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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 150

From जैनकोष



यादृक् तादृगिहास्ति तस्य वशतो यस्य स्वभावो हि य:

कर्तुं नैष कथंचनापि हि परैरन्यादृश: शक्यते । अज्ञानं न कदाचनापि हि भवेज्ज्ञानं भवत्संततं ज्ञानिन् भुंक्ष्य परापराधजनितो नास्तीह बंधस्तव ॥150॥

1192- प्रत्येक पदार्थ के स्वभाव की स्वाधीनता तथा अन्य के द्वारा अन्यादृश कियेजाने की अशक्यता-

    जिस पदार्थ का जो जैसा स्वभाव है वह स्वभाव उसही के तो अधीन है याने स्वाधीन है। प्रत्येक पदार्थ स्वभावमय है, वह तो सत्त्वसिद्ध अधिकार है, जिस पदार्थ का जो स्वभाव है वह अन्य पदार्थों के द्वारा किसी भी तरह अन्य रूप से नहीं किया जा सकता। प्रत्येक पदार्थ सुदृढ़ है, अपने स्वरूप में मजबूत है। सत्त्व ही वैसा है। तो चाहे कितना ही मेल बने, चाहे कैसा ही संपर्क हो, कैसी ही परिस्थिति हो, प्रत्येक का स्वभाव उसका उसमें ही है, एक पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ को बदलता नहीं है, किसी के द्वारा अन्यस्वभावरूप किया जा सकता नहीं। देखिये किसी प्रसंग में कोई बात कभी पराधीन भी लग रही हो, जैसे जीव रागद्वेष करता है, पर पदार्थ का सन्निधान पाकर होता है तो यह पराधीन भाव है, पराश्रित भाव है। तो कोई कहे कि देखो यह जीव पराधीन हो गया। अरे जीव स्वतंत्रता से परतंत्र बनता है।परतंत्रता से परतंत्र नहीं बनता। जैसे कोई मनुष्य किसी का गुलाम बन रहा, सेवक बन रहा तो वह मनुष्य अपनी रुचि से, अपनी मर्जी से, अपनी स्वतंत्रता से, अपनी गर्ज से पराधीन बन रहा, दूसरे की अधीनता से कोई अधीन नहीं बनता। जो भी बनता है वह स्वयं अपनी स्वतंत्रता से अधीन बनता है। यह जीव इस समय पराधीन है, रागद्वेष मोह इस पर उछल रहे हैं और कैसे कैसे शरीरों में बँध जाता, फंस जाता, जकड़ जाता, जन्म मरण करता। कितनी ही बातें इसकी हो रही हैं तो इसे पराधीन न कहेंगे क्या? हो रहा यह जीव पराधीन, हो रहा बंधन। हो रहा, अपने आपके ज्ञान विकल्प से, अपनी परिणति से इस प्रकार बना है कि ये सारी कहावतें, ये सारी बातें इस पर लद जाती हैं, तो यह जीव अपने आप अपनी परिणति से परिणमता है। सभी पदार्थ स्वयं की परिणति से परिणमते हैं।कोई दूसरा उस परिणति को नहीं कर बैठता।

1193- स्वाधीन स्वाधीन स्वभावमय पदार्थों में परस्पर निमित्तनैमित्तिक योग का दर्शन-

    हाँ इतनी बात अवश्य है लोक में कि कौन उपादान, कैसा उपादान कैसे निमित्त के सन्निधान में अपने आपमें कैसा परिणाम बना ले यह एक स्थिति है, अन्यथा जगत की सारी व्यवस्थायें समाप्त हो जायेंगी। हो रहा है ना ऐसा। जैसे रोटी अग्नि पर पकती है, अब कोई सोच ले कि रोज रोज तो अग्नि में रोटी पकती थी, आज पानी में या धूल में ही रोटी सेंक लें, तो यह बात नहीं बन सकती। वहाँ एक नियत व्यवस्था है। क्योंकि ऐसे कार्य के लिए ऐसा निमित्त सन्निधान हो, ऐसी नियत व्यवस्था हो। सो भाई जो नियत व्यवस्था है, उसे कोई मना नहीं कर सकता, मगर वहाँ यह स्वभाव है कि ऐसी स्थिति में उपादान जो परिणमता है वह किसी अन्य की परिणति नहीं है। निमित्त का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, प्रभाव कुछ अपने में ग्रहण करके परिणमता है ऐसा नहीं है। अरे वहाँ निमित्तसन्निधान है, ऐसा ही योग है कि ऐसे सन्निधान में ऐसा उपादान अपने में ऐसा परिणमन कर लेता है, मनुष्य चल रहा, एक सड़क से जा रहा, सड़क के किनारे पेड़ भी है, कुछ जगह खाली है, धूप भी निकल रही है, मनुष्य जा रहे हैं, पेड़ के नीचे से गए हैं, छायारूप परिणम गए, और जहाँ पेड़ नहीं है, खाली मैदान है वहाँ तेज धूप प्रकाशरूप परिणम रहे हैं, चल रहे हैं तो ऐसा योग है वहाँ जिसका जैसा वातावरण है उसमें उसके अनुकूल इस मनुष्य पर छायारूप, प्रकाशरूप ये सब नानाविध परिणतियाँ चल रही हैं। तो उस छाया को कहीं वृक्ष ने नहीं कर दिया, मगर वह योग ऐसा है कि वहाँ से यदि यह मनुष्य गुजरे तो वह छायारूप आ जाता है एक निष्पत्ति की ओर से बात विचारेंगे तो निमित्तनैमित्तिकभाव आपको व्यवस्थित मिलेगा, और ज्ञप्ति की ओर से विचारेंगे तो वहाँ तो यह ही निर्णय पड़ा है कि अवधिज्ञानी ने, केवल ज्ञानी ने जान लिया ना वही तो होगा, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन ज्ञानी ने वही जाना कि जैसा जब जिस विधि से होता, हो गया, भविष्य में भी याने जैसा होगा, जिस विधान से होगा वही जाना प्रभु ने इसलिए ज्ञप्ति व निष्पत्ति में परस्पर का अतिक्रमण नहीं। निमित्तनैमित्तिक योग का और सर्वज्ञदेव या अवधिज्ञानी के ज्ञान का कोई विरोध नहीं खाता, मगर जहाँ निष्पत्ति की दृष्टि से विचार चला करता वहाँ ये सब बातें होंगी। कार्यकारणभाव को दो दृष्टियों से परखा जाता है- (1) उपादान उपादेय के रूप से और (2) निमित्त नैमित्तिक के रूप से। उसके परखने की दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं। उपादान उपादेयभाव की दृष्टि से एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के साथ कार्यकारणभाव नहीं है, और निमित्तनैमित्तिक भाव की दृष्टि से ये सब कार्यकारणभाव युक्तिसंगत हो जाते हैं। इसका मूड़ और है और उपादान उपादेय से कार्य कार्यकारणभाव की तलाश करना बने तो इसका मूड़ और है।

1194- सर्व परिस्थितियों में स्वभाव की ध्रुवता-

    कैसी भी स्थितियाँ हो, यह जीव निगोद में अनंत काल रहा। अच्छा कोई बता सकता है, क्या कि निगोद जीवों के कितना ज्ञान है? अक्षर के अनंतवें भाग। वह ऐसा लगता कि कुछ भी नहीं है। जड़ हैं एक तरह में निगोद, यों लगता है। क्या वह कोई ज्ञान में ज्ञान है। कोई चेतना सी लग रही है? मगर कितना ही दबा हो, स्वभाव अमिट है। अगर स्वभाव बदल गया होता तो मनुष्य हुआ, भगवान बने, सिद्ध बने, यह बात फिर कैसे होती है। स्वभाव वही है, वह कभी दूसरे पदार्थ के द्वारा बदला नहीं जा सकता। एक बात, दूसरी बात पर्यायदृष्टि से विचारो, मायने सम्यग्दृष्टि ज्ञानमय स्वरूप में हैं। ज्ञान स्वरूप ज्ञानरूप वर्त रहा, उसको अज्ञानरूप करने वाला कोई दूसरा पदार्थ नहीं है। यही ज्ञानरूप वर्तने वाला जीव अपने ज्ञान की स्थिति को छोड़कर अज्ञानरूप मोही बन जाय तो बन जाय। हाँ वहाँ निमित्त सन्निधान को मना नहीं किया जा सकता। जैसे मनुष्य चल रहा है, छाया में वह छायारूप परिणम रहा है, वही आगे बढ़ा, धूपरूप परिणम गया, फिर छायारूप परिणम गया इस परिणमन को वृक्ष ने नहीं किया, मैदान ने नहीं किया, इस परिणति को तो जिसकी परिणति है उसी ने किया, पर उस योग प्रसंग में ऐसा कर लेता है। निमित्तनैमित्तिकयोग और वस्तुस्वातंत्र्य इन दोनों के एकत्र रहने में विरोध जरा भी नहीं है। परखने की दृष्टि है, किसी तरह परखे। हाँ तो जिस वस्तु का जो स्वभाव है वह स्वभाव अन्य पदार्थों के द्वारा अन्य रूप से किया नहीं जा सकता।

1195- ज्ञानरूप भूयमान ज्ञानी के परापराधनिमित्तक बंध की अप्रतिष्ठा–

    प्रकरण चल रहा है ज्ञानी का। और, स्वभाव का मतलब है सहज स्वभाव से। अब इसके अनुरूप उठकर जो उसकी परिणति में एक आदत बन गई है उसे यहाँ ग्रहण कर लिया जाय। ज्ञानी की परिणति में यह आदत बनी है कि वह अज्ञान स्वरूप को निहारता रहा करे। अपने आपको सहज ज्ञानस्वरूप प्रतीति में लिए हुए है ज्ञानी। वहाँ ही उसकी दृष्टि लगा करती है। ऐसी आदत वाले ज्ञानी जीव की बात कह रहे हैं। ज्ञानरूप हो रहा है निरंतर ज्ञानी उसे कोई अज्ञानरूप नहीं कर सकता। स्थिति होती है। करणानुयोग की बात तो ऐसी है कि सम्यग्दृष्टि भी हो जाय और फिर मिथ्यात्वप्रकृति का उदय हो तो सम्यक्त्व से छूटकर मिथ्यात्व में आता है। यह बात एक निमित्तनैमित्तिक योग में है, पर वहाँ भी यह देखिये कि ज्ञान से अज्ञानरूप परिणमता हुआ जीव उस प्रसंग में मिथ्यादृष्टि हुआ याने ज्ञान अज्ञानरूप परिणमा, ऐसा उस जीव कोइस मिथ्यात्व ने मिथ्यादृष्टि किया। परिणति होने का ढंग क्या? तो उपादान की ओरसे देखिये मिथ्यात्वकर्म ने परिणम किया क्या, इस जीव को परिणमाया क्या? न परिणमते को कोई परिणमायेगा क्या? तो अंतस्तत्त्व पर दृष्टि दीजिए- एक निश्चयनय के आधार से विचार करें कि यह जो जीव ज्ञानरूप चल रहा है तो यह अज्ञानरूप किसी पर के द्वारा नहीं बनता। तो ज्ञानरूप चल रहा यह ज्ञानी, अपने उपयोग में उस सहज ज्ञान प्रकाश को लिए है और उस ही रूप अपने को अनुभव करता है। बस इतिश्री, समाप्ति कुछ कार्य नहीं है बाहर करने को। बाहर सब मायाजाल है, भ्रमजाल है, झूठ बात है, बिना प्रयोजन का श्रम है, वह सब करना योग्य नहीं। एक यही सहज ज्ञान स्वभाव ज्ञान में अनुभूत रहे, यही मात्र एक कर्तव्य है, ऐसा आग्रह करके ज्ञानी जीव जो ज्ञानरूप निरंतर चल रहा है, चल रहा है। यह बात हो रही है और ऊपर कर्मविपाक आ गया, पूर्वबद्ध कर्मविपाक समागत हो गया, उपभोग हो गया वहाँ यह बात बनी। भीतर में यहाँ संतत ज्ञानरूप होने की बात चल रही। सो उस ज्ञानी ने स्वयं अनुभव किया है। फल क्या मिलेगा? जैसा वह अपने स्वभाव में बस रहा है उसके अनुरूप उसके उपयोग का फल प्राप्त होगा। जो ज्ञानरूप हो रहा है, उसको बंध नहीं हो रहा। ऐसी बात निरख करके उस ज्ञानी के इस गुण पर आकर्षित हुआ कोई दूसरा ज्ञानी यहाँ कह रहा है धन्य है महाराज, तुम भोगों उपभोग, तुम्हारे परापराधजनित बंध नहीं होने का, कोई बंधन नहीं होने का।

1196- ज्ञानी के ज्ञानगुण महात्म्य के दर्शक का ज्ञानी के प्रति वात्सल्यवचन-

    देखिये- कौनसे मुड़ में यह बात कह रहा हैज्ञानी? उस अंतरात्मत्व की कला पर प्रसन्न होकर एक तरह आशीष रूप कह लो, प्रसादरूप स्थिति में कह रहा है ज्ञानी। एक भिखारी भी तो जब किसी दातार की उदारता का गुण समझता, उसे खूब भोजन वस्त्रादिक दिया ना सो उसकी बड़ी उदारता समझ में आयी तो वह भी एक बार बोल देता है- तुम्हारा भला हो, तुम खूब सुखी रहो, यह उसकी भीतरी एक आवाज है। तो जिस ज्ञानी ने इस अंतस्त्त्व को जाना है कि जिसका उपयोग निरंतर अपने सहज तत्त्व इस परमार्थ ज्ञानस्वरूप पर रह रहा है उसको कह रहे हैं, जब ऊपर से कोई आक्रमण ही हो गया कोई उपभोग, चारित्रमोह का विचित्र विपाक ही हो गया तो कहते हैं कि हे ज्ञानी जीवों ! भोगों तुम्हारे बंध नहीं। तो उसका कहीं यह मतलब न लेना कि हर एक जीव के प्रति यही आशीष चलेगा। यह आशीष लटोरे खचोरे लोगों के लिए नहीं है। यह आवाज उनके लिए निकल रही, जिन्होंने अपने स्वतंत्र स्वरूप को नहीं पहिचाना। ज्ञानी के परापराधनिमित्तक बंध नहीं है। और, कहीं यह ज्ञान बिगड़ जाय तो क्या करे? वहाँ जो बंध होगा वह स्वापराधनिमित्तक बंध होगा, पराधपरानिमित्तक बंध वैसे भी कभी होता नहीं। ज्ञानी को एक मदद भी कर रहा यह तत्त्वज्ञान- हे ज्ञानी तू लगा रहे अपने ज्ञानस्वरूप के अभ्यास में। तू इस तरह का भी ख्याल न करना कि उपभोग आये हैं, कहीं ये बंध नहीं कर दें, अरे उन उपभोगों को तू भोग, ये बाहरी पदार्थ हैं। तू अपनी इस पवित्र दृष्टि में चल रहा तो तू इतना भी कलंक मत लगा लेना कि जो ऐसा सोच बैठे कि इस उपभोग के कारण कहीं बंध न हो जाय। अरे परपदार्थ के कारण जीव को बंध नहीं होता। एक तो यह साधारण नियम है और फिर आपके लिए तो स्पेशल स्थिति गुजर रही है। तू अपने इस ज्ञानस्वरूप में ही रह। ज्ञानस्वरूप में ही रम।

1197- ज्ञानस्वभाव के भवन के संबंध में ओध और समुचितपने की दृष्टि-

    जिसका जो जैसा स्वरूप है वह वही रहता है, यह तो है एक ओध उपादान की दृष्टि से वर्णन। यहाँ समुचित उपादान की दृष्टि से कहा जा रहा है। उस अनादि अनंत सहज स्वरूप की बात कही जा रही है, किंतु ज्ञानरूप जो निरंतर हो रहा है ऐसा जो समुचित उपादान चल रहा है उसके प्रति बात कही जा रही है। ओध उपादान और समुचित उपादान, इन दोनों का क्या मतलब है? ओध कहते हैं- सामान्य को और समुचित कहते हैंविशेष को। जीव में केवलज्ञान का स्वभाव है, निगोद के जीव में भी है और अभव्य में भी है केवलज्ञान का स्वभाव। परिपूर्ण ज्ञान का स्वभाव अभव्य में भी है, ऐसी बात सुनकर आप सोचते होंगे कि अभव्य में कैसे रहा? अच्छा नहीं है ना? तो चलो छुट्टी हो गई। फिर ज्ञानावरण की 5 प्रकृतियाँ अभव्य के न बतावें। केवलज्ञानावरण बताने की क्या जरूरत? अभव्य में यदि केवलज्ञान का स्वभाव नहीं है तो उस ज्ञानस्वभाव को आवरण कर्म क्यों कहा, अभव्य के 5 ज्ञानावरण की सत्ता बताना यह सिद्ध करता है कि अभव्य भी केवलज्ञान का स्वभाव रखता है, तब ही तो उसके अनादित: यह केवलज्ञानावरण बना हुआ है। भव्य और अभव्य में जीवस्वरूप के नाते भेद नहीं है, अगर स्वरूप के नाते भेद होता तो6 द्रव्य न कहकर 7 द्रव्य कहे जाने थे। आचार्यों ने, वीतराग ऋषि संतों ने जहाँ जो वाणी की है, चाहे कोई पहिचान न पाये लेकिन उस वाणी का एक भी अक्षर कितना कीमती है, कितना मार्मिक है, कितना रहस्य को लिए हुए हैं इस बात की कला यदि देखना है तो टीकाकार अकलंक देव, विद्यानंदी स्वामी आदि जो बड़े दिग्गज दार्शनिक विद्वान हुए हैं उनकी रचित टीका में देखो जब टीकायें पढ़ते हैं तो उनके रहस्य का पता पड़ता है। उनकी तो बात क्या? षट्खंडागम सूत्र की टीका वीरसेन स्वामी ने किया, जिन्होंने उसका अध्ययन किया है उसको जब उसके मर्म का पता पढ़ता है तो वे श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं। मूल सूत्रकार ने जो बात कही है उसमें कोई बात अगर ऐसी भी जंचे कि यह अक्षर फालतू है, अगर ऐसा एक प्रसंग रखे तो उसके विषय में आचार्यों ने टीकाकारों ने शंका और समाधान रूप में ऐसा रखा कि ठीक जंच जाता कि यह बात गलत नहीं है, ऐसा ही है।

1198- आर्षसूत्रों के रहस्य का एक उदाहरण-

    एक जरा सूत्र समर्थन का उदाहरण लो। तत्त्वार्थसूत्र का द्वितीय अध्याय जिसमें सूत्र आया है औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपारिणमिकौ च। सर्वप्रथम कहा- औपशमिकक्षायिकौ भावौ, देखना औपशमिक व क्षायिक भाव, ये दो बताये, लग रहा एकसा कि सूत्र खतम हो गया, जब भाव शब्द यहाँ डाल दिया और भाव का ही वर्णन करना था और भाव के ही भेद बताने थे तो भाव के जब दो विशेषण बता दिये औपशमिक और क्षायिक और उसके बाद कहते हैं भावौ, औपशमिक और क्षायिक ये भाव हैं, अब इसके आगे कुछ शक सा नहीं रहता कि अब आगे और भी कुछ कहना चाहिए, सूत्र पूरा हो गया, मगर सूत्र वहाँ तो पूरा हुआ नहीं है सो फिर कहते हैं मिश्रश्च च मायने और जैसे किसी बच्चे से कोई बात कही जाय- देखो भाई जीव के भाव कितने हैं? तो वह कहता है दो, औपशमिकभाव और क्षायिकभाव, और, वह वहाँ रुक गया, जैसे मानो वह भूल गया था और उसे फिर ख्याल आ गया हो। तो वह और लगाकर आगे बोला। औपशमिक क्षायिक भाव यहाँ दो बात कह कर विराम सा लेकर कहता कि और मिश्र। अब च शब्द बोल दिया तो आखिरी भेद की बात समाप्त हुई आप अगर 10 नाम लेते हैं तो 9 नाम तक तो आप सभी शब्द बोलते जाते, ‘और’ शब्द नहीं लगाते, फलाने फलाने किंतु अंत में कहते और फलाने ‘अंत में’ और लग गया, और के बाद एक नाम ले लिया तो अब गुंजाइश नहीं कि यहाँ और कुछ बोलेगा कोई। बस हो गया। सूत्र पूरा। मिश्रश्च, और फिर लिखा- जीवस्य स्वतत्त्वं, ये जीव के स्वतत्त्व हैं। अब तो कोई शंका न रहना चाहिए, सूत्र पूरा हो गया। मगर इसके बाद फिर बोल देते हैं औदयिकपरिणामिकौ च। याने लगता होगा कि यहाँ आचार्य महाराज कई बार कुछ अटक गए। मगर वहाँ रहस्य देखो तो आपको ऐसा लगेगा कि वे अटके नहीं, किंतु अनेक रहस्यों को बताने वाली बात है। औपशमिकक्षायिकौ ये दो बातें एक साथबतलायी हैं, तो ये भव्य जीव के होते हैं। जैसे मानो आप एक रेडक्रास+बना दें, इसमें आप नाम लिख दीजिए, ऊपर की जो लाइन है उसमें आप ऐसा लिख दीजिए- नीचे के कोने पर औपशमिक लिख दीजिए और सबसे ऊपर किनारे पर लिखिये क्षायिक। अब आड़ी लाइन में लिखो, औदयिक, दूसरी ओरलिखोपारिणामिक, मिश्र महाराज को बीच में लिख दो, तो आपका रेडक्रास + बन गया। यह सूत्र बन गया, इसे पढ़ लो अच्छी तरह से। यह सब नक्शा इस बात को स्पष्ट कर रहा है कि भव्य जीव, अंतरात्मा जो मोक्षमार्गी है उसके औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक भाव होते हैं, क्षायोपशमिक भाव दोनों किस्म के  हैं, रद्दी भाव हैं, ऐसे भी क्षायोपशमिक हैं और सम्यक्त्व के साथ वाले भी क्षायोपशमिक हैं, ऐसा वह बीच का मिश्र क्षायोपशमिक दोनों डंडों को छू रहा है। और बाहर में देखो तो औदयिक, क्षायोपशमिक, पारिणामिक ये सब संसारी जीव के हैं, भव्य जीव है तो अभव्य जीव है तो। इस तरह का एक तथ्य सीधा स्पष्ट होता है। इसके लिए सूत्र मेंइस इस तरह से रुक रुककर विशेष भी बीच-बीच में दे देकर सूत्र निर्माण हुआ है। आचार्य संतोंके प्रत्येक अक्षरों में बड़े तथ्य और रहस्य पाये जाते हैं।

1199- ज्ञानी के सतत ज्ञानरूप होने की महिमा-

    यह ज्ञानी जीव है, इसके निरंतर अपने आपके ज्ञानस्वरूप में दृष्टि, प्रतीति अनुभूति, कुछ न कुछ तो सदा है, प्रतीति तो निरंतर बनी हुई है, वहाँ वहाँ ही चित्त है। जैसे किसी का कोई बड़ा ही इष्ट गुजर जाय तो रात दिन उसका वही चित्त रहता है, इसी तरह संसार के जन्म मरण संकटों से जिसका भयभीत चित्त हो गया, संसार में रुलना भला नहीं, यह बड़े संकट की बात है, और साथ ही इन संकटों से छूटने का उपाय भी दृष्टि में आ गया, यह है मेरा सहज चैतन्यस्वरूप। इसका आश्रय करना, इससे ही छुटकारा बनेगा। ऐसे जीव को अब क्या चाहिए? उसे निरंतर अपने सहज ज्ञानस्वरूप की प्रतीति रहती हे, ऐसे जीव के पूर्वबद्ध निज कर्मविपाक से उपभोग आता है और आया तो कुछ तो बात बनी, चाहे क्षोभ बाहर ही लोटे। मगर उस अंतरात्मत्व के उस भीतरी गुण के समझने से यह इतना प्रसन्न होकर कह रहा है कि हे ज्ञानी जीव तुम भोगो, तुम्हें परापराधजनित बंध नहीं। पर के अपराध से, पर के कारण से, संबंध से होने वाला यहाँ यहाँ बंध नहीं।यह कर्मविपाकजनित जो उपभोग आया है उसके भोगने पर भी तेरे में पर के कारण बंध नहीं है और इतना ही नहीं, तू यह भी विकल्प न कर कि कहीं इसके कारण बंध न हो जाय, ज्ञानी के दृढ़ निर्णय है कि जिसके बंध होता, उसके ज्ञानविकल्प के कारण बंध होता। अपने स्वभाव से चिगकर जो रागद्वेष परिणाम में आता हो उस परिणाम का निमित्त पाकर कर्मबंधन होता है। कहीं दूसरे पदार्थ कारण यह बंधन नहीं बनता। निमित्तनैमित्तिक योग दोनों ओरबराबर है, कर्मोदय का कार्य उपभोग तो मिल गया, किंतु यह ज्ञानी उस काल में जो अपने स्वभाव में रम रहा है उसका फल है कि उसमें बुद्धिपूर्वक वासना नहीं बन रही है। बराबर दोनों ओरसे बात चलती है। जीव के विशुद्ध परिणामों का निमित्त पाकर पूर्वबद्ध कर्म अपने आपमें निर्जरा करते हैं छूटते रहते हैं। कैसे छूटते उसकी भी एक नियतव्यवस्था है कि कर्म का दूर होना यह किस तरह से हो रहा है, चल रही है सब व्यवस्था, मगर प्रत्येक द्रव्य का जिसका जो स्वभाव है, स्वरूप है वह स्वरूप वह स्वभाव किसी अन्य पदार्थ के द्वारा अन्य प्रकार नहीं किया जा सकता। यह एक दृढ़ता है इस स्वरूप दृष्टा की। यह स्वरूप का जो निहारना मात्र बन रहा यह अनुभव बिना नहीं बन सकता। अनुभव किया गया है, उसके बाद से दृष्टि और प्रतीति चला करती है।

1200- सहज अंतस्तत्त्व के अनुभव के प्रसाद से प्रमाणित व प्रतीत सहज स्वभाव के आश्रय का प्रभाव-

    भैया, सबसे अधिक प्रमाणित चीज अनुभव है, एक बार एक राजा के दरबार में यह झगड़ा आया कि एक पुरुष के दो स्त्रियाँ थीं बड़ी और छोटी। मानो उन दोनों में से छोटी के पास एक बालक था, बड़ी के कोई संतान न थी। वह मन ही मन कुड़ा करती थी। एक दिन उसने राज दरबार में यह मुकदमा पेश किया कि यह बालक मेरा है, मुझे मिलना चाहिए, छोटी कहे कि मेरा है, मुझे मिलना चाहिए। राजा यह बात सुनकर बड़ा हैरान हुआ।क्या निर्णय वह दे दे कि किसका है? पति की संपत्ति पर दोनों ही स्त्रियों का बराबर का अधिकार था। वहाँ उस राजा को यह निर्णय देना मुश्किल पड गया कि यह बालक किसका है और किसे मिलना चाहिए। सो उस दिन राजा बोला अच्छा इसका न्याय कल के दिन होगा। अब उसी बीच राजा ने अपने जल्लादों को समझा दिया कि देखो कल के दिन तुम लोग नंगी तलवारें लेकर खड़े हो जाना, और हम निर्णय देंगे कि इस बालक के बराबर-बराबर दो दुकड़े कर दो, सो तुम उसके टुकड़े तो न करना, सिर्फ टुकड़े करने का रूपक दिखाना।...ठीक है। दूसरे दिन फिर हाजिर हुई वे दोनों स्त्रियाँ वहाँ, राजा ने अपना निर्णय दिया कि पति की संपत्ति पर दोनों का हक है अत: उस बालक के तलवार से बराबर बराबर दो टुकड़े करके एक एक टुकड़ा दोनों स्त्रियों को दे दिया जावे। तो वहाँ बड़ी स्त्री तो प्रसन्न दिख रही थी क्योंकि वह तो ऐसा चाहती ही थी और छोटी स्त्री दु:खी होकर बोली- महाराज यह मेरा बालक बिल्कुल नहीं है। यह बालक इस बड़ी को ही दे दिया जावे। बस क्या था, राजा ने सब बात समझ लिया कि यह बालक इस छोटी स्त्री का ही है, क्योंकि यह जानती कि यदि जिंदा रहेगा तो इसे देख देखकर ही खुश रहूँगी। आखिर वह बालक उस छोटी स्त्री को दे दिया। तो देखो यहाँ किसने निर्णय बताया? अनुभव ने। तो ऐसे अनुभवसहित ज्ञान को कहते हैं सम्यज्ञान। और ज्ञान पहिले भी है, वचनों में, युक्ति में, समझ में ज्ञान वही है मगर अनुभवरहित जब तक ज्ञान है तो वह ज्ञान है। उसे जबरदस्ती कहना हो तो कहो मिथ्याज्ञान, और ढंग से बोलना हो तो कहो ज्ञान। तुम इस ज्ञान को मिथ्या कैसे कहते सच तो बतला रहे? अच्छा सुनो, वह ज्ञान सम्यक् कैसे है? अनुभवसहित तो है ही नहीं, इसी कारण बताया कि जानकर श्रद्धान करें और उस पर आचरण हो। श्रद्धा और आचरण के बीच जो ज्ञान है वह श्रद्धान का अविनाभावी है। तो यह ज्ञानी श्रद्धानी अनुभवपूर्वक अपने स्वरूप को निहारता है, देखता रहता है, उसका उपयोग इस अंतस्तत्त्व पर है, उसके लिए कह रहे कि उस ज्ञानी के उपभोग होने पर भी निमित्तक बंध नहीं है।



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