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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शांतिभक्ति - श्लोक 12

From जैनकोष



तं जगदर्चित शांति जिनेंद्रं, शांतिकरं शिरसा प्रणमामि।सर्वगणाय तु यच्छतु शांतिं, मह्यमरं पठते परमां च।।12।।

(134) जगदर्चित शांतिजिनेंद्र प्रतिप्रणमन―उक्त 8 प्रातिहार्यो से शोभायमान समस्त जगत के द्वारा पूज्य शांति करने वाले शांतिनाथ जिनेंद्र भगवान को मस्तक झुकाकर मैं नमस्कार करता हूँ। ये प्रभु समस्त गुणसमूह के लिए, मुनि, अर्जिका, श्रावक, श्राविका, चतुर्विध संघ के लिए, समस्त जीव-समूह के लिए शांति को प्रदान करें। और विशेषतया इसको पढ़ने वाले मेरे लिए उत्कृष्ट शांति प्रदान करें। पूजा में उदारता में इतना पढ़कर भी भक्त अपने लिए कुछ विशेषता से शांति की याचना कर रहा है। वह जानता है कि हमारा वश हमारी शांति पर है, दूसरे की शांति की तो अभिलाषा भर कर पाते हैं। दूसरे की शांति के कर सकने वाले हम नहीं हैं। जिनप्रभु के उपदेश से, जिनप्रभु के गुणों के स्मरण के प्रताप से मुझमें यह बात प्रकट हुई है उनके प्रति पूर्ण बहुमान और विनय उत्पन्न होता है।

(135) परमोपकारी के प्रति कृतज्ञता – भैया ! तत्वचर्चा की बात और भक्ति-व्यवहार की बात और है। तत्वचर्चा में यह कहा जा सकता है कि पिता ने पुत्र को क्या पैदा किया ? जीव हैं, दुनिया में वे अपने कर्म बाँधते हैं, आयु का उनका उदय है, जिस जीव का जैसा योग है वह वहाँ उत्पन्न होता है । पिता तो एक ऊपरी निमित्तत्त मात्र है। लेकिन कोई पुत्र अपने पिता से इस तरह भी कहेगा क्या कि ऐ पिताजी, तुमने हमारा क्या किया? मैं तो चतुर्गति में भटकता-भटकता स्वयं ही आ गया, तुम तो सिर्फ बाहरी निमित्तत्त मात्र हो, तुमसे हमारा कुछ भी संबंध नहीं है, इस तरह का व्यवहार तो कोई भी पुत्र अपने पिता के साथ नहीं करता ।यह तो है लौकिक बात, फिर भी कदाचित् कोई यहाँ ऐसा व्यवहार कर दे तो कर दे, किंतु प्रभुभक्ति के समय वह भक्त क्या यह कह उठेगा कि हे भगवन! तुम मेरे कुछ नहीं लगते हो। तुम परद्रव्य हो, तुम से मुझ में कुछ नहीं आता, मुझ में जो कुछ भी होता है वह मेरी योग्यता के अनुसार होता है, आप से कुछ भी चीज निकल कर मेरे में नहीं आती आदि, तो यह भी प्रभुभक्ति का कोई नमूना है क्या? तो प्रभुभक्ति के समय पूर्ण कृतज्ञता प्रकट की जाती है । हे नाथ ! यदि आप न होते, आपका उपदेश न होता तो ये संसार के प्राणी वस्तुस्वरूप का ज्ञान कहाँ से कर पाते? ओर फिर ये मोक्ष का मार्ग अपना कैसे बनाते? इसलिए हे प्रभो ! आपके वचन धन्य हैं, आप परमोपकारी हैं। तो यों प्रभुभक्ति में स्वरूप उपासना करते-करते प्रभु से प्रार्थना की जा रही है कि सबको शांति प्रदान करो, मुझको भी शांति प्रदान करो। वचन तो ये है परभाव और पद्धति रीति, प्रभाव ये हैं गुण स्मरणरूप । उस काल में स्वयं भक्त के गुण विकसित हो रहे हैं ओर वह उससे अपने आप में शांति प्राप्त कर रहा है।

(136) प्रभु और भक्त का नाता―हे जगत पूज्य अष्ट प्रातिहार्य से शोभित शांति के करने वाले शांति जिनेंद्र! आपको मैं प्रणाम करता हूँ। आप सब गण के लिए शांति प्रदान करें ओर मुझको भी(इस पढ़ने वाले को भी) शांति प्रदान करें। एक कवि ने तो यह तक कहा कि हे प्रभु ! आपने अधम से अधम अनेक जीव तारे। धन्य है आपके उपकार को। आपने कितने ही पुरूषों को तार दिया, उनको तारते तारते आप थक गए होंगे तो आप हमें धीरे-धीरे तारना । यह कवि द्वारा भगवान पर भक्ति भीनी दया की जा रही है। हे प्रभों ! तारने की प्रार्थना तो है, मगर धीरे-धीरे तारना, जल्दी कुछ नहीं है। हम आपको कष्ट नहीं देना चाहते । तारना, उठाना, उन्नत करना, विकसित करना, ऊँचा बनाना-इन सबका एक ही अर्थ है ना, लेकिन मैं तो एक उलझन में पड़ गया कि भगवान भक्तों को तारते हैं या भक्त भगवान को तारते हैं। अरे उलझन क्यों पड़ गयी? यों कि जैसे कहते हैं ना कि अगर भगवान न होते तो ये भक्त कैसे ऊँचे उठते, कैसे विकसित हो पाते, तो हम यहाँ यह कहते कि अगर ये भक्त न होते तो भगवान कैसे विकसित होते, लोग उनको कैसे जानते, उनकी कैसे महिमा फैलती, कैसे प्रभावना होती ? लो अब इन दो बातों के सामने आने पर एक उलझन आ गयी कि भगवान भक्त को तारते हैं या भक्त भगवान को तारते हैं ? ओह ! समस्या सुलझ गयी। कुछ परवाह नहीं, दोनों बातें मान ली जायें । कैसे मान ली जायें दोनों बातें? जैसे कोई पुरूष नदी में तैरकर पार निकलना चाहता है तो मसक में हवा भरकर, उसका मुँह बंद करके उस मसक पर छाती रखकर तैरकर पार हो जाता है, तो वहाँ यह बताओ कि मसक ने उस पुरूष को तिरा दिया कि उस पुरूष ने मसक को तिरा दिया ? मसक भी तो उस पुरूष के तिराये बिना दूसरी पार नहीं जा सकती थी। और वह पुरूष भी मसक के तिराये बिना दूसरी पार नहीं जा सकता था। तो वहाँ जैसे ये दोनों बातें माननी पड़ती हैं कि मसक ने उस पुरूष को तिराया और पुरूष ने उस मसक को तिराया, इसी प्रकार यहाँ भी यह मानना पड़ेगा कि भगवान ने भक्तों को तारा तो भक्तों ने भी भगवान को तारा। देखो भगवान के स्वरूप का परिचय होने पर भगवान से कैसी प्राइवेसी हो जाती , कुछ भी कह लो।

(137) अंतस्तत्व की परिचयी की ऊंची अभ्यर्थना―जब अंत:स्वरूप का परिचय हो जाता है तब फिर प्रभु से घुल मिलकर बात होती है। डर तो रहता नहीं। तो जो भक्त ऐसे प्रभु के स्वरूप के निकट पहुंच गया वह प्रभु से घुल-मिलकर बातें करता है, स्वरूप में अपने आपको घुमा फिरा भी देता है। प्रभुभक्ति क्या है, आत्मभक्ति क्या है? जो आत्मस्वरूप है उसकी ही तो भक्ति है। यहाँ शांति जिनेंद्र भक्ति की उपासना में प्रार्थना की गई है कि हे प्रभो ! सर्व संघ को शांति प्रदान करो, विशेषतया इस पढ़ने वाले मुझ भक्त को भी उत्कृष्ट शांति प्रदान करों । जब बाह्य पदार्थो की असार जानकर, उनसे विकल्प हटाकर एक विश्राम की स्थिति में पहुँचते हैं तब इस स्तवन का मूल्य विदित होता है। कितना उत्तत्तम सत्संग है कि प्रभु स्वरूप ह्रदय में विराज रहा हे। बाहरी सत्संग तो दूर-दूर रहते हैं, लेकिन यह सत्संग आत्मा के प्रदेश-प्रदेश में बस गया है। सत्संग तो वह सत् जिसका संग किया जा रहा है वह दूर रहता है, भिन्न रहता है, किंतु इस सत्संग में यह स्वयं है, अपने में अभिन्न तत्व है । उस सत्संग में, परमार्थ सत्संग में रहकर यह भक्त शांति की प्रतीक्षा कर रहा है।


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