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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 105

From जैनकोष



यदेतद् ज्ञानात्मा ध्रुवमचलमाभाति भवनं

शिवस्यायं हेतु: स्वयमपि यतस्तच्छिव इति । अतोऽंयद्बंधस्य स्वयमपि यतो बंध इतितत् ततो ज्ञानात्मत्वं भवनमनुभूतिर्हि विहितम् ॥105॥

896- ज्ञानात्मा का ज्ञानस्वरूप से होने से मोक्षहेतुता-

    मोक्ष का कारण क्या है यह बात कही जा रही है, अच्छा मोक्ष दिलाना किसको है?आत्मा को।तो आत्मा का मोक्ष हो इसका अर्थ क्या है कि आत्मा के सिवाय बाकी जो कुछ भी इसके संपर्क में रह आया था वह सब हट जाय और खालिस आत्मा ही आत्मा रह जाय यह है आत्मा का मोक्ष। यह उसका अर्थ है, मायने आत्मा का छुटकारा, समस्त अनात्म तत्त्वों से अलग हो जाय यह आत्मा और केवल अपने सही स्वरूप में ही रहे, उसको कहते हैं मोक्ष। तो ऐसी मोक्ष दशा कैसे प्राप्त होती है? उसका सीधा तो उत्तर है कि जब स्वभाव ही मात्र रह जाय इसका नाम मोक्ष है तो स्वभाव ही ज्ञान में रहे तो इस ज्ञान के अभ्यास की रगड़ से ही तो इसकी प्रगति बनेगी। देखिये बाहरी चीजों में जो कोई दृष्टांत है, यहाँ तो सफाई के भिन्न साधन हैं, चौकी है, इसे साफ करना है। किसी को हुकुम दिया कि इस चौकी को साफ कर दो, तो जो साफ करने वाला है उसे यह पता है कि चौकी अपने आपमें निर्मल है तब ही तो साफ करने का उद्यम करता है। अगर उसे यह विभ्रम हो कि ऐसी गंदगी तो इस चौकी का स्वरूप ही है, तो वह साफ नहीं कर सकता। उस साफ करने वाले को यह विदित है कि चौकी का असली स्वरूप इन सब गंदगियों से विविक्त अपने आपमें अपने सही रंग को लिए हुए है जैसा कि उसने चौकी बनते समय देख लिया होगा। हाँ अब यह उसको साफ करने के लिए क्या करता है, पानी डालता है, अलग करता है, साफ करता है। तो इस आत्मा को शुद्ध स्वच्छ करने के लिए क्या करना होगा? बस ज्ञान में उस स्वभाव को लो जो स्वभावमात्र रहे, उसका नाम मोक्षमार्ग कहलाता है। तो ऐसे इस सहज ज्ञानस्वरूप को अपनी दृष्टि में लेना है। तो देखिये- यह ध्रुव है, अचल है और उसके अनुरूप जो कुछ भीतर में ज्ञानतरंग में अनिवारित है, सो भी अचल। जब वस्तु हैं तो निरंतर उत्पाद व्यय तो होगा सो उस ज्ञान का जो एक अनवरत उसकी शुद्ध तरंग है वह भी क्या होना कहलाता? वह भी ध्रुव अचल जंचता है। जो ज्ञानात्मा ध्रुव अचल रूप से होना प्रतिभात होवे मायने यह ज्ञान ज्ञानस्वरूप को निहारे, ऐसी स्थिति में ज्ञान का परिणमन चल रहा होवे तो यह परिणाम है शिव का हेतु।

897- ज्ञानात्मक ध्रुव अचल भवन की वचनागोचरता व श्रेयोरूपता-

    बताया क्या जाता है? अटपट विषय विकार। जिसकी प्रकटता एकदम जाहिर हो उसे तो बताया जायगा, उसके बारे में तो कुछ बात कर सकना होगा, मगर जो स्वभावानुरूप उत्तम है, हो रहा है और खास करके तो आत्मा के संबंध में जो स्वभावानुरूप दृष्टि रखकर जो बात बन रही उसको कहने के शब्द नहीं कोई, जान लिया। कई बातें होती हैं जान लिया, पर बता नहीं सकते, गिना नहीं सकते। तो यह जो ज्ञानात्मा, ज्ञानस्वरूप आत्मा, इसका जो यह ध्रुव अचल भवन होना परिणाम बन रहा, वह है मोक्ष का हेतुभूत। देखो सहज बात की, सहज क्रिया की कोई दृष्टि नहीं की जा रही है।

898- शिवहेतु की आराधना के अभिप्राय से शिवहेतुसाधकों की सेवा- अब चरणानुयोग की बात लीजिये- स्वभावदृष्टि रखने के लिए अभ्यास करने वाले जो पुरुष हैं वे कहाँ तक सफल हो रहे या चलित हो रहे। राग आये, प्रवृत्ति आये, तेज भूख लग गई, साधारण भूख की चर्चा नहीं करते, अनेक प्रतिक्रमण दीक्षा, शिक्षादि करते। तो अब जब प्रवृत्ति करने को होता है ज्ञानी तो कैसी प्रवृत्ति करना चाहिए, यह विवेक न रखे तो वह ज्ञानी कैसे? जो यथा तथा प्रवृत्ति करे तो वह अविवेकी हैं। करना ही पड रहा है परिस्थिति में रागप्रवृत्ति तो एक छाँट होती है कि इस रूप परिणमना, इस तरह से चलना, इस तरह से खाना पीना, उठना बैठना समितिपूर्वक, उसकी ये बाह्य क्रियायें होती हैं। तो अब देखो- चरणानुयोग में जो वर्णन है वह क्या है कि विशुद्ध भावसंयम का अभ्यास करने वाले साधु की जो बाह्य क्रियायें हैं वे कहलाती हैं चरणानुयोग के विधान। अब जहाँ तीर्थप्रवृत्ति याने सम्यग्दर्शन, सम्यक् चारित्र स्खलित न हो, चलता रहे तो उस मार्ग प्रवृत्ति के लिए बाहरी आधार को देखकर ही सम्यक् प्रवृत्ति का व्यवहार बन गया, मगर सम्वर निर्जरा वहाँ भी चलती रहती है। अब ज्ञानात्मा उस ज्ञानानुरूप भवन में चल रहा है, कहीं मन, वचन, काय इनकी क्रिया साधन नहीं है मोक्ष का। साधन तो वह ज्ञानात्मक भवन है, मगर इस साधन की यह दशा है कि इस इस रूप रहता है। उसकी बाहरी क्रियायें देखकर ज्ञानी को भक्ति सेवा के लिए क्यों उमंग लगती कि उसकी झट वहाँ दृष्टि गर्द- ओह यह बाह्यभेष, ये सब क्रियायें, ये व्रतरूप क्रियायें, ये स्वभावदृष्टि और साधना करने वाले के ऐसे आया करती हैं, उसको देखकर जो स्वभावदृष्टि का बना ज्ञान उसके कारण ज्ञानी गृहस्थ, साधुसंतों की भक्ति व सेवा करता है। उस व्रत का भेष, उस व्रत में रहने वाले का भेष, उसे देखकर श्रावक बिनयादि सब कुछ करता है। मार्ग का यहाँ से मूल उठा, तो मोक्ष का हेतु क्या है? इस ज्ञानात्मा का ध्रुव अचल रूप से जो यह परिणाम है, उसका जो एक आश्रय है वह मोक्ष का हेतु है। और इतना ही क्यों? वह तो स्वयंशिव है, शिव का हेतु है। जैसे कहते हैं ना कि आस्रव दु:ख का हेतु है, तो वहाँ कहते हैं कि इतना ही क्यों। आश्रय स्वयं दु:ख रूप है इसी तरह इस ज्ञानात्मक अंतस्तत्त्व का यह अनुरूप परिणाम, यह शिव का हेतु है, और इतना ही क्यों कहते। यह स्वयं शिवस्वरूप है। 899- अज्ञानपरिणमनों में बंधहेतुता- इस ज्ञानात्मा का जो अन्य-अन्य रूप से परिणमन है, अध्रुव चलित जो परिणमन है, कर्मस्वभाव से ज्ञान का भवन है, वह बंध का हेतु है। अध्रुव और चलित परिणमन इनका बनाना होता क्यों? ये बने तो अपनी परिणति से, मगर जहाँ उपाधि कर्म का विपाक होता है उसका प्रतिफलन होता, वहाँ ज्ञानविकल्प ऐसे ही बनते। यदि इसके लिए यह ही सब कुछ जिम्मेदार हो कि यह ही आत्मा निमित्त हो, यह ही आत्मा उपादान हो, उपादान तो यह है ही, निमित्त भी यही आत्मा हो, विकार सब कुछ आत्मा की परिणति से ही बन गया हो, निमित्त न हो तो यह विकार सुगमतया स्वभाव हो जाते हैं, तो फिर उसके मिटने का कोई तरीका नहीं बन सकता। इस तरह औदयिक भाव का परिचय कराकर यह उमंग कराई जाती है, यह सत्यता उपस्थित की जाती है कि ये रागादिक विकार, ये विभाव, ये कर्मोदय का निमित्त पाकर हुए हैं। बिना निमित्त के हों सो नहीं। जैसे सिद्ध प्रभु का परिणमन उसमें कर्मादिक कोई बाहरी निमित्त नहीं, काल तो एक सामान्य बात है। तो जहाँ व्यतिरेक नहीं होता उसकी चर्चा नहीं की जाती है। कर्म में व्यतिरेक संबंध संभव है सो कर्म जीवविकार में निमित्त हुआ करता है। तो बात बन क्या गई। है अपनी ही कमायी की बात। अपने विभावों से अर्जित प्रकृति प्रदेश स्थिति अनुभाग बंध वाला कर्म था, उसका जब विपाककाल आया तो यह जीव रागरूप परिणम गया। 900- शब्दप्रयोगविधि से निमित्त नैमित्तिक भाव के परिचय की सुगमता का दिग्दर्शन-

    भैया निमित्त और नैमित्तिक इन दो की बात झट समझना हो तो देखो एक समय में दोनों बातें होकर भी जिसमें जब लगाया गया हो वह निमित्त, जिसमें तब जगाया गया हो वह नैमित्तिक, बहुत सीधी कुंजी आपके लिए कह रहे हैं। जैसे आग पर पानी डाला तो वहाँ यह ही तो आप कहेंगे किपानी कानिमित्त पाकर आग बुझ गई।अच्छा दोनों बातें  एक समय में हुई, उसी समय में पानी का संपर्क हुआ और उसी समय में आग बुझी, और इसको अगर यों बोले कि जब आग बुझी तब पानी आ गया, इसे कोई मान नहीं सकता। अब देखना- बात एक ही समय में है और एक द्रव्य दूसरे पदार्थ का त्रिकाल कर्ता नहीं होता, मगर निमित्त नैमित्तिकपन वास्तविक क्या है? कौन निमित्त है, कौन नैमित्तिक है, इस बात के समझने के लिए इन दोनों का सही प्रयोग बहुत मदद देता है। जब पानी गिरा तब आग बुझी, ऐसा प्रयोग तो सयुक्तिक बन गया और आगम में भी यह ही प्रयोग है कि कर्मोदय होने पर राग हुआ, कर्मविपाक हुआ उस समय राग हुआ। दोनों जगह भिन्न-भिन्न बातें हैं जीव का परिणाम कर्म को नहीं करता, कर्म का परिणाम जीव को नहीं करता, पर निमित्त क्या है, नैमित्तिक क्या है, इसको समझने की कुंजी यह ही है, इस प्रकार समस्त आगम में बताया गया है। हाँ अगर यों कह दिया जाय कि जब आग बुझी तो पानी आ गया, तो इसमें आग का बुझना तो कहलायेगा निमित्त पानी का आना कहलायेगा नैमित्तिक, ऐसा तो नहीं है। निमित्त नैमित्तिक को सब लोग व्यवहार में समझते है? निमित्त शब्द ही यह जाहिर करता है कि त्रिकाल कर्तृत्व नहीं है एक में दूसरे का। जब शब्द ही जाहिर करता, तब कभी यह शंका न होनी चाहिए कि इसने दूसरे का कुछ कर दिया। फिर भी देखो- निमित्त की अनुपस्थिति में विकार नहीं होता तो वह निमित्त और विकार क्या? निमित्त वह जिसकी अनुपस्थिति में विकार न हो। विकार कार्य है, निमित्त कारण है, ऐसा होने पर भी किसी द्रव्य की परिणति को दूसरे द्रव्य ने नहीं की, बल्कि उसमें हमको यह उमंग मिली कि ये रागादिक भाव यह तो कर्म की छाया, माया, प्रतिफलन है, यह मेरी चीज नहीं हैं, मैं तो स्वभावत: चैतन्यस्वरूप हूँ। निमित्तनैमित्तिक भाव के परिचय से स्वभावदृष्टि में और अधिक प्रेरणा मिलती हैं।

901- अज्ञानमय भाव की बंधरूपता व ज्ञानमय भाव की शिवरूपता-

ज्ञान का जो स्वभावानुरूप परिणमन है उस परिणमन में जो भवन है, होना है वह तो है शिव का हेतु और इसके अतिरिक्त अध्रुव और विचलित जो विकार परिणमन है वह है बंध का हेतु। अरे-अरे इतना भी न कहो, वह स्वयं बंध है याने अंत: स्वभाव से विचलित हों, ऐसा जो हमारा परिणाम है वही स्वयं एक बंधनरूप है, बंधन का हेतु है, वही बंधन है। तो बात क्या आयी, बस एक निगाह, एक ही दृष्टि। अपनी भलाई करना है तो एक ही दृष्टि करो कि मैं स्वयं सहज किस स्वरूप में हूँ, उसकी पहिचान करके, उसमें निर्णय बने कि मैं तो यह हूँ। यद्यपि जीवविकार में भी मैं का संबंध तो है, पर जीवविकार विकृत है, दशा आगंतुक हैं और और बातें हैं, तो वास्तव में मैं क्या हूँ, परमार्थ से मैं क्या हूँ? मैं यह सहज चित्स्वभावरूप हूँ। बस यह स्वप्रतीति हो जाना चाहिए और बात कुछ मत सोचें, याने विवाद की बात अधिक न आये और यह ही अनुभव बन जाय जैसा कि किसी नारकी को भी बन जाता है, किसी बैल को भी बन जाता, किसी घोड़ेको भी बन जाता, वे तो बात करना भी नहीं जानते। वे तो आस्रव बंध की पढ़ाई भी नहीं पढ़ते, किंतु उनको यह ज्योति जगी है और अपने आपके सहजस्वरूप अंतस्तत्त्व में प्रीति हुई है, सम्यग्दर्शन हो गया उन्हें, तो मुख्य बात यह है, यही अपनी कमाई है। अपने आपके सहज अंतस्तत्त्व में, परमार्थ निरपेक्ष रूप में जो कुछ स्वरूप है उसमें अपना दृढ़ निर्णय बने कि मैं यह हूँ, अगर कोई धर्मचर्चा करते हुए में गुस्सा आ गया तो धर्मचर्चा तो कर रहे थे अंतस्तत्त्व की, और और बात की, और किसी बात में मैल न बैठा, ताव आ गया और ताव भी ऐसा आ गया कि दूसरों के देखने में भी बुरा लग रहा, यह तो लड़ाई सी हो रही। तो बात क्या है? वहाँ उसने अपनी विकल्प पर्याय में आत्मत्वबुद्धि की। उस विकल्परूप से कोई मान न रहा था तो उसने समझा अपना विनाश कि हाय मैं ही मर गया। अपने उस विकल्प के प्रति ऐसी आत्मत्वबुद्धि रही कि ताव आ जाता है, झगड़ा हो जाता है, तो जरूरत है निज सहज स्वभाव को जानने की। इसके प्रताप से कषायक्लेश मिटेंगे, जन्ममरण के संकटों से छूट मिलेगी। हमें इस दुर्लभ मानव को सफल करना है, एतदर्थ जरूरत है कि हम इस तरह के अध्ययन करें, मनन करें, चिंतन करें, सोचें, अनुभव करें, जिसमें कि हमें अपने सहज स्वभाव में यह मैं हूँ, ऐसी दृढ़ प्रतीति हो। आवश्यकता यह है आज इन दुर्लभ क्षणों को सफल करने के लिए।

902-निरास्रवता का निर्धारण- हाँ तो इस तरह का स्वभावाश्रय में जो ज्ञान परिणाम हो रहा, वह क्या? केवल ज्ञानमात्र, ज्ञान परिणाम, प्रतिभास। रागद्वेष नहीं, परोपयोग नहीं, देखो ऐसा जो सोच रहा है ज्ञानी चौथे पांचवें छठे गुणस्थान में तथा 8 वें, 9 वें, 10 वें गुणस्थान में भी जो उपयोग चल रहा है, ऐसे ज्ञानस्वभाव के आश्रय में लग रहा है, उपयोग वही चल रहा है वहाँ बुद्धिपूर्वक विकार तो नहीं, किंतु राग तो उसके भी चल रहा, ये रागद्वेष विकार एक क्षण को भी अलग न कर सके। अब देखे चल रहा है निरंतर, मगर वह अबुद्धिपूर्वक राग है। उस अबुद्धिपूर्वक राग को भी मेंटने का उपाय क्या है। इसी स्वभाव में उपयोग लगाना। बुद्धिपूर्वक राग तो तत्काल मिट गया। अबुद्धिपूर्वक राग भी मूल से नष्ट हो, उसका उपाय भी इस ही स्वभाव का आश्रय है। तब ही तो करणानुयोग कह रहा है कि आश्रय बंध चल रहा है 9 वें, 10 वें गुणस्थान तक। और वह हमारा बुद्धिपूर्वक अनुराग नहीं, इसी आधार पर द्रव्यानुयोग कह रहा है कि सम्यग्दृष्टि निराश्रव: तो बात क्या हुई? क्या दोनों का विरोध है परस्पर में? विरोध नहीं। यह बुद्धिपूर्वक प्रक्रिया का अनुयोग है, और करणानुयोग समय-समय का, ढंग का, एक एक क्षण के सही निर्णय का अनुयोग है। 903- पृथ्क्करणीय पदार्थ के विशेष परिचय से उसके पार्थक्य की स्पष्टता- देखिये-जिसचीजसेहमकोस्वयं को निराला समझना हे उस चीज को बहुत अधिक परिचय बन जाय तो उससे निरालेपन की बुद्धि में कितनी स्पष्टता आती है और जिससे निराला समझने की चाह है यदि उसके संबंध में खास परिचय नहीं है, केवल एक शब्द का ही परिचय है, कर्मधूल रजकण इतना ही कहने मात्र की बात है और उसकी बंधदशा, उदयदशा सत्त्व की स्थिति, अनुभाग, स्थितिखंड, अनुभागखंड, प्रमाण कितना होता, क्या होता जब तक यह सब परिचय में नहीं आया तब तक भेदविज्ञान स्पष्ट ज्ञान में आना कठिन है। जब समझा कि कर्म भी एक पदार्थ है, राक्षसों आदि की तरह यह भी कोई एक चीज है और इस-इस ढंग से है, जब परतत्त्व का जरा अधिक परिचय बनता है तो उससे निरालेपन की बुद्धि भी बड़ी स्पष्ट बनती है। इससे अध्ययन में सब लाइये- कर्मसिद्धांत, जीव सिद्धांत, सब चीजें ज्ञान में लावो, उससे स्पष्टता भी बनती है और एक उमंग भी आती है, हम एक ही निबंध का रोज-रोज अध्ययन करें तो वह हमारी एक तरह की दिनचर्या जैसी चीज बन जाती है कि हम उसका अधिक असर नहीं पा सकते, अत: ऋषियों की जितनी कृतियाँ हैं चारों वेद (अनुयोग) संबंधी जितनी भी कृतियाँ हैं उनका हम अध्ययन करें।कभी करणानुयोग, कभी चरणानुयोग किस-किस ढंग से कैसी उमंग बनती है, किसको पढ़कर कैसा कहाँ-कहाँ एक साहस, उमंग, मार्गदर्शन मिलता है इसके लिए हमको सब तरह का अध्ययन लाभदायक होता है। और उसमें फिर हमारी यह कथनी भी विशिष्ट बन जाती है, देखो फिर कैसे स्पष्ट समझ में आयगा, मोक्ष का हेतु क्या, शिव का हेतु क्या। 904- ज्ञान का ज्ञानस्वभाव से भवन की शिवहेतुता का दृढ़ निर्णय- इस ज्ञान के इस विशुद्ध परिणमन के न होने पर चाहे कितना ही शरीर, मन, वचन की क्रियायें हो जायें और हृदय से हो जायें फिर भी दृष्टि मिथ्या है। अज्ञानी जीव भी हृदय से व्रत तप ग्रहण करता है। भीतर में उसकोअंतस्तत्त्व का पता नहीं और धर्म की बात कुछ सुन रखी सो भीतर से हृदय से करता याने दुनिया को दिखाने के लिए नहीं, किंतु अपने मन से करता है फिर भी सहज ज्ञानस्वभाव की, ज्ञान के सहज परिणमन की प्राप्ति न होने से उसका इस मन, वचन, काय की क्रिया के होने पर भी मोक्ष नहीं होता, और जिसको इस ज्ञानस्वभाव का परिचय है, इस ज्ञानपरिणमन की बात चित्त में आयी है, समझता है उसका अनुभव बना, ऐसा जो जीव है, वह बाहर में लोगों को जो बहुत अच्छा दिखे ऐसा व्रत, तप आदिक न भी कर सके, बिल्कुल न करे यह तो नहीं संभव, कर रहा सहज, अंदर से कर रहा, लोगों को जाहिर हो ऐसा कोई व्रत नियम बढ़िया न बने तो भी इस ज्ञानस्वभाव की उपलब्धि के प्रताप से मोक्षमार्ग बन जाता है। तो ज्ञान का ज्ञानरूप में होना, ज्ञान में इस ज्ञानस्वभाव को ज्ञेय करना और यहाँ ही ज्ञान को बसाकर प्रसन्नता पाना, निर्मलता पाना, बस यह ही एक खास परमार्थ अमीर का व्यापार है जो हम आप सब आत्मार्थियों को मददगार है। इसके अतिरिक्त बाहरी ये समागम संग ये मददगार नहीं हैं। 905- परिजन में मोह न करके धार्मिक वातावरण में रहकर जीवन सफल करने का संदेश- परिवार मिला है तो परस्पर एक दूसरे को वैराग्य और ज्ञान की दिशायें बताकर धर्मपालन को प्रयोगात्मक करें जिससे कि औरों का भी भला हो। मगर उनमें यह मेरा है, बड़ा अच्छा है, लड़का है, इष्ट है,...अरे उसका स्वाद ले तो लिया अब तक पाया क्या? स्वाद भी क्या? रोना ही रोना।यह ही मिला। चाहे इष्ट मिला हो चाहे अनिष्ट मिला हो, उसके फल में रोना ही रोना मिला है। आनंद नहीं मिला। किसी ने अभी समझ लिया, कोई दो चार वर्ष बाद समझ लेगा, मगर उसका फल वह ही है। किसका फल? राग करने का। चीज के मिलने जुलने की बात का असर नहीं, किंतु उसमें जो राग है, इष्ट बुद्धि है, उसकी बात कह रहे। किसको आप कहेंगे कि यह हमारी सुख की स्थिति है? किसी के पुत्र नहीं होता वह दु:ख मानता कि मेरे कुछ नहीं है, आगे संतान न चलेगी, वह यों सोचकर दु:खी हो रहा। उसने यह ही जाना कि मेरी संतान ये पुत्र आदि कहलाती और अपने आत्मद्रव्य की जो त्रिकाल सत्ता है, जो परमार्थ संतान है उसकी तो दृष्टि ही नहीं है। मेरे लौकिक संतान नहीं, यह बात उसके लिए दु:ख का कारण है। ये लड़के बच्चे होते रहें, हमारी संतान होती रहे, इसमें वह सुख समझता, पर विचारो तो सही कि अगर कोई पुत्र कुपूत निकल आया तो उसका भी कष्ट आप मानते कि नहीं? ...मानते।...और सुपूत निकल आया तो? अरे उससे तो उससे तो और भी अधिक कष्ट मानते। कोई पुत्र बड़ा आज्ञाकारी है, विनयशील है, सेवा करने वाला है, तो उसको देखकर आपके इतना तृष्णा का रंग चढ़ता है कि आप सोचते कि मैं इसके लिए सब कुछ कर जाऊँ इतना धन कमाकर धर जाऊँ कि यह जिंदगी भर सुख पूर्वक रहे...। यों सारे जीवन भर आपको उसके पीछे बुरी तरह से लदे फिरना पड़ेगा। और कपूत के लिए तो बस अखबारों में निकलवा दिया कि अब इससे मेरा कुछ वास्ता नहीं...लो सारा झगड़ा खतम। तो फिर लोक में कौनसा संग समागम है जो इस जीव को आनंद का कारण बने? कुछ नहीं। 906- अंत: सहजपरमात्मतत्त्व का प्रसाद पाने का संदेश- भीतर का यह आत्मा भगवान, सहज परमात्मतत्त्व, परमब्रह्म, यह मेरे लिए परम शरण है। एक भजन में बोलते हैं ना- ‘‘तेरी भक्ति में क्षण जायें सारे। मेरे शाश्वत शरण, सत्य, तारण, तरण ब्रह्म प्यारे। तेरी भक्ति में क्षण जायें सारे। ज्ञान से ज्ञान में ज्ञान ही हो, कल्पनाओं का एकदम विलय हो, भ्रांति का नाश हो, शांति का वास हो, ब्रह्म प्यारे। तेरी भक्ति में क्षण जायें सारे।।’’ अपना भगवान अपने को मिला है, इससे अपनी सारी बातें करके अपने आत्मप्रभु को प्रसन्न कीजिए। बस यह प्रभु का प्रसाद यह आत्मप्रभु की प्रसन्नता है, यह हम आपके संकटों को नष्ट कर देगा। तो यह ही ज्ञान, ऐसा अपने स्वरूप में मनन यह ही शिव का हेतु है और इतना ही नहीं, शिवस्वरूप है। इतनी ही दृष्टि इस जीवन में रहे, यह ही सबसे बड़ा भारी पौरुष है।


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