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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:लिंगपाहुड - गाथा 16

From जैनकोष



बंधो णिरओ संतो सस्सं खंडेदि तह य वसुहं पि ।

छिंददि तरुगण बहुसो तिरिक्खजोणी ण सो समणो ।।16।।

(26) वनस्पति पर चलने वाले व पृथ्वी पर धमाधम चलने वाले मुनिवेषियों की पशुसमता―जो मुनिभेष धारण करके वनस्पति आदिक की हिंसा से जिसके बंध होता है, वहाँ दूषण करता हुआ बंध को नहीं गिनता है तो समझिये कि वह धान को ही जैसे कोई बिगाड़ देता है ऐसी उनकी वृत्ति है, जैसे तिर्यंच ही ऐसा कार्य किया करते हैं, खेत भरपूर हैं, धान्य फल आ रहे हैं, तो कोई पशु उनको वालों को खा ले या उनको नीचे जड़ों से उखाड़ता है तो यह तो तिर्यंचयोनि वालों के काम हैं और वे पशु अपने दोषों को कुछ नहीं गिनते, चाहे वे बँध जाये, गिरफ्तार हो जायें, पिट जाये, मगर उन तिर्यंचों की प्रकृति ही कुछ ऐसी होती कि जरा भी मौका मिले तो वे सोचते हैं कि मैं इस खेत में घुसकर इस खड़ी हुई धान आदि की फसल को खाऊँ, तो ऐसे ही वह मुनिभेषी साधु ऐसे हिंसा आदिक के कार्य करके वे बंध को भी नहीं गिनते कि मेरे कर्मबंध होगा और उसका फल मुझे भोगना होगा । यह बात बिल्कुल निश्चित है कि जैसा जो भाव करेगा उसके वैसा कर्मबंध होगा । और जो बंध हो चुका वह कोई बड़े विशाल ज्ञानबल के बिना हटाया नहीं जा सकता । तो यह ही समझिये कि जो कर्मबंध किया, उसका फल भोगना ही पड़ता है । तो जो विवेकी है वह अपने द्वारा किए हुए दोष को दोष समझता है और बंध से दूर रहना चाहता है । किंतु जो पर्यायबुद्धि वाला है वह दोष को भी नहीं समझना चाहता और बंध को भी नहीं दिखता । तो जो साधु दोष करता जाये और उससे होने वाले बंध को न गिने तो वह तिर्यंच योनि वाला ही है, ऐसा समझिये । चलने में कुछ न गिने, घास पर भी चल दे, तो यह तो पशु जैसा कार्य है ꠰ जैसे पशु किसी भी अंकुर से चल देते हैं, ऐसे ही मुनिभेषी भी कुछ भी न मिलकर घास पर भी चल दे, जैसा चाहे चल दे तो वह मुनि नहीं है, किंतु तिर्यंच योनि वाला पशु है । सचित्त फलों में, सचित्त पुष्पों में कोई दोष का तो उपदेश करे नहीं, किंतु उसे का विधान बताये कि ऐसे पुष्प चढ़ाना ही चाहिए, ऐसे सचित्त फल चढ़ाना ही चाहिए, यों उपदेश देता है तो वह अपने दोषों को तो नहीं गिन पाता, किंतु बंध पर बंध को ही करता है । हिंसा वाले कार्यों में चाहे वह एकेंद्रिय की हिंसा हो उसका समाधान करे, कहे कि इसमें काहे का दोष, इसमें काहे का बंध, यह तो इस पद में कर्तव्य है, और औषधि आदि बनाने के लिए किन्हीं भी पत्तियों को और पौधों को और नाना प्रकार से अन्य हिंसावों को जो बेखटके उपदेश देकर कराये, उन वृक्षों को खुदवाये, छिदाये भिदाये, कटाये, तो ऐसा जीवहिंसा के लिए उत्साह देने वाला अज्ञानी साधु पशु के समान है । वह तो केवल एक द्रव्य से मुनिभेषी है, पर उसके भीतर में भाव की शुद्धि नहीं है, ऐसा साधु भी नरकगति का पात्र है ।


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