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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 69

From जैनकोष



‘भू-महिला, कणयाई लोहाहि विसहरो कहं पि हवे।

सम्मत्तणाण वे रग्गोसहमंतेण सह जिणुद्दिट्ठ।।69।।’

   लोभ है विषधर भंयकर विष वाला सर्प जैसे सर्प दुःखदायी होता है घर में जरा दिख भी जाय किसी कमरे में तो रात को उस कमरे में सोने की हिम्मत नहीं होती। चाहे वह सर्प कहीं का कहीं चला जाय मगर बार-बार उसका ख्याल बना रहने से नींद नहीं आती है। ऐसा दुःखदायी है, और जिसे डस ले तो बहुत कम पुरुष ऐसे होते हैं जो बच पाते हैं यदि तेज विष वाला सर्प हो तो उसके काटने पर कोई बचता नहीं, मगर विषधर विष को भी बचा सकते हैं मंत्र, तंत्र, सिद्धि, औषधि द्वारा ऐसे ही पृथ्वी कास्त्रीकास्वर्णादिक का जो लोभ है वह विषधर के समान दुःखदायी होता है उसे नष्ट किया जा सकता है तो सम्यक्त्व ज्ञान वैराग्य रूपी औषधि और मंत्र से औषधि सेवन करने पर उसका ऐसा निमित नैमित्तिक भाव है कि जैसे ही उस औषधि का सार नसों में व्याप्त होता है वैसे ही विष रस बदल जाता है तो विष के विरुद्ध जो औषधि दी जाती है वह उस विष को नष्ट कर देती है खाये हुए का असर नसाजाल में अधिक हो तो नसाजाल उसी में बनता है। तो विषधर का विष भी दूर हो जाता है।
   ज्ञान मंत्र का प्रभाव―जैसे विषधर का विष दूर हो जाता है वैसे ही ज्ञान मंत्र से मोह लोभ सब कलंक विष नष्ट हो जाते हैं। कोई साधक मंत्र पढ़ा रहा है और मंत्र पढ़ने वाले हाथ से कुछ क्रियायें भी करता है तो कहीं उसका कुछ असर उस सर्प से उसे हुए पुरुष में जाता नहीं है पर कैसा एक निमित नैमित्तिक भाव है कि वह तो मंत्र पढ़ रहा है और वहाँ विष दूर हो जाता है। यह भी एक अद्भुत शक्ति है और शक्ति क्या है? मंत्र शक्ति मायने आत्मशक्ति एक विश्वास आत्मा के बल का अद्भुत चमत्कार है वह सरल तो बने मायाचार रहित तो बने सर्व जीवों के सुख का अभ्यासी तो बनें दूसरे की प्रतिष्ठा देखकर ईर्ष्या तो न करे ऐसा हृदय बने तो उसमें बल स्वयं विकसित होता है, प्रसिद्धियाँ विकसित होती है। रागद्वेष, विषय कषाय इनका अभाव हो और आत्मा के गुणों का विकास हो, ये सब आत्मा के चमत्कार है तो जैसे मंत्र बल से विष का हटाव हो जाता है ऐसे ही ज्ञानबल से इन लोभादिक विषयों का हटाव हो जाता है। धन्य है वह पुरुष, धन्य है वह जीव जिसकी दृष्टि निज अविकार ज्ञानस्वरूप में जाय और उसे अपना माने उसके अतिरिक्त अन्य पदार्थों को भिन्न समझे। यह बात जिसके उपयोग में समायी है वह पवित्र है ऐसा ज्ञानी पुरुष लोभ विषधर के विष को दूर कर देता है।


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