व का नाश करने वाला दोष है। शंका अपने स्वरूप में शंका होना, बहुत दिनों से धर्म मार्ग में लग रहा हूँ, त्याग व्रत में चल रहा हूँ, ये मुफ्त में ही तो सारे कष्ट नहीं सहे जा रहे हैं। पता नहीं आत्मा हैं या नहीं, क्या बात है। ऐसी शंकायें आना या जिनेंद्र भगवान के वचनों में शंका आना यह बात तो ठीक नहीं जंचती। शास्त्रों में तो लिखा है मगर यह ठीक नहीं लगता। अरे अपने आपकी बुद्धि पर तो दोष नहीं देते, उनकी समझ में अभी तक नहीं आ सका यह और बजाय इसके उन शास्त्रों में दोष में तो लिखा है मगर यह ठीक नहीं लगता। अरे अपने आपकी बुद्धि पर तो दोष नहीं देते, उनकी समझ में अभी तक नहीं आ सका यह और बजाय इसके उन शास्त्रों में दोष देते कि यह भगवान ने ठीक नहीं कहा, शास्त्र में यह ठीक नहीं लिखा गया....इस प्रकार जिनेंद्र भगवान के वचनों में शंका करना यह दोष है। ऐसा दोष सम्यग्दृष्टि ज्ञानी पुरुष के नहीं होता, उसका कारण क्या है कि प्रभु का उपदेश अनेक विषयों में है। मोक्ष मार्ग के प्रयोजनभूत 7 तत्त्वों का भी वर्णन है और परोक्षभूत जैसे ढाई द्वीप, असंख्यात द्वीप, नरक स्वर्ग आदिक का भी वर्णन है। इस ज्ञानी पुरुष ने अनुभव में आ सकने योग्य मोक्ष मार्ग के प्रयोजनभूत 7 तत्त्वों का सयुक्तिक स्वानुभव निर्णय किया है और उसे ऐसा लगता है कि जो मेरे अनुभव में आया वही देखो शास्त्रों में देखने को मिल रहा, जो शास्त्रों में मिल रहा वही मेरे अनुभव में आया। तो मोक्षमार्ग के प्रयोजन भूत सप्त तत्त्वों के बारे में स्वयं अनुभव करके उस अखंड शुद्ध चैतन्यमात्र अंतस्तत्त्व का अनुभव किया है और वही बात ग्रंथों में है, ऐसा मिलान देखकर उसको ऐसी पूर्ण श्रद्धा हुई है कि जिन ऋषियों से, जिन भगवान से ये सब शास्त्र आये हैं वे पूर्ण सत्य हैं, और उन्हीं शास्त्रों में स्वर्गनरक का भी वर्णन आया है तो वह भी पूर्ण सत्य है। ऐसे निरपेक्ष साधु संतजन कभी अन्यथावादी नहीं हो सकते।
   वह परोक्ष चीज है। कहाँ यह बात नहीं चलेगी कि मैं देख लूँ तो सही है। आप जिसे देख रहे हैं उसमें यथार्थ बात मिल रही या नहीं, जैसा कि शास्त्रों में लिखा है? मिल रहा है। रंच भी गल्ती नहीं पायी जाती। प्रभु का संदेश है कि सर्वसत् उत्पाद व्यय ध्रौव्य सहित हैं। इन तीनों में से (उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य में से) अगर एक भी न हो तो वहाँ तीनों नहीं होते और वह वस्तु ही नहीं होती। इस बात का किसी भी जगह थोड़ा भी विरोध या अनबन होता हो तो खूब निरख लीजिए, कहीं अनबन नहीं है। जो दिखने वाली और अनुभव में आ सकने योग्य बात है वह पूर्ण सही मिली आगम के अनुसार तो ऐसे वीतराग भगवान और ऋषिजनों द्वारा प्रणीत प्रत्येक बात प्रत्येक वचन पूर्ण प्रमाणिक हैं। ज्ञानी को जिन वचनों में शंका नहीं और आत्मस्वरूप में भी शंका नहीं होती।
   सम्यग्दृष्टि को इहलोकभय, परलोकभय, वेदनाभय व मरणभय की शंका का अभाव―ज्ञानी सम्यग्दृष्टि को अपने स्वरूप में शंका नहीं है, यही तो कारण है कि ज्ञानी जीव को भय नहीं होता। इस लोक में न जाने कैसा कानून बन जाय और न जाने मेरा क्या हाल होगा। फिर सब जायदाद छिन जाय या कोई लूट ले जाय या सारा नुकसान हो जाय तो मेरा क्या हाल होगा। ऐसा भय ज्ञानी जीव को नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि मैं आत्मा सदा हूँ, अगर हूँ, अविनाशी हूँ, सदा रहूँगा, मैं कभी मिटता नहीं। कुछ भी बाह्य परिस्थितियाँ आयें उनसे इस आत्मा के सत्त्व में कोई अंतर नहीं आता। यह मैं सहज ज्ञानानंद स्वरूप हूँ। इसमें बाधा का कोई काम नहीं है। न परलोक का भय मानता। वहाँ भी मैं वही आत्मा हूँ और वहाँ भी अपने आपको निरखता रहूँगा, फिर बाधा किस बात की? अपने स्वरूप को न निरख सके और बाहरी पदार्थों में मेरा दिल बसे तो बाधा होना प्राकृतिक बात है। ज्ञानी जीव किसी वेदना में भी भय नहीं रखता। वेदना होती है तो वह उसका ज्ञाता रहता है। शरीर में कोई वेदना हुई तो वह उसकी उचित व्यवस्था तो बनाता पर वह उस रोग की विशेष परवाह नहीं करता।
   वह जानता है कि मैं तो अमूर्त आत्मा हूँ, यह रोग तो मेरे में मोह का है, राग द्वेष का है। सो ज्ञानी जीव ने इन राग द्वेष मोह भावों को परभाव परख लिया है। उनके अभिमुख वह नहीं होता, उनसे उपेक्षा रखता है। अपने स्वरूप की ओर आता है, उसको शंका नहीं होती। उसे मरण का भी क्या भय? जिसे मोह लगा है वही मरण का भय करेगा। जिस ज्ञानी पुरुष ने बाह्य समागमों के बीच रहकर भी अपने को अकेला ही अनुभव किया है मेरे स्वरूप में मात्र मैं हूँ, मैं अपने में ही सब कुछ करने भोगने वाला हूँ। इस मुझ चैतन्यमात्र आत्मा का अन्य किसी चेतन अथवा अचेतन पदार्थ से रंच भी संबंध नहीं। ऐसी भावना में जिसने अपना जीवन बिताया वह मरते समय भी अपने आपको दृष्टि में रखे रहता है। यह मैं आत्मा हूँ। उसका कहीं बिछोह नहीं। यह यहाँ न रहा, दूसरी जगह चला गया, यह मैं क्या था? जिसके छूटने का रंज हो? यहाँ न रहा दूसरी जगह चला गया। जैसे जिस किसी विवेकी को कहीं रेल वगैरह किसी में किसी रेल अधिकारी ने कहा कि भाई यहाँ न बैठो, इस जगह बैठो, तो उस विवेकी पुरुष को उस दूसरी जगह बैठने में रंच भी संकोच नहीं होता। वह जानता है कि चलो वहाँ न बैठा यहाँ सही, ऐसे ही ज्ञानी पुरुष को मरण के प्रसंग में भी भय नहीं होता। जिसके ऐसे दोष नहीं है उसको सम्यग्दृष्टि कहते हैं।
   ज्ञानी के अरक्षा अगुप्ति व आकस्मिक भय का अभाव―सम्यग्दृष्टि जीव के शंका दोष नहीं रहता, इस संबंध में यहाँ चर्चा चल रही है। न उसे अपने स्वरूप में शंका है और न जिनेंद्र भगवान के वचनों में शंका है। स्वरूप में शंका तो यों नहीं रही कि अपने स्वरूप का अनुभव करके सहज परम आनंद पा लिया है, उसे अब कोई चलित नहीं कर सकता। जिनेंद्र भगवान के वचनों में शंका यों नहीं है कि जो प्रयोजनभूत तत्त्व है, जब वह पूरा आगम से खुद में मिल गया तो जितने भी वचन हैं परोक्षभूत पदार्थ के बारे में उनके संबंध में उसे पूरा प्रमाण है। ऐसा सम्यग्दृष्टि जीव 7 भयों से रहित होता है। इसके अरक्षाभय भी नहीं है। मेरी रक्षा नहीं है, कैसे रक्षा हो? मैं अनाथ हूँ, ये विकल्प ज्ञानी के नहीं जगते। चाहे वह धन से भी गरीब हो और इतना भी क्यों, चाहे वह पशु पक्षी भी हो, यदि वह सम्यग्दृष्टि है तो उसको अपनी रक्षा के बारे में चिंता कुछ नहीं है। उसे अनुभव हुआ है कि मैं हूँ जो हूँ सो अपने ही स्वरूप में हूँ। मेरे से बाहर मेरा कुछ नहीं है, किसी भी बाहरी पदार्थ से मेरे में कुछ दखल नहीं है। मैं अविनाशी हूँ। उसका कभी अभाव ही नहीं हो सकता, सदा रहेगा, फिर अरक्षा किस बात की? ज्ञानी जीव के अगुप्तिभय भी नहीं होता। मेरे द्वार खुले हैं, किवाड़ कमजोर है, कैसे मैं सही रह सकूँगा, उसका यहाँ कोई भय नहीं है क्योंकि उसने अपने स्वगुप्त अंतस्तत्त्व को पहिचान लिया है। स्वरूप किले में किसी भी पर पदार्थ का प्रवेश नहीं हो सकता। प्रत्येक वस्तु अपने आपके स्वरूप किले के समान दुर्भेद्य, अभेद्य, रहती है। एक के स्वरूप में दूसरी वस्तु का स्वरूप नहीं पहुँचता। फिर मेरे में अगुप्ति क्या? मैं स्वयं अपने स्वरूप की गुप्ति रखे हूँ। मेरा स्वरूप दुर्ग अत्यंत मजबूत है। यह जीव स्वयं कल्पनायें करके ही तो दुःखी हो रहा है। स्वयं ही तो यह आनंदमय है, इसे गुप्तिमय नहीं है। आकस्मिक भय भी सम्यग्दृष्टि के नहीं है। आकस्मिक भय कहलाता है अटपट भय। कुछ भी अटपट कल्पनायें कर डाला, जैसे अभी यहाँ बैठे हैं। अटपट कल्पनायें करने लगे कि बादल आ गए हैं, कहीं बिजली न गिर जाय। यदि बिजली मेरे ऊपर गिर गई तो पता नहीं मेरा क्या हाल होगा, मैं बचूँगा भी या नहीं―यों अटपट कल्पनायें कर डालना आकस्मिक भय है।
   एक बात यह समझो कि कोई भी अन्य पदार्थ इस आत्मा को कुछ गड़बड़ कर ही नहीं सकता। केवल अज्ञानी जीव कल्पनायें करके अपने आप में यह समझते कि मुझको इससे हानि पहुँचती। किसी भी पदार्थ से कुछ भी भय इस आत्मा में नहीं आता। कोई हानि इस आत्मा में नहीं होती। उसके आकस्मिक भय भी नहीं हैं। ऐसे 7 भयों से रहित यह सम्यग्दृष्टि जीव दुःख रहित है। अंतः अनाकुल है।
   सम्यग्दृष्टि के कांक्षा व जुगुप्सा दोष का अभाव―आकांक्षा का दोष भी ज्ञानी पुरुष में नहीं है। आकांक्षा कहते हैं इच्छा को। धर्म के एवज में सांसारिक सुख संपदा की इच्छा होना यह तो सम्यग्दृष्टि में संभव ही नहीं है, पर अन्य जो इच्छायें होती हैं उनके प्रति भी उपेक्षा है, उनमें अनुराग नहीं है, उनके प्रति निवृत्ति की ही भावना रख रहा है। सम्यग्दृष्टि में आकांक्षा का दोष नहीं। वह निर्जुगुप्स है, उसके जुगुप्स का दोष नहीं है। जुगुप्स मायने ग्लानि। आरे आत्मस्वरूप में ग्लानि करना, आत्मविभावों में दुःखी होना और उससे अपने को म्लान बनाना यह ज्ञानी के नहीं होगा क्योंकि विभावों से अपने को निराला समझ रहा। उसका प्रभाव नहीं चलता और बाहर किसी साधु संत में कोई देह में ग्लानि आयी हो, मल मूत्रादिक आये हों तो भी ग्लानि न करना। ग्लानि करे तो यह दोष है। इससे एक बात और भी जीवन में समझना कि जिन लोगों के जरा-जरा सी बात में ग्लानि के भाव आते हैं। नाक, भौं सिकोड़ा करते हैं यह उनकी कोई भली बात नहीं है।
   अपने मन को बहुत-बहुत ग्लान कर लेना इसकी क्या जरूरत? जो है सो है। उसके ज्ञाता रहें। यद्यपि गृहस्थी के बीच रहकर ये सब बातें आवश्यक होती हैं, मगर सफाई को इस तरह की एक आदत बना लेना यह तो कोई भली बात नहीं है। किसी स्थिति में जब कोई वैसी घटना आये ग्लानि की तो झट अपने आत्मस्वरूप की सम्हाल कर लें। मैं तो ज्ञानानंद स्वरूप हूँ, मेरे पर कोई संकट नहीं, बाह्य पदार्थ विषयक आने जाने के कारण संकट जो लोग अनुभव करते हैं उस संकट को टाल सकते हैं, ये आते जाते, उनसे मुझमें क्या संकट? अपने एकाकी आत्मा को निरखे तो एक भी संकट नहीं है और कुबुद्धि आये, बाहरी पदार्थ न मिलें इच्छानुकूल तो उसमें संक्लेश करे, संकट माने यह तो अज्ञान और मोह की दशा है। इसी में सारा संसार फंस रहा है। इस भव को पाकर कौन सी भली बात कर ली है? इतनी ही बात आ जाय उपेक्ष्य, बाहर में कुछ भी होता हो, इष्टवियोग अनिष्ट संयोग उसके ज्ञाता दृष्टा रहें। मेरे को क्या इष्ट हैं, क्या अनिष्ट हैं? मैं एकाकी अपने आपके स्वरूप को लिए हुए अपने आप में सदा रहता हूँ। उसमें कोई कष्ट नहीं।
   सम्यग्दृष्टि के मूढ़दृष्टि व अनुपगूहन दोष का अभाव―सम्यग्दृष्टि जीव कभी भी मूढ़दृष्टि के दोष में नहीं आ पाता। दुनिया के लोग कैसा ही बहका रहे हों, कितने ही रागी द्वेषी देवी देवताओं की पूजा आराधना कर रहे हों, किसी भी लोकमूढ़ता से सम्यग्दृष्टि जीव रंच भी प्रभावित नहीं होता है। उसके अज्ञान नहीं जगता है। मैं अविकार स्वरूप हूँ, ऐसा स्वरूप जहाँ प्रकट हुआ है वह तो है देव। इस अविकार स्वरूप के प्रकट करने की विधियाँ जहाँ लिखी हैं वह है शास्त्र। इस अविकार स्वरूप को प्रकट करने के लिए जिनकी धुन बन गई है, जिन्हें अन्य कुछ नहीं सुहाता ऐसे निर्ग्रंथ कहलाते हैं गुरु। इस ओर ही उसकी श्रद्धा है। अपने आपके अविकार स्वरूप की श्रद्धा है, वह कहीं व्यामोह को प्राप्त नहीं होता। जो ज्ञानी है, सम्यग्दृष्टि है वह कभी भी अनुपगूहन नहीं करता। किसी में कोई दोष आया हो अपने साधर्मी जनों में तो उस दोष को जनता के बीच प्रकट करने का क्या प्रयोजन ज्ञानी को? वह तो अपने आपके स्वरूप ध्यान का धुनिया बना हुआ है और फिर समाज का अहित है। समाज के लोग जानेंगे कि जब ऐसे बड़े-बड़े लोग भी विचलित होते हैं ऐसे-ऐसे कठिन दोष में आते हैं तो फिर वे कहेंगे कि अरे धर्मवर्म कुछ नहीं, यों धीरे-धीरे एकदम तीर्थप्रवृत्ति खतम होती है। लोग संकट में पड़ जाते हैं।
   सम्यग्दृष्टि के अवात्सल्य व अप्रभावना दोष का अभाव―ज्ञानी पुरुष वत्सल हैं, धर्मप्रेमी है, जिसमें दोष लगा है उस ही व्यक्ति को भले प्रकार वह समझायेगा, पर जो लोग दोषी पुरुषों से बात ही न करें, उन्हें समझायें ही नहीं और एकदम जनता में दोष प्रकट करें तो उनमें अदया है, धर्मानुराग भी नहीं है। वे अपने कल्याण की ओर अभिमुख भी नहीं है। सम्यग्दृष्टि जीव में अनुपगूहन नाम का दोष नहीं होता। अस्थितिकरण दोष भी ज्ञानी में नहीं होता। धर्म में लगे हुए को हुए को ढकेलना, असहयोग करना, निंदा आदिक करना, किसी भी प्रकार उसे धर्म से डिगाना, ऐसी कोशिश ज्ञानी जीव के नहीं होती, बल्कि डिग रहे को स्थिर करने का ही उसमें भाव रहता है। अवात्सल्य भी उसमें नहीं है। धर्मी जनों में ऐसा वात्सल्य होता है ज्ञानी का कि किसी समय कुछ अपनी कमी भी कर डाले तो उसे भी सहन कर लेता है और धर्मात्माओं के दुःख का निवारण करता है। आज का रक्षाबंधन बंधन इसी बात का तो संदेश देता है। अब से हजारों लाखों वर्ष पहले की बात है, जब 7॰॰ मुनियों के संग सहित अकंपनाचार्य पर किसी बैर के कारण बलि आदिक जो मंत्री थे उन्होंने 7 दिन का राज्य लेकर जो उपसर्ग किया वह उपसर्ग बड़ा भयानक था। 7॰॰ मुनियों को घेर लिया जोरों से या और किसी तरह से। वे तो आत्मध्यान में मग्न थे। न भी बाड़ लगाते तो भी वे कहाँ जाते? वहाँ हड्डियाँ फेंककर, ईंधन फेंककर आग लगा दी और यज्ञ का ऐसा बहाना किया कि बड़े-बड़े मंत्र पढ़े जा रहे लोगों को किमिच्छिक दान दिये जा रहे; उन्हें क्या था? 7 दिन का राज्य मिल ही चुका था, जिस चाहे को जितना चाहे दान दे सकते थे। उस समय का दृश्य बड़ा भयानक था। देखिये एक मुनि पर उपद्रव आये तो श्रावकजन कितना संकट में पड़ जाते हैं। 7॰॰ मुनियों पर उपद्रव ढाया जाते हुए देख रहे थे श्रावकजन पर वे उस समय क्या कर सकते थे? जब राजा ही बेईमान बन जाता है तो फिर किसका वश चलता है? उस समय की यह घटना हैं। एक जगह एक साधु महाराज के रात्रि को उसी दिन मुख से हाय निकली, वहाँ कोई एक क्षुल्लक जी थे। उन्होंने साधु महाराज से उनके मुख से हाय निकलने का कारण पूछा तो उन्हें सब बताना पड़ा। वहाँ क्षुल्लक जी ने पूछा कि आखिर यह संकट कैसे दूर होगा? तो बताया कि विष्णुकुमार मुनि के पास जाओ, उन्हें विक्रियाऋद्धि सिद्ध है। उनसे निवेदन करो, वे सब कुछ अपने आप समझ लेंगे और कोई उपाय करके वह उपसर्ग दूर कर सकेंगे। क्षुल्लक जी गए विष्णुकुमार मुनि के पास, उनसे निवेदन किया, सारी घटना बताया। देखिये अभी तक विष्णुकुमार मुनि को इसका भी पता न था कि मुझे विक्रिया ऋद्धि सिद्ध हैं। जो बिना इच्छा के ज्ञानस्वरूप अपने आप में मग्न होने के लिए तपश्चरण करते हैं उनको ऋद्धियाँ सहज ही प्राप्त होती हैं। जब जाना विष्णुकुमार मुनि ने मुझे विक्रियाऋद्धि सिद्ध है तो उनके मन में आया कि परीक्षा करके देखें तो सही कि मुझे विक्रियाऋद्धि सिद्ध भी है या नहीं, सो अपना एक हाथ फैलाकर देखा। उनका वह हाथ समुद्र पर्यंत फैल गया तब निश्चय हो गया कि मुझे सचमुच विक्रियाऋद्धि सिद्ध है। बस क्या था, उन्होंने झट ब्राह्मण का रूप बनाया, साथ ही 52 अंगुल का छोटा गात (शरीर) बनाया और पहुंचे उस बलि द्वारा किये जा रहे यज्ञ में। वहाँ देखा कि बड़े-बड़े मंत्रोच्चारण किये जा रहे थे। स्वयं भी बड़े-बड़े मंत्रोच्चारण करने लगे। उन्हें देख कर राजा बलि बहुत प्रसन्न हुआ और कहा तुम जो चाहो सो मांग लो। तो उन्होंने कहा मुझे बस तीन कदम भूमि दे दीजिए। तो राजा बलि ने बहुत-बहुत कहा, अरे तेरा छोटा शरीर वैसे ही हैं, तेरे कदमों में तीन कदम भूमि कितनी होगी, तू तो और कुछ माँग। तो कहा―राजन् मुझे इतनी ही जमीन चाहिए, आप संकल्प करें, मैं तीन कदम भूमि में ही संतुष्ट हूँ। तो झट राजा बलि ने संकल्प किया―तीन कदम भूमि ले लीजिए। तो उन विष्णुकुमार  ने विक्रिया से अपना ऐसा विशालरूप बनाया कि एक कदम में तो पूरा जंबूद्वीप घेर लिया और एक पैर ऐसा घुमाया कि सारे मानुषोत्तर पर्वत को घेर लिया। अब तीसरा कदम धरने को जगह ही नहीं शेष बची। वहाँ वह दृश्य देखकर राजा बलि दंग रह गया। जब तीसरा कदम रखने के लिए भूमि देने को कहा तो राजा बलि ने क्षमा मांगना शुरू किया और यही कहा कि मेरे पास अब भूमि देने को कहाँ हैं। कहाँ से दूँ? अब मेरी पीठ पर पैर रखकर संकल्प पूर्ण कर लीजिए। उस समय का बड़ा भयानक दृश्य था। वहाँ देवता लोग आये पुष्पवर्षा किया, राजा बलि ने माफी मांगी और बलि कृत उपसर्ग दूर किया। उपसर्ग दूर तो हो गया मगर जो धुवां कंठ में रुँध गया था, उससे सारे मुनियों को आहार लेने में भी बड़ी कठिनाई थी। अब ऐसी स्थिति में मुनिजनों को आहार किस ढंग का दिया जाय, यह प्रश्न श्रावकजनों के सामने का था। उन्होंने शायद चावल की खीर और ये सिवइयाँ देना उचित समझा होगा। आप सब लोग जो रक्षाबंधन के दिन खीर और सिवइयाँ बनाकर खाते हैं शायद इसका रिवाज तभी से चला आ रहा है। यहाँ चल रही है वात्सल्य अंग की बात। यहाँ विष्णु कुमार मुनि का 7॰॰ मुनि राजों के प्रति वात्सल्य की तीव्रभावना का दिग्दर्शन कराया है। उस समय विष्णुकुमार मुनि ने यह नहीं सोचा कि मैं मुनि होकर क्यों अपने आत्मध्यान को भंग करूँ, क्यों अपनी शांति में बाधा दूँ, बल्कि उन्होंने मुनिराजों के प्रति इतना तीव्र वात्सल्यभाव बनाया कि अपने मुनिव्रत को छोड़कर अपने ऋद्धिबल का प्रयोग करके मुनिजनों का उपसर्ग दूर करना उचित समझा। 7॰॰ मुनियों का उपसर्ग दूर किया तत्पश्चात् प्रायश्चित लेकर पुनः दीक्षोचित कार्य किया। आज भी इस रक्षाबंधन के दिन कुछ ब्राह्मण लोग राखी बाँधते समय इस प्रकार का मंत्र पढ़ते हैं ‘जेन राजा वली वद्धो’ इसमें जेन शब्द अशुद्ध है, जेन नहीं वह येन हैं जेन शब्द किसी विभक्ति वाला न मिलेगा। इसका अर्थ है येन राजा वलिः बद्धः। जिसने बलि राजा को बाँधा, उस विष्णुकुमार मुनि को हमारा नमस्कार हो। अपने में सामर्थ्य है और अपना कोई साधर्मी भाई अत्यंत कष्ट में पड़ा हो, उसके प्रति दया के भाव न उमड़ें तो यह तो वात्सल्य के विरुद्ध बात है। यहाँ का सारा समागम असार है। यह तो केवल गुजारे की चीज है। कर्तव्य तो आत्मध्यान, आत्मज्ञान, आत्मरमण हैं, सम्यग्दृष्टि जीव के अवात्सल्य नहीं रहता। ईर्ष्या, विरोध, दूसरे को गिराना, कोई प्रेम न रहना यह तो बहुत तुच्छ बात हैं। ज्ञानी जीव के हृदय में इन तुच्छ कामों का कोई स्थान नहीं। सम्यग्दृष्टि जीव की ऐसी प्रवृत्ति होगी कि जिसमें अप्रभावना का स्थान नहीं है। सहज ही एक ऐसा आचरण होता है। बात क्या हुई कि ज्ञानी पुरुष ने अपने आप में ऐसे सहज स्वरूप का अनुभव किया कि जिससे उसने अलौकिक आनंद पाया। अब उस की धुन इस ही स्वरूपानुभव की रहती हैं। दूसरी कोई धुन हैं ही नहीं। तो अप्रभावना की बात ज्ञानी पुरुषों को कैसे बने? ऐसे शंका आदिक 8 दोषों से रहित सम्यग्दृष्टि जीव होता है।
   सम्यग्दृष्टि जीव के द्यूत क्रीडा, मांसभक्षण व मदिरापान का परिहार―सम्यग्दृष्टि जीव के सातों प्रकार के व्यसन संभव ही नहीं हैं। इन सातों प्रकार के व्यसनों के संबंध में प्रायः सभी लोग जानते हैं। (1) पहला व्यसन है जुवा खेलना―इसको तो लोग व्यसनराज कहते हैं। जुवा एक ऐसी प्रारंभ वाली बात है कि जिस चाहे व्यसन का इस जुवा से प्रारंभ होता है। यद्यपि बाहर से इस जुवा खेलने में कोई हिंसा नहीं दिखती, ग्लानि नहीं दिखती, कोई अपवित्र बात नहीं दिखती, मगर जुवा ऐसे सभी व्यसनों का मूल हैं कि यह लगने को तो लग गया सरलता से, मगर जब इस व्यसन की जवानी होती है तो इससे सारे व्यसन उसके साथ लग जाते हैं। इस कारण जुवा व्यसन को व्यसन राज कहा है। हार जीत की दृष्टि रखकर, धन पैसे का दाँव लगाकर जो कुछ खेला जाता है तास हो, चौपड़ हो, चौसर हो, सट्टा हो, कहीं बादल बरसने का सट्टा, कहीं चाँदी सोने का सट्टा, ये सब जुवा कहलाते हैं जो इनमें लग गया उसको एक रात दिन भी चैन नहीं पड़ती, शांति नहीं मिलती, उसे नींद नहीं आती, और जब यह व्यसन अपनी जवानी पर आता है तो इसमें बहुत आशक्ति हो जाती। उसका तो फिर जीवन खतम हो जाता है काहे का जीवन? जहाँ सदाचार का नाम नहीं, धर्म का प्रवेश नहीं, वह जीवन भी क्या जीवन है। सम्यग्दृष्टि जीव के जुवाव्यसन का आना संभव ही नहीं हैं। मांस खाना, आदि यह सम्यग्दृष्टि जीव के कहाँ संभव हैं? सब जीवों का जो हित समझ रहा, चिदानंदस्वरूप सबमें एक समान तक रहा है, वह अपने ही समान दूसरों को जान रहा है, वह कहाँ इन खोटे व्यसनों को कर सकेगा? मद्यपान भी एक व्यसन है। शराब पीना, इसमें आत्मा बेसुध हो जाती है इसमें जीवहिंसा भी है। दूसरों को इससे बड़ा कष्ट पहुँचता है, क्योंकि मद्य पीने वाला नशे में पागल सा हो जाता है वह और मदिरा पीले वाले में ऊपर से देखने में तो ऐसा बल दिखेगा कि यह हमको पटक देगा, मार देगा, पर मद्यपायियों में बल नहीं होता। यह बात तो हमने एक घटना से समझी। जब गुरुजी (श्री गणेश प्रसाद जी वर्णी) मेरठ आये थे तो एक बार हम और वह (दोनों) एक साथ शौच के लिए जंगल गए। हम दोनों के हाथ में अपना-अपना कमंडल था। वहाँ गुरुजी अपना कमंडल रखकर शौच के लिए हमसे कुछ पहले ही बैठ गए। इतने में वहाँ एक शराबी पुरुष आया और गुरुजी का कमंडल लेकर चल दिया। यह दृश्य देखकर हमसे न रहा गया। हमारे मन में आया कि चाहे कुछ भी हो, पर हमको यह कमंडल इससे लेना है। सो हम पहुंचे उसके पास और एक ही झटके में उससे कमंडल छीन लिया। वहाँ हमने यह अनुमान लगाया कि शराबियों में, मद्यपायियों में कुछ भी बल नहीं रहता। इन मद्यपायियों की बड़ी बुरी हालत होती है।
   सम्यग्दृष्टि के चोरी, झूठ, परस्त्रीगमन व वेश्यागमन व्यसन का परिहार―चौथा व्यसन है चोरी करना―किसी की चीज चुरा लेना चोरी है। लोग तो इस धन को 11वाँ प्राण कहते हैं। भले ही उन्हें यह न मालूम हों कि शेष 1॰ प्राण कौन से हुआ करते हैं, पर धन को 11वाँ प्राण कहते हुए आप जिस चाहे के मुख से सुन सकते हैं। अब वे 1॰ प्राण कौन से होते हैं उसको तो जो समझदार लोग हैं वे ही जानते हैं, लेकिन नासमझ लोग भी इस धन को 11वाँ प्राण बोलते हैं। तो ऐसे धन को जो कि 11वाँ प्राण माना गया है उसे अगर कोई चुरा ले, हर ले तो यह तो एक बड़ी हिंसा का काम हुआ। जिसने चोरी करने की अपनी आदत बना ली उसको बाकी आचारों के प्रति क्या प्रेम रहेगा? वह तो सब तरह से भ्रष्ट हो जायेगा? (5) झूठ बोलने की बात ज्ञानी जीव में नहीं होती। उसे कुछ प्रयोजन होता नहीं। और, कदाचित कोई लौकिक बात भी आगे आये तो उसका प्रयोजन है जीवरक्षा का। वह क्यों दूसरों को दुःख देने वाली वाणी बोलेगा? झूठ बोलने का व्यसन भी ज्ञानी जीव में नहीं होता। (4-5) परस्त्रीगमन और वेश्यागमन का पाप भी बड़ा भयंकर है। इन व्यसनों में आये हुए पुरुष का कभी भी दिमाग शुद्ध नहीं रह सकता, बुद्धि शुद्ध नहीं रह सकती। सदा शंकित रहता, सदा चिंतित रहता। बड़े अपवित्र भाव में आ गया वह। इस संबंध में गुरु जी एक घटना सुनाया करते थे कि सागर में कोई एक सिपाही था। उसे किसी वेश्या से प्रेम हो गया था। उस वेश्या के पीछे वह पागल बना फिरता था। यहाँ तक कि उसके पीछे वह ड्यूटी में कमी होने से नौकरी से भी बरखास्त कर दिया गया। अब वह कुछ वृद्ध सा भी हो गया था, उसके पास धन न रहने से उस वेश्या ने भी उसे ठुकरा दिया था। वह सिपाही उस वेश्या के घर भी अब नहीं जा सकता था, सो वह क्या करता कि उस वेश्या के घर के सामने किसी पेड़ के नीचे वह पड़ा रहा करता था और उसके मकान की छत की ओर देखा करता था। जब बहुत दिन ऐसा करते हुए हो गया तो किसी ने पूछा―भाई तुम यहाँ इस तरह से पड़े रहकर इस छत की ओर क्यों देखा करते हो? तो उस सिपाही ने बताया कि हम इसलिए यहाँ पड़े हुए छत की ओर देखा करते कि जिस वेश्या पर हमारा भारी प्रेम था उस वेश्या ने हमें ठुकरा दिया, अपने घर पर नहीं आने देती, पर हमको उस पर इतना बड़ा प्रेम है कि हमारे मन में सदा यह बना रहा करता कि कब वह वेश्या अपनी छत में घूमने के लिए निकले और हमें दिख जाय। उसे देख देखकर ही हम अपना मन संतुष्ट कर लिया करेंगे। ले देखिये वेश्यागमन करने वालों की ऐसी दुर्गति हुआ करती है। ऐसी-ऐसी खोंटी बातें ज्ञानी सम्यग्दृष्टि जनों में संभव नहीं। वे तो इन सप्त प्रकार के व्यसनों से रहित होते हैं। इस प्रकार इस ज्ञानी सम्यग्दृष्टि जीव की और भी विशेषतायें और कहेंगे। सम्यग्दृष्टि जीव के 44 दोष नहीं होते हैं, इस प्रकरण में अंतिम बात कही जा रही है कि ग्रहण किए हुए व्रतों में अतिचार भी नहीं हुआ करता है। 5-5 अतिचार हैं प्रत्येक व्रत के। जैसे―(1) अहिंसाव्रत (2) सत्यव्रत (3) अचौर्यव्रत (4) ब्रह्मचर्य व्रत (5) परिग्रहत्याग व्रत अथवा इनके परमाणु रूप अणुव्रत। उन व्रतों में कुछ थोड़ा उल्लंघन होना, अधिक उल्लंघन होना, ऐसे दोष हुआ करते हैं वे अतिचार दोष सम्यग्दृष्टि के नहीं होते। हो भी जाते हैं तो उनको प्रायश्चित से शुद्ध कर देते हैं। सदा अतिचार लगते रहें, होते रहें, ऐसा सम्यग्दृष्टि में नहीं होता। कभी कोई परिस्थितिवश हो तो प्रायश्चित से शुद्ध कर देते हैं। ऐसे 44 दोष सम्यग्दृष्टि के नहीं होते, यह बात बताकर अब ज्ञानी मुनियों की पात्रता के संबंध में कहते हैं।


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