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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 43

From जैनकोष



वाणर-गद̖दह-साण गय-वग्घ-वराहकराह।

पक्खि जलूय-सहावणर जिणवर धम्म-विणासु।।43।।

   वानर स्वभाव वाले पुरुषों द्वारा धर्म विनाश―ऐसा पुरुष जिन धर्म का विनाश करने वाला है जो बंदर, गधा, कुत्ता, हाथी, बाघ, सूकर, कछुवा, पक्षी और जोंक जैसा स्वभाव रखता है। धर्म का विनाश करने वाला क्या, वह तो अपने आप के ही धर्म का नाश करता है और व्यवहार में जो तीर्थ प्रवृत्ति है, जो एक धर्म की परंपरा है उसका भी नाश करता है। बंदर स्वभाव वाला मनुष्य चंचल होता है, स्वयं के लिए वह कुछ न कर सके और दूसरे का विनाश करे, वह होता है बंदर के स्वभाव वाला, बच्चों की पुस्तक में एक कहानी आती है कि एक बार कोई बंदर एक पेड़ पर चढ़ा और उस पेड़ पर एक पक्षी अपना घोंसला बनाकर रहता था कुछ बरसात हो रही थी। पक्षी तो अपने घोंसले में भली प्रकार बैठा था और यह बंदर बरसात की वजह से ठंड से ठिठुर रहा था, दुःख पा रहा था तो अचानक ही उसकी दृष्टि उस घोंसले पर गई और कुछ क्रूर दृष्टि से देखने लगा तो वहाँ वह पक्षी कहता है कि रे बंदर तू तो मनुष्यों जैसा हाथ पैर वाला है। यदि तू चाहे तो छोटी मोटी कुटी बनाकर आराम से रह सकता है। कहो ईंटों को ढेर ढंग से रखकर कुटी जैसी बना ले और आराम से रहे लेकिन बंदर होता है प्रकृति से चंचल, दूसरे का विनाश करने वाला उसकी आदत ही ऐसी है कि वह बिगाड़ करे तो जब इस प्रकार से पक्षी को समझाते हुए देखा तो झट पहुँचा उस घोंसले के पास और उस घोंसले को तोड़कर फेंक दिया। वह बेचारा पक्षी असहाय होकर बाहर बैठा रह गया। तो बंदर जैसा स्वभाव जिन मनुष्यों के हैं वे खुद अपनी व्यवस्था नहीं बना सकते, और दूसरे की अवस्था बिगाड़ देते, ऐसे मनुष्य धर्म का विनाश करते हैं। वे अपने धर्म का तो नाश करते ही हैं याने समता का परिणाम न होना, कषाय जगना, यह अपना विनाश है, पर उनकी क्रियाओं से जनता में भी धर्मप्रवृत्ति नहीं रह पाती इसलिए व्यवहार धर्म का भी विनाश है।
   गर्दभ स्वभाव वाले पुरुषों द्वारा धर्मविनाश―दूसरे स्वभाव वाले लोग हैं गधा जैसे स्वभाव वाले। गधे का नाम ही लोगों को असह्य है। जो बच्चा कुछ पढ़ता लिखता नहीं उसे मास्टर लोग गधा कहकर पुकारते हैं। घर में भी बुद्धिहीन बालक को लोग गधा कहकर चिल्लाते हैं। गधा, बेवकूफ, आदि और वह गधा एक अज्ञानी प्राणी है, वह केवल दूसरों का बोझ ढोता है और खुद के लिए नहीं। यदि गधा कोई चंदन की लकड़ी लादे लिए जा रहा हो तो उस चंदन की गंध का मौज उस गधे को नहीं मिलता, वह तो बोझ लादे है। पर स्वयं उसको कोई गंध नहीं मिल पाता, दूसरे तो उससे किसी प्रकार का फायदा उठा लें, पर यह खुद कुछ लाभ नहीं ले सकता, वह पुरुष गधे की प्रकृति वाला कहलाता है। एक धोबी के घर एक गधा था और एक कुतिया भी। प्रायः करके ऐसे लोग कुत्ता या कुतिया पाला करते हैं। गधा तो रोज बोझ ढोने के काम आता और जो कुछ रूखा-सूखा उसे खाने को मिल गया बस उसी में संतुष्ट रहता, और कुतिया काम कुछ नहीं करती फिर भी उसे मालिक से प्यार मिलता। तो एक बार उस धोबी के घर पली हुई कुतिया ने बच्चे पैदा किए, उसके छोटे-छोटे बच्चों से धोबी बड़ा प्रेम करता था। वे कुतिया के बच्चे मालिक के ऊपर पंजे भी मारते, मुख से काट भी लेते फिर भी मालिक उनसे प्यार करता। यह दृश्य वहाँ बँधा हुआ गधा देखा करता था। एक दिन उसके मन में आया कि देखो मैं इस मालिक की कितनी तो सेवा करता, इसका बोझ ढोता, गृहस्थी चलाता, फिर भी हमसे प्रेम नहीं करता और ये कुतिया के बच्चे इसके किसी काम नहीं आते फिर भी इनसे बड़ा प्रेम करता।
   आखिर उस गधे की समझ में आया कि वे कुतिया के बच्चे चूँकि उसे पँजों से मारते हैं, मुख से काटते हैं इसलिए मालिक उनसे प्रेम करता है, सो मुझे भी वैसा ही करना चाहिए ताकि मालिक से प्यार मिले। बस क्या था, गधे ने उस धोबी को अपने पैरों से दुलत्ती मारना शुरू किया और मुख से काटना भी। वहाँ धोबी ने डंडा उठाया और उस गधे को पीटना शुरू किया। तो जैसे कुतिया के बच्चों का कार्य देखकर गधे का भी उस प्रकार का कार्य करना एक अज्ञानतापूर्ण कार्य था ऐसे ही अज्ञानीजन ज्ञानियों की बाह्य क्रियावों को देखकर उसकी वास्तविकता को न समझकर उन जैसी क्रियायें करने लगें तो वह भी उनका अज्ञानतापूर्ण कार्य है। ऐसा अज्ञानतापूर्ण कार्य करने का जो स्वभाव रखते हैं, जिन्हें कुछ विवेक नहीं वे गधा जैसे स्वभाव के होते हैं। और वे स्वयं भी धर्म में नहीं है और धर्मप्रवृत्ति का भी नाश करते हैं।
   श्वान स्वभाव वाले पुरुषों द्वारा धर्मविनाश―इसी तरह कुछ लोग होते हैं कुत्ते के स्वभाव वाले। कुत्ते में भी अज्ञान है, और एक अज्ञान ऐसा विकट है कि कोई पुरुष अगर उसे लाठी मारे तो वह लाठी को चबाता है। उसकी सिंह जैसी दृष्टि नहीं बन पाती कि मुझे मारने वाली यह लाठी नहीं है किंतु यह पुरुष है। तो जैसे कुत्ते को कोई मारे तो वह लाठी चबाता है ऐसे ही तो मिथ्यादृष्टियों का ज्ञान है। मिथ्यादृष्टि अज्ञानी जीव दुःख भोग रहा है तो कर्मोदय से दुःख भोग रहा, सो अपने कर्म पर तो दृष्टि देता नहीं और बाहरी पदार्थों पर दृष्टि देता है कि इसने मुझे दुःखी किया। और भी कुत्ते में अवगुण होते। अपनी जाति के दूसरे प्राणियों को देख करके भौंकना। कोई कुत्ता नये मुहल्ले से निकले तो वहाँ के कुत्ते उससे बहुत लड़ते हैं, तो ऐसे ही कुत्ते जैसा स्वभाव साधर्मियों में प्रीति न होना और बाह्य पदार्थों पर अधिक दृष्टि होना, निमित्ताधीन दृष्टि होना, ऐसी प्रकृति के जो मनुष्य हैं वे स्वयं तो धर्म करेंगे ही क्या। पर वे व्यवहार धर्म का भी विनाश करते हैं। वैसे कई दृष्टियों से कुत्ता भला होता है। पहरेदारी करे, घर की रक्षा करे, कोई दो टुकड़े खिला दे तो पूँछ हिलाकर विनय प्रदर्शित करे, और सिंह में कोई गुण ही नहीं है, बड़ा क्रूर होता, खूंखार होता मगर यह क्या फर्क आया कि अगर किसी मनुष्य की कोई ऐसी तारीफ करे कि यह तो सिंह के समान है, शेर दिल है तो ऐसी बात सुनकर वह बहुत खुश होता है। हालांकि उसने तो यह कहा कि यह शेर के समान है मायने खूँखार है, दूसरों को दुःख देने वाला है, कोई काम का नहीं है, अर्थ तो यह निकला मगर वह सुनने वाला बड़ा खुश होता है कि मुझे शेर के समान कहा। और यदि किसी को कह दिया जाय कि यह कुत्ते के समान है तो इसमें हुई प्रशंसा कि विनयशील है। कृतज्ञ है, रक्षा करने वाला है, मगर उसे सुनकर लोग बडा खेद मानते हैं। बताओ यह फर्क कहाँ से आया? तो वह फर्क मूल में यही है कि सिंह की दृष्टि तो होती है यथार्थ। जैसे सिंह को कोई लाठी मारे तो वह लाठी को नहीं चबाता, वह तो उस हमलावर पर ही हमला करता है, उसे सही ज्ञान है कि मुझको तो इसने पीटा है और कुत्ते को ऐसा ज्ञान होता कि मुझको तो उस लाठी ने पीटा है। तो जिसमें अज्ञान बसा हो, वस्तु के स्वरूप का सही परिचय न हो, साधर्मियों को देखकर गुर्राये वह पुरुष न स्वयं धर्म कर पाता है और न वह व्यवहार धर्म का ही प्रवाह रख सकता है।
   गज व्याघ्र जैसे स्वभाव वाले पुरुषों द्वारा धर्मविनाश―कुछ पुरुष होते हैं हाथी जैसे स्वभाव के। हाथी के विषय में समयसार में भी वर्णन आया है कि अज्ञानवस्तु सतृणाभ्यवहारकारी आदि। हाथी को कोई यदि हलुवा भी खाने के लिए उसके सामने धर दे और घास भी तो वह उन दोनों को एक साथ मिलाकर खा जाता है। वह हलवा का विवेक नहीं कर सकता। इसी तरह अज्ञानी जीव भी ज्ञेय में रहकर ज्ञान का स्वाद लिया करते हैं, ज्ञान का स्वयं अलग से स्वाद नहीं ले सकते। और ले तो रहे हैं स्वाद ज्ञान का मगर ध्यान बनाते हैं कि हम इन पदार्थों का स्वाद लेते हैं। तो उनको विवेक नहीं है। धर्म नाम है अपने सहज ज्ञान स्वरूप की उपासना करने का। जो पुरुष इस ज्ञानतत्त्व को नहीं जानते और बाहरी ज्ञेय पदार्थों पर ही आशक्त हो रहे हैं वे पुरुष न स्वयं धर्म पाते हैं और न व्यवहार धर्म का प्रवाह रख सकते हैं। कोई पुरुष होते हैं व्याघ्र जैसे स्वभाव के, क्रूर, जिससे किसी को कोई लाभ नहीं है बल्कि प्राणघात का ही संशय बना रहता है। तो ऐसे ही जो दुष्ट है, क्रूर है, जिससे किसी का भी भला नहीं, काम का आना तो दूर रहा, उल्टा वह प्राणघात करे, दोषदर्शी हो, ऐसा पुरुष व्याघ्र जैसे स्वभाव का है। वह न तो स्वयं धर्म में लग सकता है और न व्यवहार धर्म की रक्षा कर पाता है। कुछ पुरुष होते हैं सूकर जैसे स्वभाव के।
   शूकर कच्छप पक्षी जौंक स्वभाव वाले पुरुषों के द्वारा धर्मविनाश―सूकर भी एक बहुत बुरी गाली जैसी बात बन गई है तो इसमें कोई अवगुण ही तो है। वह स्वच्छता को तो पसंद ही नहीं करता। कीचड़ गंदगी में ही मस्त रहता, जिसका भोजन भी बहुत दुर्गंधित वस्तु है, ऐसे ही जो अभक्ष्य भक्षण करें, अपवित्रता के आचरण से रहने में ही मौज मानें ऐसे पुरुष न तो स्वयं धर्म कर पाते हैं और न व्यवहार धर्म की रक्षा कर सकते हैं। कुछ पुरुष होते हैं कछुवा जैसे स्वभाव के, याने जो स्वयं मंदबुद्धि हों, आलसी प्रकृति के हों, कठोर हृदय के हों, ऐसे ही जो पुरुष मंद बुद्धि के हों, आलसी हों, कठोर हों, वे न तो स्वयं धर्म कर सकते हैं और न व्यवहार धर्म की रक्षा कर पाते हैं। कुछ पुरुष होते हैं पक्षी जैसे स्वभाव के। जहाँ बैठे, जहाँ निवास हैं वहाँ ही स्थान गंदा करें, अपवित्र करें, अपने उठने बैठने के स्थान को भी वे पवित्र और स्वच्छ रख ही नहीं सकते, ऐसे ही जो पुरुष अपने ही धाम को गंदा करें, विवेक नहीं वे पुरुष न स्वयं धर्म कर सकते न व्यवहार धर्म का प्रवाह बना सकते। कुछ पुरुष होते हैं जौं स्वभाव के। जैसे जोंक यदि गाय के थन में भी लग जाय तो भी वह दूध न पीकर खून ही पीती है ऐसे ही कुछ मनुष्य ऐसे होते कि जो किसी भी संग प्रसंग में रहें मगर वे उसके गुणों को नहीं ग्रहण करते, दोषों पर ही दृष्टि रखा करते हैं, क्योंकि वे स्वयं दोषप्रिय हैं। तो उन्हें दूसरे के दोष देखने में कुछ मौज आता है। तो जोंक जैसी प्रकृति के लोग जो दोषग्राही हैं, गुण को अलग कर देने वाले हैं वे पुरुष न स्वयं धर्म कर सकते और न धर्म की रक्षा कर सकते, ऐसी प्रकृति के पुरुष धर्म का विनाश करते हैं।


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