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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 42

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खुद्दो रुद्दो रुट्ठो अणिट्ठपिसुणो सगव्वियोसूयो।

गायणजायणभंडण दुस्सण सीलो दुसम्मउम्मुक्को।।42।।

   आत्महित का आधारभूत निष्पक्षता का महागुण―हम आपका हित किसमें है, इस पर यदि कोई निष्पक्ष होकर अपने आप में चिंतन करे तो इसका उत्तर मिल सकता है। कल्याण चाहते हुए भी दुविधा यह आती है कि इस मनुष्य में जन्मतः या किसी कारण ऐसा पक्ष होता है कि मैं अमुक हूँ। जैसे मैं हिंदू हूँ, ईसाई हूँ, जैन हूँ आदि कुछ भी एक पक्ष रहता है और उस पक्ष में रहते हुए यह अपने भीतर के तत्त्व को ग्रहण नहीं कर पाता। यदि कोई निष्पक्ष होकर एक अपने को आत्मा हूँ इतना ही नाता रखकर हित की खोज करे तो उसे हित मिल सकता है इसके लिए त्याग की आवश्यकता है। त्याग बाहरी चीजों का नहीं कह रहे किंतु अपने अंदर में किसी प्रकार के पक्ष की भावना नहीं। थोड़ी देर को अंदाज करें, जो आज हिंदू जाति में उत्पन्न हुए क्या वे जीव मुस्लिम अथवा अन्य जाति में उत्पन्न न हो सकते थे? हो गए हिंदू, आत्मा की सकल तो न बिगाड़ना चाहिए। आत्मा के तो वह एक ही स्वरूप है, जो जाननहार है, जानने वाला पदार्थ जीव की सकल जीव का स्वरूप सबका एक समान है। जो पुरुष केवल आत्मा के नाते से ही बात सुनेंगे, समझेंगे, विचारेंगे उनको रास्ता मिल जायगा और जो जिस कुल में पैदा हुआ, जिस मजहब में पैदा हुआ, वह केवल उस नाते से विचारेगा तो उसको तत्त्व न मिलेगा। मैं आत्मा जानने वाला पदार्थ हूँ। बस इतना ही मेरा नाता है। इतना ध्यान रखकर यदि चिंतन करें तो अपने आप में बसा हुआ भगवान स्वरूप आत्मा अनुभव में आ जायगा।
   स्वयं में भगवत्स्वरूप का दर्शन―लोग भगवान को ढूँढ़ने, परखने के लिए बाहर में अपने ज्ञान का बड़ा व्यायाम करते हैं। यहाँ देखा वहाँ देखा, वन में देखा, नगरी में देखा, प्रतिमा में देखा, मंदिर में देखा, बाहर-बाहर ही उनकी भावना रहती है भगवान को खोजने की, मगर भगवान आत्मा यह स्वयं अपने आप में मिलता है। खुद में रागद्वेष न हों और एक ज्ञान स्वरूप की ही भावना कर रहा हो तो उसका अपने आप में भगवान के दर्शन होते हैं। मनुष्य का सर्वप्रथम गुण यह होना चाहिए कि वह निष्पक्ष प्रकृति का हो। मैं जीव हूँ, आत्मा हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ, बस मुझे अन्य कुछ न चाहिए। मेरा स्वरूप मेरी दृष्टि में रहे मैं अपने आप के इस ज्ञानानंद धाम अंतस्तत्त्व में रहूँ, बस यह ही तो चाहिए। इसमें जो होना होगा कल्याण के मार्ग में वह स्वयमेव होगा और, इसके लिए कुछ व्यावहारिक बातों की जरूरत है। यह तो है भीतरी श्रद्धा कि जिसके दर्शन से आत्मा का कल्याण होता है।  मगर आत्महित में जो चलना चाहते हैं उनको कैसा होना चाहिए, कैसा न होना चाहिए यह बात और जानना योग्य है।
   क्षुद्र पुरुषों के सम्यक्त्वरिक्तत्व―इस गाथा में यह बतला रहे हैं कि कैसी आदत वाला जीव कल्याण पात्र नहीं होता है, आत्मा का हित नहीं कर सकता है। इसी संबंध में कल भी चर्चा चली थी, आज भी चल रही है। जो पुरुष क्षुद्र हों, हल्के दिल के हों, तुच्छ हृदय के हों, जिन में क्षुद्रता भरी हो, जो छोटी मोटी बात करने वाले हों, छोटा मोटा ही चिंतन करने वाले हों, गैर जिम्मेदार, अपने आप का कुछ महत्त्व न समझें दूसरों को भी तुच्छ जानकर उनसे जैसा चाहे वार्तालाप कर लें, हृदय में जरा भी यह ध्यान न आये कि मेरे व्यवहार से किसी को दुःख भी होगा, ऐसा क्षुद्रता का अभिप्राय जिन जीवों में है वे आत्मकल्याण नहीं कर सकते। यह सब विकट कर्मोदय है। जो क्षुद्रादिक जैसे विचार जीव को मिले, यह मेरा है, यह दूसरे का है, इस तरह का अधिक विचार क्षुद्र प्रकृति में होता है और वह त्याग वृत्ति तक में भी ऐसा भाव रखता कि मेरा नहीं है। यह दूसरा है आदिक यहाँ तक भी विचारता। एक बार की बात है कि कोई दो भाई थे, वे परस्पर में हिल मिलकर बड़े प्रेम से रहते थे। एक बार बड़ा भाई कहीं जा रहा था, उसके दोनों हाथों में एक-एक अमरूद थे बायें हाथ में तो था अमरूद का छोटा फल और दायें हाथ में था बड़ा फल। अचानक ही हुआ क्या कि आगे से उसका एक खुद का लड़का और एक छोटे भाई का लड़का आते दिखा। बाईं ओर तो था छोटे भाई का लड़का और दाहिनी ओर था उसका खुद का लड़का। वहाँ उस बड़े भाई ने जब दोनों को अमरूद देना चाहा तो उस समय उसके मन प्रकृत्या ही ऐसा भाव आया कि बड़ा फल तो अपने बच्चे को दे दूँ और छोटा फल छोटे भाई के बच्चे को दे दूँ, सो किस तरह से हाथ करके दिया कि बायें हाथ पर दाहिना हाथ रखकर बड़ा फल तो खुद के बच्चे को और छोटा फल छोटे भाई के बच्चे को दिया। यह दृश्य देख लिया उस पुरुष के छोटे भाई ने, तो उसके हृदय में एक बहुत बड़ा धक्का सा लगा, और अपने बड़े भाई से कहा भैया अब तो हम न्यारे होना चाहते हैं, एक में अब हमारा तुम्हारा रहना न बन पायगा। छोटे भाई के मुख से ऐसी बात सुनकर उस बड़े भाई को बड़ा खेद हुआ। उसे उस छोटे भाई के प्रति अनुराग तो था ही। वह तो सहसा ही वैसी घटना घट गई, सो वहाँ उस बड़े भाई ने बड़े करुणस्वर में कहा भाई हमारा कसूर माफ करो, बोलो तुम्हें क्या चाहिए? हम तो तुम्हें अपनी सारी जायदाद देने को तैयार हैं। हमें कुछ न चाहिए। हम तो एक झोपड़ी में रहकर साधारण सी स्थिति में अपना गुजारा कर लेंगे। देखिये वहाँ परस्पर में अनुराग तो था ही, कुछ अधिक जान बूझकर वैसी बात नहीं किया, समय की बात थी सो साधारण विकल्प में वैसी घटना घट गई लेकिन विडंबना तो बन गई बिना मतलब? यहाँ तो सहसा हुआ, पर कितने ही घरों में तो एक बहुत बड़ा पक्षपात रहता, और बहुत बड़ा क्षुद्रता का भाव चलता है। समाज में भी किसी-किसी के मन में ऐसा तुच्छता का भाव बन जाता है, तो ऐसे तुच्छ विचार वाले पुरुष सम्यग्दर्शन के पात्र नहीं होते।
   रुद्र पुरुषों की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―व्यवहार में भी दूसरों का भला चाहें तो उससे मोक्ष का मार्ग मिलेगा। जिसका व्यवहार ही गंदा है उसको मोक्षमार्ग कैसे मिल सकेगा? रौद्र परिणाम वाला हो कोई, दूसरे के सताने में मौज मानना, झूठ बोलकर या मजाक करके दूसरे को दुःख पहुँचाकर अपने आप में मौज मानना या कोई चीज चुराकर बचाकर अपने में आनंद मानना, परिग्रह जोड़कर, तृष्णा के साधन जोड़कर उसमें मौज मानना यह सब रुद्र प्रकृति कहलाती है। दूसरे को तो क्लेश होता हो और उस काम में यह मौज मानता हो तो ऐसी छुद्रता जिसके चित्त में होती है वह सम्यक्त्व का पात्र नहीं रहता। सम्यक्त्व का पात्र न रहे इतना ही नहीं, किंतु वह अपने जीवन में शांत सुखी भी नहीं हो पाता। मनुष्य का धन वचन है, तभी कहते हैं कि वचने का दरिद्रता, याने वचनों में दरिद्रता क्या करना, और ऐसा भी न करना चाहिए कि चित्त में तो मायाचार बसा हो और ऊपर से वचन भले कहे जा रहे हों, चित्त भी साफ रखना, वचन भी अच्छे बोलना, शरीर से उत्तम चेष्टा करना यह तो है हित का उपाय और क्षुद्रता के भाव करना यह है संसार में रुलने का उपाय।
   रुष्ट पुरुषों की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―जो पुरुष रुष्ट हो जाय, क्षण भर में रुष्ट और क्षण भर में तुष्ट, कदाचित तुष्ट भी हो जाय, पर जो रुष्ट होता रहे ऐसे पुरुष का उपयोग ऐसे गंदे वातावरण में जाता है, दुर्विचार में जाता है कि वह हित का पात्र नहीं, सम्यक्त्व पाने का पात्र नहीं। सम्यक्त्व कहते हैं अपने आत्मा का असली स्वरूप अपनी दृष्टि में आना। जो स्वरूप लिए बैठे है यह आत्मा का असली स्वरूप नहीं है। नहीं है। यह तो माया का स्वरूप है। माया कहते हैं दो पदार्थ मिलकर एक जैसी स्थिति को उत्पन्न करें उसका नाम है माया, परमार्थ कहलाता है एक ही पदार्थ अकेला ही रहकर अपने स्वभावरूप रहता है उसे कहते हैं परमार्थ। जो पुरुष रुष्ट होता है उसे परमार्थ की सुध नहीं और अपने आप में अनेक कल्पनायें करके, कर्मोदय बढ़ाकर अपने आपका ही घात करता है। तो जो रुष्ट पुरुष है अथवा क्षणिक रुष्ट, क्षणिक तुच्छ ऐसी प्रकृति वाला है, तो ऐसा पुरुष विश्वास का पात्र नहीं होता और ऐसी आदत वाले को सम्यक्त्व की भी पात्रता नहीं। जब ये संसार को अपनी क्रीड़ा का स्थान समझ रहा तो वह भली बात कैसे पायगा? संसार है विपत्तियों का घर और कहीं बाहर में नहीं हैं संसार, अपने परिणामों में है संसार। दूसरे पदार्थ के प्रति रागद्वेषादि के भाव बनाना यह ही संसार है। भला बतलाओ घर में कोई जिसको अपना मान रहे हैं स्त्री, पुत्र, मित्रादिक, उन जीवों के साथ इसका कुछ संबंध भी है क्या? कुछ भी संबंध नहीं। जैसे अन्य सब जीव वैसे ही घर में आये हुए जीव, रंच मात्र भी संबंध नहीं है। गुजारे के लिए संबंध बनाया है। संबंध तो नहीं मगर अपने जीवन का गुजारा चले इसके लिए परिवार का संबंध बनाया है, वस्तुतः संबंध कुछ नहीं। अब जो लोग इस रहस्य को न जाने, तुरंत जो मिल गया है उसे ही अपना सर्वस्व पाने तो उसकी हित में गति नहीं हो सकती। जिसने अपने आत्मा के सहज स्वरूप को पहिचाना है वह ही पुरुष समता परिणाम में रह सकेगा वह रुष्ट न होगा किसी बात में। जिसकी रोष करने की, क्रोध करने की आदत पड़ गई है वह पुरुष सम्यक्त्व का पात्र नहीं होता।
   अनिष्ट व पिशुन पुरुषों की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―जो पुरुष दूसरे का अनिष्ट करे, अनिष्ट विचारे, अनिष्ट-अनिष्ट में ही उसकी बुद्धि जाय, मिलेंगे ऐसे बहुत से लोग जो दूसरों का बुरा करके भीतर से बड़े खुश हुआ करते हैं, अच्छा बहुत से लोग ऐसे भी मिलेंगे कि जो चूहा, गिलहरी, बिल्ली, आदि की पूछ बाँधकर उसके सामने कुत्ता छोड़कर या उनको अग्नि के पास ले जा-जाकर तड़फाते हैं। दुःखी करते हैं और उसमें बड़ा मौज मानते हैं। भला बताओ ऐसे पुरुषों के चित्त में दया कहाँ है? मनुष्य-मनुष्य के प्रति भी ऐसे विचार करने वाले भी होंगे कि दूसरे को नुकसान पहुँचा रहे हैं, दूसरे को दुःखी देख रहे हैं और उसमें वे बड़ा मौज मान रहे हैं। अरे भाई क्या मिला दूसरे के प्रति बुरा विचार करने से? बस यह ही मिला कि खुद का पाप बंध किया। तो जो अनिष्ट पदार्थ से अनुराग करके खुद अनिष्ट बन गया दूसरे के लिए, ऐसा पुरुष सम्यक्त्व से उन्मुक्त है, रहित है। चुगलखोर, यहाँ की बात दूसरे से भिड़ाया, वहाँ की यहाँ से भिड़ाया यह एक बहुत बड़ा अपराध हैं अपना समय खोना, दूसरे का अहित करना, अपना विश्वास हटा लेना, उसमें सारे ऐब आते हैं, भला बतलाओ यदि कोई मनुष्य चुगली करने का काम छोड़ दे तो उसका बिगाड़ क्या है? वह तो सुख से रहेगा, मगर जिसकी ऐसी आदत पड़ जाय कि एक की बात दूसरे से भिड़ाना तो ऐसा पैशून्य करने वाला पुरुष सम्यग्दर्शन से रहित है। भिड़ाने से उन दोनों का झगड़ा बन जाता है और यह देखता रहता है। यह मनुष्य चोरी-चोरी भिड़ाता है, सामने नहीं पड़ता। किसी से कोई बात कह दी, ऐसे चुगलखोर मनुष्य से तो नरक में रहने वाले जीव भले हैं क्योंकि वे नारकी जीव एक दूसरे नारकी को भिड़ाते हैं तो चोरी-चोरी से नहीं भिड़ाते, सामने बोल देते कि यह तुम्हारा पूर्व भव का दुश्मन है। पूर्वभव में इसने तुम्हारे साथ इस तरह का व्यवहार किया... यों सामने बोल देते मगर यह चुगल खोर तो चोरी-चोरी से एक दूसरे को भिड़ाता रहता है, ऐसी चोरी का परिचय रखने वाला पुरुष आत्मा का हित नहीं पा सकता। वह पुरुष सम्यक्त्व से रहित है।
   सगर्वित पुरुषों की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―सगर्वित माने गर्व रखने वाला पुरुष, जो पुरुष अपने चित्त में घमंड रखता है, थोड़ा ज्ञान पाया तो उससे ही ऐसा मानने लगता कि मैंने तो बहुत कुछ चीज प्राप्त की, और ऐसे गर्व की उसके आदत बन जाती है कि बड़े पुरुषों का भी वह तिरस्कार करने लगता है। गर्व का काम ही यह है कि वह बड़े पुरुष को भी कुछ नहीं गिनता, अपने को ही महान समझ कर पूरे अविनय भाव में रहा करता है। ऐसा गर्व में रहने वाला पुरुष आत्मा का हित कैसे पा सकता है? वह कल्याण से बहिर्भूत है। गर्व एक ही तरह का नहीं होता। किसी को कुल का गर्व है, किसी को जाति का गर्व है, किसी को ऐश्वर्य का गर्व है, किसी को धन संपदा का गर्व है किसी को रूप का गर्व है, किसी को बल का गर्व है, और ज्ञान का गर्व होना वह सब गर्वों में बुरा गर्व है क्योंकि जाति कुल वाले जो गर्व हैं उनको तो मिटाने का उपाय भी होता है, वह उपाय क्या है? ज्ञान, भेदज्ञान, यथार्थज्ञान। अब कोई ज्ञान पर ही गर्व करे तो उसका उपाय फिर नहीं रहता, क्योंकि ज्ञान ही तो गर्व को मिटाने का उपाय था और ज्ञान पर ही कोई गर्व करे तो अब वह बेइलाज रोगी हो जाता है। ज्ञानी पुरुष के चित्त में गर्व नहीं रहता, पर जिसके अज्ञान है और भ्रम से वह मान ले कि मेरे को ज्ञान जगा, बाकी सब अज्ञानी हैं, ना समझ हैं, ऐसा जिन को गर्व होता है वे सम्यक्त्व से रहित हैं।
   ईर्ष्यालु पुरुषों की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―ईर्ष्यालु पुरुष भी बड़े गंदे होते हैं कोई धन में बढ़ रहा हो, कोई ज्ञान में बढ़ रहा हो उससे ईर्ष्या, कोई इज्जत में बढ़ रहा हो उससे ईर्ष्या और ईर्ष्या का ऐसा रूप होता है कि वह इतना तक विचार लेता कि मेरी बरबादी हो जाय तो हो मगर यह दूसरा भी बरबाद हो जाय। वह ईर्ष्या का रूप होता है और जिसके चित्त में ईर्ष्या है वह जो कुछ उसने पाया है वह भी उसके लिए न पाये की तरह है। जैसे मानो किसी ने 1॰ हजार रुपये कमाये, किसी ने 5॰ हजार कमा लिये तो 1॰ हजार रुपये जिसने कमाया वह 5॰ हजार रुपये कमाने वाले से ईर्ष्या करता है, परिणाम यह होता है कि वह उस 1॰ हजार का भी सुख नहीं लूट पाता। वह तो दूसरे से ईर्ष्या करके रात दिन तड़फता रहता है। ऐसी ईर्ष्या रखने वाले पुरुष सम्यक्त्व के पात्र नहीं होते। अब वस्तुतः विचारें कि मानो किसी ने 1॰ हजार रुपये कमाया है, अपने घर का उससे काम चलाता है तो उसे कौन सी मुसीबत आ गई जो अपने से अधिक धनिक से ईर्ष्या कर बैठे? जब ऐसा ही अज्ञानभरी कषाय का उदय होता है तो उसके ईर्ष्या जगती है, और जब कभी ज्ञानियों से, त्यागी, साधु संतों से ईर्ष्या का भाव आ जाय तब तो वह बेइलाज रोगी बन गया क्योंकि जो त्यागी व्रतीजनों से ईर्ष्या जैसे दुर्गुण को समाप्त कर सकता था उसी के प्रति अनादर बन गया तो ऐसी ईर्ष्या चित्त में रखने वाले पुरुष सम्यक्त्व से उन्मुक्त हैं वे कल्याण के पात्र नहीं हैं।
   तुच्छव्यवसायी कलहप्रिय दुःशीलपुरुषों की सम्यक्त्वोन्मुक्तता―इसी तरह क्षुद्र प्रकृति वाले गा बजाकर नृत्य करके जो आजीविका बनाया करते हैं और जगह-जगह डोलकर मांगते रहते हैं ऐसे पुरुष भी अगंभीर अपने आप के महत्त्व को न आँकने वाले होते हैं, वे पुरुष भी सम्यक्त्व के पात्र नहीं हो पाते। यहाँ यह बतलाया जा रहा है कि अपना भविष्य अगर सुधारना है तो भली बात अपने चित्त में बसानी है, जिसको निरख कर आत्मसंतोष रहे, उसे आकुलता न जगे, तो उसका कर्तव्य है कि अपना व्यवहार इतना विशुद्ध रखें के किसी कारण शल्य न बने, जैसे ज्यादह बोलचाल करने से कभी कोई शब्द खोटा तुच्छ निकल गया तो उस बोल के बाद उसे भीतर में बड़ा पछतावा होगा, ऐसा काम ही क्यों करे? क्या जरूरत पड़ी है कि जो बाहरी दूसरे लोगों से हम अधिक संबंध बढ़ायें। प्रयोजन माफिक जितना धर्महेतु आवश्यक है उतना तो संबंध रहे मगर अनावश्यक क्यों संपर्क बढ़ायें? तो जो अपने जीवन का महत्त्व नहीं समझता और अटपट स्वच्छंद आचरण में लग जाता वह पुरुष सम्यक्त्व से रिक्त रहता है, ऐसी कलह करने वाला पुरुष जिसको झगड़ा पसंद है झगड़ा देखना पसंद है, कहीं दूसरी जगह झगड़ा होता हो तो वह बड़ी उमंग के साथ पहुँचता है, चाहे कैसी ही हालत उस लड़ाई में बन रही हो पर यह देखकर खुश होता है।

तो कलहप्रिय है, लड़ाई करने वाला है ऐसा पुरुष आत्मा की भलाई का क्या ख्याल कर सकता? वह सम्यक्त्व से रिक्त है। इसी प्रकार दोष देने वाला, दूसरे को ऐब लगाने वाला और दोष ही दोष जिसके ज्ञान में बसे रहा करते हों, ऐसा दूसरों को दोष लगाने की प्रकृति रखने वाला पुरुष सम्यक्त्व से रिक्त है। आत्मा गुणमय है, ज्ञानमय है, उस ज्ञान का महत्त्व समझें, दूसरों में भी ज्ञान देखें। उनका भी जो महत्त्व जाने वह तो होगा कल्याण का पात्र और जो खुद को ही बहुत महान समझ ले, जो दूसरों को सताये, लापरवाही करे, ऐसा पुरुष सम्यक्त्व से रिक्त होता है।


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