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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 163

From जैनकोष



रागोद्गारमहारसेन सकलं कृत्वा प्रमत्तं जगत्

क्रीडंतं रसभावनिर्भरमहानाटय्येन बंधं धुनत् ।

आनंदामृतनित्यभोजि सहजावस्थां स्फुटं नाटयद्-

धीरोदारमनाकुलं निरुपधि ज्ञानं समुन्मज्जति ॥163॥

1284- बंध को धुनते हुए निरुपाधि ज्ञान का उपयोगभूमि में प्रवेश-

अब निरुपाधि ज्ञान प्रकट होता है याने उपयोग में रागद्वेषादिक विभाव अंतरंग उपाधियों से रहित यह ज्ञान प्रकट होता है, जो ज्ञान इस बंध को धुनता हुआ प्रकट हो रहा, जहाँ आत्मस्वभाव स्पर्शी ज्ञान है वहाँ बंध की क्या कथा है? बंध किसे कहते हैं? बंध की क्या तारीफ है? उपयोग कर्मविपाजक विकारभाव में, विकल्प में अपने आपको जोड़ता याने विभावों के अधीन बन गया उपयोग। अब विभावरूप, विकाररूप यह अपनी परिणति करे, यह है अपने आपमें बंध। और ऐसा बंध बना कैसे? ऐसा कहीं आत्मा का स्वभाव नहीं है कि वह विभावों के अधीन विभावरूप परिणमन, ज्ञानविकल्प यों ही अपने आप बनाया करे, ऐसा स्वभाव नहीं है। करता यह जीव ही विकारपरिणाम है, मगर कर्मविपाक सन्निधान में यह जीव अपने आपमें इस प्रकार का विकार करता है, तभी यह विकार दूर हो सकता है, नैमित्तिक है, अतएव वह विकार दूर हो सकता है; जो अनैमित्तिक तत्त्व है, अहेतुक है, स्वाभाविक है वह दूर नहीं किया जा सकता। तो यहाँ इस बंध को इस रूप में जो रखता है यह मेरा स्वरूप नहीं, स्वभाव नहीं, स्वाभाविक भाव नहीं, यह औपाधिक है, पर लक्ष्य करके उत्पन्न हुआ भाव है, ये सारी बातें जब इस ज्ञानी के निर्णय में हैं तो उसमें एक ऐसा बल होता है कि इसको तो ज्ञानबल के द्वारा क्षणमात्र में दूर किया जा सकता है।

1285- रागोद्गारमहारस से बंध द्वारा जगत् की विडंबना-

यह बंध राग के उदयविपाकरस से सारे जगत को प्रमत्त कर चुका है, कर रहा है। कैसा प्रमत्त? बेहोश, स्वरूप की सुध नहीं हो पाती। इस जीव पर राग बहुत बड़ी विपत्ति है। स्वरूप से देखो तो सब जीव आनंदमय हैं, स्वरूप में निरखिये, स्वरूप कष्ट के लिए नहीं होता। एक आत्मा ही क्या, किसी भी पदार्थ का स्वरूप अपनी बरबादी के लिए नहीं हुआ करता। मुझ आत्मा का स्वरूप है चैतन्य प्रकाश, उसमें कष्ट का कहाँ अवसर है? स्वरूप को निरखिये- स्वरूप आनंदमय है। मगर पूर्वबद्ध निजकर्मविपाकवश बन रहे हैं ज्ञान विकल्प। इन ज्ञान विकल्पों ने इस जीव को झकझोर दिया, यह जीव परेशान हो गया। परेशान शब्द यद्यपि है उर्दू का, किंतु इसको संस्कृत शब्द अगर मान लें तो परेशान का अर्थ क्या होगा? पर ईशान, ईशान कहते हैं स्वामी को। तो पर पदार्थों को अपना स्वामी मानना या पर का स्वामी अपने को मानना, जहाँ यह बुद्धि जगती है वहाँ इस जीव को परेशानी शुरू हो जाती है। सूक्ष्मरूप से, मोटेरूप से, ऐसे ही कोई पर के प्रति लगाव बनाता है जीव तो यह परेशान है, दु:खी है, यह परतंत्र है। यह विह्वलता, यह राग के उद्गार से प्रकट हुई है।

1286- ज्ञानवासित वैराग्ययुक्त जीवन की धन्यता-

भैया, किसी भी वस्तु का राग न करें तो क्या बिगड़ता है यहाँ? आत्मा के गुणों में से कोई गुण क्या कम हो जाता है? किसी भी वस्तु विषयक किसी भी परतत्त्व में, किसी भी वस्तुधर्म में राग न हो तो आत्मा का क्या बिगाड़ है सो बतलाओ? जरा अपने जीवन से अंदाज करो, इस जीवन तक इस कुटुंब में कितने लोग गुजर गए? आपके बाबा थे, बड़ा प्यार रखते थे वे भी नहीं रहे, जो जो नहीं रहे, दादा, बाबा, पिता, किसी के पुत्र भी नहीं रहे, जो जो भी जिनके नहीं रहे, वे जरा विचारें तो सही कि हमने पूर्व समय में ऐसी ऐसी चेष्टायें की, राग किया, प्रीति की। यदि मैं प्रीति न रखता, राग न रखता तो मेरा क्या बिगाड़ था? यह बात अब जरा समझ में आ सकती है, क्योंकि वे साधन सामने नहीं हैं, वे गुजर गए हैं और उसके प्रति जो प्रीति की है, उसकी एक बड़ी चोट है, आघात है, दु:ख है, तो यह बात झट समझ में आ सकती है कि उन जीवों से यदि प्रीति न की होती तो मेरा क्या बिगाड़ था। बल्कि मैं तब भी आनंद में रह लेता, इतना समय व्याकुलता में तो न जाता, यह बात झट समझ में आती, ऐसी ही बात मिली हुई संपत्ति और परिचय में यदि बन सके तो उसका जीवन धन्य है। जल से भिन्न कमल है। जल से भिन्न रहेगा कमल तो वह सड़ेगा नहीं, जल से ही पैदा होता और वह जल से राग करने लगे, जल में पड़ जावे तो कुछ दिन में वह सड़ जायगा। वह जल से न्यारा रहता है तो प्रफुल्लित है, ऐसे ही हम आप घर में पैदा होते, इसी कुटुंब में पलते-पुषते, इसके बीच रहकर भी अगर अपने स्वरूप का भान रहे तो प्रसन्न रहेंगे और जो परिजन में, परिग्रह में इनमें अनुरक्त होंगे, आसक्त होंगे तब तो फिर सैकड़ों प्रकार के झगड़े रहेंगे, वहाँ फिर आदर न रहेगा, उसमें सड़ जायेंगे मायने बरबाद हो जायेंगे। इसका खूब भली प्रकार अंदाज कर लो- घर के बीच रहकर अगर बालबच्चों से अधिक मोह रहेगा तो वे बाल-बच्चे भी यही समझेंगे कि बाप तो बड़ा बुद्धू बन रहा, मेरे लिए रात-दिन जुत रहा, मैं जो कहूँगा सो यह करेगा...और जो कुछ ज्ञान और वैराग्य की ओर प्रेरित रहेगा यह तो उसके प्रति उन सबको भय रहेगा कि हमसे कहीं कोई अनुचित बात न बनने पावे। कहीं ऐसा न हो कि ये पूर्ण विरक्त हो जावें। तो ज्ञान और वैराग्य से वासित होकर घर में रहना बनेगा तो वहाँ प्रसन्नता रहेगी और आसक्त होकर घर में रहेगा तो वहाँ क्लेश रहेगा। यह राग का उद्गार ऐसा ही महान मदिरारस है।

1287- बंध की अज्ञानियों पर मार और ज्ञानियों की बंध पर मार-

इस बंध ने क्या किया, इस कर्मविपाक ने क्या किया कि राग-उद्गाररूपी मदिरारस से सारे जगत को प्रमत्त कर दिया और स्वयं अपना अनुभागरस भरा हुआ होने से एक अपना नृत्य बनाये, क्रीड़ा कर रहा अर्थात् इन सब प्राणियों को जैसी चाहे दुर्दशा बनाने में यह कारण हो रहा, निमित्त हो रहा। अथवा भावबंध से देखो तो यह भावबंध इस जगत को नाना प्रकार से नाच नचा रहा, ऐसे स्वच्छंद क्रीड़ा करने वाले बंध को अब इस ज्ञान ने धुना। धातु एक अर्थ में अनेक होती हैं फिर भी सूक्ष्मता से देखें तो भेद पड़ता है, जैसे देखना, निरखना, परखना, लखना, अवलोकन आदि ये सब देखने के अर्थ में हैं, मगर सबके भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। इनकी सावधानी हिंदी में अधिक नहीं रखते पर इंग्लिश में और संस्कृत में इसकी बड़ी सावधानी होती है। कैसे कहाँ किन शब्दों का प्रयोग करना होता। यहाँ यह ज्ञान इस बंध को धुन रहा है, नष्ट कर रहा है, पीट- पीटकर, मार-मारकर उसके अंश-अंश को धुन रहा है, ऐसा यह ज्ञान अब प्रकट होता है। यह चल रहा है बंधाधिकार। तो बंधाधिकार के मायने यह न जानना कि इसमें बंधने-बंधने की बात की जायगी, इसमें बंध के धुन की बात कही जायगी। प्रकरणवश बंध के लक्षण भी आयेंगे। बंध का स्वरूप बताया जायगा, पर प्रयोजन है बंध को दूर करने का। बंध का यहाँ प्रवेश होता है याने इस उपयोगभूमि में अब बंध की चर्चा चलती है तो चर्चा धुन के रूप से चलेगी। बंध क्या कहलाता है? वह कैसे मिटता है? उसके प्रति क्या अपने को पौरुष करना है, ये सब चर्चायें इस अधिकार में आयेंगी तो यह ज्ञान विभाव-उपाधि से रहित होकर विलास कर रहा है। ज्ञानबल के द्वारा विभावभाव हट गए।

1288- अविकार स्वरूप पर विकार लदने की विडंबना-

यह हूँ मैं अनादि चैतन्य प्रकाशमात्र, इसमें विकार नहीं, किंतु इस पर विकार लद गए, जैसे सिनेमा का पर्दा है, तो उस पर्दे में फिल्म फोटो नहीं है, दिन में देख लो, कहाँ है? जब चाहे देख ली कहाँ है? सिनेमा के पर्दे पर फोटो नहीं पड़ी हुई है, वहाँ से वह फोटो नहीं आयी किंतु उस पर फोटो का रंग लद गया है, कब? उस फिल्म मशीन से जो भी कार्य किया जा रहा है उसका सन्निधान पाकर। ऐसे ही मेरे स्वरूप में विकार नहीं हैं और स्वरूप में से विकार नहीं निकले किंतु अशुद्धता की योग्यता से मुझ पर विकार लद गए हैं। जैसे उस पर्दे पर इतनी योग्यता है कि उस पर फोटो लद सकती है, चित्रण हो सकता है ऐसे ही इस उपयोग में ऐसी योग्यता है कि उस पर विकार लद सकते हैं। कब? रागोद्गाररस-निर्भर कर्मविपाक का सान्निध्य पाकर। ये विकार मेरे स्वरूप नहीं हैं। ऐसा जो एक, दोनों की संधि में, महान एक छेद किया है, दूर किया है, टुकड़े किया है ज्ञान द्वारा, अब ये विभाव अब इस स्वभाव में जुड़ सकें, जुड़ते तो किसी के न थे, पर अज्ञानी भ्रम से अपनाता रहा, यह अब भ्रम भी नहीं रख रहा है तो एकदम स्पष्ट मामला बन गया। यह मैं चैतन्यप्रकाश मात्र हूँ, ऐसी दृढ़ दृष्टि के कारण अब यहाँ निरंतर बंध का धुनना बन रहा। आ रहे जा रहे, उसे अपना नहीं रहा ज्ञानी।

1289- अध्यात्मशास्त्र में बुद्धिगत पौरुष एवं कार्य का वर्णन-

देखिये- अध्यात्मशास्त्र में बुद्धिपूर्वक वर्णन होता है तो अन्य-अन्य बातें जानने पर भी जब एक अध्यात्म में केवल अंतस्तत्त्व का लक्ष्य रखा जाता है तो वहाँ फिर ज्ञान में एक ऐसा ध्यान नहीं लाया जाता कि बंध तो यहाँ तक चलता, आस्रव तो यहाँ तक होते 9 वें गुणस्थान तक, 10 वें गुणस्थान तक, तो वह जान तो गया, जान लिया, मगर अबुद्धिपूर्वक जो बातें हैं उन पर आप क्या पौरुष करें? बुद्धिपूर्वक जो गंदगियाँ हैं उन्हें हटाना है। जब बुद्धिपूर्वक गंदगियाँ हटेंगी, अबुद्धिपूर्वक गंदगियाँ भी हटेंगी। यह ही तो सम्यग्दृष्टि पौरुष करता है कि बुद्धिपूर्वक पर तत्त्व पर-विजय किया तो अबुद्धिपूर्वक पर-तत्त्व पर विजय करने का उसका यही पौरुष है। जो राग को दूर करने का पौरुष है, कोई भिन्न पौरुष नहीं, अपने सहज स्वरूप का आश्रय करना और एक ही मात्र यह पौरुष है जिसके बल से सभी प्रकार के आस्रव बंध धुने चले जाते हैं जहाँ एक ज्ञान प्रकट हुआ। अपने आपके सहज ज्ञानस्वरूप में, मैं हूँ ऐसा अनुभवने वाला वह ज्ञान नित्य ही आनंदरूपी अमृत का भोजन करने वाला है अर्थात् उस ज्ञान के साथ ही आनंद लगा हुआ है। फिर उस विशुद्ध आनंद से ही ज्ञान का पोषण चल रहा, यह ज्ञान और आनंद सहभावी हैं, ऐसा आत्मीय ज्ञान और आत्मीय आनंद ये दोनों ही चल रहे हैं। तो आनंदामृत का नित्य भोजन करते हुए यह ज्ञान प्रकट होता है।

1290- आनंद को उमगाता हुआ ही शुद्ध ज्ञान के अभ्युदय की विलास-

जिसे सम्यग्ज्ञान हुआ, स्वानुभव बना, आत्मा की सुध हुई उसे आनंद होगा ही। वहाँ कभी ऐसा नहीं सोचा जा सकता कि मैंने ज्ञान का तो अनुभव किया और देखो मुझे आनंद हुआ कि नहीं। जैसे अनेक लोग ऐसा सोचते हैं कि मैंने जिंदगी भर धर्म तो किया मगर मेरे को दु:ख न मिटा, धन न बढ़ा, बच्चे न बने...अरे ! ऐसी दृष्टि करने वालों ने धर्म किया कहाँ? समस्त परभावों से विविक्त सहज चैतन्यप्रकाश की रुचि की हो, उसमें ही लगन होने की, मग्न होने की धुन बनी हो, ऐसे पुरुष को कष्ट कहाँ है? बच्चों को वह क्या मानता है, सब पर चीजें हैं, पर का संबंध, पर के लगाव को तो, वह एक विपत्ति समझता है। तो जैसे एक मोटे रूप में कोई कहे कि ज्ञान की हम बहुत बहुत बारीक चर्चा भी करते हैं, उसी का अर्जन भी करते हैं और फिर भी आनंद नहीं मिलता, तो समझो अभी धर्म नहीं कर सका। धर्मपरिणाम हो और आनंद न आये, यह बात कैसे हो सकती है? यदि सविधि जैसा कि यह ज्ञान करे, इस सहज ज्ञानस्वभाव को ज्ञेय कर ले, ज्ञान में वह सहज ज्ञानस्वरूप समाये ऐसी कभी वृत्ति बने तो वहाँ तत्काल ही उसको अद्भुत आनंद प्रकट होता है। वेदांत की एक टीका में दृष्टांत दिया है कि कोईनई बहू जिसके पहली बार गर्भ रहा था तो जब कुछ उसे पेट दर्द सा होने लगा, कुछ जरा तकलीफ सी हुई तो वह अपनी सास से बोली- माँजी ! जब मेरे बच्चा पैदा हो तो मुझे जगा देना, कहीं ऐसा न हो कि मैं सोती ही रहूँ और बच्चा पैदा हो जाय या कुछ से कुछ गड़बड़ी हो जाय। तो वहाँ सास बोली- बेटी घबड़ा मत, बच्चा जब भी पैदा होगा तो तुझे जगाता हुआ ही पैदा होगा। तो ऐसे समझो कि यह ज्ञान जब भी पैदा होगा तो आनंद को जगाता हुआ ही पैदा होगा। स्व का ज्ञान बने, स्व की अनुभूति बने और वहाँ आनंद न हो यह कभी नहीं हो सकता।

1291- अनर्थविभाव को छोड़कर चैतन्य महाप्रभु के दर्शन की कला से अपने को आत्माभिमुख बनाने का संदेश-

इस संसार के ये सब जीव अपनी सुध न पाने के कारण इतने दु:खी हैं और संसार में भ्रमण कर रहे हैं। इनको आनंदामृत का पता ही नहीं, न जाने बाहर में कहाँ- कहाँ दिमाग लगाते, न जाने कितनी ही पक्ष-विपक्ष की बातें चलती, न जाने किन-किन चीजों को अपनी मानकर गर्व करते, पर जरा सोचो तो सही कि इस जगत में कोई भी पर पदार्थ अपना है क्या? यहाँ गर्व किए जाने लायक कोई बात भी है क्या? जिसके मिथ्यात्व है, मोह है उसको इतना विष व्याप्त रहा है कि जिसको समझ लिया अपना, जिसको मान लिया, अपना बस उसके लिए अपना तन, मन, धन, वचन सर्वस्व अर्पित करता और जिन्हें गैर समझ रखा उनके प्रति रंच भी उदारता का भाव नहीं उमड़ता, मानो उनसे कुछ मतलब ही न हो, यह मिथ्यात्व-महाविष की छाप है। नहीं तो जिसकी विशुद्ध दृष्टि हो गई वह सब जगत के जीवों को निरखें तो सबसे पहले उसे ब्रह्मस्वरूप के दर्शन होना चाहिये ज्ञानबल से। सब जीवों में यही चैतन्यस्वरूप है। वहाँ की गड़बड़ियाँ, वहाँ की अटपट प्रवृत्तियाँ, इन बातों में चित न देकर सर्वप्रथम उनके सहज चैतन्य महाप्रभु का दर्शन हो।

1292- निज सहज स्वरूप के दर्शन के दृढ़ अभ्यासी को सर्वत्र चैतन्य महाप्रभु के दर्शन-

सर्व जीवों को निरखते ही प्रथम वहाँ चैतन्य महाप्रभु का ख्याल आ सके तो समझिये कि वह उसका अभ्यासी है। होता भी तो ऐसा ही है। जो पुरुष हर तरह से सांसारिक सुख में मग्न है, कुटुंब अच्छा है, वैभव ठीक है, लोगों में इज्जत भी है। सब कुछ बात हो रही है तो उसे कहीं भी कुछ दिखता है तो सर्वप्रथम वह सुखमय वातावरण ही दिखता है, क्योंकि वह खुद सुखी है, वैसी उसकी दृष्टि बनी है। वही उसके अनुभव में चल रहा है। वह तो उसे सहज ही ऐसा लगेगा कि सब सुखी हैं, सब सुखमय हैं, किसी को कष्ट नहीं, और खुद को भी कोई बड़ा सांसारिक कष्ट आ जाय, मानो किसी का परम इष्ट गुजर गया, या अन्य कोई विपत्ति आ गई तो वह जब कुछ भी देखता है तो बाहर उसे ऐसा लगता है कि सारी दुनिया कष्ट में पड़ी हुई है। जैसी अपने अंदर बात है वैसी ही बात बाहर नजर आती है। तो जिसने अपने इस चैतन्यस्वरूप का अभ्यास किया है ज्ञान से, वही भीतर अपने उस तत्त्व को निरखने के पौरुष में सफल हुआ है, अनुभव बना है उसे जगत के सब जीवों को निरखकर प्रथम उसके अंत: स्वरूप का दर्शन होता है, होना चाहिये। बात यह भी सत्य है, पर्याय की भी बात ठीक है, ये परिणतियाँ चल रही हैं मगर अंतर में उसे इस प्रभुता का अवश्य स्मरण होता है क्योंकि यह ज्ञान, यह स्वरूप अपने इस आनंदामृत से तृप्त हुआ है।

1293- निरुपाधि ज्ञान का सहज विलास-

आनंदामृतनित्यभोजी ज्ञान ने अपनी सहज अवस्था को स्फुट साफ-साफ स्पष्ट प्रकट किया है अर्थात् अपने ज्ञान में जाना कि यह मैं आत्मा, यह मैं ज्ञान हूँ। यदि कोई पौरुष बाहर का न करूँ, किसी तरह का विकल्प न बनाऊँ, कहीं मोह ममत्व की बातें न करूँ तो इसकी सहज हालत क्या होगी, यह उसके निर्णय में भली-भाँति पड़ा हुआ है। विकल्प करते हैं तो क्या स्थिति बनती है और बाहरी विकल्प नहीं रखते हैं तो क्या स्थिति बनती है? दोनों का इसको परिचय है। तो जब वह ज्ञान प्रकट होता है, जिसके विभावों से उपेक्षा है ऐसे ज्ञान के समय वह ज्ञान अपनी सहज अवस्था को स्पष्ट नचा रहा है, प्रकट कर रहा है। नचाना किसे कहते हैं? जब मन आये तब काम कर लें, इसे कहते हैं नचाना। यहाँ भी तो ऐसा कहते हैं कि इसने तो उसे नचा रखा है, मायने जब मन चाहे तब उसे दु:ख में डाल दे कष्ट में डाल दे, जैसा चाहे तैसा काम करा दे, इसे कहते हैं नचाना। तो इस ज्ञान ने किसे नचा रखा है? अपनी सहज अवस्था को नचा रखा है। जब दृष्टि दे तो वह सहज अवस्था इसके ज्ञान में स्पष्ट है। दुष्ट लोग दूसरों को नचायेंगे, किसी प्रकार? तो यह ज्ञान, सहज ज्ञान अपनी शुद्ध अवस्था को नचाता है मायने वही-वही बना रहता है, और कदाचित् कोई ज्ञानी कुछ वीतराग अवस्था से नीचे है, सराग अवस्था में है और कभी-कभी उसका ज्ञानविकल्प बनता भी है तो भी उसके हाथ यह बात है कि जब दृष्टि दें तब ही अपने आपकी सुध लें, बस अपने में आनंद सामने पा लेते हैं। दृष्टि की ओर वह चीज सामने है। जब अपने पास यात्रा करने में टिफिन बाक्स में रखा हुआ भोजन है तो जहाँ भूख लगी वहाँ ही खा लिया। उसके लिए अधिक चिंता नहीं करनी पड़ती कि पता नहीं कौनसे स्टेशन में खाना मिलेगा,...ऐसे ही ज्ञानी जीव को प्रतीति में निज सहज तत्त्व है, ऐसी जब इसकी सुध होती, जब भी इसकी दृष्टि होती तब ही अपने तत्त्व का अनुभव कर लेता है। तो ऐसी सहज अवस्था को स्पष्ट नचाता हुआ यह ज्ञान अब प्रकट होता है।

1294- धीर उदार अनाकुल निरुपाधि ज्ञान का प्रताप-

बंध को धुनता हुआ यह ज्ञान धीर है। धीर कहते हैं ‘‘धीरांति इति धीर:’’ जो बुद्धि दे, बुद्धि का विकास करे, ज्ञान का विकास करे वही ज्ञान है। ऐसा ज्ञान प्रकट होता है कि अब उसके विकास ही विकास चलेगा। अवनति की बात नहीं। जैसे लौकिकजन कहते हैं कि धन से धन बढ़ता है, उनकी बात और है। जिनके पास धन है वे व्यापार करेंगे, धन बढ़ेगा। यहाँ देखो ज्ञान में ज्ञान बढ़ रहा है और निरुपाधि धन प्रकट होता है। वह विशुद्ध ज्ञान ज्ञानविकास में ही बढ़ा हुआ रहता है इसलिये वह ज्ञानविकास को ही दे रहा है, अतएव धीर है। धैर्य का अर्थ लोग कहते हैं घबराहट न होना यों धीरता रखें, यह फलित अर्थ है, इस शब्द का अर्थ नहीं है। जिसका भाव ऐसा है कि ज्ञान ज्ञान को, बुद्धि को साफ रखता है, विकसित करता है, वहाँ घबराहट होती नहीं है, इसलिए धैर्य का अर्थ घबराहट नहीं होता, यह फलित अर्थ निकलता है। यह ज्ञान धीर है, उदार है। इसमें सब तुच्छ बातें विभाव गंदगियाँ नहीं आती हैं। सर्व जीवों में स्वरूपसाम्य इसकी नींव है, जिस पर कि यह ज्ञान का विकास चल रहा। यह निराकुल है। आकुलता नहीं है। ज्ञान में आकुलता नहीं। देखिये- जब कहा जाय कि ज्ञानी के बंध नहीं होता तो उसका एक तो अर्थ यह लेना कि बुद्धिपूर्वक बंध नहीं है, आस्रव नहीं हैं; दूसरा अर्थ यह लेना कि इस जीव को ज्ञानी शब्द से कहा है इसलिए ज्ञानभाव के नाते से ही उसको निरखना है। और भाव के नाते से है बंध है तो हो मगर उसका संबोधन तो नहीं किया। जिस शब्द से संबोधन किया उस शब्द की कला से ही देखें तो ज्ञान की कला में क्या बंध हुआ करता है? तो यों परखो, ज्ञान को ज्ञान-ज्ञान स्वरूप मात्र में ही निरखा जाय तो ज्ञानकला के द्वारा बंध नहीं होता। यहाँ अब यह निरुपाधि ज्ञान प्रकट होता है जो कि इस संबंध को धुनता हुआ विलास करता रहता है।



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