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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 41

From जैनकोष



उग्गो तिव्वो दुट्ठो दुव्भावो दुस्सुदो दुरालावो।

दुंभइरदो विरुद्धोसो जीवो सम्मउमुक्को।।41।।

   उग्र पुरुष की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―जो प्राणी उग्र प्रकृति वाले हैं, व्यवहार में, अभिप्राय में जिनके उग्रता पड़ी है वे पुरुष सम्यक्त्व से उन्मुक्त हैं। उग्रता कहते हैं उसे तो तीव्र क्रोधी हो, जिसे धर्मात्मा या धर्म न सुहाये, बढ़ते हुए लोगों से ईर्ष्या हो और जिस किसी से किसी भी प्रकार के शब्दों में बोलने की भी भावना रखता हो उसे उग्र कहा करते हैं। उग्रता के लक्षण कृष्णलेश्या में पाये जाते हैं। बड़ा प्रचंड तीव्र क्रोधी, बैर को न छोड़े इस प्रकार के दुष्ट अभिप्राय का हो वह उग्र कहलाता है। सो उग्र स्वभाव वाला पुरुष सम्यक्त्व से सूना है। इन प्राणियों का हित अपने आप के सही स्वभाव के दर्शन में है, अन्यत्र किया हुआ उपयोग इस बहिरात्मा को इष्ट लगता है, किंतु बाहर में इस जीव का हितकारी कोई नहीं है। अज्ञान का अंधेरा है जहाँ बाहर की चीजें सुहाया करें। ज्ञानी पुरुष वह है कि जो अपने आपके सहज स्वरूप की भावना रखता है और अपनी आत्मा में रम करके संतुष्ट रहना चाहता है। इसके विपरीत जिसकी दृष्टि बाहर ही बाहर लगी हुई है वह पुरुष अपने लिए तो उग्र बन ही रहा है तो ऐसा उग्र पुरुष सम्यक्त्व से सूना होता है।
   तीव्र दुष्ट पुरुष की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―जो तीव्र दुष्ट है वह भी सम्यक्त्व से सूना है। दोष देखने की आदत होना इसे दुष्टता कहते हैं क्योंकि जो स्वयं दोषी है उसको निरंतर दूसरों के दोष देखने की आदत रहती है। जिसको गुण प्रिय हैं उसे दूसरों में गुण परखने की आदत होती है। तो जो दूसरों के दोष निहारकर अपने मन को मौज में रखने की आदत बनाये हैं वह पुरुष दुष्ट है क्योंकि उसके उपयोग में दोष ही दोष लदे रहते हैं। गुण के लिए दुष्ट पुरुष के हृदय में स्थान नहीं होता। गुणी गुणों को पसंद करते हैं, दोषी दोष को पसंद करते हैं। जिसमें दोष बसे हुए हैं वह दूसरों के प्रति ईर्ष्या का भाव रख रहा है। दूसरों का विनाश तक कर देने के लिए जिसके मन में भाव उठता हो वह पुरुष तीव्र दुष्ट है। एक कवि ने नीति में कहा है कि―दुर्जनं प्रथमं वंदे सज्जनंतदनंतरम्। मुखप्रक्षालनात्पूर्वं गुदप्रक्षालनं वरम्। याने दुर्जन को पहले नमस्कार करें, सज्जन को बाद में नमस्कार करें, जैसे कि लोग सुबह उठकर पहले क्या धोते हैं? खोटी चीज, बाद में क्या धोते हैं? मुख, तो ऐसे ही प्रथम वंदना करें दुष्ट का उससे दूर रहें, मध्यस्थ रहे, अपने को उससे क्या प्रयोजन? वह सम्यक्त्व से हीन है। यहाँ शिक्षा यह लेवें कि अपने में सदा दूसरों के गुण परखने की आदत बने। दोष परखने की आदत क्यों बनें? मैं अपने उपयोग में दोष का प्रतिबिंब क्यों लाऊँ? मेरे उपयोग में गुणों का प्रतिबिंब हो। साधुसंतों का ध्यान हो, प्रभु के स्वरूप का ध्यान हो, गुण उपयोग में बसें, दोष उपयोग में न आयें। उपयोग में दोष आने की यदि प्रकृति रहेगी तो वह जीवन में ही समय-समय पर बहुत विपत्तियाँ पाता है। तो जो दुष्ट है वह सम्यक्त्व से हीन है।
   दुर्भावनायुक्त प्राणी की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―जो दुर्भावनायुक्त है वह भी सम्यक्त्व से रहित है, किसी का बिगाड़ चाहे न कर सके मगर जहाँ मूढ़ता है वहाँ दूसरों का बिगाड़ करने की दुर्भावना रहती है। स्वयंभूरमण समुद्र में एक बड़ा मच्छ रहता है, जिसकी अवगाहना 1॰॰॰ योजन की है याने चार हजार कोश का लंबा एक मच्छ है। देखो जो बिल्कुल छोटा तालाब हो उस में छोटे मच्छ मिलते, बड़े तालाब हो तो बड़े मच्छ मिलते, समुद्रों में अब भी सुनने में आता कि एक-एक मील तक के मच्छ होते हैं। फिर स्वयंभूरमण समुद्र तो इतने बड़े घेरे का है एक तरफ कि जितने में सारे द्वीप समुद्र समा जायें और फिर भी अधिक रहे। इतने बड़े जल के समूह में ऐसे बड़े मच्छों का होना असंभव बात नहीं। वह जगह इतनी दूर है कि वहाँ तक आजकल मनुष्य जा ही नहीं सकता चाहे कितनी ही विद्यायें पाले। तो ऐसे बड़े मच्छ होने का कारण क्या है कि मच्छ होते हैं नपुंसक और वहाँ का मैला कूड़ा मिट्टी करकट कुछ भी चीज पड़ी हो वहाँ जीव आता है और वही उसका शरीर बन जाता है। कर्म की ऐसी विधि है, विचित्रता है। वह अपना मुख बाये पड़ा रहता है और उसके मुख में से हजारों छोटी बड़ी मच्छियाँ आती जाती रहती हैं, उसके कान में, आँख में एक छोटा तंदुल मच्छ और रहता है वह यह सब लीला देखकर अपने मन में सोचता है कि यह मच्छ कितना मूर्ख है, इसके मुख में हजारों मच्छियाँ जाती रहती हैं फिर भी यह अपना मुख दबा नहीं लेता। इसकी जगह पर यदि मैं होता तो एक भी मच्छी बचने न देता। देखिये इस खोटी भावना के कारण वह मरकर नरक में जाता है। यहाँ भी तो लोग बैठे-बैठे दुर्भावना से बिना ही किसी परिश्रम के पाप बंध किया करते हैं। सर्व जगत सुखी हो ऐसी भावना भाने में कौन सी आफत आ रही है। जो दूसरों के सुखी होने की भावना रखते हैं वे स्वयं भी तत्काल सुखी रहते हैं और आगे भी सुखी रहेंगे। दुर्भावना का फल तो तत्काल भी दुःख देता है और आगे भी दुःख देगा। जो पुरुष दुर्भावना सहित है वह सम्यक्त्व से हीन है, उसे मुक्ति की राह न मिल पायगी, इस कारण इस समय भी यदि शांति चाहिए है तो अपना सद्भाव रखना होगा। सर्व जगत सुखी होवे ऐसी भावना रखें। आजकल भी कुछ बुढ़िया ऐसी सद्भावना वाली मिलती हैं जो स्वयं सुखी हों ले दूसरों के लिए भी कह बैठती कि भगवान ऐसा सबको सुखी करे। उनकी यह बात एक सद्भाव को जाहिर करती है। जो खोटी भावना रखता है उसका सुख बढ़ता नहीं बल्कि नष्ट हो जाता है। जो दुर्भावना से युक्त है वह पुरुष सम्यक्त्वहीन है।
   दुःश्रुत पुरुष की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―दुश्रुत, कुज्ञानी, उल्टा जाननहार पुरुष सम्यक्त्व हीन है। कुज्ञान का दुःख अधिक देखा जाता है। और संदेह करना भी खोटा ज्ञान है, उल्टा जानना भी खोटा ज्ञान है। उल्टा ज्ञान और खोटा ज्ञान इन दोनों खोटे भावों में उसको दुःखी होना पड़ता है। कभी-कभी जैसे किसी को बड़ा शक होता है तो वह पागल तक हो जाता है। बहुत से रोगी तो ऐसे तक देखने को मिले कि जो यह कहते पाये जाते कि मैं क्या खाऊँ, थाली उठाता हूँ तो वहाँ साँप नजर आते, भोजन उठाता तो साँप नजर आते, मुख में कौन चलाता हूँ तो ऐसा लगता कि जैसे साँप ही खा रहे हो। अब उसमें इतनी बड़ी बात आयी कैसे? तो वह पहले हर बात में एक शक की आदत वाला बन गया था। कहीं ऐसा न हो, कहीं ऐसा न हो। शक धीरे-धीरे बढ़-बढ़कर इतना कठिन रूप रख लेता है। किसी पर संदेह की आदत रखे, यह खुद के लिए नुकसान पहुँचाता है और इतना तक नुकसान पहुँचाता कि उसकी बुद्धि में भी फर्क आ जाता। इसे कहते हैं दुर्मति, कुज्ञान। इसी प्रकार उल्टे कुज्ञान में दुःख ही हैं। बात तो कुछ हो और यह जान कुछ ले, उसमें कष्ट ही है। बात कुछ भी नहीं और एक शक ही बन गई या किसी ने कुछ उल्टा कह दिया तो इतना ही सुनने से इतनी कषाय जग जाती है कि उसकी बुद्धि में इतना धैर्य नहीं रहता कि कम से कम इतनी बात पूछ तो ले कि क्या ऐसी बात तुमने हमारे विषय में की है? वह देखना भी नहीं चाहता, अलग ही रहता, बात बढ़ती है, और जब कषाय बढ़ती है, खोटा ज्ञान बढ़ता है तो वहाँ उसका व्यवहार ही शांत नहीं है, सम्यक्त्व की बात तो दूर रहो। सम्यग्दृष्टि के तो ऐसी प्रकृति होती है कि जैसे कोई विपत्ति में फँसा हो, तो वह उसकी रक्षा करने की बात सोचता है उसके मन में अटपट बातें नहीं आती। अटपट बातें तो आती हैं मौज में जिसे कहते हैं लोग सुख वह सांसारिक सुख तो दुःख से भी भयंकर परिणाम वाला है। सुख में ही तो अटपट बातें हैं। दुःखी पुरुष तो अटपट बातें करने से डरता है। वह जानता है कि मेरे कर्मोदय से दुःख आया है, अब अपने आप को अच्छे कर्तव्यों में रहना चाहिए। विपत्तियाँ आने पर धर्म प्रायः सुहाता है, सुख में धर्म कहाँ सुहाये? विरले ही अच्छे भवितव्य वाले हैं जो सुख में भी धर्म की ओर लगे रहते हैं। कोई ऐसी एक घटना हुई होगी कि एक पुरुष नारियल खरीदने पास के बाजार में गया, दुकानदार से पूछा कि भाई नारियल कितने में दोगे?..... डेढ़ रुपये में।.... एक रुपये में न दोगे? अरे भाई यदि एक रुपये में लेना है तो पास के शहर से ले आवो। वह उस पास के शहर में पहुँचा और दुकानदार से बोला भाई नारियल कितने में दोगे? एक रुपये में।... 8 आने में न दोगे। ... अरे भाई यदि 8 आने का लेना है तो अमुक प्रांत में मानो आसाम में चले जावो। वह आसाम पहुँचा, वहाँ पूछा भाई नारियल कितने में दोगे? .... 8 आने का। .... 4 आने में न दोगे? .... अरे 4 आने में लेना हो तो पास के गाँव से ले लावो, वहाँ पहुँचा और पूछा नारियल कितने में दोगे? .... 4 आने में। ..... दो आने में न दोगे? अरे भाई दो आने भी क्यों खर्च करते? देखो उन बगीचों में कितने ही नारियल के वृक्ष खड़े हैं, उनसे मनमाने जितने चाहे नारियल तोड़ लावो। अब वह पहुँचा एक बगीचे में और एक नारियल के वृक्ष पर चढ़ गया। चढ़ने को तो बड़े उमंग के साथ चढ़ गया पर जब ऊपर से नीचे को निगाह गयी तो वह घबड़ा गया और विचारने लगा कि अरे मैं तो बहुत ऊपर चढ़ा हूँ, यदि यहाँ से गिर गया तो बच नहीं सकता। उस समय उस के मन में आया कि यदि मैं आज के दिन अच्छी तरह से नीचे उतर गया तो 5॰ ब्राह्मणों को भोजन कराऊँगा कुछ हिम्मत करके नीचे को खिसका। ऊँचाई कुछ कम हो जाने से उसके मन में आया 5॰ तो नहीं पर 25 को अवश्य भोजन कराऊँगा, फिर कुछ और नीचे खिसका तो विचारने लगा कि 25 को तो नहीं पर 1॰ को अवश्य भोजन कराऊँगा और जब बिल्कुल ही नीचे उतर आया तो विचार ने लगा कि मैं क्यों उन्हें खिलाऊँ। उतरा तो मैं स्वयं हूँ। तो इस कथानक में यह बात दर्शायी गई है कि किसी पर जब कुछ विपत्ति आती है तो उसके मन में आता कि यदि इस बार मैं विपत्ति से बच गया तो खूब धर्म करूँगा, पर जब दैवयोग से वह विपत्ति टल जाती तो धर्म कर्म की सब बातें वह भूल जाता है। जिसका उपयोग व्यसनों में लग गया उसका ज्ञान सही नहीं रहता। जो खोटी बुद्धि वाला है उसको सम्यक्त्व पाने की बात तो दूर रहो, जीवन में कभी शांति भी नहीं प्राप्त कर सकता।
   दुरालापी की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―जो सम्यक्त्व से रिक्त है, खोटे वचन बोलने वाला है वह भव-भव में कष्ट पाता है। किसी से खोटा वचन व्यवहार करने से लाभ क्या? कोई छोटे से भी छोटा हो उसके साथ हित मित प्रिय वचन व्यवहार रहे, इससे तो उसकी उच्चता जाहिर होती है। खोटे बोलने से तो मात्र विपत्ति ही हाथ आती है। एक कवि ने अलंकार में यह कहा कि एक बार दाँत और जीभ का झगड़ा हो गया। दाँत और जीभ इन दोनों ने अपने-अपने बड़प्पन की बहुत-बहुत युक्तियाँ दी। और दाँतों ने यह कहा कि री जीभ तू अकेली है और हम 3॰-32 के करीब में हैं। तू व्यर्थ ही अपने बड़प्पन की बातें बड़बड़ाती है। तुझे कुछ पता नहीं, मैं जिस दिन तुझे मारने के लिए तैयार हो जाऊँगा उसी दिन जरा सी देर में इन 3॰-32 दाँतों के बीच में तुझे दबा दूँगा, तो कट कर गिर जायगी। तो वहाँ जीभ कहती है दाँतों से कि तुम अधिक घमंड की बात न बगराओ। मेरे में तो वह कला है कि किसी को एक ही कड़वा शब्द बोल दूँ तो तुम सभी को एक साथ तुड़वा दूँ। कभी किसी बलवान गुंडे को जरा सी गाली की बात बोल दूँ तो कहो वह मुक्के से मार मारकर तुम सभी को एक साथ में तोड़ दे। तो भाई तो दुष्टभाषी लोग हैं, खोटा बोलने वाले हैं वे इस भव में भी सुख शांति से नहीं रह सकते, उनका यहाँ कोई आदर करने वाला नहीं, उनकी कोई मदद करने वाला नहीं। बल्कि उससे बदला लेने की भावना वाले बहुत होते हैं। तो दुष्टभाषी पुरुष सम्यक्त्व से हीन हैं।
   दुर्मतिरत पुरुषों की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―दुर्मतिरत, जो दुर्बुद्धि में रम रहे हैं, दुर्बुद्धि क्या? पंचेंद्रिय के विषयों में आशक्त होना दुर्बुद्धि है। स्पर्शन इंद्रिय का विषय है तो शीत उष्ण आदिक, पर उसमें काम को स्पर्शन इंद्रिय के विषय में माना, उसमें जिसकी बुद्धि अटकी हो वह सम्यक्त्व का कैसे पात्र है? रसना इंद्रिय का विषय रस खाने की धुन, ऐसा रस मिले तो भोजन लूँ, उसके विचार में बस वही-वही सुहा रहा, तो वह तो एक अज्ञान अंधकार की बात है, रसीले स्वादिष्ट भोजन को कर के यह आत्मा लाभ क्या पा लेगा? बल्कि स्वास्थ्य खोवेगा, बीमार रहेगा और बहुत आकुलित होगा, आरंभ अधिक करना होगा। तो जो रसना में आसक्त है वह दुर्मतिरत है। किसी-किसी को शौक होता है बढ़िया-बढ़िया गुलदस्ते चारों ओर लगाये रहने का। कोट के कालर पर, नाक में, कान में या अन्य कहीं भिन्न-भिन्न प्रकार के तेल फुलेल इत्र लगाने का किसी-किसी को बड़ा शौक होता है, अरे अच्छी खुली हवा में रहे, जो गंध है वह ठीक है, पर उसका उपाय बना बनाकर उस ही में आसक्त रहना, वही-वही सोचना यह कोई भली बात नहीं। कहाँ गई उसकी बुद्धि? पर पदार्थों में, विषयों में, वह अपने स्वरूप की सुध क्या लेगा? चक्षुइंद्रिय के विषय में आसक्त होना, सिनेमा हो, तमाशा हो, बड़ा प्रिय लगना, रात्रि को भी जगना और वही-वही धुन में रहना और वैसा ही विकल्प रहना, प्रयत्न रहना, ये सब दुर्मतियाँ, हैं। इन दुर्मतियों में रत पुरुष सम्यक्त्व का पात्र नहीं। अच्छे राग रागनी के शब्द, प्रीति के शब्द, मोह के शब्द और बुरे शब्द। उनको सुनने की बात जोहना, उसमें खुश होना, ऐसी जिनकी दुर्बुद्धि है उनके सम्यक्त्व कहाँ, याने मुक्ति का मार्ग प्रारंभ नहीं हो पाता। इसी प्रकार विरुद्धभाव जो धर्म के प्रतिकूल भाव है उन भावों में जो रहता है वह जीव सम्यक्त्व का पात्र नहीं है। कुगुरु, कुदेव, कुशास्त्र में अनुराग, देव, शास्त्र गुरु से उपेक्षा, धर्म भी करते तो दिखाने के लिए, यश कीर्ति के लिए। ये सब धर्म के प्रतिकूल बातें हैं। सो धर्म विरुद्ध व्यवहार करने वाले पुरुष सम्यक्त्व से उन्मुक्त हैं। ये खोटी बातें न रहें, सद्भावना में जीवन चले, ऐसा अपना प्रयत्न करना चाहिये।


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