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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 151

From जैनकोष



ज्ञानिन् कर्म न जातु कर्तुमुचितं किंचित्तथाप्युच्यते

भुंक्षे हंत न जातु मे यदि परं दुर्भुक्त एवासि भो: । बंध: स्यादुपभोगतो यदि न तत्किं कामचारोऽस्तिते ज्ञानं सन्वस बंधमेष्यपरथा स्वस्यापराधाद्ध्रुवम् ॥151॥

1201- कुछ भी कर्म करने की अनुचितता का ज्ञानी को संबोधन- प्रकरण यह चल रहा है कि ज्ञानी पुरुष के कर्मविपाकवश उपभोग भी आ जाय तो भी उपभोग निमित्तक उसके बंध नहीं बनता। कारण यह है कि उसका उपयोग उस ज्ञानस्वरूप की ओर है तो उसके बुद्धिपूर्वक कोई विकल्प वहाँ नहीं है, इस कारण से वह बँधता नहीं। इस प्रकरण के चलने के बाद कोई लोग स्वच्छंद भी हो सकते सुनकर, तो उस स्वच्छंदता का अपहार करने के लिए कह रहे हैं कि हे ज्ञानी! तुमको कुछ भी कर्म करना उचित नहीं है। कोई सा भी कर्म, कोई भी उपभोग किसी भी प्रकार का विकल्प किया जाना उचित नहीं है। आया था उपभोग कुछ, तो सुख दु:ख रूप बात बन गई थी, इतना भी विकल्प करना उचित नहीं है। हाँ जब ऐसी वस्तु स्थिति है, वही एक उत्सर्ग का निर्णय है कि किसी भी प्रकार का कर्म किया जाना उचित नहीं, कुछ सोच मत करें, कुछ विचारें नहीं, कुछ बोलना नहीं, करना नहीं, भोगोपभोग कोई भी प्रकार का विकल्प करना नहीं। यह है एक उत्सर्ग का आदेश। तो एक बात यह कह रहे हैं कि कोई ऐसा सोचता है अथवा ऐसी स्थिति बनती है कि मैं भोगता तो हूँ पर मेरा यह उपभोग कुछ नहीं, अथवा ये बंधादिक कुछ नहीं, भोग रहा हूँ पर मेरे बंध नहीं। ऐसा जो कोई कहता है तो समझो कि उसने खट्टा खाया, जिसे कहते हैं एक दुरुपयोग करना। उपभोग होता है, पर बंध नहीं होता, ऐसे वचन को सुनकर कोई चित्त में यह बात लाये कि मैं भी भोगता हूँ, पर उसके बंध नहीं है तो यह भी उसने खट्टा खाया, दुर्भुक्त हुआ। एक बात। दूसरी बात यह कि खट्टा खाया, क्योंकि उसके भीतर इच्छा तो पड़ी है भोग की और इस तरह का वह अनुभव बनाता है- मैं भोग रहा हूँ, परंतु बंध नहीं तो कामचार जब है, इच्छा जब है तो फिर बंध न हो, यह कैसे हो सकता? इच्छा है तो बंध चलेगा, इस कारण कोई भी काम करना उचित नहीं, एक ही निर्णय रखें अपने लिए कि भोग भोगना उचित नहीं, उपभोग रंच न चाहिए। किसी प्रकार का सुख दु:ख विकल्प कुछ भी न चाहिए। 1202- उपभोग की ज्ञानी के दुर्भुक्तता-

     अब जरा थोड़ा ज्ञानी की प्रशंसा में इसी वचन को ढालो। ज्ञानी जीव के उपभोग होता है, किंतु प्रतीति, दृष्टि, अनुभूति कुछ अपने आपकी होने के कारण कुछ हुई, कुछ हो रही है, प्रतीति निरंतर है। तो इस कारण उसके उपभोगकृत परापराधकृत बंध नहीं है, तो यह दुर्भुक्त याने बड़ा खराब भोगा गया। अच्छा भोगा गया क्या कहलाता कि भोग हो और बंध हो और संसार में रुलना हो यही तो भोगने का एक न्याय है और इसी को ही डटकर भोग कहते हैं। जैसे इस मुद्रा में देखा जाय तो जगत में कहीं भी कुछ भी अन्याय नहीं हो रहा। जैसे कि किसी ने पाप किया, बंध किया, फल इसमें भोगा गया सो भोगे, अन्याय काहे का? किसी पर कोई कितना ही अन्याय कर रहा, पर जीवों की नीति पर देखो तो जो जैसा करता है सो पाता, अन्याय काहे का? जो सता रहा है अन्याय कर रहा है उसका है अन्याय। अगर कोई पाप करे, व्यसन करे और उसका फल न मिले तो उसे कहो अन्याय जैसे इस ओर बात यों लगाते हैं इस तरह यहाँ भी लगावें कि ज्ञानी के उपभोग हो रहा और बंध नहीं हो रहा तो यह कोई भोग की नीति का और भोग के कानून से बात होनी चाहिए- संसार बढे़, दु:खी हो, बंध हो, यह हुआ नहीं तो वह दुर्भुक्त हो गया। कुछ अच्छा नहीं भोगा गया। अच्छा भोगना मायने भोगे और बंध होवे, दु:खी होवे वह तो है भोग भोगने की सही बात भोगना हुआ और बंध हुआ ना? नीति की बात हुई, न्याय हो गया, मगर यहाँ देखो कि ज्ञानी जीव के उपभोग हो रहा और बंध नहीं हो रहा। यह एक ज्ञानी की प्रशंसा का अर्थ है।

1203- उपभोग में इच्छा कामाचार होने के अपराध से बंधन- मतलब यह है कि उत्सर्ग बात यह है कि कुछ करना ही नहीं चाहिए और विपाक की बात आ पड़ती है तो अपने आपके भीतर सम्हाल रखना कि भीतर इच्छा न जगे, उसके प्रति कामचार न हो, अभिलाषा न बने। देख भोग भोगते हुए तेरे अंदर कामचार है या नहीं, अगर कामचार नहीं है, इच्छा नहीं है तो कोई बंध नहीं और इच्छा अगर है तो भी भोगने से बंध नहीं अपने भीतर में जो इच्छा की उस अपराध से तुझे बंध हुआ है, ये बाहरी बातें हैं, बाहरी प्रसंग हैं, उनको देखकर जैसे कह देते हैं कि यह तो बाहरी बात है, इससे बंध नहीं होता, हाँ बिल्कुल सही बात है। बाहरी पदार्थों के कुछ भी परिणमन संपर्क से बंध नहीं होता, मगर यह भी तो देखो कि उस प्रसंग में इच्छा है या नहीं, मेरे विकार है कि नहीं। है तो बंध हो रहा है। गुरुजी सुनाते थे कि एक वेदांती गुरु शिष्यों को पढ़ाता था तो वह रोज रोज यही कहे अपने शिष्यों से कि ब्रह्म नित्य अपरिणामी वह न खाये, न पिये न कुछ करे न कुछ भोगे। यहाँ तो यह कहे और आदत उसकी क्या थी कि एक मांस वाले की दूकान पर रसगुल्ले कुछ मिलाकर बनते थे तो वह प्रतिदिन उस दुकान में बैठकर रसगुल्ले खाता था। । तो उसे उसके शिष्यों ने बहुत मना किया, समझाया पर वह न माने। तो एक दिन किसी शिष्य ने साहस करके उसी दुकान पर जब गुरुजी रसगुल्ला खा रहे थे, दो तीन थप्पड़ गुरुजी के जड़ दिए, तो वहाँ गुरुजी बोले अरे अरे यह क्या करते? इस मांस वाली दुकान पर आप रसगुल्ले क्यों खाते? तो गुरु बोला- अरे कौन खाता? ब्रह्म तो खाता नहीं, वह तो अपरिणामी है, नित्य है,...तो वहाँ शिष्य बोला- अरे तो आप हमारे थप्पड़ लगाने से नाराज क्यों होते? थप्पड़ तो शरीर में लगे, ब्रह्म में तो थप्पड़ लग ही नहीं सकते। वह तो अपरिणामी है, नित्य है...तो वह गुरु बोला- बस बस मेरा होश ठिकाने आ गया, तुमने तो मेरी आँख खोल दी, अभी तक तो मैं बड़ी भूल में था...। तो मतलब यह है कि बाहरी प्रसंग हैं तो तत्त्व यह कहता है कि बाहरी पदार्थ के कारण बंध नहीं होता, वह बात तो ठीक है, मगर यह भी निरखो कि हमारे विकार हैं कि नहीं? अभी हमारी अरहंत भगवान की जैसी स्थिति नहीं है। दिव्यध्वनि खिरती है, और वह बिना इच्छा के खिरती है। प्रभु तो ज्ञानस्थित बन गया है। ज्ञानानंदमय है। इच्छा है, विकार है, तो यही तो खुद का अपराध है। और इस खुद के अपराध के कारण यहाँ बंध होता है। 1204- आत्मा की सही सम्हाल में बंधन का अभाव-

    देख आत्मन् तू तो ज्ञानरूप रहता हुआ रह, यह ही काम तुझे सौंपा गया है मोक्षमार्ग में। तू तो अपने को ज्ञानरूप वर्तता हुआ, उपयोग करता हुआ रह। अन्यथा देख, तेरा ही अपराध बनेगा और तेरे ही अपराध से वहाँ निश्चित बंध होगा। तो एक अपने आपको सम्हाल। बाहर की बात का क्या अधिक सोचना? आया कि गया कि क्या हो रहा? मेरा बंध है, नहीं है, क्या है? अरे तू एक अपने आपके आत्मा को सम्हाल। अपने को ज्ञानरूप अनुभवकर। मैं ज्ञानमात्र हूँ ज्ञानस्वरूपमात्र हूँ ऐसा उपयोग अपने भीतर लगायें और अपने को ज्ञानमात्र अनुभव करें।


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