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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 37

From जैनकोष



णहि दाणं णहि पूजा नाहि सीलं णहि गुणं ण चारिंतं।

जे जइणा मणिया ते णेरइया कुमाणुसा होंति।।37।।

   दान पूजाविहीन पुरुषों की दुर्गति―जिन मनुष्यों का इस जीवन में कोई दान नहीं है वे मनुष्य नारकी और खोंटे मनुष्य होते हैं। दान मात्र देने का ही नाम नहीं है किंतु जिससे धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति चले, लोगों को मोक्षमार्ग का रास्ता दिखे ऐसी विधियों में अपने और पर के उपकार के अर्थ द्रव्य का त्याग करना दान कहलाता है, यह कहलाता है पात्रदान, धर्मार्थदान और जो दीन दुखियों को देखकर करुणवश उन्हें आहारदान दिया जाय यह कहलाता है दयादान। यद्यपि दोनों ही दानों से पुण्य का बंध है फिर भी दया दान और भक्तिदान, इन दोनों में इतना अंतर है कि भक्तिदान से तो मोक्षमार्ग की परंपरा बनती है और दया दान से सांसारिक सुख प्राप्त होने की बात बनती है। तो दान का कर्तव्य गृहस्थों का प्रतिदिन का बताया गया है, जिसकी प्रवृत्ति दान की नहीं है या इसका कोई महत्त्व जानता नहीं है ऐसा पात्र दान की नहीं है या इसका कोई महत्त्व जानता नहीं है ऐसा पात्र दान शून्य जीवन बिताने वाले पुरुष नार की और कुमानुष होते हैं। तो प्रभु पूजा―जो परमात्मा हुए हैं, जिनका आत्मा रागद्वेष मोह से सदा के लिए पृथक हो गया है, ऐसे लोकालोक के जाननहार परमात्मा का गुणस्तवन जिसके जीवन में नहीं है उसका जीवन क्या जीवन है, जैसे संसार में सलने सभी प्राणियों का जीवन है वहीं जीवन पूजा हीन पुरुषों का है। पूजा का मतलब कोई एक ही प्रकार की बात नहीं, गुणस्तवन करे, द्रव्य से पूजा करे, जाप सामाजिक अनादि में प्रभु के गुणों का चिंतन करें, जिस प्रकार से प्रभु के गुण पूजे जायें वे सब विधियाँ पूजा कहलाती हैं। तो जिनके जीवन में पूजा की विधि नहीं है उनका जीवन ऐसे संसारी कोई एक ही प्रकार की बात नहीं, गुणस्तवन करे, द्रव्य से पूजा करे, जाप सामाजिक आदि में प्रभु के गुणों का चिंतन करें, जिस प्रकार से प्रभु के गुण पूजे जायें वे सब विधियाँ पूजा कहलाती हैं। तो जिनके जीवन में पूजा की विधि नहीं है उनका जीवन ऐसे संसारी जीवों की भाँति केवल एक संसार परंपरा बढ़ाने में ही उनकी विधि बनती है। तो पूजाहीन पुरुष यथा तथा जीवन बिताकर विषय कषायों में अपना जीवन बिताकर वे नरक और कुमानुष के दुःख भोगते हैं।
   शील गुण चारित्रहीन पुरुषों की दुर्गति―शील रहित पुरुष भी दयनीय दशा को पाते हैं। शील नाम है आत्मा के सरल अविकार स्वभाव की धुन में बने रहना, पर इस शील के घातक जितने पाप हैं, उन पापों में प्रधान है कुशील नाम का पाप, इसीलिए कुशील के त्याग को शील कहने की रूढ़ि हो गई, जैसे कि ब्रह्मचर्य का अर्थ तो है ब्रह्मस्वरूप में चरण करना, रमण करना, ब्रह्मचर्य के बाधक जो पाप हैं, उन पापों में प्रधान है कुशील। इस कुशील को त्यागें ब्रह्मचर्य शब्द की रूढ़ि हुई है। शील नाम है आत्मस्वभाव का। आत्मस्वभाव की और अपनी बुद्धि का रहना और बाह्य में शील वृत्ति से रहना, ऐसा शील जिनके जीवन में नहीं है उनका जीवन भी नारक और कुमानुष के दुःखों को पाता है, इसी प्रकार गुण और चारित्र जिनके जीवन में नहीं है वे अगले जन्म में नारक और कुमानुष के कष्ट पायेंगे। गुण हुए मूल गुण, चारित्र हुआ क्या गुणों का विस्तार बढ़ता गया उत्तर गुणों में प्रति हुई और आत्मा के स्वरूप में रम जाने की ओर प्रगति हुई ऐसे गुण और चारित्र जहाँ नहीं वे जीव भी दुर्गति हो पावेंगे।
   मायामय जगत से उपेक्षा करके अनुत्तर अंतस्तत्त्व की अभिमुखता में कल्याण―वास्तविकता यह है कि जिसमें आत्मा का कल्याण है उसको अपने आत्मा का ही सहारा लेना होगा। दूसरे जीव का, दूसरे पदार्थ का सहारा लेना और उस ही को अपना सर्वस्व आधार मानना, अपनी शक्ति के माहात्म्य को भूल जाना यह एक अपराध है, और इस अपराध से जीव को शांति नहीं मिल सकती। अपने मूल को पकड़ें जिसको शांति चाहिए। शांति किसी बाहरी पदार्थ से नहीं मिलती। मकान से या किसी परिवार से या किसी यश कीर्ति से या भोजन आदि बाह्य वस्तु से इस जीव को शांति मिले सो ऐसी बात नहीं बनती। शांति तो स्वरूप ही है जीव का। जीव में कहाँ है दरिद्रता? जीव में कहाँ है आकुलता? स्वरूप को तो देखिये--इसका चैतन्यमात्र स्वभाव है, वहाँ आकुलता नहीं है। स्वरूप में कष्ट नहीं है, फिर आकुलित क्यों हो रहा है यह जीव? यह सब अज्ञान का नृत्य है। अपने आपके ही ज्ञान में जब यह जीव नहीं ठहर रहा तो अज्ञान का वहाँ नाच चल रहा है। जैसे स्कूल में किसी कक्षा में मास्टर नहीं है तो लड़के लोग प्रकृत्या ही ऊधम मचाते, हो नाता रखकर गुजारा करना होता है। मगर इतनी श्रद्धा तो होनी चाहिए। यह जगत का संबंध, यह कुटुंब का संपर्क, ये और-और प्रकार के नाते केवल इस जिंदगी के गुजारे के लिए हैं, इसमें तथ्य कुछ नहीं रखा है। तो जो पुरुष अपने आत्मा की ओर अभिमुख होते हैं, अपने माहात्म्य को प्रधान रखते हैं वे पुरुष शांति पाते हैं, ऐसे पुरुषों का व्यवहार खराब नहीं होता, उद्दंडता पूर्ण नहीं होता। जब शरीर में फंस ही गया और इस कारण ये सारी बातें करनी ही पड़ रही हैं तो वह प्रेमयुक्त वचन बोल कर उन सब बाधावों से निपटता है और अपने आप को अबाध बनाकर उस भगवान परमात्मतत्त्व की आराधना करता है।
   आत्मोपासना का उद्देश्य बना लेने पर ही मानव की सत्य प्रगति की संभवता―भैया अपने जीवन में एक लक्ष्य तो बना ही लेना चाहिए। जिस मार्ग से चलकर हमको भी इस संसार के संकटों से सदा के लिए छुटकारा पाना है, यह बात चित्त में न समाती हो तो इस जीवन से क्या लाभ मिलेगा? पूर्वकृत पुण्य के उदय से चाहे कुछ वैभव संपदा प्राप्त हो जाय किंतु उन्हें कुछ लाभ मिला नहीं, वहाँ कुछ भी आत्मलाभ नहीं है। जिसको अपना कल्याण चाहिए वह अपने आत्मा की समझ बनाये पहले, और अपने लिए अपना आत्मा ही समर्थ है, महत्त्वशाली है। जब कभी पंचपरमेष्ठी की भक्ति करते हैं। पूजा करते हैं तो कहीं यह बात नहीं हैं कि भगवान हमारा दुःख टाल देंगे, भगवान हमारी इच्छा पूर्ण कर देंगे, यह बात रंच भी नहीं है। भगवान अपने आनंद में मग्न रहें कि संसार के लटोर खचोरे जीवों का दुःख सुन रहे या उनके कुछ काम में प्रयत्न कर रहे, यह काम नहीं है। यह तो संसारी जीवों की आदत है। प्रभु तो लोकालोक के जाननहार हैं फिर भी अपने आनंद में मग्न हैं। तो पूजा करने से कहीं भगवान सुख देने नहीं आते, दुःख नहीं मिटाते, लेकिन जो प्रभु की पूजा करता है, जो भगवान के गुणों की आराधना करता है उसके परिणाम स्वयं इतने ऊँचे होते हैं कि उसे विशिष्ट पुण्य का बंध होता है और उस पुण्य विपाक होने में सांसारिक सुख सामग्री मिलती है और धर्म के अनुराग की भी बात मिलती है, इसलिए भगवान की भक्ति करना आवश्यक है पर वहाँ भी ऐसा यथार्थ श्रद्धान रखें कि मेरे कर्तव्य के अनुसार मेरा भवितव्य बनता है। तो जिन्हें शांति चाहिए उनका एक मुख्य कर्तव्य है कि वे अपने आत्मा की आराधना में रहें।
   स्वचैतन्य धाम में विश्राम की अनुत्तरता―यह सारा जगत दुःख से भरा है। जैसे सावन भादों के महीने में जब तेज बरसात हो रही हो, खूब काली घटा छा गई हो, बादल खूब तड़क रहे हों, बिजली चमक रही हो, कुछ-कुछ ओले भी पड़ने लगे हों तो ऐसे समय में वह पुरुष किसी ऐसी जगह में जाकर जहाँ कि पानी भर न आता हो चाहे वह कोई पुरानी झौंपड़ी ही हो वहाँ अपने आपको बड़ा सुखी शांत अनुभव करता है, वहाँ से वह कहीं बाहर में कुछ ढूँढना भी नहीं पसंद करता, ऐसे ही ज्ञानी पुरुष इस विपत्तिमय संसार में नाना प्रकार के कष्ट पाता हुआ यह किसी धाम की खोज में रहता है कि मुझे कोई ऐसा स्थान मिले जहाँ रहकर मैं सुखी शांत हो जाऊँ। इस ज्ञानी ने खूब ढूँढ़ा सर्वत्र, जिस चाहे में खोज की, मगर कहीं इसको शांति का आधार न मिला और मिला तो अपने आपके इस चैतन्य स्वरूप में। सो जो इस चैतन्य स्वरूप में आया है वह निर्वाध है और वह बाहर ढूंकना भी पसंद नहीं करता। तो किसको अपना मानता? यहाँ कौन सा ऐसा तत्त्व है बाहर में जो मेरा उपकार कर दे, ऐसा यथार्थ ज्ञान रखने वाला पुरुष अपने शील को प्राप्त करता है, अपने गुण और चारित्र को पाता है, किंतु जो पुरुष शील गुण पूजा दान आदि इन सब बातों से दूर है वह मरकर नारकी और कुमानुष होता है ऐसा तीर्थकर देव ने बताया है।


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