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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 107

From जैनकोष



वृत्तं कर्मस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं न हि ।

द्रव्यांतरस्वभावत्वांमोक्षहेतुर्न कर्म तत् ॥107॥

908- कर्मस्वभाव से ज्ञान के भवन में मोक्षहेतुता का अभाव-

   ज्ञान का कर्मप्रभाव से होने को चारित्र नहीं कहते। कर्मस्वभाव से होने का अर्थ क्या है? जैसे उदाहरण में दर्पण के समक्ष लाल पीला कपड़ा आया और दर्पण में लाल पीला फोटो रूप परिणमा तो लाल पीले रंग रूप जो परिणमा उसे हम यों कह सकते हैं कि यह दर्पण उस कपड़े के स्वभावरूप से परिणमा। यद्यपि उपादान उपादेय भाषा में यह बात नहीं है, कपड़ा अपने स्वभाव से परिणम रहा, दर्पण अपनी परिणति से परिणम रहा, लेकिन जो यह औपाधिक भाव है उस रूप से जो भी चल रहा तो वह दर्पण के निज निरपेक्ष स्वभाव से होना नहीं कहलाता। उसे यों ही कहा जायगा कि यह उस उपाधि के स्वभाव से परिणम रहा। जरा अंत: देखिये पूर्वबद्ध कर्म जब कर्मविपाक काल में आया, उनका उदय हुआ तो विपाक फूटा। सो अनुभाग उदित हुआ तो कर्म का कर्म में, मगर जैसा समयसार में परिशिष्ट अधिकार में बताया कि अनादि से पर के ज्ञेय के काल में, उस कर्मविपाक के ज्ञेय के काल में चूँकि अंतर नहीं समझा अतएव ज्ञान का उस तरह से परिणमने से संसार बना तो जो विपाक हुआ, प्रतिफलन हुआ, जो झलक हुई, उस रूप से यह उपयोग अपने को मानने लगा, यह कहलाया कर्मस्वभाव से कर्म का परिणमना। इसका नाम चारित्र नहीं।ज्ञानस्वभाव से परिणमते रहने का नाम निश्चय चारित्र है। होता क्या है, कि जीव के जो रागादिक विकार हुए उनमें निमित्त स्वयं आत्मा नहीं, किंतु इसका निमित्त स्वयं रागादि भावापन्न परद्रव्यसंग ही है और इस प्रक्रिया को वस्तु का स्वभाव बतलाया कि जो रागादिकरूप परिणमन है उसमें निमित्त केवल परसंग ही है और ऐसी स्थिति में आत्मा विकाररूप परिणमता है। न जातु रागादिनिमित्त भावमात्मात्मनो याति यथार्ककांत:। तस्मिन्निमित्तं परसंग एव वस्तुस्वभावोऽयुमुदेति तावत्।जरा फिर ध्यान दीजिए। यह वस्तु का स्वरूप है कि एक द्रव्य किसी दूसरे द्रव्यरूप नहीं परिणमता इसमें किसी को रंच भी विवाद नहीं। तब यहाँ दो वस्तु हैं- जीव और कर्म। कर्म का उदय हुआ यह है निमित्त और जीव में जो विकार हुए वे नैमित्तिक हैं।

909- निमित्त का सन्निधान होने पर अशुद्ध उपादान में स्वयं विभाव परिणमन की कला- अब यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य की परिणति नहीं करता यह कुंजी यहाँ लगाओ। याने एक द्रव्य दूसरे द्रव्य की परिणति नहीं करता याने निमित्तभूत कर्म जीव की रागादिक परिणति को नहीं करता और इसी का नाम अकिंचित्कर है और इस दृष्टि सेएक दूसरे द्रव्य में अकिंचित्कर होता है, इस न्याय को तो छिन्न-भिन्न किया ही नहीं जा सकता। तो यह बात आयी कि निमित्तभूत पुद्गलकर्म का उदय इस जीव के रागविकाररूप कार्य में अकिंचित्कर है, अर्थ यह हुआ कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य की परिणति नहीं करता। तो यहाँ एक शंका का होना स्वाभाविक है कि फिर निमित्त शब्द ही क्यों कोर्स में रखा, और अनेक लोग फिर नियतनियत ही निमित्त क्यों कहे जाते? रोटी के सिकने में आग निमित्त। ऐसा क्यों नहीं हो जाता कि किसी दिन आग निमित्त हो तो किसी दिन पानी निमित्त बन जाय। क्योंकि अब उसमें व्यवस्था हीनहीं कुछ तो अटपट क्यों नहीं हो जाता ऐसी एक आशंका हो सकती है तो निमित्त ही क्या कहलाया? समाधान यह है कि बात यों होती है कि कर्मविपाक में उदयकाल में उस वातावरण में याने कर्म का उदय तो कर्म में ही है, उस उदय में एक वातावरण कहो जिसे कहा है संपर्कजभाव, वह ऐसा संपर्कजभाव है कि उस वातावरण में यह उपादान स्वयं अपनी कला से, अपनी परिणति से विकाररूप परिणम जाता है। तो चूँकि निमित्त की अनुपस्थिति में यह जीव रागादिक विकाररूप नहीं परिणमा, और नहीं परिणम पाता, इस कारण से यह वहाँ निमित्त हुआ। अर्थ ठीक सीधा यह है कि निमित्त को पाकर उपादान अपने प्रभाव वाला बनता है। विकार आया यह जीव का ही प्रभाव है उस समय के उपादान के अनुकूल है, पर यह उस समय कर्मोदय निमित्त के अभाव में न बन सका, ऐसा हर जगह घटित करो। प्रत्येक निमित्त में आप यह बात पायेंगे कि निमित्तभूत पर द्रव्य ने उपादान की परिणति नहीं की, मगर इस इस प्रकार की स्थिति में निमित्त के सद्भाव में उपादान ने अपनी ही कला से अपनी ही परिणति से उस प्रकार का विकार पैदा किया, तब फिर उस विकार को हटाने का उपाय क्या है। जान लिया ना कि यह विकार आत्मा के स्वभाव से नहीं चला, किंतु उस निमित्त सन्निधान में यह कला बनी अतएव यह नैमित्तिक है। तो विकार नैमित्तिक है औदयिक है, पौद्गलिक है किसी भी शब्द में कहो। जो उसमें लगे वह अज्ञानी है। ज्ञानी विभाव में आकर्षित नहीं होता। ज्ञानी की धुन तो अपने स्वभाव की ओर है। 910- उत्पत्तिक्रिया व ज्ञप्तिक्रिया में निमित्त नैमित्तिकभाव अथवा साध्यसाधनभाव का दिग्दर्शन- एक बात और इस प्रसंग में जानियेगा कि क्रिया दो प्रकार की दर्शनशास्त्र में कही गयी और युक्ति से भी जान लें, एक उत्पत्तिरूप कार्य और एक ज्ञप्तिरूप कार्य याने जानकारी बनना एक यह काम, और एक उद्भव होना, प्रकट होना, व्यक्त होना, उत्पन्न होना, एक यह कार्य। तो उत्पन्न होने के प्रसंग में तो यह ही कहा जायगा, जैसी कि स्थिति है कि कर्मोदय का निमित्त पाकर जीव रागरूप परिणमा, और ज्ञप्तिरूप क्रिया की दृष्टि से यों वार्ता हैं कि जीव का रागविकार यह तो समझ में आता है, कर्मोदय हमारी समझ में नहीं आता। यद्यपि कर्म से सूक्ष्म रागविकार है, क्योंकि कर्म पौद्गलिक है पर द्रव्य है रूपरसगंधस्पर्श सहित है उससे सूक्ष्म है जीवरागविकार, वह तो आत्मपरिणति है अमूर्त है, किंतु वह अपने परिणमन में है, अतएव वह तो झट समझ में आयगा, मगर कर्मदशा, कर्मोदय कर्म की बात, यह समझ में न आयगी। परमावधि, सर्वावधि ज्ञानी, ये ही इसको जान पाते हैं, और केवलज्ञान के तो सभी प्रत्यक्ष हैं। तो जैसे धुवाँ देखकर अग्नि का ज्ञान बना तो धूम का दर्शन निमित्त है और अग्नि की ज्ञप्ति कार्य है, यह तो कहा ही जायगा। वहाँ वह एक ज्ञप्तिरूप कार्य बना। क्यों? धूम का दर्शन करके अग्नि का ज्ञान बना। जब उत्पत्ति की हैसियत से बोलेंगे तो कारण अग्नि है, कार्य धूम है। सो ज्ञप्तिकी दृष्टि से देखेंगे तो अनुमान प्रमाण में यह ही बात आयगी कि धूम साधन है, अग्नि साध्य है, मायने धूम देखकर अग्नि का ज्ञान हुआ। इस तरह रागविकार देखकर कर्मोदय का ज्ञान हुआ। रागविकार हुआ, उस काल में कर्मोदय है, कर्मोदय था, इस कारण का जो ज्ञान हुआ तो इस ज्ञानरूप कार्य के लिए रागादिक का ज्ञान निमित्त है, मगर कर्मोदय की उत्पत्ति रूप कार्य के लिए रागविकार निमित्त नहीं है। वहाँ रागविकार का निमित्त कर्मोदय है और ज्ञप्ति में यह बात आती है कि रागविकार जब जाना, समझा तो कर्मोदय का ज्ञान हुआ? उस काल में कर्मोदय है। तो ये दो बातें भी एक खास समझने की है- कार्य दो प्रकार के हैं- उत्पत्तिरूप कार्य और ज्ञप्तिरूप कार्य। जब रागविकार हुआ तब कर्मोदय है ऐसा ज्ञान हुआ, यह बात तो ज्ञप्ति के मामले में चलेगी, मगर निमित्तनैमित्तिकविधि में जिस ढंग से जो है सो ही होता है। बस उसमें भी पर का, निमित्त का कोई भी द्रव्य, गुण, पर्याय, परिस्थिति, परिणति, प्रभाव कुछ भी चीज निमित्तभूत कर्म के प्रदेश से बाहर नहीं होती, किसी पदार्थ का कुछ भी हो वह उसके प्रदेश में ही है, प्रदेश से बाहर नहीं है मगर संपर्कजभाव की स्थिति में, उपादान निमित्त के सद्भाव में अपनी परिणति से विकाररूप परिणम गया। 911- निमित्तनैमित्तिकभाव के परिचय में स्वातंत्र्य, सान्निध्य और हितशिक्षण का दिग्दर्शन-

   निमित्तनैमित्तिकभाव में स्वातंत्र्य और सान्निध्य जानने को एक मोटासा उदाहरण ले लो। जैसे इस तखत पर आप बैठे हैं तो आपके बैठने में तखत निमित्त है, कारण कह दो, निमित्त कह दो, मगर तखत का गुणप्रभाव आदि आपमें कुछ नहीं आया। तखत ने आपकी कुछ परिणति नहीं की। तो वहाँ हुआ क्या, कि तखत का आश्रय करके आप अपनी परिणति से, अपनी सामर्थ्य से इस प्रकार बैठ गए। तखत निमित्त हुआ बैठने में। यह एक मोटा दृष्टांत है। वहाँ निमित्त नैमित्तिक भाव को बताने के प्रसंग में यह ही बात दिखी कि तखत का आश्रय पाकर यह बैठ गया। और किसी को तखत न दिख रहा हो और आपका इस समय उस प्रकार का उठना बैठना दिख रहा है तो ऐसा उठना बैठना देखकर यह जानकारी होना कि यह तखत पर बैठा है, यह ज्ञप्तिरूप बात है।निमित्तनैमित्तिक का परिचय हमको स्वभावदृष्टि के लिए यह उमंग दिलाता है कि यह विकार तेरा स्वरूप नहीं, तेरा निरपेक्ष भाव नहीं, तेरे ही स्वरूप से उठा हो सो नहीं, स्वभावभाव नहीं, किंतु यह तो कर्मस्वभाव से ज्ञान का होना बन रहा है। ज्ञान का कर्मस्वभाव से होने का नाम व्रत नहीं, मोक्ष का हेतु नहीं, क्यों नहीं कि वह द्रव्यांतरस्वभावरूप से हो रहा है। ये जो विभाव जग रहे हैं उनको बता रहे हैं कि ये द्रव्यांतरस्वभाव से हो रहे हैं, अपने आपके स्वभावरूप से नहीं हो रहे हैं। और यही कारण है कि वे सब बंध के हेतु है, मोक्ष के हेतु नहीं।

912- जीव का कर्म- जीव का वास्तविक कर्म क्या? तो देखो साधारण शैली में तो यह उत्तर आयगा कि जीव का जो परिणमन है वह जीव का कर्म है लेकिन एक विशेष शैली में यह बतायेंगे कि जीव का जो भी परिणमन है, जो विषम है, जिसकी जानकारी में जचा कि हुआ काम। काम तो वह कहलाता कि जिसमें जचे यह न था- यह हुआ। इस दृष्टि से शुभ अशुभभाव ये हैं जीव के कर्म और जीव के शुभ अशुभ भाव का निमित्त पाकर जो कर्मबंधन हुआ वह कर्म, वह पौद्गलिक कर्म पुद्गलकाकार्य है। ये जो दो बातें कही गई है कि मिथ्यात्व दो प्रकार का- अजीव मिथ्यात्व जीव मिथ्यात्व। अविरति, कषाय आदिक सब दो दो प्रकार के हैं, पुद्गल कषाय याने कर्म प्रकृति और जीवकषाय मायने ज्ञानविकल्प, यह दो पना यह जाहिर करता है कि यहाँ मात्र निमित्तनैमित्तिक संबंध है और जहाँ निमित्त की बात कही वहाँ स्वयं ही यह अर्थ आ जाता है कि यह पर का कर्ता नहीं। जैसे यहाँ भी लोग जब किसी की प्रशंसा करते हैं कि देखो इन्होंने इतना ठाठ बना लिया, मढ़िया बना लिया, यह गुल्जार कर दिया तो वह चाहे मन में कुछ हो पर कहता तो इसी तरह है कि भाई साहब हमने कुछ नहीं किया, यह तो हो गया, आप लोगों की कृपा थी। मैं तो निमित्त मात्र था।...तो उसके कहने में बात क्या जाहिर हो रही है कि मैंने नहीं किया, मैं निमित्तमात्र हूँ। तो निमित्तमात्र का अर्थ यह है कि जो उपादान में कुछ करता नहीं, किंतु जिसके असद्भाव में कुछ होता नहीं उसे कहते हैं निमित्त। तो यह आत्मा ज्ञानस्वरूप है। इस ज्ञान का परिणमन तो चलता ही है, चलता ही रहेगा। परिणमन बंद न होगा, हाँ अशुद्ध उपादान में विकार जो होगा वह निमित्तसानिध्य में है। 913- द्रव्यपर्यायात्मक वस्तु का प्रमाण से पूर्ण ज्ञान- वस्तु में तो द्रव्यत्व और पर्याय ये दो ऐसी खास बात हैं कि एक का निषेध करें तो दूसरे का लोप हो जाता है। पर्यायनहीं है, ऐसा कोई कहे तो द्रव्य का अभाव हो गया। द्रव्य नहीं है ऐसा कोई कहे तो पर्याय की सिद्धि नहीं। वस्तु तो द्रव्यपर्यायात्मक है। और द्रव्यपर्यायात्मक है तो वस्तु की पूरी जानकारी द्रव्यदृष्टि और पर्यायदृष्टि दोनों से होती है, फिर यह एक अपनी बात है कि किसी एक दृष्टि को हम प्रयोजन से मुख्य कर लें जिसमें कि स्वभावाश्रय का काम बनता हो ऐसा किया जाता है, किया जा सकता है। मगर प्रतिपक्षनय की बात स्वीकार करके फिर प्रयोजनवश विवक्षितनय को प्रधान बनाना यह है मार्ग और प्रतिपक्षनय की बात का विनाश करके बोला तो फिर विवक्षित रहा ही क्या? जो नय सोचा उसको एकांतत: मान लेते कि इससे सिद्धि है, पर मार्ग नहीं मिलता, क्योंकि वस्तु द्रव्यपर्यायात्मक है उसके विरुद्ध सोचा गया। 914- एकद्रव्यस्वभाव व द्रव्यांतरस्वभाव से परिणमन की प्रक्रिया होने से ज्ञानपरिणमनपद्धति में बंधमोक्षहेतुत्व की व्यवस्था– यह ज्ञानस्वरूप आत्मा, यह परिणमता ही तो रहेगा। अब ज्ञान का किस तरह से परिणमना बने कि संसारपरिपाटी का कारण हो जाय और ज्ञान का किस तरह से परिणमना बने कि संसार संकटों से छुटकारा का कारण हो जाय। इन दो बातों को यहाँ इन दो कलशों में बताया गया है। ज्ञान का ज्ञानस्वभाव से होना तो है मोक्ष का हेतु और ज्ञान का कर्मस्वभाव से होना यह है बंध का हेतु, मोक्ष का हेतु नहीं। ज्ञान का स्वभाव से होना यह तो बना एक द्रव्य के स्वभाव से, स्वयं के खुद के स्वभाव से, और ज्ञान का कर्मस्वभाव से होना यह बना द्रव्यांतरस्वभाव से, यह शब्द स्वयं अमृतचंद्रसूरि ने इस कलश में प्रयुक्त किया है। जिससे अपने को अनेक शिक्षा की दिशायें मिलती हैं। तुम ज्ञानस्वरूप हो, परिणमते रहोगे। परिणमन बिना एक क्षण भी न होगा। अब बस सब यही निर्णय पड़ा हुआ है कि हमारा ज्ञान किस पद्धति से परिणमे कि हमारा आनंदविलास बना रहे और यह ज्ञान किस पद्धति से परिणमे कि कष्ट, दु:ख, व्यग्रता ये सारी बातें आ जायें। बस ज्ञान ज्ञानस्वभाव से हुआ, परिणमा, यह तो है आनंदरूप और ज्ञान का कर्मस्वभाव से होना, यह है संकटरूप। अब अपने आपमें यह परीक्षा करो कि हमारे ये दिन रात किस पद्धति से ज्ञान के परिणमन में गुजरते हैं? कर्म स्वभाव से परिणमते हुए गुजरते हैं स्वभाव से या ज्ञान से परिणमते हुए गुजरते हैं? याने कषाय से लगाव करके, अपनायत करके ये गुजरते हैं क्षण या अपने ज्ञानस्वभाव की दृष्टि रखकर गुजरते हैं। यह परीक्षा खुद की खुद कर सकते हैं। यदि क्रोध, अहंकार, माया, तृष्णा का रंग, ममता की वासना, ये ही बने रहते हैं और इनमें हमारा ज्ञान चलता रहता है तो यह है कर्मस्वभाव से होने वाली बात। कर्मस्वभाव से परिणमने में आत्मा का हित नहीं है। 915- अपने भविष्य के लिए अपना उत्तरदायित्व जानकर ज्ञानपरिणमनपद्धति का सुधार करने का संदेश- देख लो जरा कितनी चलती है बाह्य पदार्थों में ममता, तृष्णा का रंग कितना गहरा है, कैसा क्या है, यह बात आप परख लीजिए। है अपनी गलती। इसगलती को स्वीकार करके यह गलती मिटाना है हमको, नहीं तो परेशान होने को कोई दूसरा न आयगा। जगत में कोई मित्र नहीं है जो मेरा सुधार बना दे- अच्छा परिणमन कर दे। जगत के मित्रों का तो यह स्वरूप है कि जिसकी कषाय से कषाय मिल जाय बस वह मित्र कहलाता है। आपके चित्त में जिस तरह की कषाय जग रही है उस तरह की कषाय दूसरों में दिख जायें बस आपके दोस्त हो गये। कषाय का कषाय दोस्त है। आप खूब अच्छी तरह से निरखते जाइये, परिवार में देख लो- जैसी पति की कषाय है उस तरह की पत्नी की कषाय चल रही, एक समान कषाय मिल रही, घर हमें चलाना, द्रव्य हमें जोड़ना, द्रव्य इन्हें जोड़ना, लो इस कषाय में कषाय के मिलने से एक दूसरे के मित्र बन गए। जगत के मित्रों की क्या कहानी कहना और विरोध भी यही कहलाता कि कषाय से जिसकी कषाय न मिले। वह और तरह की कषाय कर रहा, यह और तरह की कषाय कर रहा, तो वह विरोधी मान लेता, यह मेरा विरोधी है। जगत में न कोई विरोधी, न कोई मित्र। इसकी तो यह कोरी कहानी है। यहाँ से हटना है। बहुत दूर चला गया यह उपयोग। आऊँ अपने समीप उतरूँ ! अब तो इस ज्ञानस्वभाव की जानकारी में आऊँ और रम लूँ, यह ही एकमात्र शरण है। आऊँ, उतरूँ, रम लूँ निज में, यह ही ज्ञानस्वभाव में आने की बात है और यह ही मोक्ष का हेतु है।


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