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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 5

From जैनकोष



भयविसणमलविवज्जिय संसारशरीरभोगणिव्वण्णो।

अट्ठगुणंगसमग्गो दंसणसुद्धो हु पंचगुरुभत्तो।।5।।

   सम्यग्दृष्टि के इहलोक भय का अभाव―सम्यग्दर्शन से विशुद्ध कौन है, जिसके बारे में बताया गया ना, प्रथम नरक विनषट̖भूज्योतिष बान भवन षंढ नारी, थावर विकलत्रय पशु में नहिं उपजत सम्यक् धारी। समंतभद्राचार्य ने रत्नकरंड में भी यह ही बताया जो सम्यग्दर्शन से शुद्ध है याने सम्यग्दृष्टि है वह ऐसी कुगतियों में नहीं उत्पन्न होता, याने सम्यग्दर्शन सहित होते हुए में यदि मरण होता है, तो इन कुगतियों में उत्पन्न नहीं होता। वह सम्यग्दर्शन से शुद्ध जीव कैसे होता है। सम्यग्दृष्टि जीव 7 भयों से रहित है, निःशंक है, क्यों नहीं उसे सप्त मय है? इहलोकभय, क्या होगा इस भव में, इस लोक में सरकार बदलती है, नये-नये कानून बनते हैं और अनेक प्रकार के टैक्स लादे जाते, मानो कानून बन गया कि कोई सोना नहीं रख सकता और रखे तो जेल जायगा, तो लोग क्या करेंगे, सोना को उठाकर नाली में डाल देंगे, नहीं तो प्राण घात का भी दंड रखते, ऐसी कल्पनायें जगती, उसमें भय पैदा होता, और सम्यग्दृष्टि को, यह भय नहीं है क्योंकि वह जानता है कि मेरा स्वरूप निर्वाध है, उसमें कोई कष्ट ही नहीं, इसमें कोई कुछ विघ्न ही नहीं डाल पाता, स्वरूप है मेरा, मेरे में है यही हूँ, अमर हूँ, शाश्वत् हूँ, उसके भय क्या? भय वहीं तो होता जहाँ पर वस्तु में अपना लगाव बनाया, जो अपराध करता है वह भय मानेगा ही अपनी राधा से विमुख हो गए, अपनी राधा है आत्मोपलब्धि, उससे दूर हो गए, जो यह अपराध करेगा वह शंकित रहेगा और भयशील रहेगा। सम्यग्दृष्टि को भय नहीं है। बच्चे को कोई डराये तो बच्चा माँ की गोद में मुख छिपाकर चिपटकर रह जाता और अपने को निर्भय अनुभव करता है कोई बाहरी बाधायें आ जायें इस ज्ञानी को तो यह ज्ञानी अपने स्वरूप  की गोद में गुप्त होकर रहता चिपटकर रहता और निर्भय हो जाता। बाहर के लोग कुछ भी उपद्रव करें, कुछ भी ढायें, यह अपने में समा गया, करते रहो जो करो, उसे क्या भय। सम्यग्दृष्टि पुरुष इहलोक भय से रहित है।
   सम्यग्दृष्टि जीव के परलोकभय का अभाव―सम्यग्दृष्टि को लोक का भी भय नहीं। लोग का भी भय नहीं। लोग कहते कि पर लोक का भय तो करें याने अच्छे आचरण से रहें। परलोक का भय रहेगा तो उससे जरा व्यवस्था भी ठीक रहती है, लोग धर्म में भी रहते और यहाँ तो यह कह रहे कि ज्ञानी के परलोक का भय नहीं, उसका अर्थ यह है कि उस की दृष्टि में है अपना स्वात्मा सदा, उसको अपने आप है निगाह में वह जानता है कि यहाँ होऊं तो यह मैं अन्य पर्याय में होऊं तो यह मैं और यह मैं बस इतनी मेरी दुनिया सब जगह यह ही मैं। सब कालों में यही मैं। ऐसा उसका निर्बाध दर्शन है और यही मैं अपनी निगाह में हो वहाँ कहीं कुछ डर नहीं परलोक का भय उन्हें होता जो अनाचार में रहते और थोड़ा ख्याल आ जाता कि परलोक में क्या होगा। जो अपने स्वरूप की प्रतीति में रहते उन्हें परलोक का भय नहीं।
   सम्यग्दृष्टि के वेदना, अरक्षा, व अगुप्ति भय का भी अभाव―वेदनाभय शरीर में वेदना हुई उसका भय, जिसने शरीर को आत्म रूप माना ही नहीं उसको वेदना भय क्या? इसके अगर कभी बुखार रोग और थोड़ा उसे कष्ट भी हो तो उसको भी वह जानता है। उसके अंदर भय नहीं है कि अब क्या किया जायगा? अब न जाने क्या होगा ऐसी उसके किंकर्तव्यविमूढ़ता नहीं है। यह मैं हूँ, यही रहूँगा, अभी यह पर्याय है, यह जायगी, मैं रहूँगा और नवीन पर्याय आयगी शरीर में जिन्होंने आपा माना है उनको वेदना भय सताता है शरीर को आत्मा रूप स्वीकार करने वाले शरीर का जरा भी कष्ट नहीं स्वीकार करना चाहते। कितने ही लोग तो इतने व्यामोही होते कि रास्ता चलते में किसी ने कहा कि भाई हमारा यह बोझ उठा देना सिर पर, तो वे यह सोचते कि मैं क्यों उठाऊं, याने देह में इतना तीव्र राग है कि अपने आराम के खिलाफ कुछ करना ही नहीं चाहते वेदना भय सताता है मोहियों को ऐसे ही अरक्षाभय, मेरी रक्षा होगी या नहीं होगी, यह भय सम्यग्दृष्टि के इस कारण नहीं कि वह जानता है कि मैं शाश्वत सुरक्षित हूँ। जो सत् है वह कभी मिटेगा क्या? मैं सत् हूँ तो मैं मिटूँगा क्या? कोई ऐसी गड़बड़ी हो जाय कि इस शरीर में न रहें, इससे विदा होना पड़े तो उससे मेरे लिए क्या नुकसान? यहाँ न रहा और कहीं रहा, उसका कुछ विकल्प ही नहीं, ऐसी प्रखर दृष्टि रहती है। यहाँ आपने किसी से कह दिया कि आप वहाँ न बैठो यहाँ आ जाओ तो वहाँ बैठने में आप कोई कष्ट मानते क्या? ऐसे ही मानो इस आत्माराम से किसी ने कहा कि आप इस शरीर में न रहो यहाँ आ जावो, तो ठीक है वहाँ चलो, जहाँ हो वहाँ सही। व्यग्रता तो तब हो जब उसी पर्याय से मोह हो जाय। उसे अरक्षा भय भी नहीं। मेरा स्थान ठीक नहीं, यह भी भय नहीं, अगुप्तिभय भी नहीं।
   सम्यग्दृष्टि के मरणभय व आकस्मिक भय का भी अभाव―मरणभय भी नहीं। मरण का भय तो बहुत बड़ा भय है और इस भय से सब आतंकित हैं। मरण का नाम सुन कर सभी लोगों को डर लगता। एक घर एक घर में कोई एक बुढ़िया रहती थी। वह बहुत वृद्ध हो गई थी। उसके नाती पोते भी उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं रखते थे, सो वह बुढ़िया बहुत-बहुत रोती थीं, बड़ा कष्ट मानती थी और प्रति दिन भगवान से यह प्रार्थना किया करती थी कि हे भगवान मुझे उठा ले, मायने मैं मर जाऊं....., यही बात वह रोज-रोज कहा करती थी। एक दिन उस बुढ़िया के पास एक बड़ा भयंकर जहरीला साँप निकल आया तो उसे देखकर वह बुढ़िया डरी, चिल्लायी और अपने नाती पोतों का नाम ले लेकर बोली अरे दौड़ो, बचाओ, साँप निकल आया है, तो वहाँ कोई नाती बोला अरी बुढ़िया माँ तू घबड़ा मत, मेरी प्रार्थना को भगवान ने स्वीकार कर लिया है। तू रोज-रोज जो यह कहा करती थी कि हे भगवान मुझे उठा ले तो भगवान ने तेरी प्रार्थना सुनकर काल को इस सर्प के रूप में तुझे उठाने के लिए भेजा है तो यहाँ मरने से सभी डरते। अभी शरीर में कोई रोग हो जाय या कोई तेज कष्ट आ पड़े तो कह उठते कि मेरा मरण हो जाय तो अच्छा है पर मरण की आशंका होने पर देखो तो वहाँ फिर बदल जाता है चित्त। मरण नहीं चाहता। इस तरह लोग मरण से भय मानते पर सम्यग्दृष्टि को मरण का भय नहीं याने उसने जगत के सर्व अर्थों से अपना ऐसा पूरा कटाव बना लिया कि उसके लिए मरण भी कुछ नहीं है। यहाँ न रहे वहाँ रहे। अपने निज स्वरूप पर उसकी दृष्टि है और जगत में कोई आकांक्षा नहीं। मोहवश लोगों को बड़ी बुरी मौत मरना पड़ता। मर रहे, ख्याल आ रहा। सारा जीवन परिश्रम करके हवेली बनाया, अब यह छूट रही, सब कुछ कष्ट करके अपने को सुखी रोटियाँ खिलाकर बच्चों का इतना पढ़ाया लिखाया, बड़े किया, अच्छे बनाया, अब ये सब मुझ से छूट रहे हैं यों सारे ख्याल हैं और बुरी मौत मरना पड़ता और निर्मोह पुरुष बड़ी शांति से मरण करता। तो यह मरण भय भी इस स्वरूप पर दृष्टि रखने वाले के नहीं होता। अनाप सनाप भय हुआ करते इन दुनियावी लोगों को। आकस्मिकभय में अटपट सोचविचार होते। जैसे कहीं बादल नहीं है फिर भी यह भय मानते किन्हीं बिजली न गिर जाय, कहीं बिजली गिरने से मेरा मरण न हो जाय, कहीं छत ही न गिर जाय यों कुछ से कुछ सोच बैठते। कोई आकस्मिक उपद्रव न आ जावे यह भय भी उस सम्यग्दृष्टि के नहीं होता, क्योंकि आकस्मिक कुछ है नहीं मेरे लिए दुनिया में जो है सो बर्त रहा हूँ और परिणमता रहता हूँ अपनी ही परिणति से परिणमता हूँ सारी बात मुझ में दृढ़ दुर्ग की तरह है। किसी प्रकार के भय सम्यग्दृष्टि जीव को नहीं है और खुद में ही परख लें, अगर ऐसी निर्भयता की बात है तो हाँ ठीक है, सम्यक्त्व है। बात कुछ और हो तो कहने से कुछ नहीं बनती बात।
   सम्यग्दृष्टि की सप्तव्यसन रहितता―जो सम्यग्दर्शन से शुद्ध है वह सप्त व्यसनों से रहित है। इससे पहले यह जाने कि 7 व्यसनों में जो हो किसी भी व्यसन में उसके सम्यक्त्व नहीं। जुवा खेलने का व्यसन सम्यग्दृष्टि के होगा क्या? उसमें बड़ी अधीरता चंचलता, दिल ठिकाने भी नहीं और ऐसी ही बातों में उपयोग जाय। मांस भक्षण कितना एक निंद्य काम है। दूसरे जीव के घात से होता है मांस, वह स्वयं खराब है, कुछ दिन पहले के लोग तो इस मांस का नाम भी न लेते थे अगर किसी के बारे में बताना होता था कि वह मांस खाने लगा तो यों कहते थे―अरे कुछ पता है वह तो मिट्टी खाने लगा। और नाम लेकर मांस शब्द बोलने में भी उन्हें बुरा लगता था। जो बहुत बूढ़े पुराने लोग हों वे समझ सकते उस समय की हालत। यह माँस इतना निंद्य पदार्थ है कि उसका नाम लेने में भी बुरा लगता, और उसे कोई खाये तो क्या उसे कह सकते सम्यग्दृष्टि। सम्यग्दृष्टि के व्यसन नहीं होते। मदिरापान करना यह भी एक बड़ी दूषित बात है। सम्यग्दृष्टि के ऐसी गंदी प्रवृत्ति नहीं होती। चोरी करना, शिकार खेलना, परस्त्री गमन करना, वेश्यागमन करना, ये भी सम्यग्दृष्टि पुरुष के नहीं होते। वे तो एक सहज विरक्त भाव को लिए हुए होंगे। कर्मोदय आता, चारित्र मोह का उदय है तो अणुव्रत में रहकर जैसी प्रवृत्ति वहाँ होती है वैसी प्रवृत्ति चलेगी। भले ही नियम न किया हो व्रती हो फिर भी उसकी प्रवृत्ति ऐसी शुद्ध होगी जो सप्त व्यसनों से रहित है।
   सम्यग्दृष्टि के अष्टांगदोषरहितता―जो सम्यग्दर्शन से शुद्ध है वह सम्यक्त्व के दोष से रहित है जैसे सम्यक्त्व के 8 गुण न होकर उसके विपरीत 8 दोष हैं वे दोष नहीं होते किंतु सम्यग्दृष्टि के अंग ही होंगे। जिन वचन में शंका करना, अपने स्वरूप में शंका होना, भोग विषयों की इच्छा रखना, धर्म पालन के एवज में भोग साधन। चाहना यह दोष नहीं होता। व्रती साधु संत पुरुषों की सेवा में ग्लानि रखना यह सम्यग्दृष्टि के न होगा। क्यों न होगा? माता पिता अपने छोटे बच्चे की सेवा करने में ग्लानि क्यों नहीं करते। नाक आ जाये तो उसे अपनी धोती से पोंछ देते, ग्लानि क्या नहीं होती? तो उस बच्चे के प्रति उन्हें प्रीति है, उमंग है या जो कुछ समझ रख कि यह हमारा कुल चलायेगा बुढ़ापे में यह हमारी मदद करेगा। जो कुछ भी जितनी प्रीति है उस प्रीति के कारण उसे ग्लानि नहीं। तो एक सम्यग्दृष्टि को भी धर्मात्मा साधु संत के प्रति प्रीति होती है। जो कुछ वह चाहता है वह वहाँ मौजूद होता तो इस प्रीति के अतिरेक में ग्लानि आने का सवाल ही नहीं आता। कभी दूसरे धर्म वालों को या किन्हीं जादूगरों का चमत्कार देखकर ऐसा भाव करना कि वाह तत्त्व तो यह है धर्म तो यहाँ है। सच्ची बात, सार बात तो यहाँ है, ऐसा कुछ निरखना यह दोष सम्यग्दृष्टि के नहीं होता। दूसरे किसी भी व्रती में, साधु में कोई दोष भी हो जाय कभी तो उसको वह जनता में प्रकट नहीं करता, यह तो गुण है और प्रकट करे, स्वच्छंद हो तो यह उसका दोष है। ऐसा दोष सम्यग्दृष्टि के नहीं होता, क्योंकि उसे धर्म के प्रति प्रीति है और जिसके प्रति प्रीति है उसके बारे में यह चाह होती कि इसकी निंदा न हो, धर्म की निंदा न हो, बस इस उद्देश्य से उसका उपगूहन चला धर्मात्माजन कोई विचलित हो जाये तो उनको और आनंद माने, उमंग करे, होने दो विचलित अच्छा हुआ, ऐसा भाव दोष है, सम्यग्दृष्टि के ऐसा दुर्भाव नहीं होता, किंतु अपनी सामर्थ्य माफिक उसको इस धर्म में स्थिर करने का ही उसका भाव और यत्न है। धर्मात्मा जनों में सम्यग्दृष्टि को वात्सल्य होता, द्वेष नहीं, घृणा नहीं, जैसे घर में 2-4 लड़के हैं, कोई तनिक खोटा भी है तो भी माता का सब पुत्रों पर प्रेम रहता है। चाहे किसी के प्रति कुछ कम प्रेम रहे किसी से अधिक मगर माता प्रीति सब पुत्रों से रखती है ऐसे ही सम्यग्दृष्टि पुरुष इतना उदार होता है कि चाहे नाम जैन हो, स्थापना जैन हो, चाहे द्रव्य जैन हों, चाहे भाव जैन हो, वात्सल्य उसका सब से रहता है। इतनी बात परखकर ये जैन होकर भी इस को ऐसा करना नहीं आता, इसको ज्ञान नहीं है इन्हें, इतनी बात से वे जुदा न कर देंगे उसे। यह तो गैर है कुछ नहीं है, पापी है, इससे मेरा कुछ मतलब नहीं, विरोध मान ले, यह बात सम्यग्दृष्टि में नहीं होती। तो उदार हृदय है, सबसे मिलकर चलता है भले ही विभिन्नतायें होती ही हैं रहे मगर उस विभिन्नता के नाते उसके भीतर घृणा नहीं जगी, अनादर नहीं हो गया, क्योंकि उस सम्यग्दृष्टि को तो अपनी पड़ी है कि मेरा कैसे आत्महित हो वह व्यर्थ के बखेड़े में क्यों पड़ेगा। उसकी प्रवृत्ति तो धर्म प्रभावना की होती है, उसका कोई कार्य ऐसा नहीं जो प्रभावना में विघ्न डाले।
   सम्यग्दृष्टि की अष्टमदरहितता―सम्यग्दृष्टि के किसी प्रकार का घमंड नहीं होता। ज्ञानी सम्यग्दृष्टि को परिचय है कि वह किस प्रकार से शुद्ध होता है, उसे कुल का घमंड नहीं। मैं बड़े ऊंचे कुल में पैदा हुआ इसका भी उसे घमंड नहीं मेरे मामा, नाना ऐसे कुल के हैं इसका भी घमंड नहीं। ज्ञान का भी उसे घमंड नहीं वह तो जानता है कि केवलज्ञान के समक्ष यहाँ का कितना ही बढ़ा चढ़ा ज्ञान हो वह समुद्र में बिंदु बराबर है। इतने में ही तुष्ट होना है क्या? केवलज्ञान हो तो स्वभाव दशा होगी अन्य बीच की स्थिति की चाह नहीं, वह सम्यग्दृष्टि है। सम्यग्दृष्टि के पूजा मद नहीं है और बढ़कर मानो संयमी है तो उसने किसी से हाथ जुड़ाने के लिए अपना घर छोड़ने जैसा कठिन काम किया क्या? उसे कोई परवाह नहीं। जिसका जैसा चल रहा उसका उसके लिए, वह अपने में विह्वल नहीं होता, लोग न माने तो ठीक है, चल रहा। अनंतानंत जीव मिथ्या दृष्टि हैं, ये दो चार और उन में शामिल होने लगे कुछ पलड़ा थोड़े ही डूब जायगा। विकल्प नहीं रखता वह कि हाय ये लोग यो क्यों नहीं करते, उसे अपनी पूजा प्रतिष्ठा का भाव नहीं रहता और मान लो हो भी पूजा प्रतिष्ठा तो उसका उसे मद भी नहीं रहता। भैया, विमुग्धो को एक बार, ऐसा तो लगता होगा कि इस संसार में इस सम्यग्दृष्टि को कुछ सुख नहीं, यह तो बेकार है, इससे भले तो ये मिथ्यादृष्टि लोग हैं। कैसे कि जब ये मिथ्यादृष्टि लोग अपने बच्चे को गोद में लेकर खिलाते तो कैसा खुश होते, खूब हँस हँसकर उसे अपनी छाती से चिपका-चिपकाकर मुख से चूम-चूमकर खिलाते, प्यार दिखाते, बड़ा मौज मानते और ये सम्यग्दृष्टि लोग तो अपने बच्चों को गोद में लेकर भी उसे अपने से भिन्न निरखते, उसके प्रति अंदर से उदासीन रहते, उसको खिलाकर हर्ष नहीं मानते, तो सम्यग्दृष्टियों से तो ये मिथ्यादृष्टि लोग भले हैं ऐसा लोगों को लगने लगता पर ऐसी बात नहीं है ये मिथ्यादृष्टि जन जिन्हें अज्ञान है, जो विषयों में मस्त हो रहे, उनकी दशा तो बड़ी दयनीय है सम्यग्दृष्टि पुरुष तो विवेकी है, पुण्य पाप फल मांहि न हर्ष है न विषाद। चिंतन है, मनन है, आत्मस्पर्श भी कभी होता। उसका एक स्थिर आनंद है, जब है तब सहज आनंद भोग रहा, नहीं है तो स्मरण है। उसे कोई मद नहीं। उसे बल का भी मद नहीं ऋद्धि ऐश्वर्य का भी मद नहीं तपश्चरण का भी मद नहीं। सुंदरता, सुरूपता आदि कोई प्रकार का अभिमान उसे नहीं है जो पूरा है भीतर उसके ऐसा रूप नहीं बनता जो लोक में एक अपवाद फैले। सम्यग्दृष्टि जीव किसी विसम्वाद में नहीं पड़ता लौकिक लोग क्या कर रहे, उसे देखकर यह बदल नहीं होती कि मैं भी यह ही करूँ। ऐसे ये जो दोष बताये जाते हैं, उन दोषों से रहित सम्यग्दृष्टि पुरुष होता है।
   दर्शनशुद्ध जीव की देवमूढ़तावर्जितता―जो सम्यग्दर्शन से शुद्ध है वह जीव कैसा होता है उसका वर्णन चल रहा है। अभी तक बताया है कि दृष्टि शुद्ध जीव भयों से रहित है, 7 व्यसनों से रहित है और शंका आदि दोषों से रहित 8 मदों से रहित है, अब सम्यग्दृष्टि तीन मूढ़ताओं से रहित है इस विषय में बात चल रही है मूढ़ता मायने मूर्खता मुग्धता, अज्ञानवश होने वाली प्रवृत्तियां वे तीन हैं (1) देवमूढ़ता, (2) लोकमूढ़ता और (3) पाखंडिमूढ़ता। देवमूढ़ता जो देव नहीं है उसको देव मानकर उसकी आराधना पूजन आदिक प्रवृत्तियों में रहना यह देवमूढ़ता है। देव तो सभी जीव नहीं है, पर उनमें देवत्व का ख्याल बन जाए तो वे कुदेव कहलाते हैं। जो देव नहीं है वह कुदेव है, ऐसा अर्थ नहीं है, देव तो यहां के सभी जीव नहीं एकेंद्रिय से लेकर हम आप मनुष्यों तक, पर कुदेव नहीं कहलाते, जो देव नहीं है और उनकी ओर से या भक्तों की ओर से जिसमें देवत्व की ख्याति की जाय उसे कहते हैं कुदेव। जो रागादिक सहित है, परिग्रह सहित है, और देवत्व की प्रसिद्धि बन रही हो तो उस प्रसिद्धि में नहीं बहता यह सम्यग्दृष्टि जीव।
   सद̖दृष्टि की लोकमूढ़तावर्जितता―लोकमूढ़ता-दुनियावी प्राणी किस-किस बात में धर्म मानकर प्रवृत्तियाँ किया करते हैं। उन बेचारों को स्वरूप की खबर नहीं, नदी में स्नान करना, समुद्र में नहाना, पहाड़ में गिरना, और-और भी अनेक बातें। रास्ते में कही पत्थरों का ढेर लगा हो तो वहाँ एक पत्थर और डालना, उसका वंदन करना अन्य अनेक प्रकार की मूढ़तायें चलती हैं। कोई ऐसा संन्यासी होगा सो कहीं भिक्षा से लड्डू ले आया। वह लड्डू लिए जा रहा था सो एक जगह रास्ते वह लड्डू गिर गया और गिरा खराब जगह पर, सो उसे झट उठा तो लिया, पर साथ ही अपनी पोल छिपाने के लिए वहाँ 1॰-5 फूल उसने डाल दिया, इसलिए कि देखने वाले लोग कहीं पहिचान न जायें कि यहाँ से इसने लड्डू उठाया। वहाँ लोगों ने देखा कि इतने बड़े महाराज यहाँ फूल डाल रहे हैं नम्र होकर सो वहाँ और लोगों ने देखा तो दो-दो फूल उन्होंने भी चढ़ाया। अब तो जो भी उस रास्ते से जाय वही दो चार फूल चढ़ाये। इस तरह से वहाँ पर फूलों का एक बहुत बड़ा ढेर लग गया। उसका नाम भी लोगों ने रख दिया फुल्वा देवी। अब दो एक विवेकी पुरुषों ने सलाह किया कि देखना चाहिए कि इस जगह कौन सी देवी है, क्या है कुछ स्वरूप तो देखना चाहिए। सो वे डरे नहीं फूलों को अलग किया और देखा तो उन्हें असली देवी दिख गई (हँसी) मायने जो गंदी चीज पड़ी थी वह दिख गई। तो लोक मूढ़ता की बात कहे रहे कि जिस ओर लोग बहे जा रहे धर्म समझकर उस ओर बहना यह लोकमूढ़ता है। सम्यग्दृष्टि के इसकी तो गंध ही कहाँ से आ सकती।
   दर्शनशुद्ध की पाखंडमूढ़ता वर्जितता एवं अनायतनोपासनावर्जितता―जिसने अपने सहज स्वभाव का अनुभव पाया हो सहज आनंद का अनुभव किया हो और इसके प्रसाद से दृढ़ता हुई कि ऐसी आत्मा की स्थिति बनना यह धर्म है उसके हृदय में कैसे फैलेगी पाखंडिमूढ़ता। सग्रंथ सारंभ ऐसे कुभेषी साधुजनों में गुरुत्वबुद्धि करना, उनकी सेवा करना पाखंडिमूढ़ता है। लोग तो हुक्का भरकर ऐसे साधुओं को देते, यह उनकी सेवा मानते हैं पाखंडिमूढ़ता वाले अफीम लादें, गॉजा ला दें और-और क्या-क्या बातें करते और वे खुश हो रहे हैं। कैसे पटती है उनकी गुरुशिष्यता यह बात कुछ समझ में नहीं आती है। सो मूढ़ता की बात विचित्र है। मूढ़ताओं से रहित ज्ञानी पुरुष होते हैं। अनायतनों में इस सम्यग्दृष्टि को आस्था नहीं, कुदेव, कुशास्त्र, कुधर्म, कुगुरु और इनके सेवक ऐसे इन दोषों से रहित जो हैं वे सम्यग्दृष्टि हैं।
   सम्यग्दृष्टि की संसार शरीर भोगनिर्विण्णता―ये सम्यग्दृष्टि जीव संसार शरीर भोगों से विरक्त हैं। चाहे अभी विरक्त का नियम नहीं किया, मगर यथायोग्य सहज विरक्त होती है। ज्ञानी के होती ही है संसार से विरक्त। रागद्वेष भाव का नाम संसार है और उन भावों से इसकी विरक्त है। यह संसार भाव अनर्थकारी है। यह कलंक है, यह मेरा आश्रेय नहीं है। यह दृढ़ प्रतीति है ज्ञानी के, संग होते हुए भी हँसकर भी, वैसी प्रवृत्ति करके भी इसके भीतर उदासी रहती है। शरीर से उदासी, शरीर को बहुत पोसना, सफाई में रखना अनेक बार खाना आदिक बातें ये जो शरीर पोषक हैं शरीर की ममता करने वाली हैं अभक्ष्य खाना आदिक का ये वृत्तियाँ कहाँ से होंगी। यह संसार से विरक्त है। देह जुदा, पुदगल अचेतन मैं चेतन ज्ञानस्वरूप जिसकी दृष्टि में यह भेद पड़ा है वह गुजारे माफिक शरीर की सेवा करेगा जैसे कि एक मालिक अपने नौकर की सेवा करता है क्योंकि उससे अपना काम निकालना है। इस शरीर के टिकाये रहने से थोड़ा जीवन चलता है। इसलिए इस शरीर की थोड़ी सेवा करनी होती है। खान पान करना होता, करता है, मगर उसमें आशक्ति नहीं है और इसी प्रकार यह सम्यग्दृष्टि पुरुष इन भोगों से विरक्त है। अब देखिये निमित्त नैमित्तिक योग वश उसे करनी पड़ती है विषय प्रवृत्ति फिर भी वह उदास होता है ऐसी स्थिति जिसके नहीं है और यों ही मान लें कि मैं सम्यग्दृष्टि हूँ तो केवल एक मान लेने से बात न बनेगी। वह प्रभाव आना चाहिए स्वयं में जो सम्यग्दर्शन का प्रभाव है, संसार, शरीर, भोगों से वह विरक्त है।
   सम्यग्दृष्टि का निःशंकित व निःकांक्षित अंग―दर्शशुद्ध भव्यात्मा सम्यग्दर्शन के 8 अंगों से समग्र है। 8 अंग हैं अंग मायने अवयव। जैसे शरीर के अंग और शरीर है अंगी। पैर आदि अंग न रहा तो जो शरीर की दशा है, अंग न रहे तो वही सम्यक्त्व की दशा है। अथवा यहाँ थोड़ा बहुत शरीर का काम चला भी लेंगे किसी अंग बिना मगर वहाँ न चल सकेगा। सम्यक्त्व है अंग सहित। जैसे शरीर में 8 अंग होते हैं और उन 8 शरीरों के में अंगों से जिस विधि से बात बनती है उस विधि का दिग्दर्शन सम्यक्त्व के 8 अंगों में दिख सकता है। शरीर के 8 अंग कौन से? 2 पैर, 2 हाथ, एक पीठ, एक हृदय, एक मस्तक और एक नितंब। अब प्रवृत्ति की विधि देखिये मनुष्य चलता है तो एक पैर आगे रखता है और पीछे का पैर उठाता है, तो जो एक पैर आगे रखता है और पीछे का पैर उठाता है तो जो पैर आगे रखता है वह कितना निःशंकता से रखता। सड़क है चल रहे हैं तेजी से चलते हैं पैर को निर्भय बढ़ाते जाते हैं। कहीं कोई शंका आती क्या? यह सड़क कहीं रूई की तरह पोली न हो कि पैर धस जाय, ऐसी कोई कल्पना करता क्या? तो जैसे अगला पैर निशंक रखते हैं और पिछला पैर बड़ी उपेक्षा से हटाते हैं, कहीं राग होता है क्या उस जमीन से अरे जहाँ पिछला पैर रखा था उसकी ओर दृष्टि ही नहीं रखता, उपेक्षा करता, ऐसी ही निःशंक और निःशंकित अंग की बात है। अगले पैर की तरह नि:शंकित अंग है। जो अपना कदम है और गंतव्य स्थान है उसकी ओर उसकी दृष्टि कैसे निशंक रहती है और वहाँ निःशंकित गति की ओर उमंग है, पर भोग साधनों की ओर ऐसी उपेक्षा है जैसे पिछला पैर बड़ी वेग से अपेक्षा करके चलने वाला उठाता है।
   सम्यग्दृष्टि का निर्विचिकित्सित व अमूढ़दृष्टि अंग―निर्विचिकित्सा―शरीर के बाँये हाथ से सभी लोग भंगी जैसे रोज काम करते हैं, शौच के बाद शुद्धि करते हैं। तो शौच के बाद क्या कभी किसी ने सोचा सा कि यह मेरा बाँया हाथ बड़ा खराब है, इसको काटकर फेंक देना चाहिए अरे ऐसा तो कोई नहीं सोचता। दोनों ही हाथों से कोई घृणा नहीं करता। ऐसे ही मुनिजन कदाचित् बीमार हों और कुछ मल मूत्रादिक निकले या लार निकला किसी प्रकार की अशुचिता आये तो भी धर्मात्माजन उनके प्रति घृणा नहीं करते क्योंकि उन्हें प्रीति है धर्म से और वे धर्म की मूर्ति हैं। दाहिना हाथ जैसे किसी भी बात के निर्णय में यह दाहिना हाथ अमूढ़ता का धोतन करता है ऐसा ही है वह तत्त्वनिर्णय यथार्थ यह ही है याते जैसे यह दाहिना हाथ एक अमूढ़ता की बात बताता है इसी तरह यह अमूढ़ दृष्टि अंग खोंटे मार्ग में जाने वाले पुरुषों के प्रति वह मुग्ध नहीं होता और यथार्थ निर्णय रखता है कि मोक्ष मार्ग तो यही है।
   सम्यग्दृष्टि का उपगूहन और वात्सल्य―उपगूहन अंग―जैसे शरीर का नितंब भाग, इस को हर एक कोई ढके रहता, कोई चड्ढ़ी पहिनता, कोई धोती पहिनता कोई पायजामा, कोई कुछ। उपगूहन करते हैं, ढके रहते हैं इस भाग को तो सम्यग्दृष्टि जीव किसी अशक्त जीव के आश्रय कोई दोष हो जाय धर्मी से किसी साधर्मी भाई से, ज्ञानी से तो उस दोष का उपगूहन करता, ताकि जनता में धर्म की निंदा न हो। भले ही उसके प्रति क्या करना समझाना बुझाना वह सब होता है, मगर जनता में वह दोष प्रकट नहीं करता जैन उसका उपगूहन करता। सम्यग्दृष्टि का वात्सल्य देखो जैसे हृदय में प्रेम बताया जाता इसी प्रकार साधर्मी जनों के प्रति धर्मी का हृदय है वात्सल्य है। जैसे एक मित्र का किसी दूसरे मित्र से निष्कंप वात्सल्य होता है जैसा कि गाय और बछड़े का निष्कपट वात्सल्य होता है ऐसा वात्सल्य एक साधर्मी का दूसरे साधर्मी से होता है।
   सम्यग्दृष्टि का स्थिति करण वात्सल्य एवं प्रभावना अड्ग―स्थिति करण―पीठ, इस पर कितना ही बोझ लाद दिया जाय, जो बोझ सिर पर भी नहीं उठाया जा सकता वह बोझ पीठ पर उठाया जा सकता। तो जैसे शरीर का पीठ भाग स्थिति के काम आता ऐसे ही यह स्थितिकरण समझो। कभी धर्म से कोई च्युत होता हो, दूसरा बंधु च्युत होता हो तो उसे धर्म पथ में लगाये, उसे वचनों से, अन्य सहायता से उसकी शल्य मेटना, धर्म में स्थिर करना, और प्रभावना जैसे सारे शरीर में प्रभावना का स्थान मस्तक है। उसको देख कर ही तो लोग प्रभावित होते, यह ज्ञानी है, प्रतिष्ठित हैं ऐसा जानते, और किन्हीं अंगों को देखकर ऐसा ज्ञान नहीं होता, ऐसे ही सम्यग्दृष्टि जीव अपने आचरण से नियम से विचारों से अपने धर्म की प्रभावना बढ़ाता है और निश्चय से सब कुछ अपने आपका अपने में ही कार्य है।
   ज्ञानी की पंचगुरूभक्तता―8 अंगों से समग्र और यह दर्शन शुद्ध जीव पंच गुरू है 5 गुरू हैं अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु। ज्ञानी, उनके सही स्वरूप को जानता है, समझ रहा है, यह सब आत्मविकास है णमोकार मंत्र में किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया गया। तीर्थंकर तक का भी नाम नहीं है कि इनको नमस्कार है, किंतु किसके नाम है? आत्मा के विकास स्वरूप के नाम हैं। साधु जो रत्नत्रय की साधना करें, अपने सहज स्वरूप को जानकर उस ही में धुन बनाने का प्रयास करें वह साधु है, वह आत्म विकास है, जितना भी है, ऐसे ही आचार्य और उपाध्याय है। और जब ऐसी साधना के बल से चार घातिया कर्म दूर हो गए और वहाँ अनंत ज्ञान अनंत दर्शन, अनंत शक्ति अनंत आनंद प्रकट हो सो अरहंत है। फिर जब शरीर व घातिया कर्म दूर हो जाते तो वह सिद्ध प्रभु है।
   घातिया कर्म दूर होने पर देही की स्फटिकमणिसंकासता―जहाँ यह अनंत चतुष्टय प्रकट हुआ वहाँ विभिन्न नैमित्तिक योग देखिये―यह देह कैसा हो जाता? स्फटिकमणि की तरह। कोई बूढ़ा मुनि है वह अरहंत बन गया तो अब वहाँ बूढ़ा शरीर नहीं रहता, नहीं तो बड़ा भद्दा लगे कि यह देखो बढ़े भगवान आ गये। उनका स्वरूप मनोज्ञ है। जैसे प्रतिमा बनती है तो सबका एक स्वरूप होता। बूढ़ा वगैरह है कुछ नहीं मुनि की तस्वीर में तो देखिये हड्डियाँ निकली दिखेगी मगर अरहंत की प्रतिमा में मनोज्ञता रहती है और उनका निगोद रहित शरीर होता। 12वें गुणस्थान में किस तरह की पर्याय चलती कि वहाँ तक निगोद जीव तो रहते हैं देह में और वे न रहें ऐसे कोई एक समय में बात नहीं बनती। वहाँ उत्पाद का विरोध है याने नवीन जीव नहीं उत्पन्न होता और उसके भी निरोध की गुण श्रेणी है, उसके ढंग से पहले के जीव कितने क्षण तक और वहाँ चले अगले जीव कितने अनुपात में उत्पाद निरुद्ध हो तो, ऐसा होते-होते 12वें गुणस्थान के अंत में यह देह वादर निगोद से रहित हो जाता है और 13वें गुणस्थान में स्फटिकमणि की तरह शरीर हो जाता है।
   वीतरागता की महिमा―देह का निर्दोष हो जाना पहले बाहरी बात हुई मगर वह ज्योति कौन है जिसकी वजह से यह काम सहज होता है। महिमा देह के तारीफ की नहीं है। महिमा है उस वीतरागता की। वह वीतराग है सर्वज्ञ है। मगर हम आप कदाचित् अपना यह धैर्य रख सकते हो कि मुझे केवल ज्ञान की जरूरत नहीं, न हो न सही, नहीं है तीनों लोक का ज्ञान तो न सही मगर वीतरागता जरूर हो क्योंकि आकुलता का नाश वह वीतराग भाव ही है। तो एक बार यह मना किया जा सकता कि नहीं मिला तीनों लोक का ज्ञान तो न सही मगर वीतरागता जरूर हो। हालाँकि ऐसा होता नहीं कि वीतराग होने पर तीनों लोकों का ज्ञान न हो, मगर उसे एक धैर्य है। सबको न जाने तो वहाँ अनंत दर्शन नहीं है। अनंत दर्शन कहलाता है समस्त पदार्थों के जाननहार आत्मा का प्रतिभास कर लेना। नहीं हुआ न सही मगर वीतरागता के लिए आप कभी गम न खायेंगे कि वीतरागता न हो तो न सही। ऐसे ही रोग होना जन्म मरण होना आदि दोष यह जरा भी इष्ट नहीं है। तो महिमा किसकी है? वीतरागता की निर्दोष, स्वच्छ हो गए तो प्रभु वीतराग भी हैं, सर्वज्ञ भी हैं और जब यह देह भी दूर हो जाता है, शेष अघातिया कर्म दूर हो गए, केवल आत्मा ही आत्मा असंपृक्त, निर्बंध हर प्रकार से केवल यह सिद्ध भगवान है, उनके स्वरूप को ज्ञानी जानता है और उसकी उन में भक्ति होती है। तो जो सद̖दृष्टि है पंच परमेष्ठी में भक्ति भावना रखता हुआ विशुद्ध रहता है। एक ऐसी दृष्टि होनी चाहिए।
   स्वरूप निर्णेता ज्ञानी के उपासनात्रने परमेष्ठि गुणदर्शन―भैया, स्वरूप निर्णय तो हो मगर देखने में हम को गुण पहले नजर आने चाहिए। गुण प्रेमी यदि हैं तो हमें गुणों पर दृष्टि विशेष होनी चाहिए। समझने को तो समझ लें किंतु उपासना के प्रसंग में हमारी गुण दृष्टि हो। अरहंत भगवान जो अनंत चतुष्टय के धनी हैं उन की उपासना के समय यह दृष्टि नहीं होती कि अभी तो इनके साथ शरीर लगा है, अभी इनके साथ अघातिया कर्म शेष हैं यह दृष्टि नहीं होती। दृष्टि यह होती कि यह अनंत चतुष्टय संपन्न हैं यद्यपि जैसे जो हैं सो वैसा जान रहे हैं पर उपास्य भाव में बस गुणभाव ही दृष्टि में है। ऐसे ही साधु अवस्था में समिति गुप्ति के भाव होते हैं, वे राग निर्मित नहीं है और विराग निर्मित नहीं है, किंतु एक स्थिति है कि बहुत अंशों में राग गल गया और उस स्थिति में जो शेष राग है सो वहाँ प्रवृत्ति इस ढंग की होती है। वहाँ जाना गया सब मगर उपास्य तत्त्व में यह उमंग हुई, आस्था हुई कि धन्य हैं ये मुनिराज, वीतराग होने पर ऐसी समिति गुप्तिरूप चेष्टायें होती हैं, यद्यपि उनमें अभी राग है, पूर्ण विरागता नहीं है पर राग-राग से ही यह वृत्ति नहीं बनती किंतु काफी विरागता रहने पर ऐसी राग की वृत्ति बनती। तो उपासना की भक्ति के प्रसंग में जब तक समझो गुणग्रहण न हो तब तक भक्ति नहीं जगती। ऐसे ही जान लिया कि पूजा शुभोपयोग है और शुद्धोपयोग होना है, उसकी दृष्टि में हेय है मगर पूजन करने वाले को जो ऐसा जान रहा है वह कभी ऐसा भी कहता है क्या कि हे प्रभु हम आप की हेय पूजा कर रहे हैं? यह त्याज्य है, हेय है और आपसे ही तो मिली है यह ऐसी वाणी, ऐसा कोई बोलता है क्या उपासना के प्रसंग में? तो विशुद्धि की ओर दृष्टि है, गुणो की ओर दृष्टि है, सो भक्ति की यह सब महिमा है इससे ये सब बातें चलती हैं। तो एक प्रगति बने अपनी ऐसी कि पूज्य पुरुषों में तो क्या, साधारण जीवों को भी देखें तो हमें चैतन्य स्वभाव दृष्टि में आये। इसमें भी चैतन्य स्वरूप है, अविकार स्वरूप है। उस सहज भाव की दृष्टि बने, जान रहे हैं अब और यह भी बात ज्ञान में आयगी कि एकेंद्रिय आदिक ये सब अवस्थायें हैं, पर वह तथा क्यों नहीं तुरंत ज्ञान में आता तो हमारी ऐसी भावना अभ्यास बने स्वभाव के प्रति कि हमको सर्वत्र तुरंत तो गुण ही गुण नजर में आवें ऐसी भावनाभ्यास के बल से यह जीव अपने स्वभाव की भावना करता है।


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