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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शांतिभक्ति - श्लोक 13

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येभ्यर्चिता मुकुटकुंडलहाररत्नै:।शक्रादिभि:सुरगणै:स्तुत पादपद्मास्।।ते मे जिना प्रवरवंश जगत्प्रदीपा:।तीर्थकरा: सततशांतिकरा भवंतु।।13।।

(138)सुरगणाभ्यर्चित शांतिदेव से शांति की अभ्यर्थना―जो इंद्रादिक देवगणों के द्वारा मुकुट हार कुंडल रत्न आदिक से पूजे गए थे- जब प्रभु का जन्म हुआ था जन्म-कल्याणक के समय अभिषेक के बाद उनको मुकुट कुंडल, हार, रत्न, अंगूठी आदि पहिनाये गए थे, देवोपनीत आभूषणों से सुसज्जित किए गए थे, ऐसे हे जिनेंद्रदेव ! जिनके चरणकमल की स्तुति बड़े-बड़े देवों के द्वारा की गई है, जो उत्कृष्ट वंश में उत्पन्न हुए है, जो तीन लोक के जीवों को सन्मार्ग दिखाने के लिए दीपक के समान हैं, ऐसे तीर्थंकर जिनेंद्रेव ! शांति के प्रदान करने वाले हों। (यह साकार उपासना की बात चल रही है) बाह्य वैभव के स्तवन के माध्यम से भीतर के वीतराग सर्वज्ञ कृतकृत्य स्वरूप तक पहुंचने वाले भक्त जन प्रभु की उपासना कर रहे हैं इस साकार उपासना के रूप में।

(139) वीतरागता का प्रभाव – भला ये प्रभु उत्पन्न हुए हैं मनुष्य लोक में किसी राजा के घर और स्वर्गों के जैसे ठाट – बाट में रहने वाले इंद्र, देवगण कितनी दूर हैं, वे देवता हैं, और वे भगवान उनकी जाति बिरादरी के भी नहीं हैं, कोई उनकी रिश्तेदारी नहीं, कोई शासक शास्य का संबंध नहीं, कोई गुरु शिष्य का संबंध नहीं, कोई किसी के काम आयगा, ऐसा भी संबंध नहीं, कोई किसी की विपत्ति को दूर कर रहा हो ऐसा भी कोई संबंध नहीं, लेकिन यह क्या हो रहा कि अनगिनते देव देवांगनायें ये सब खिंचे चले आ रहे हैं और प्रभु की सेवा करके वे अपने जीवन को धन्य समझते हैं। यह सब प्रताप है वीतरागता का, निर्मोहता का। जिसके नाम पर मूर्ति भी पूजती है। जिस मूर्ति को पूज रहे हैं अथवा समझो कि मूर्ति की जगह पर साक्षात् भगवान भी हों जिनको भक्त जन पूज रहे हैं, जिन पर चमर ढुल रहे हैं, जिनकी आरती उतर रही, तालियाँ बज रहीं, नाच गाने खूब हो रहे और कल्पना करो कि वह मूर्ति या भगवान कहीं बाहर उठकर देखने लगें कि देखें तो सही कि ये लोग किस तरह से मेरे पास आ रहे हैं तो बस समझो उनकी पूजा नदारत। ऐसा करने वाले व्यक्ति की पूजा नहीं होती। यहाँ तो यह सवाल है कि अनगिनते देव नरेंद्र योगिराज आदि सब जिनकी पूजा में लगे हैं और वे प्रभु अपने अंतस्तत्व के स्वरूप का ही स्पर्श कर रहे हैं । रंचमात्र भी क्षोभ नहीं है, रंचमात्र भी बाहर झुकाव नहीं है, परम वीतराग है, उनकी ही यह सेवा है, उपासना है।

(140) विपुल पुण्य प्रतापी शांतिजिनेंद्र से शांति की अभ्यर्थना―तीर्थंकर प्रभु का तो इतना बड़ा पुण्य प्रताप होता है कि प्रभु होंगे जब हों तब बहुत दिनों में, लेकिन उनकी प्रतिष्ठा मान्यता जन्म से पहिले से ही होने लगती है। जन्म तो असली गर्भ में आने का नाम है। तो गर्भ में आने से 6 महीने पहिले अर्थात जन्म लेने से 15 महीने पहिले ही इंद्र को यह ख्याल बन गया कि ये वीतराग सर्वज्ञ होंगे तो जिनप्रभु को इंद्रादिक ने गृहस्थावस्था में मुकुट, कुंडल, हार रत्नों से पूजा, जिनके चरणकमल देवगणों के द्वारा स्तवन किए गए, जो उत्कृष्ट वंश में उत्पन्न हुए हैं। (बड़े पुरूषों का जन्म नीच कुल में नहीं होता) जो जगत के प्रदीप हैं, सबका सन्मार्ग दिखाने के लिए प्रकाश स्वरूप हैं, ऐसे हे शांतिजिनेंद्र तीर्थंकर ! सर्व को शांति प्रदान करो।


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