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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 23

From जैनकोष



‘सीदुण्ह-वाउपिउलं सिलेसिमं तह परीसहव्वाहिं।

कायकिले सुववासं जाणिज्जे दिण्णए दाणं।।23।।

   पात्रदान में देय आहार का विवेक―गृहस्थ पात्र को दान देता है तो वह कैसे-कैसे देता है, इसका वर्णन इस गाथा में है, वह पात्र के शीत, उष्ण, वात, पित्त आदि को समझकर देता है। यदि शीतकाल है तो उसमें उस ऋतु के अनुरूप आहार देना चाहिए। गर्मी का समय है। तो उस ऋतु के अनुकूल पात्र को आहार दान करना चाहिए याने शीत ऋतु में जो कुछ चीज गर्म  हो या ठंडी न करे ऐसा भोजन श्रावक देता है। ग्रीष्म ऋतु में गर्मी न बढ़ाये, उसकी साधना ठीक रखे ऐसा आहार देता है। तो जो शीत और उष्ण काल के अनुसार जानता है कि किस प्रकार भोजन दिया जाता है वह है पात्रदान का अधिकारी। अथवा महाराज की शीत उष्ण की जानकारी रखे, इनकी प्रकृति ठंडी-ठंडी रहती है, ठंडी की इनको कुछ शिकायत है, या शीत यह बरदास्त नहीं कर पाते, ऐसा ध्यान में रखकर आहार देता है, गृहस्थ। उत्तम आहार जिस में गर्मी की प्रकृति हो और गर्मी के दिनों में ऐसा आहार जो उसे प्यास न उत्पन्न करे कि जिससे वह अपने पद से च्युत हो। तो शीत और उष्ण की समझ रखकर श्रावक आहार दान देता है। वात पित्त की खबर रखे। वात रोग एक वायु है जैसे गैस उठती या जब वायु नहीं सरती तो पेट में ही वायुबेला सा होना यह सब शरीर में वात है। किसी मुनि के वात प्रधान प्रकृति हो और उसे वात करने वाली चीज खिलायी जाये तो यह योग्यदान नहीं होता। ऐसे ही पित्त का रोग। किसी को पित्त उछला है, पित्त उछलते रहते हैं पर यदि पित्त वाले को पित्त ही बढ़ाने वाला आहार दिया जाय तो वह अयोग्य आहार है। आहार देने का प्रयोजन है सुगमता से निर्वाध रूप से यह पात्र अपने कल्याण मार्ग में लगे, आत्मध्यान में लगे और आहार ही ऐसा करा दिया कि जिससे अनेक व्याधियाँ बढ़ जाती है, तो ऐसे श्रावक ने कोई विवेक का काम नहीं किया, इसी प्रकार किसी में कफ की प्रकृति है तो जैसे कफ का रोग उसे संक्लिष्ट न करे उस प्रकार से आहार दे, इसी तरह परीषह व्याधि को समझकर श्रावक आहार देता है। जैसे रक्षाबंधन के दिन मुनिजन कुछ अग्नि से जले, कुछ धुवां से कंठरुद्ध, ऐसी स्थिति में आहार को आये थे तो वहाँ जैसे उनके गले से सुगमता से उतर जाय उस प्रकार का आहार दान श्रावकों ने दिया था, यदि उससे विरुद्ध आहार साधु को करा दिया जाय तो वह योग्य आहारदान नहीं कहलाया। इसी तरह व्याधि को निरखकर आहार देते, जुखाम है, बुखार है, अनेक व्याधियाँ हुआ करती हैं, तो जैसी व्याधि हो उस प्रकार का आहार देवे। यदि प्रतिकूल आहार हो गया तो वह योग्य आहारदान नहीं रहा। तो जो ज्ञानी गृहस्थ है वह मुनिराज की व्याधि को समझकर दान देता है और वही सही दान है। इसी तरह कायक्लेश हुआ हो या साधुजनों ने उपवास किया हो तो उपवास के बाद जैसा भोजन दिया जाना चाहिये वैसा भोजन सद्गृहस्थ देता है, तो ऐसी इस बात को समझकर श्रावक सुपात्रदान करता है।


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