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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 36

From जैनकोष



सम्मविसोहीतवगुणचारिंत सण्णाणदाणपरिहीरां।

भरहे दुस्समयाले मणुयाणं जायदे णियदं।।36।।

   दुःषम काल की लीला―यह है दुस्समकाल, जिसे कहते हैं पंचमकाल। दुस्सम काल में दुःख की ही भरमार होती है, और धर्म की ओर से श्रद्धा कम होती चली जाती है। भले ही आज से कोई 1॰॰- वर्ष पूर्व इतना ज्ञानवान न थे, कोई सूत्र जी वाँच ले तो उसे ही पंडित जी, अथवा भगत जी कहा करते थे, कोई विधान वाँच ले तो वह वहाँ का माना हुआ पंडित कहलाता था। ऐसे-ऐसे भी समय गुजर गए, मगर उस समय की जो श्रद्धा थी उससे तुलना की जाय तो आज ज्ञान में लंबी चौड़ी बाल में खाल निकालने वाली बातें भी करते हैं, मगर भीतर से श्रद्धा कम है अथवा किसी के श्रद्धा नहीं भी है, श्रद्धा में हीनता होती चली जाती, चारित्र में हीनता होती चली जाती, यह पंचमकाल का एक ऐसा प्रभाव ही है। इस पंचमकाल के संबंध में एक ऐसा ही छोटा सा कथानक है कि जिस दिन कलिकाल शुरू हुआ था उससे दो दिन पहले एक पुरुष ने किसी को अपना टूटा फूटा मकान बेच दिया और लेने वाले ने तुरंत ही उसमें नींव भरने के लिए उसकी खुदायी करवाना शुरु कर दिया। खुदायी गहरी करवायी गई, भाग्य से उसमें मिला असर्फियों से भरा हंडा। अब तो वह खरीदने वाला बड़ी विचारधारा में पड़ गया, क्या करूँ अब इसका? समझ में आया कि यह मेरा नहीं है। मैंने तो सिर्फ जमीन खरीदा है तो वह तुरंत उसे बेचने वाले के पास ले गया और कहा कि यह लीजिए अपना असर्फियों से भरा हंडा, यह उस जमीन के अंदर निकला है, यह मेरा नहीं है। तो बेचने वाला बोला, मैं इसे क्यों लूँ? यह मेरा नहीं, मैंने तो जितनी जमीन बेचा उसकी पूरी रकम पा ली। आखिर दोनों में यह कलह बढ़ी कि तुम्हारा है, हमारा नहीं, तुम्हें लेना पड़ेगा। दोनों एक दूसरे से सही बात कहें पर कोई लेने को तैयार न हो। उनका वह फैसला राजा के पास पहुँचा तो राजा ने भी बहुत-बहुत समझाया, पर दोनों ने लेना स्वीकार न किया। अंत में राजा हताश होकर बोला अच्छा आज तो अब देर हो चुकी, इसका फैसला कल कि दिन करेंगे। अब कल और आज के बीच में वह रात्रि थी जिसमें कलिकाल शुरू होना था। मानो 12 बजे रात्रि तक रहा अच्छा युग (सतयुग) और उस के बाद लगना था कलयुग। तो रात्रि के 12 बजे के बाद वह बेचने वाला सोचता है कि देखो मैं कितना मूर्ख निकला। अरे वह धन देने ही तो आया था, मैंने व्यर्थ ही लेने से मना कर दिया। अब सवेरा होगा और वह लेने को कहेगा ही तो मैं कह दूँगा कि अच्छा नहीं मानते हो तो दे दो, उधर खरीदने वाले के मन में क्या भाव आया कि मैं कितना मूर्ख निकला, व्यर्थ ही उसे धन देने गया, उसका इस धन पर क्या अधिकार, इसे तो मैं अब सवेरा होने पर कह दूँगा कि ठीक है, यह धन मेरे ही पास रहने दो, मैं रख लूँगा। उधर राजा के मन में यह भाव आया कि देखो मैं कितना मूर्ख निकला, उन दोनों को धन लेने के लिए बहुत-बहुत मना रहा था, अरे वह धन तो जमीन के अंदर का है, उस पर उन दोनों का क्या अधिकार? सवेरा होते ही मैं वह निर्णय दे दूँगा कि वह सारा धन राजा का है। तो उस कथानक में यह बात दर्शाती गई है कि कलियुग के प्रारंभ में ही लोगों के अंदर इस प्रकार के खोंटे भाव जग गए।
   दुःषम काल में भी धर्म पालन की विशेषता―अब चल रहा है यह दुस्समकाल। इस भरत क्षेत्र में इससे पहले चतुर्थ काल था, अब यह पंचमकाल चल रहा है। आयु हीनता ही ओर, शरीर हीनता की ओर, बुद्धि हीनता की ओर, धर्म भाव भी हीनता की ओर। उससे पहले लोगों के भाव बड़े उग्र होते थे। कुछ बच्चे हो जाने तथा सम्हल जाने के बाद वे सर्व कुछ त्यागकर दीक्षा ले लेते थे। मानो आजकल का समय इस प्रकार का नहीं है तो इतना तो किया जा सकता है कि अपने बच्चों पर ही सब जिम्मेदारी देकर और यदि कुछ समर्थ हैं तो अपने लिए कुछ आजीविका का साधन रखकर निशंक होकर धर्म साधना करें, सत्संग में रहें, अपने निवास स्थान को छोड़ कर रहें, अपने निवास स्थान में निरंतर बने रहने से भी भीतरी भावों में प्रगति नहीं हो पाती। यदि सदा के लिए गृहत्याग नहीं बन सकता तो साल में कम से कम एक दो माह तो निश्चित होकर धर्म साधना करें। अपने ऊपर जिम्मेदारी का बोझ न लादे फिरें। इतना तो किया ही जा सकता है, पर ऐसा भी कहाँ बन पा रहा है? यह तो दुस्सम काल है।
   पंचम काल में सम्यक्त्व विशुद्धि आदि की उत्तरोत्तर हीनता―भरतक्षेत्र में इस दुस्सम काल  में मनुष्यों के सम्यग्दर्शन विशुद्धि तप, मूलगुण, चारित्र, सम्यग्ज्ञान, दान, इन सभी बातों की हीनता होती चली जा ही है। दर्शन विशुद्धि उसे कहते हैं कि तत्त्व का यथार्थ श्रद्धान होना जो बात जैसी हो उसका उसी तरह परिचय करें। शरीर निराला है, जीव निराला है, मरण होने पर तो लोग स्पष्ट जान लेते हैं कि शरीर निराला और जीव निराला। और―जो कुछ समझदार लोग हैं व लक्षणों से पहचानते हैं कि शरीर का लक्षण तो रूप, रस, गंध, स्पर्श होना है और मुझ जीव का लक्षण ज्ञान, दर्शन, आनंद होना है। तो मैं जीव हूँ यह देह अजीव है, इससे मैं निराला हूँ, ऐसा समझकर और बाहरी सब पदार्थों को अहितकारी जान कर उनसे उपेक्षा करें और अपने आप के स्वरूप भी आराधना में रहें, यह है कहलाती विशुद्धि। तपश्चरण मूल गुण, साधु के मूल गुण, श्रावक के मूल गुण, उनमें भी हीनता हो रही हैं। श्रावक के मूलगुण, श्रावक के मूल गुण, उनमें भी हीनता हो रही है। श्रावक के मूल गुणों में छोटा से छोटा व्रत है मद्य, मांस, मधु का त्याग, बड़ पीपर आदि कठूमरों का त्याग, यह तो जन्मजात बात थी, किंतु यह ही एक मुश्किल पड़ रहा है। तो मूल गुणों की हीनता, चारित्र की हीनता, ज्ञान और दान की हीनता ये सब बातें इस दुस्सम काल में हो रही हैं। श्रावकों का यह ग्रंथ है, इसमें आचार्य देव ने बताया कि श्रावकों का मुख्य कर्त्तव्य पूजा और दान है, उसे करें और उसका समर्थन करें और उसमें अंतराय न करे।


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