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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 4

From जैनकोष



सम्मत्तरयणसारं मोक्खमहारुक्खमूलमिदि भणियं।

तं जाणिज्जइ गिच्छयववहार सरूवदो भेदं।।4।।

   व्यवहार सम्यक्त्व के तीन प्रकार―सम्यक्त्वरत्न सार अर्थात् सम्यकरूप सार रत्न है, जो कि मोक्ष रूपी महान वृक्ष का मूल है, जैसे मूल के बिना, जड़ के बिना व नहीं ठहरता, होता ही नहीं, ऐसे ही सम्यक्त्व के बिना मोक्ष वृक्ष बनता ही नहीं। चारित्र नहीं, मोक्ष भी नहीं, उस सम्यक्त्व को निश्चय और व्यवहार के स्वरूप से भेद जाना। यहाँ व्यवहार सम्यक्त्व और निश्चय सम्यक्त्व का संकेत किया है। व्यवहार सम्यक्त्व तीन तरह की अवस्थावों के बारे में प्रयुक्त होता है, सम्यग्दर्शन के पूर्व सम्यग्दर्शन के अनुकूल होने वाली तैयारियाँ, जैसे कहा है―‘हेतु नियत को होई’, एक वह व्यवहार सम्यक्त्व, एक सम्यक्त्व के काल में ही तो सम्यग्दृष्टि की चर्या होती है अंग रूप अन्य-अन्य रूप जो सम्यक्त्व भाव बिना नहीं बनना ऐसे व्यवहार को भी व्यवहार सम्यक्त्व कहते हैं। इसे कहा जाता है निश्चय सम्यक्त्व के साथ होने वाला व्यवहार, उसे कहियेगा निश्चय सम्यक्त्व से पूर्व होने वाला व्यवहार और किसी जीव का सम्यक्त्व छूट गया, छूट भी जाता है, प्रथमो पशम सम्यक्त्व भी तो कितनी ही बार छूटता, कितनी ही बार बनता, इस विषय को कोई न समझ सके, मुनि महाराज हैं, सम्यग्दृष्टि हैं, समिति तप आदिक के पालन में रत हैं। कभी सम्यक्त्व छूट भी गया तो उनके इस क्रियाकांड में अंतर नहीं पड़ता, वह चलता ही रहता है और कुछ संस्कार और ख्याल के कारण वह वहाँ प्रवृत्ति चलती भी रहती है, सम्यक्त्व छूट गया, फिर भी जो व्यवहार बन रहा वह चूँकि सम्यग्दृष्टि यों के व्यवहार जैसा ही है वह भी कहलाता है व्यवहार सम्यक्त्व। तो व्यवहार सम्यक्त्व की तीन प्रकार की अवस्थाओं में अनुकूल व्यवहार पालन करने का उपदेश है।
   व्यवहार सम्यक्त्व के तीनों प्रकारों का संक्षिप्त निर्देशन―तत्त्वार्थ श्रद्धान कर रहा, स्वाध्याय में चल रहा, चर्चा कर रहा, बात चल रही, परिणाम अच्छा है, मंद कषाय है, आत्म हित की अभिलाषा है, ऐसी प्रवृत्ति को देखकर लोग कहते हैं सम्यक्त्व और है नहीं अभी सम्यक्त्व, पर सम्यक्त्व के कारण क्यों कहै जाते थे कि ऐसा विशुद्धभाव सम्यक्त्व घातक कर्मों के उपशम आदिक का निमित्त भूत है और सम्यक्त्व घात प्रकृतियों का उपशम आदिक होने पर सम्यक्त्व होता, तो यों निमित्त का निमित्त होने से उसे कारण कहा है। सम्यक्त्व की उत्पत्ति का निमित्त क्या है? 7 प्रकृतियों का उपशम आदिक। और उन 7 प्रकृतियों के उपशम आदिक का निमित्त क्या? उस प्रकार के विशुद्ध परिणाम। तो इन विशुद्ध परिणामों को व्यवहार सम्यक्त्व कहते हैं। यह हुई सम्यक्त्व से पहले होने वाली अवस्था। अब सम्यक्त्व होगा, पर वह सम्यग्दृष्टि पुरुष मन वचन काय की प्रवृत्ति से दूर हो गया है। भले ही सम्यक्त्व हो गया, पर अभी यह प्रवृत्ति से दूर नहीं हो पाता। मन से कौन सोचता है? सम्यग्दर्शन होते संते की बात कही जा रही है और ऐसा जीव जब बोलता है जैसा काय प्रवृत्ति करता है, जैसा उसका विचार बनता है, उनका जो रूप होता है वह व्यवहार सम्यक्त्व निश्चय के साथ-साथ वाला है, वह भी व्यवहार सम्यक्त्व है और सम्यक्त्व भी पैदा किया, था, मिट गया, पर प्रवृत्ति में अंतर नहीं पाया जा रहा बाह्य बातों में। वैसा ही आधार, वैसा ही व्यवहार, वैसी ही बात तो वह है निश्चय सम्यक्त्व के मिटने के बाद का व्यवहार मगर वह भी व्यवहार सम्यग्दर्शन है।
   व्यवहार सम्यक्त्व के सम्यक्त्व कारणत्व के कथन में प्राप्तव्य शिक्षा―तीन अवस्थाओं में विभिन्न स्वरूप व्यवहार सम्यक्त्व कहा गया है, पर अपना प्रयोजन कहाँ है, शुद्धपना कहाँ बनाना है, उपाय कहाँ बनाना है तो वह है सम्यक्त्व पूर्व भावी व्यवहार जो हेतु नियत को होई। व्यवहार सम्यक्त्व निश्चय सम्यक्त्व का कारण है, साक्षात् कारण नहीं, व्यवहार सम्यक्त्व के योग में ऐसी विशुद्धता है कि उस सान्निध्य में कर्मों का उपशम आदिक चलता और कर्मों का उपशम आदिक के सन्निधान में सम्यक्त्व की उत्पत्ति होती। हो रही इन सब की स्वयं की स्वयं में बात, पर सारी विश्व व्यवस्था यह सब निमित्त नैमित्तिक योग पर चल रही है मगर है वस्तु सब अपने आप में अपने ही उत्पाद व्यय ध्रौव्य युक्त। ऐसे वर्णन से प्रयोजन क्या निकला कि उस प्रकार का हम व्यवहार बनायें, विचार बनायें, ज्ञान बनायें, मनन बनायें, यह अपना कर्तव्य है यह उससे शिक्षा निकली।
   सम्यक्त्व के प्रयोजक अनेक भेदों में भी सहज स्वरूप के दर्शन का संदेश―और वास्तव में सम्यक्त्व तो परमार्थतः जो है सो ही है, एक है। राग सहित जीव के सम्यक्त्व को सराग सम्यक्त्व कह दिया, वीतराग जीव के सम्यक्त्व को वीतराग कह दिया। सम्यक्त्व के पूर्व हुए व्यवहार को व्यवहार सम्यक्त्व कह दिया, सम्यक्त्व के साथ होने वाली प्रवृत्ति को व्यवहार सम्यक्त्व कह दिया। सम्यक्त्व मिटने पर भी सम्यक्त्व के साथ जो संस्कार बना, जो परिणति बनी वह परिणति अब भी चल रही। व्यवहार सम्यक्त्व के कितने ही नाम लें सब किसी न किसी प्रयोजन को लिए हुए हैं और सम्यक्त्व जो है सो ही है। तो ऐसे निश्चय और अभेद स्वरूप सम्यक्त्व को जानों, बात उसमें एक ही है। सहज स्वरूप का अनुभव करो, पहिचान जावो।
   आत्महिताभिलाषी को जिनोपदिष्ट विधि से हितोपाय करने का संदेश―सहज स्वरूप को जानो, श्रद्धा करो, आचरण करो, इस क्रम से उपदेश किया है, क्योंकि यह प्रयोग की बात है। समयसार में भी इसी क्रम को लेकर बात आयी हैं कि राजा को पहले धनार्थी जानता है फिर श्रद्धा करता है, फिर आचरण करता है, याने जानने का काम तो करे कुछ उससे बनेगी श्रद्धा और श्रद्धा के साथ ज्ञान है ही सम्यग्ज्ञान, पर प्रयोग करने के लिए, शिक्षा के लिए जब बात कही जाती तो यह ही ढंग चलता है। कुछ जाने बिना श्रद्धा किसकी? यद्यपि वह ज्ञान श्रद्धा शून्य होने से सम्यक् नाम नहीं पाता, पर जैसे किसी कार्य का प्रस्ताव तो कर दिया पर कार्य करने को जब तैयार होते तब मालूम पड़ती बात। वह तो एक प्रस्ताव है, श्रद्धा करे पर ऐसा अगर कोई बोलता है तो उसका ढंग यह ही बनता कि कुछ तो जाना, किसी के बारे में पढ़ा सो तत्त्व ज्ञान के पौरूष में तो लगे ही रहना चाहिए, सच्चे मन से संसार से सम्वेग पाकर संसार में नहीं रहना है ऐसा अपना दृढ़ निश्चय करके जो आत्महित की अभिलाषा रखता है अपने आप पर दया करता है उसको तो मार्ग मिलकर ही रहेगा वह न भटकेगा। हाँ जिसको वस्तुत सम्वेग नहीं होता या आत्महित की बात चित्त में नहीं जगी, रह रहा है पर्याय में आत्म बुद्धि करता हुआ, मगर सनक आयी है धर्म की, ज्ञान की, चर्चा की, चलो यह भी थोड़ा अच्छा है, वहाँ अभी मोक्षमार्ग नहीं मिला। सबसे पहला गुण होना चाहिए ‘किं कुशलं ममेति विमृशन्’ मेरा हित क्या है बस यही चिंतन यह ही मनन, दूसरा मेरा कर क्या देता है? दूसरों में चापलूसी करना, मायने प्रेम करना स्नेह करना, उनका आराम रखना, अपने उपयोग पर उनका बोझ रखना, यह अगर करते रहे तो इन विकल्पों से वहाँ मिलेगा क्या? जैसे अनादि से चलते चले आये ऐसा ही रुलना मिलेगा, उसमें उसका कोई हित नहीं है। यह भावना यदि ऐसी दृढ़ भरी हुई हो कि इस भावना से कोई वातावरण चिगा न सके, तारीफ है उसकी वह पुरुष सब कुछ कर सकेगा, आत्महित करके ही रहेगा, क्योंकि बुरा चाहे तो बुरा भी इसका खूब होता।
   निश्छल अंतस्तत्त्व की सिद्धि की अभिलाषा होने पर निकट काल में आत्मोपलब्धि―यह स्वयं आत्मा तो ईश्वर है, मानो कल्प वृक्ष है, जो चाहे सो मिलता है इस आत्मा को। एक मोटी बात सोचो―यह जीव शरीर चाहता है तो यह ईश्वर इससे शरीर ही शरीर देता रहता कि नहीं खूब लेते जावो शरीर, टोटे न पड़ेंगे, और यदि यह शरीर रहित अपनी स्थिति चाहता है तो क्यों न होगी शरीररहित स्थिति। अपनी स्थिति चाहता है तो क्यों न होगी शरीररहित स्थिति? यह भगवान आत्मा तो ऐश्वर्य संपन्न है, जो चाहे सो इसमें से मिल जाय। अगर बुरा-बुरा चाहे तो बुरा-बुरा ही मिलेगा और अगर हित की वांछा होगी तो हित होकर ही रहेगा। वेदांत की एक जगदीशी टीका में कथा आयी है कि गर्मी के दिनों में कोई मुसाफिर कहीं जा रहा था तो तेज गर्मी के संताप से वह बहुत हैरान हो गया। उसके मन में आया कि यदि कोई छायादार वृक्ष मिलता तो उसके नीचे बैठकर कुछ विश्राम करता, तो थोड़ी ही दूर चलकर सड़क के किनारे एक छायादार वृक्ष दिखा। वह था कल्पवृक्ष पर उस मुसाफिर को इसका क्या पता? खैर वह उस वृक्ष के नीचे बैठकर विश्राम करने लगा। उसके मन में आया कि छायादार वृक्ष तो मिल गया, पर यदि थोड़ी हवा चल जाती तो आनंद आ जाता। लो हवा भी चल पड़ी फिर उसके मन में आया कि हवा तो चल पड़ी, अब तो यदि ठंडा पानी पीने को मिलता तो आनंद आता। लो एक लोटा ठंडा पानी भी हाजिर हो गया। फिर उसके मन में आया कि पानी तो मिल गया पर यदि कुछ फल खाने को मिल जावें तो आनंद आ जाता। लो फलों से भरा सजा सजाया थाल हाजिर हो गया। फिर उसके मन में आया कि यह सब क्या हो रहा है, कौन ऐसा कर रहा, कहीं भूत तो यहाँ नहीं है, लो भूत भी सामने हाजिर हो गया, फिर उसमें मनमें आया कि अरे लो यह भूत ही आ गया, कहीं यह मुझे खा न जाये, तो खा भी गया तो जैसे वहाँ जैसा-जैसा विचारा वैसा ही वैसा हुआ ऐसे ही यह भगवान आत्मा जैसा-जैसा विचारे भला अथवा बुरा, वैसा उसको क्यों न मिलेगा? बल्कि यह समझो कि बुरे पर तो इसका अधिकार नहीं पर भले पर इसका स्वतंत्र अधिकार है। तो हम यहाँ वहाँ कुछ भी बुद्धि न भ्रमाकर शुद्ध आत्मा को अपने आप के हित के प्रयोजन से लगाये रहें चर्चा में, ज्ञान में, वार्ता में।
   सत्त्वेषुमैत्री की भावना से आत्म पात्रता की परीक्षा―भैया जैसी चार भावनायें कहीं ऐसी चर्या बनावें―सब जीवों में मैत्रीभाव, करने से काम बनेगा और करना क्या केवल एक उपयोग की बात है, सर्व जीव हमारे स्वरूप के समान नहीं हैं क्या? चाहे निगोद हों चाहे बड़े मनुष्य हों, चाहे पशु हों, मूल स्वरूप देखो तो सब का स्वरूप समान है, पर यह क्या अंतर पड़ गया कि जो भी मनुष्य दिखते उनके दोषों पर पहले दृष्टि जाती। अरे जब उसमें स्वरूप है, स्वभाव है, गुण है तो फिर गुण पहले क्यों नहीं नजर आते? दोष तो कुछ जानबूझ कर नजर आते, गुण सहज नजर आना चाहिए। यह इसलिए है कि जिसकी दोष ग्रहण करने में रुचि है उसे दोष त्वरित दिखेगा, जिसकी गुणग्रहण में रुचि है उसे त्वरित गुण दिखेगा। तो अब देखो दूसरे का दोष किसी ने अपने उपयोग में लिया तो उसने सबसे पहले अपना उपयोग दोषाकार बनाया कि नहीं बनाया? बनाया तो उसमें उसे फायदा क्या मिला? क्या खराबी हुई और बजाय इसके यदि गुणों में उपयोग को लगाते तो खुद का उपयोग गुणाकार बनता कि नहीं? बनता। तो अपना उपयोग दोषाकार बनाने में भलाई कुछ नहीं। अब बतलाओ अपने हाथ की ही दोनों बातें हैं, दोष सब में, गुण सब में, निरख करके दोषों पर दृष्टि जाय, निरख करके एक दम गुणों पर दृष्टि जाय, यह अपनी रुचि की परीक्षा है कि कहाँ रुचि जग रही? सब बात अपने-अपने भीतर समझना है, और कमियाँ तो हैं। जो कमी है उसे दूर करें यह एक प्रवृत्ति की बात कह रहे, सत्त्वेषु मैत्री सब जीवों में मित्रता का व्यवहार हो प्रथम तो यह ही कलंक है कि जो प्रयोजनवश ऐसा समझते हैं कि ये मेरे धन के, परिवार के ये सब मेरे हैं और ये गैर, यह कलंक उतना बड़ा नहीं है जितना बड़ा हम धर्म के नाते उस धर्म प्रचार के नाते यह कल्पना कर बैठते कि यह मेरा, यह गैर। यह उससे बड़ा कलंक है। अनंतानुबंधी कषाय का प्रयोग या परीक्षा धर्म प्रसंग के संबंध में होती है। तो ऐसे जो आचार्यों के उपदेश वचन हैं उनके प्रयोग में ले। अपना ऐसा प्रयोग बने कि दूसरे को दूसरा जानें, जिसका जैसा है सो है, वह खुद के लिए अपनी प्रकृति बने, उस उपदेश का कुछ आचरण खुद में होना ही चाहिए ‘सत्वेषुमैत्री’।
   गुणिप्रमोद, क्लिष्ट कृपापरत्व व विपरीत बुद्धि माध्यस्थ्य भावना से आत्मपात्रता की परीक्षा―गुणिषु प्रमोदं, गुणी जीवों को देखकर सम्यग्दृष्टि ज्ञानी संयम गुणियों को देखकर उनमें प्रमोद भावना जगना, जितना आपको अपने लड़के को देखकर प्रमोद जगता उससे अधिक प्रमोद जगना, तब ही तो यह सिद्ध होगा कि हमको अपने परिजन या संतति में रुचि है या धर्म में रूचि है। तीसरी भावना क्लिष्ट जीवों को देखकर उनमें दयापरता का भाव। पहली दया तो यह कि बेचारा अपने को न समझ कर, विकल्पों में उलझ कर कैसा दुःखी हो रहा इसे ज्ञान प्राप्त हो ऐसी भावना होना, और फिर आखिर पर्याय है। किसी भूखे दुखी से कहो कि तुम बड़ा कष्ट पा रहे हो, तुम माला लो और णमोंकार मंत्र पढ़ो, तो उस को धैर्य तो नहीं होगा। उसका दुख दूर हो ऐसी सेवा करो, भोजनादि दो और फिर उसे वास्तविकता बताओ तो अपने में जितनी सामर्थ्य है, सामर्थ्य के अनुसार उसकी सेवा करना, उसका दुःख दूर करना। चौथी भावना है विपरीत वृत्तौ माध्यस्थ्यं, उल्टा कुमार्गगामी, विपरीत बुद्धि वाला, जिसको देखकर डर लगता कि क्या करें, तो उसके लिए न राग न द्वेष माध्यस्थ भाव रखें तो ऐसी हमारी प्रवृत्ति कुछ है या नहीं है? अगर नहीं है तो करें और है तो उसको बनायें रहें। भैया स्वानुभूति कर लो कहने को सब कहते हैं, वह बस ज्ञान द्वारा प्राप्त कर लिया जाता, पर उसके साथ अपने आप पर कितना नियंत्रण चलता है, भीतर कितना संयमन, कितना अपना कंट्रोल होता, तब हम उस स्वानुभूति को पाते हैं कहने को तो सहज ज्ञान द्वारा पाया मगर उस पाने के अनुकूल जो आचरण है उस बिना नहीं पाया। जो किसी चीज को प्राप्त करना चाहता है वह उसके प्रयत्न में सब कुछ करता और प्राप्त कर लेता है। यहाँ लोक में तो उसके लिए ऐसा ही करते हैं सब, तो यहाँ भी पहिले क्या उपाय करना है कौन पीछे वाला उपाय है। बाह्य उपाय अंतर उपाय कैसा भी हो, सबका प्रयोग बनाये तो अपने जीवन में सदाचार यथाशक्ति संयम, ज्ञानाभ्यास, स्वभाव दृष्टि पौरुष, स्वभावाश्रय का यत्न भावना, बाह्य आभ्यंतर आचार विचार सभी का प्रयोग बनावें। एक स्वानुभूति का ध्येय तो रखना ही है फिर भी परिणतियाँ ऐसी हैं कि परिणतियाँ होती हैं तो वे कैसी हों, विवेक करें और न मन, वचन, काय की प्रवृत्तियाँ उठें तो वह तो बड़ी अच्छी बात है। पर, यह मिलती तो नहीं किसी को यह नैष्कर्म्य दशा, तो सभी का प्रयोग करें, आगा पीछा कुछ नहीं सोचना, जैसे इष्टोपदेश में कहा कि जैसे-जैसे सम्वित्ति में यह ज्ञान आता है वैसे ही वैसे सुलभ विषय भी अरूचिकर हो जाता है और जैसे-जैसे सुलभ विषय भी अरूचिकर हो जाता है वैसे ही वैसे सम्विति में ज्ञान आता है इसलिए क्या करना कमेटी करके, निर्णय करके बताओ कि पहले विषय अरूचिकर बने कि ज्ञान में ज्ञान आये? कुछ निर्णय नहीं है जो बने तो बने मगर आगे पीछे का कुछ नहीं। जिस शुद्धत्व पर दीवाने हुए हैं उसके लिए हर प्रयत्न में चलना, सहज स्वरूप के लिए, उसके लाभ के लिए, तो होने दो उचित सब, बाह्य आचारों में से गुजरें, भीतर में अपने ज्ञान की एक गति बनावें, सब उपाय करें, दृष्टि में एक है ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व ऐसा ध्यान ज्ञान में रखकर इस भावना में प्रवेश तो करें। निकट में ही होगा कोई क्षण ऐसा कि यहाँ वहाँ की सब सिट्टी वह भूल जायगा और वही एक ज्ञान में रहेगा। करें तो सही प्रयत्न। विधि सही बने और काम न बने, यह कैसे होगा? एक अंजान भी नाना उपाय रचता है तो उसे भी कभी गैल मिल जायगी, पर जो जानकार हैं, जिसको उपाय दिखा, वह इस उपाय से भीतर से चलें तो उनको लाभ कुछ न होगा? उसे तब सहज आनंद का अनुभव होगा जिस स्थिति में उससे परिचय होता है कि ओह यह है आश्रेयपद तो ऐसा अपने आप में अपने सहज स्वरूप के दर्शन के हम योग्य रहें, कुछ प्रयास में रहें, पाये भी उसके वास्ते। इसका शेष संबंध का व्यवहार भी ऐसा उचित रहना चाहिए कि कभी अशांति और कषाय न बढ़ें, किसी के प्रति जिससे हम अपने लक्ष्य पूर्ति के पात्र रह सकें।


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