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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:लिंगपाहुड - गाथा 15

From जैनकोष



उप्पडदि पडदि धावदि पुढवीओ खणदि लिंगरूवेण ।

दरियावह धारंतो तिरिक्खजोणी ण सो समणो ।।15꠰।

(35) ईर्यासमिति को भूलकर अटपट दौड़ने गिरने वाले मुनिवेषियों की अश्रमणता―जो मुनिभेष धारण कर अटपट जल्दी उलायत कर दौड़ता है, गिर भी जाता है, ऐसा तेज पृथ्वी पर पैर रखकर चलता है कि वहाँ कुछ गड̖ढासा भी हो जाये याने कुछ विशेष तेज चिन्ह उभर जायें, तो ऐसी शीघ्रता का गमन जो रखता है वह तिर्यंचयोनि का है, वह श्रमण नहीं है । ईर्यासमिति से गमन बताया है कि नहीं? न बहुत धीरे चलना, न बहुत जोर से चलना, बहुत जोर से चलना तो यों अनुचित है कि उसमें जीवरक्षा नहीं हो पाती, बहुत धीरे से चलना कोई प्रकरण ही नहीं बताता और एक व्यर्थ का बनावटी श्रम और समय गंवाने की बात है । धीरे चलने में उतना दोष की बात नहीं जितना कि तेज चलने में है । कभी-कभी तो वह मुनिभेषी यह बात सुनकर खुश हो जाता । कोई कहे कि आपकी बड़ी तेज चाल है, आपकी चाल के सामने तो लोगों को दौड़ना पड़ता है, वह तो समझता है कि इसमें मेरी प्रशंसा हो रही, किंतु बन रही है निंदा । याने आप ईर्यासमिति के विरुद्ध परिणाम करते हैं, जीवरक्षा का उसके भाव ही नहीं है जो इतना तेज चला करते हैं । तो ईर्यासमिति में बहुत तेज चलना, दौड़कर चलना और उस चलते हुए में गिर जाना ये सब बातें मुनिभेष धारण कर जो करता है, वह श्रमण नहीं है, किंतु तिर्यंच योनि वाला है ꠰


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