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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 70

From जैनकोष



‘‘पुव्वं जो पंचेंदिय तणु मणुवचि हत्थपायमुंडाउ।

पच्छा सिरमंडाउ सिवगइ पहणायगो होई।।70।।’’

   पंचेंद्रिययादि मुंडनपूर्वक शिरोमुंडन की प्रतिष्ठा―मोक्षमार्ग में गमन करने का अधिकारी कौन है, इसका वर्णन इस गाथा में किया जा रहा है। जो पुरुष पहले तो पंचेंद्रिय, शरीर, मन, वचन, हाथ पैरादिक को मुड़ावे याने इनका मंडन करे, इनके वश में न रहे इनके शृंगार की बात न सोचे पहले तो अपनी इंद्रियों का मंडन करे पीछे फिर जो केशों का मुंडन करता है। वह मोक्ष मार्ग का पथिक होता है। भाव यह है कि एक केश लोंच देकर हटा देने में या बाहरी कोई भेष बनाकर रह लेने में मोक्ष का मार्ग नहीं मिलता है। मोक्ष मार्ग मिलता है सम्यग्ज्ञान से और सम्यग्ज्ञान की स्थिरता बनने से/तो जिसको यह स्थिरता बनती है वह निर्ग्रंथ् मार्ग से चलकर ही बना पाता है। वह एक बाह्य साधन है। निमित्त भी नहीं किंतु एक आश्रयभूत जैसी चीज है, पर कर्म नष्ट होते हैं तो ज्ञान बल से नष्ट हुआ करते हैं। कोई सा भी मामला हों।
   बात थी कितनी सी जड़ में व बात भी कितनी सी करनी―एक भजन में ऐसा छंद आया है कि ‘‘बात थी कितनी सी जड़ में, हो गया कितना बतंगड़’’ यह उस छंद में पहली लाइन है, इसमें कहा कि देखो जड़ में (मूल में) कितनी सी बात थी शरीर को मान लिया यह मैं कोई कहे कि यह कोई इतना बड़ा गुनाह तो नहीं किया लोक दृष्टि से कि उसे प्राणदंड मिले या उसे लोग बहुत-बहुत बुरा कहें। वह बैठा है अपने आप में और धीरे से भीतर ही चुपके से स्वीकार भर कर लिया देह को कि यह मैं हूँ तो यह कोई बड़ा अपराध नहीं जंचेगा। तो बात थी कितनी से जड़ में हो गया कितना बतंगड। कितना बतंगड़ बन गया, एकेंद्रिय में जन्म ले, नरक में जाय, निगोद में जाय, कीड़ा मकोड़ा बने और कैसे-कैसे दुःख भोगे, यह सब विडंबना बनती है जरा सी बात में कि इस देह को मान लिया कि यह मैं हूँ। बात तो जरा सी नहीं है पर केवल उत्साह के लिए, एक रास्ता निकालने के लिए बात कही जा रही है। इसमें बात भी कितनी सी करनी, दूर होगा सब भदंगड़। यह सारा का सारा बतंगड़ बना देहात्मबुद्धि करने से मगर यह सब भग जायगा जरा सी बात करने से जरा और निकट आये इस देह से हटकर और ज्ञान स्वरूप अंतस्तत्त्व में अनुभव बनाये कि यह हूँ मैं, इतना सा काम करना है। यह कोई बड़ा काम है क्या? तकलीफ का काम है क्या? एक बैठे ही बैठे भीतर में यह सोच लिया जाय कि यह हूँ मैं अविकार ज्ञान स्वरूप बस इतनी सी बात आनी चाहिए कि यह सारा का सारा बतंगड़ दूर हो जायगा।
   अविकार ज्ञानस्वरूप की उपासना का महत्त्व―कल्याण का रास्ता तो बिल्कुल साफ है, बहुत सुगम है और अद्भुत शांति और आनंद का देने वाला है। मगर उस बात को करने में जैसे कहते हैं लोग कि चीं बोल गया। बच्चे खेलते हैं कोई ऐसा खेल कि जिस में पकड़ ले और वह कह दे कि मैं हार गया तब उसे छोड़ना, तो हार गया शब्द न बोलना किंतु वही कह दे कि मैं हार गया तो यह चीं बोलना हार गए का पर्यायवाची शब्द है। तो जैसे वही चीं बोल गया ऐसे ही आत्मकल्याण के मार्ग में चलना तो बिल्कुल सुगम बात है। कोई कठिन बात नहीं पर इतनी भी सरल बात करने में चीं क्यों बोल दिया जाता है। अनंत काल तक संसार के संकट सहना तो मंजूर है पर एक आध सेकेंड को सारे विकल्पों का बोझ हटाकर अविकार ज्ञानस्वरूप में मग्न होना। यह मंजूर नहीं हो रहा। यह कितने बड़े अपराध की बात है। तो मोक्षमार्ग में वहीं पुरुष गमन करता है जिसको अपने अविकार ज्ञानस्वरूप का परिचय हो गया, सो ही कह रहे यहाँ पर कि भाई पहले तो 5 इंद्रिय शरीर मन, वचन, काय, हाथ पैरादिक इनका मुंडन करें, जिसने सिर का मुंडन किया उसके लिए आवश्यक है कि पहले इनका मुंडन करें, प्राकृत भाषा में मुंडन शब्द दिया है जिसका अर्थ है केशलुंच किया, मुंडन किया। तो पहले इंद्रिय का मुंडन करे फिर मुंडन करें अपने सिर का तो वह पुरुष मोक्षमार्ग का नायक बनता है, अर्थात् कषायों को नष्ट करना, विषयों से निवृत्त होना, यह प्रधान काम है।


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