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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 27

From जैनकोष



जसकित्ति पुण्णलाहे देह सुबहुगंपि जत्थतत्थेव।

सम्माइ सुगुण भायण पत्तविसेसं ण जाणंति।।27।।

   यशकीर्ति व पुण्य के लाभ के लिये दान दातार की तथ्य के विषय में अजानकारी―कितने ही पुरुष अथवा लोभी पुरुष अपने यश कीर्ति के लिए या पुण्य लाभ के लिए जहाँ तहाँ अनेक प्रकार के दान भी देते हैं और वे जानते हैं सम्यक्त्वादिक गुणों को जिन के द्वारा सम्यक्त्व का धारी भव्य पुरुष लाभ उठाता है, याने जो पुरुष अपना यश चाहने के लिए, कीर्ति चाहने के लिए दान करते हैं तो वे जिस किसी की भी सेवा करते हैं। जिसकी तू-तू बज रही हो, जिसकी लोक में अपने आप ख्याति बन जाय उनकी भक्ति में आगे बढ़ जाता है। सो वह यह नहीं देखता कि यहाँ सम्यक्त्वादिक गुण हैं या नहीं उन गुणों से युक्त उत्तम पात्र की बात वहाँ है ही नहीं, क्योंकि खुद ही जब बुरा है कि एक नाम या और कुछ इच्छा से वह सेवा कर रहा है, मोक्ष मार्ग की प्रीति से सेवा करे तो उसका उत्तम फल होता है। उस गृहस्थ को भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र के प्रति उमंग जगे, उसका रुचिया है तो वह सम्यग्दर्शन धारी ज्ञान चारित्र धारी संत महात्माओं की सेवा करने में प्रसन्न रहता है, ज्ञानी अज्ञानियों की सेवा में प्रसन्न नहीं रहता, और अज्ञानीजन जिस किसी की भी सेवा करने को तैयार रहते हैं, तो लोभी पुरुष कीर्ति और पुण्य की चाह से वे जिस किसी को भी, याने पात्र है या नहीं, ऐसा विचार किए बिना ही विविधदान देते हैं सो इन गुणों को वे नहीं जानते। मोक्ष मार्ग क्या है इसको ही नहीं पहिचाना। उनका तो एक यह ही मंतव्य है, आशय है कि पूजा में हमारा बड़प्पन और हमारी उच्चता प्रसिद्ध हो जाय।
   शुद्धभाव से दिये गये पात्रदान का फल―एक कथानक है कि एक बार किसी श्रावक की जंगल में किसी मुनिराज से भेंट हुई। वह मुनिराज ज्ञानी थे। उनको बड़े भक्ति भाव से आहारदान दिया उस श्रावक ने तो आहार होने के बाद उस श्रावक के घर खूब रत्नों की वर्षा हुई। इस दृश्य को देख लिया उसके किसी पड़ोसी ने। वह बड़े आश्चर्य में पड़ गया और समझ लिया कि इस तरह से मुनि को आहार दान देने से रत्नों की वर्षा होती है। उसके भी मन में आया कि हम भी इसकी तरह मुनि को आहारदान दें ताकि हमारे घर भी रत्नों की वर्षा हो। आखिर दिया मुनि को आहार दान पर बाद में क्या देखता है कि वहाँ तो एक भी रत्न नहीं बरसे। तो भाई शुद्ध भावों से दिए आहार दान से उस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है न कि लोभवश करने से। यह आत्मा अपने में शुद्धभाव बनाये तो उससे पुण्यकर्म का बंध होता है और अशुद्धभाव बनाये तो उससे पापकर्म का बंध होता है। यहाँ क्रिया बाहरी दान की चल रही है, सेवा की चल रही है मगर हो रहा है वहाँ पाप का ही बंध होता है। इसके लिए एक दृष्टांत दिया है।
   लोभवश क्रिया से सिद्धि की असंभवत―सो सुनिये किसी लकड़हारे को कोई मुनिराज मिले। तो लकड़हारा बोला―महाराज मेरे कल्याण के लिए मुझे कोई बात बताओ। तो मुनिराज ने उसे णमोकार मंत्र सिखाया और कहा कि देखो तुम इसी का पाठ कर लिया करो। उस लकड़हारे ने बड़ी श्रद्धाभक्ति से यह पाठ करना शुरु कर दिया। वह हर बात में बस णमोअरिहंताणं की धुन में लग गया। कोई उससे कुछ पूछे―तो बस वह यही कहे णमोअरिहंताणं वह दो तीन दिन लकड़ियाँ बीनने तथा बेचने भी नहीं गया। स्त्री ने खाने के लिए खीर बनाया और खाने के लिए लड़के से बुलवाया तो वहाँ भी वह बोला―णमोअरिहंताणं, स्त्री ने खीर परोसा और कहा खावो तो उसने कहा―णमोअरिहंताणं। फिर स्त्री बोली सभी अरे खालो ना? तो फिर वही बात णमोअरिहंताणं। स्त्री ने कहा―ऐसे कब तक काम चलेगा? णमोअरिहंताणं।....बच्चों का गुजारा इस तरह से कैसे चलेगा? णमोअरिहंताणं। वहाँ स्त्री को गुस्सा आया और लकड़हारे के सिर पर लूगर (अधजली लकड़ी) जोर से मारा। वहाँ क्या देखने में आया कि उस लूगर में से रत्न खिरे। यह भी उस लकड़हारे के भावों की विशेषता। आखिर वह लकड़हारा धनिक हो गया। लकड़हारे को बड़ी जल्दी धनिक होते देखकर उसके पड़ोस की किसी सेठानी ने लकड़हारे की स्त्री से पूछा―कहो तुम इतना जल्दी धनिक कैसे बन गई? तो वहाँ लकड़हारे की स्त्री ने सारी घटना आदि से अंत तक बता दी। अब उस सेठानी ने विचार किया कि यह तो धनिक बनने का बड़ा सरल उपाय है, मैं भी ऐसा ही उपाय करके धनिक बनूँगी। सो सेठ से वह सेठानी बोली कि हमने धनिक होने का एक उपाय समझ लिया है, हमारे कहने से तुम एक काम करना फिर हम सब काम बना लेंगी। तो सेठ ने कहा―क्या काम करें बताओ? तो सेठानी बोली―देखो तुम दो तीन दिन कहीं कुछ कामकाज करने नहीं जाना, खानापीना भी न खाना, तुमसे कोई कुछ कहे तो णमो अरिहंताणं बोलना, बस काम बना लेंगी। ठीक है कर लेंगे ऐसा। अब सेठ उसी दिन से कहीं कामकाज करने नहीं गया, न खाने पीने गया, कोई कुछ कहे―बस णमो अरिहंताणं, सेठानी ने खीर बनाया, अपने बच्चे से सेठ को खाने के लिए बुलवाया, तो सेठ बोला णमो अरिहंताणं। आखिर जबरदस्ती लाकर खाने के लिए बैठाया और खीर परोसकर कहा खा लो, तो सेठ बोला―णमो अरिहंताणं।....ऐसे कैसे काम चलेगा?.....णमो अरिहंताणं इस तरह से बच्चों का पालन पोषण कैसे होगा? णमो अरिहंताणं बस सेठानी ने लूगर (अधजली लकड़ी) सेठ के सिर पर मारा तो वहाँ उसमें से सारा कोयला बिखर गया। सेठानी बड़े गौर से देखकर पछताती है अरे यहाँ तो सारा कोयला ही बिखरा, रत्नों का नाम नहीं। अब देखिये अच्छे भावों से न किए जाने के कारण क्रियायें तो सारी वही की गई पर वहाँ लाभ कुछ न मिला, बल्कि सारी हानि ही हानि हुई, तो जितनी भी सुख शांति मिलती है वह उसके ही शुद्धभाव से मिलती है। दूसरा कोई किसी को सुख नहीं देता।


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