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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शांतिभक्ति - श्लोक 11

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दिव्यतरूसुरपुष्पसुवृष्टिर्दुंदुभिरासनयोजनघोषौ।आतपवारणचामरयुग्मे यस्य विभाति च मंडलतेज:।।11।।

(129)अशोकवृक्ष प्रातिहार्य―जिनके ये 8 प्रातिहार्य शोभायमान होते हैं उन शांतिजिनेंद्र को मैं प्रणाम करता हूँ। पहिला प्रातिहार्य है अशोकवृक्ष, दूसरा है पुष्पवृष्टि , तीसरा है दुंदुभि बाजे की ध्वनि होना, चौथा-सिंहासन, पाँचवाँ-दिव्यध्वनि, छठवाँ-छत्रत्रय, सातवाँ-चामर और आठवाँ-भामंडल। ऐसे 8 प्रातिहार्य जिनेंद्र भगवान में होते हैं। प्रातिहार्य का अर्थ क्या हैं ? प्रतिहार का अर्थ है दरबान। वहाँ का (समवशरण का) दरबान था इंद्र । प्रतिहार के द्वारा जो रचना की जाय, सेवा की जाय उसे प्रातिहार्य कहते हैं। भगवान जहाँ विराजमान हैं वहाँ अशोकवृक्ष की रचना हो जाती है। नाम भी अशोकवृक्ष है, जो यह सूचित करता है कि जो भगवान वीतराग सर्वज्ञदेव के चरणों में आयगा वह शोक रहित हो जायगा। मानो इस तरह जो जीवों को आशीर्वाद सा दे रहा है। यो एक अशोकवृक्ष नाम का प्रातिहार्य है।(130) सुरपुष्पवृष्टि प्रातिहार्य –दूसरे प्रातिहार्य का नाम है पुष्पवृष्टि । ऊपर से पुष्पों की वर्षा होती है, जो पुष्प बरसकर लोगों को यह बतला रहे हैं कि देखो हमारी शक्ल। पुष्प जब ऊपर से नीचे को गिरता है तो उसका जो फूल का भाग है वह तो नीचे की और रहता है और डंठल वाला भाग ऊपर की और रहता है, लेकिन उस फूल की नीचे गिरते-गिरते शक्ल बदल जाती है। डंठल वाला भाग तो नीचे की और हो जाता है और फूल वाला विकसित भाग ऊपर की ओर हो जाता है। तो वह गिरता हुआ फूल दुनिया के लोगों को यह शिक्षा दे रहा है कि भगवान के चरणों में आयगा उसका बंधन निम्न हो जायगा अर्थात ढीला पड़ जायगा । बंधन नाम डंठल का भी है। बंधन नामकर्म बंधन का भी है। मानो इस तरह का संदेश देते हुए सुरपुष्प बरस रहे हैं।(131) दुंदुभि और सिंहासन प्रातिहार्य―तीसरा प्रातिहार्य है दुंदुभि बाजे की ध्वनि। जो बड़े तेज ध्वनि से बोलकर मानो यह कह रही है कि ऐ आत्मकल्याण के इच्छुक पुरूषों ! यदि तुम्हें अपना कल्याण चाहिये हो तो यहाँ वीतराग सर्वज्ञ प्रभु के निकट आवो । चौथा प्रातिहार्य है सिंहासन । सिंहासन अर्थ है श्रेष्ठ आसन। कहीं शेर के जैसे आकार वाला कोई बैठा हो सो बात नहीं है। सिंहासन का अर्थ है श्रेष्ठ आसन। सिंह का अर्थ है श्रेष्ठ। ऐसा श्रेष्ठ आसन है अर्थात ऐसा सिंहासन है जो कि बड़े अमूल्य रत्नों से जटित है। आखिर प्रातिहार्य ही तो है। जिसकी रचना इंद्रों द्वारा होती है ऐसे प्रातिहार्य सिंहासन पर विराजमान हैं।(132) दिव्यध्वनि प्रातिहार्य―5 वाँ प्रातिहार्य है दिव्यध्वनि। भगवान की दिव्यध्वनि खिरती है यह तो है भव्य जीवों का पुण्योदय और प्रभु के वचन योग का काम, किंतु यह ध्वनि चारों तरफ खूब फैले ओर कुछ उस ध्वनि में से जुदी-जुदी भाषाओं जैसा भी कुछ परिवर्तन सा होकर लोगों के कानों में पड़े यह है प्रातिहार्य। जब यहाँ आविष्कारक मनुष्य इस ध्वनि का कुछ-कुछ आविष्कार कर रहे हैं। लाउड स्पीकर तो है ही। फिर इंद्र परिकल्पित सिंहयंत्र की तो प्रशंसा ही क्या की जा सके, जो प्रभु के उपदेश को लाउड कर दे, बहुत ऊंची आवाज को कर दे कि बहुत दूर तक बैठे हुए लोगों को भी सुनाई दे। साथ ही कुछ-कुछ उसका अनुवाद भी अनेक भाषाओं में हो जाय। ऐसी कुछ प्रक्रिया वृहस्पति अथवा इंद्र द्वारा की जाती है। इंद्र का अर्थ है जो इंदन करे, ऐश्वर्यशाली हो। वृहस्पति का अर्थ है-बहुत बड़ा स्वामी। वाचस्पति का अर्थ है-वचनों का स्वामी। इंद्र द्वादशांग का वेत्ता होता है, फिर भी श्रुतकेवली नहीं कहला सकता, लेकिन ज्ञान उसका इतना ऊँचा होता है।

(133)छत्रत्रय, चमर व भामंडल प्रातिहार्य―छठा प्रातिहार्य है छत्रत्रय। तीन छत्र हैं जो मानो दुनिया से यह कह रहे है कि तीनों लोक के वृहस्पति (स्वामी) तो यह हैं, जिन पर तीन छत्र शोभयमान होते हैं। 7 वाँ प्रातिहार्य है चामर। एक शोभा है, भगवान की भक्ति है। कही भगवान के शरीर पर मक्खियाँ बैठती हों और चमर ढुलते हों, सो बात नहीं, लेकिन पूज्य पुरूषों की यह एक शोभा है कि जिन पर चमर ढुलते चले जा रहे हैं। 8 वाँ प्रातिहार्य है भामंडल। जिनके शरीर की आभा का मंडल बन गया है। कुछ प्रभु के शरीर की कांति थी और कुछ देवों ने अतिशय बनाया है यह। इस तरह ये 8 प्रातिहार्य हैं। अब अगले श्लोक में कहेंगे कि इस प्रातिहार्य से शोभित शांतिभगवान को मैं नमस्कार करता हूँ।


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