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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 164

From जैनकोष



न कर्मबहुलं जगन्न चलनात्मकं कर्म वा

न नैककरणानि वा न चिदचिद्वधो बंधकृत् ।

यदैक्यमुपयोगमभू: समुपयाति रागादिभि:

स एव किल केवलं भवति बंधहेतुर्नृणाम् ॥164॥

1295- बंधहेतु के संबंध में विचार-

यह जीव अपने आप अपने स्वरूप से स्वभावत: अपने एकत्व में रहता है। इसमें स्वरूपदृष्टि से निरखें तो कोई असुंदरता नहीं, और जब आज की स्थिति निरखते हैं, घटना देखते हैं तो यहाँ विपत्ति हैं, बंधन में हैं। शरीर में कैसा बँधा है? सो परख लो। स्वरूपदृष्टि से तो निराला है, पर बंधन भी देख लो, अगर कहा जाय कि आपका शरीर तो वहीं बैठा रहने दो और केवल आप हमारे पास आ जावो तो नहीं आ पाते, ऐसी घटना है। तो ऐसा बंधन क्यों हुआ इस जीव को? उसका कारण क्या है? देखिये- शरीर का बंधन हुआ उसका कारण तो उस प्रकार का कर्मोदय और उदय तब आया जब यह सत्ता में आया। सत्ता हुई इसकी तब जब इसका बंध हुआ। तो उस कर्मबंध का कारण क्या हैं? आपत्ति तो सब बंधमूलक हुई ना? तो उस बंध का हेतु क्या है? इस तथ्य का इस छंद में विचार किया है याने यह जीव ज्ञानावरणादिक अष्टकर्मों से बँध गया उसका कारण क्या है? इस तथ्य पर इस छंद में विचार किया गया है।

1296- बंधप्रसंग के समय की कुछ बाहरी घटनाओं का चित्रण-

देखिये- यहाँ बाहरी घटनायें किस प्रकार की हैं। इस संसार में हम आप हैं जिनमें कार्माणवर्गणायें खूब भरी पड़ी हुई हैं। प्रत्येक जीव के साथ अनंत तो पुद्गल कर्मपरमाणु हैं और उससे अनंत गुणे कार्माणवर्गणा के विस्रसोपचय परमाणु हैं याने जो कर्मरूप अभी नहीं हैं, पर कर्मरूप बन सकेंगे, ऐसा इसके साथ बना हुआ है एक क्षेत्रावगाही, इनसे यहाँ बंध नहीं है। जहाँ कार्माण वर्गणा के विस्रसोपचय हैं वहाँ बंधन नहीं है। जीव के साथ बद्ध कर्म परमाणुओं का बंधन है, मगर देखिये- जब जीव एक भव छोड़ता है, दूसरे भव में जाता है तो बद्ध कर्म जाते हैं साथ, मगर ये विस्रसोपचय भी इसके साथ जाते हैं। उसमें बँधा होकर भी कैसा यह बँधा-सा चिपटा हुआ है। अब एक घटना देखो- कार्माणवर्गणा के जो विस्रसोपचय है, (विस्रसोपचय का अर्थ है विस्रसा उपचय, स्वभाव से ही ढेर लगा), वे ही कर्मरूप बन जाते हैं। तो ऐसा होने का कारण क्या? तो एक बात तो यह दिख रही कि सारे संसार में कर्म भरे पड़े हैं। दूसरी बात यह दिख रही कि जीव बड़ी दौड़ लगा रहा है, मन, वचन, काय की बड़ी-बड़ी प्रवृत्तियाँ कर रहा है, यह भी दिख रहा है। यह भी दिख रहा है कि यह जीव बहुत से साधनों के बीच रह रहा, घर में रह रहा, कुटुंब में रह रहा, जहाँ जो संग प्रसंग हैं उनमें रह रहा यह जीव नजर आ रहा है। यह जीव का जिसको चाहे सताने का काम करना, किसी का बंध कर देना, किसी का चित्त हटा देना, ऐसी अनेक बातें दिख रही हैं।

1297- कर्मबहुल जगत का बंधहेतुता में अनियम-

कोई कह रहा है शंकाकार कि हम तो यह जानते हैं कि जब कर्मों से भरा हुआ यह संसार है और इसके बीच यह जीव रह रहा है तो उसमें अधिक क्या दिमाग लगाना? अरे- काजल की कोठरी में कैसा ही सयाना जाय, कालिमा की रैख तो लागे पै लागे ही। ऐसे ही कर्मों से भरा हुआ संसार है और उसमें पड़ा हुआ यह संसारी जीव है तो यह बचकर कहाँ जायगा? उसको कर्म बंधेगे ही, एक लौकिक पुरुष ने अपना ऐसा विचार रखा, मगर यह विचार बंध के कारण की असलियत को नहीं बता रहा। कर्म तो भरे है संसार में, सिद्धभगवान विराजे हैं वहाँ पर भी कर्म भरे हैं। निगोद जीव वहाँ भी रह रहे हैं और उनकी कार्माण वर्गणायें तो हैं ही और अनेक वर्गणायें जीव से अलग भी रहा करती है। तो कर्म जब सारे लोक में भरे हैं और कर्म भरे रहने के कारण इनका बंध हुआ ऐसी बात मान लेते, तब तो सिद्ध में बंध होना चाहिए। याने कर्मबंध का कारण कर्म से भरे हुए संसार में निवास नहीं बताया जा सकता। अरहंत भगवान तो यहीं रह रहे। वे तो सिद्ध लोक में अभी नहीं हैं और कर्म यहाँ भरे पड़े हैं ही। उनको क्यों नहीं बंध हो रहा? तो यह कारण बताना कि कर्म से भरे संसार में रहते हैं इस कारण कर्मबंध होता है, यह बात ठीक नहीं बैठती, कारण तो वह बताना चाहिए कि उसके होने पर कार्य हो ही हो, जिनके न होने पर कार्य न हो। तब तो वह निमित्त की बात बतानी वाली है अन्वयव्यतिरेकी हो तो उसको निमित्त बताया जावे। यह कर्मों से भरा संसार है इस कारण नवीन कर्मों से बँधता है, यह बात तो युक्त नहीं है। देखिये- बंध के बारे में दोनों ही दृष्टियों से निरख सकते हैं। इसके भाव-बंध क्यों होता? द्रव्यबंध क्यों होता? अच्छा, अब द्रव्यबंध की चर्चा है कि अष्ट कर्मों का बंध है उसका कारण कर्म भरे संसार में रहना नहीं हैं।

1298- चलनात्मक कर्म का बंध हेतुता में अनियम-

दूसरा कोई कहता है कि बात बिल्कुल स्पष्ट है कि यह लोक यह प्राणी इसका मन डोलता है, कहाँ कहाँ मन का योग होता है, कहाँ अटपट वचन व्यवहार है, शरीर की कैसी चेष्टायें रखता है; पापमयविषयों में, व्यसनों में ऐसी-ऐसी जब इसकी प्रवृत्तियाँ हैं, मन, वचन, काय की ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं तो यह ही कर्मबंध का कारण है। कर्मबंध का कारण अधिक खोजने में क्या दिमाग लगाना? तो इस दूसरे का क्या भाव आया कि मन, वचन, काय का जो हलन-चलन है, योग है, यह कर्मबंधन का कारण है। तो यह बात भी सूक्ष्मता से विचारें तो युक्त यों नहीं बैठती कि अरहंत भगवान के मनोयोग है कि नहीं? मनोबल तो नहीं, भावमन तो नहीं, पर द्रव्यमन का योग वहाँ भी है, परंतु बंध तो नहीं। वचनयोग वहाँ है कि नहीं? ‘‘भवि भागन बच जोगे बसाय’’। कहा ही है कि भव्य जीवों का सौभाग्य और भगवान का वचनयोग, उसके वश दिव्यध्वनि खिरती है। अरहंत भगवान के काययोग भी है कि नहीं है। वे विहार करते हैं, काययोग भी चल रहा पर उनका बंध नहीं हो रहा, इसलिए बंध के कारण में योग की बात बताना युक्त नहीं है। जिसके होने पर कार्य हो, न होने पर कार्य न हो ऐसा अन्वयव्यतिरेक वाला कारण बताना चाहिए।

1299- अनेक करण साधनों का बंधहेतुता में अनियम-

तीसरा बोला कि बात बिल्कुल सामने है, यह गृहस्थ, यह जीव कैसा मोहियों के बीच पड़ा है, वैभव धन संपत्ति के बीच पड़ा है, आहार आदिक प्रसंग रखे हुए है, मकान सजावट बहुत-बहुत बातें, इनके बढ़िया साधन बने हुए हैं। इन साधनों के बीच रह रहे हैं इसीलिए तो बंध होता रहता है और तब ही तो ज्ञानी पुरुष इन सबसे विरक्त होकर इन्हें त्यागकर निर्जनस्थान में आत्मसाधना करने जाता है, तो यह सारा बंध इन बाह्य साधनों से हो रहा है। सो ये अनेक कारण याने बाह्य पदार्थों का जो निकटपना है, बस यह बंध का कारण है अथवा ये स्पर्शन, रसना आदिक इंद्रियाँ बंध के कारण हैं। यह बात तीसरे पुरुष ने रखी। इस पर भी विचार करें, तो यह संगत यों नहीं बनता कि जहाँ-जहाँ ये बाह्य पदार्थ हों वहाँ-वहाँ बंध हों, ऐसा नियम तो नहीं बन पा रहा है, क्योंकि यहाँ तो आपका एक मकान और जिसमें आप रहते हैं, वहाँ आपको बंध बता दिया और समवशरण कितना बड़ा मकान, कितनी बड़ी शोभा, वहाँ अरहंत भगवान रह रहे हैं उनको भी बंध बता दिया। प्रभु के होता है क्या बंध? बाह्य साधन, प्रसंग से बंध नहीं होता। इंद्रिय, शरीर भी वीतराग मुनि के हैं वहाँ भी बंध होता नहीं।

1300- चिंदचिब्दध का बंधहेतुपने में अनियम-

अच्छा तो चौथा पुरुष बोला, ये बातें आपने फेल कर दी ठीक, मगर एक बात बिल्कुल सही जँच रही है कि यह जीव अन्य जीवों का वध करता, जीवों को दु:ख पहुँचाता, चेतन-अचेतन पदार्थों का यह विग्रह करता, तोड़ मरोड़ करता, ऐसी कठिन बातें जब यह कर रहा है तो बंध क्यों न होगा? और लोग कहते भी खूब हैं- हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह आदिक, हिंसायें करना, दूसरे जीवों का वध करना, दिल दु:खाना ये सब पाप हैं और इनसे बंध होता है तो जब चेतन-अचेतन का विग्रह किया जा रहा है तो बंध हो रहा है यह बात एक चौथे पुरुष ने रखी। पर इस पर भी विचार करें, सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो युक्त यों नहीं बैठती। देखो मुनि महाराज जो समितिपूर्वक चलते हैं, जिनको कोई प्रमाद नहीं है, जिनके चित्त में नाना परिणतियाँ चल रही है और अचानक छोटा जीव ही मानो कहीं से उड़कर कैसा ही नीचे आ जाय और उसका वध हो जाय तो इतने पर भी मुनि महाराज के बंध नहीं बताया। तो यह बात भी तो युक्त न रही।

1301- बंधहेतुता पर यथार्थ प्रकाश-

अच्छा, तो अब ये चारों के चारों शंकाकार बोले तो फिर तुम ही बताओ कि बंध का कारण क्या है? होता है ना ऐसा? कोई बच्चा एक पहेली पूछे तो चार लडके अपना- अपना जवाब दे रहे हैं पर वे जवाब ठीक नहीं बैठ रहे तो ठीक नहीं है यह बात तो चारों बोलते हैं फिर बोलते हैं कि अच्छा तुम ही बताओ। वहाँ इतनी बात जरूर होती कि वह लड़का यह कहे कि तुम यह कह दो कि हार गए तो हम बतायें। यहाँ भी कहना चाहो तो कह लो नहीं तो इतना तो पूछ ही लो कि बंध का कारण क्या है सो बताओ? सो आचार्यदेव बतलाते हैं कि देखो, आत्मा की ही बात देखो, आत्मा में ही उस बात को निरखना है तो उत्तर आयगा। बाहरी बातों से उत्तर सही न आयगा। यह आत्मा है उपयोग स्वरूप, यह आत्मा है उपयोग लक्षण वाला, उपयोग की भूमि। सो यह आत्मा, यह उपयोग जब रागादिक विकारों के साथ एकता करता है, बस उन रागादि विकारों में आत्मीयता जो आशय है यह मैं हूँ अपने को भूल गया और विकाररूप अपने को अनुभवने लगा, बस ऐसी जो विकार के साथ एकता है यह ही बंध का कारण है। देखिये- जहाँ अज्ञान नहीं रहता, मिथ्यात्व नहीं रहता, भेदविज्ञान जगता वहाँ भी यथाख्यात चारित्र अवस्था से पहले रागादिक का सद्भाव होने से बंध है, आस्रव है, मगर उसे बंध की गिनती में यों न लेना कि संसार-परंपरा का करने वाला बंध तो यह मिथ्यात्व और अनंतानुबंधी के विपाक में होता है, और इनका जहाँ छेद हो गया, स्वभाव और विभाव की संधि दो टूक कर दी गई, संधि तोड़ दी गई। स्वभाव और विभाव ये एकदम उपयोग में, ज्ञान में अलग जँचे, वहाँ संसार का बंधन नहीं। अंधकार नहीं रहा अब? तो रागादिक विकारों के साथ यह उपयोग जब एकता को करता है तो वह बंध का कारण होता है। वह एकता क्या? वही स्नेह, चिपकाव, लगाव। विभाव में और उपयोग में ऐसा बन जाना, जम जाना कि इसे यह भान ही नहीं रहता कि मैं अविकार ज्ञानस्वरूप वस्तु कुछ परमार्थ हूँ।

1302- बंधहेतुता के तथ्य का संकेतक एक दृष्टांत-

बंधहेतुता के तथ्य को एक दृष्टांत में देख लो। कोई पहलवान तेल लगाकर लंगोट कसकर किसी उद्यान में स्थित अखाड़े में कूद गया। अपने हाथ में शस्त्र लिए हुए वह अपनी कला का अभ्यास कर रहा था। वहाँ पर कदली के वृक्ष भी खड़े थे। उस अखाड़े में, उद्यान में धूल भी बहुत भरी हुई थी। अब वह पहलवान उस धूल भरे अखाड़े में अपने हाथों में शस्त्र लेकर व्यायाम का अभ्यास कर रहा था। उसके उस अभ्यास में सैकड़ों कदली वृक्ष भी कट-कटकर गिर रहे थे। धूल भरी वह जगह थी, हवा भी चल रही थी सो वह धूल उड़-उड़कर उस पहलवान के सारे शरीर में लिपट रही थी। अब वहाँ आप बताओ कि उस पुरुष को धूल क्यों लग गई? तो वहाँ कुछ ऐसे बच्चे बोल उठे कि धूल क्यों न लगे? जब धूल भरी जगह में ऐसा खेल करने आया है तो धूल तो लगेगी ही, तो दूसरा बोला- अजी, यह बात नहीं है। बात यह है कि इसने जो इतनी खटपट की, हाथ पैर चलाया, खूब घूमा इसलिए उसको धूल लगी। तीसरा बोला- वाह, यह बात नहीं है, वह जो शस्त्र लेकर आया और ऐसी तैयारी में आया इसलिए धूल लग गई। तो चौथा बोला- बात यह नहीं है, इसने कितने ही कदली के वृक्षों को काट गिराया है, जो इतना खोटा काम करे उसके धूल तो चिपकेगी ही। पर उन चारों की बातों पर जब विचार करें तो ये कोई उत्तर सही नहीं हैं। सही उत्तर तो यह होगा कि इस धूल के चिपकने का असली कारण है शरीर में तैल का लगा होना। यह बात न हो तो फिर बतलाओ कि यदि वह तैल न लगाये, 10-5 दिन पहले से ही अपने शरीर को रूखा रखे, वह पुरुष यदि उस ढंग का व्यायाम करता है तो उसके शरीर पर धूल चिपकते तो नहीं देखी जाती। तो जैसे उस धूल के चिपकने का कारण तैल का संग है, ऐसे ही कर्मबंध का कारण स्नेह, रागद्वेष, मोह ये भाव हैं। ये भाव ये पद की परिणतियाँ हैं।

1303- बंधहेतुविदारण का स्वाधीन सुगम उपाय-

कर्मबंध के हेतुभूत रागादिकभावों के दूर करने का उपाय खुद की निगरानी है। यह काम इतना सुगम और सरल है कि जिसमें किसी पर की अपेक्षा नहीं पड़ती। कोई ऐसा कार्य तो नहीं है कि अभी यह नेग नहीं हुआ, यह बात नहीं हुई। कैसे काम बने? कोई ऐसी बाहरी बात तो नहीं है आत्मकल्याण की। जैसे एक कथानक है कि एक सेठ के घर एक बिल्ली पली हुई थी तो जब उसका कोई विवाहकाज आये तो उस बिल्ली को अशगुन समझकर उसे किसी पिटारे में बंद कर दिया करता था। वहाँ विवाहकाज हो जाय, बस बिल्ली को पिटारे से खोल देता था। आखिर सेठ तो गुजर गया, वह बिल्ली भी गुजर गई। सेठ के लड़के तो सयाने हुए, तो किसी लड़के ने जब अपनी लड़की का विवाह किया तो भाँवर पड़ने का समय आया, वहाँ एक लड़का बोल उठा- अरे ठहरो, अभी भाँवर नहीं पड़ेगी, अभी तो एक दस्तूर बाकी है, कौन सा दस्तूर?...अरे ! अभी एक बिल्ली कहीं से पकड़कर लाना है, उसको पिटारे में बंद करना है तब भाँवर पड़ेगी। अब यहाँ कहाँ धरी बिल्ली? बिल्ली ढूंढ़ने में, उसे पकड़ने में और पिटारे के अंदर बंद करने में कोई 7-8 घंटे का समय लग गया, तब कहीं भाँवर पड़ी। तो जैसे उस बाहरी विकल्प बात के करने के लिए पराधीनता की बात रही ऐसी कोई बात आत्मकल्याण के लिए नहीं है कि भाई अभी अमुक चीज नहीं है तो कैसे यह आस्रव रुक सकता, कैसे यह बंध रुकेगा? अरे ! अपने आत्मा के सहज निरपेक्ष स्वभाव की दृष्टि करें। जान जावें कि यह स्वभाव अविकार है और इसमें ही अपना मनन बनावें। मैं यह हूँ। तो कर्म के बंध आदि में सब फर्क आ जायगा।

1304- अनुभावानुकूल उपयोग का व्यापार-

देखिये- जिस तरह का अपना प्रयोग बनता कि यह मैं हूँ उस तरह की उसकी प्रवृत्ति होने लगती है। कहीं-कहीं सुना होगा कि नाटक में मानो किसी ने दीवान अमरसिंह राठौर का पार्ट अदा किया। उस पार्ट अदा करने वाले बालक को उस समय यह ध्यान में न रहा कि मैं अमुक बालक हूँ और अमरसिंह राठौर का पार्ट अदा कर रहा हूँ, उसने अपने को अमरसिंह राठौर रूप में अनुभव किया और अपने विरोधी को तलवार से मार गिराया। वह मरण को प्राप्त हो गया। ऐसे अनेक दृष्टांत मिलेंगे। बड़े-बड़े मंत्र सिद्ध करने वाले लोग भी तो अपने को ठीक उस रूप अनुभव करके वैसी वृत्तियाँ कर डालते हैं। और इसी समयसार में दृष्टांत दिया है ना कि ‘‘गरुड़ध्यानपरिणत: गरुड़:’’ गरुड़ का ध्यान लोग करते हैं, जो गरुड़ देवता को मानते तो ऐसा ध्यान करते वे कि अपने को यह अनुभव करने लगते- मैं गरुड़ हूँ। समयसार टीका में बताया है कि जैसे कोई पुरुष भैंसे का ध्यान करने लगता कि मैं एक बहुत बड़ा भैंसा हूँ, जिसके सींग बड़े लंबे और ऐसी सींगे लंबी चली गई जैसे कि महाराष्ट्र की भैंसों के सींग। पंजाब की भैंसों के सींग तो छोटे और गोल होते, पर महाराष्ट्र की भैंसों के बड़े लंबे सींग होते। तो जैसे मानो अपने कमरे के अंदर बैठा हुआ ऐसा ध्यान बना ले कि मैं तो एक बहुत लंबी सींगों वाला भैंसा हूँ और उस कमरे का दरवाजा था छोटा तो उस ध्यान में यह विषाद करने लगता कि अरे ! मैं अब इस दरवाजे से बाहर कैसे निकलूँगा? अरे ! कहाँ तो बैठा है अपने आराम के कमरे में और भ्रम की धारा में ऐसा बह गया कि वहाँ भारी विषाद करता है। तो जैसा कोई तत्त्व में अहंकार अनुभव करे, उस प्रकार की उसकी वार्ता चलती है। तो भला ज्ञानी ने एक सहज निरपेक्ष, चैतन्यप्रकाश, ज्ञानस्वरूप, जाननमात्र, प्रतिभासमात्र, उस ही में दृष्टि स्थापित की, उस ही में अनुभव बनाया कि मैं यह हूँ, यह मैं हूँ, तो उसकी प्रवृत्ति ज्ञाता रहने की ही तो रहेगी। वह विकार अथवा कोई अटपट क्रियायें कैसे करेगा? जब भीतर यह अनुभव चल रहा है कि मैं यह हूँ।

1305- ज्ञानी के सर्वत्र मिथ्यात्व व अनंतानुबंधीकृत बंध का अभाव-

जब अंतस्तत्त्व का अनुभव नहीं भी चल रहा और ज्ञानी है, प्रतीति में तो निरंतर है, और कदाचित् कर्मविपाकवश उसे सारी प्रवृत्तियाँ भी करनी पड़ती हैं तो वहाँ भी वह अपनी सावधानी बनाये हुए है। अनुभूति जितनी सावधानी तो नहीं है कि यह उपयोगी ज्ञानस्वभाव में ही उपयुक्त रह जाये, मगर प्रतीति का भी बल इतना बड़ा बल है कि उसके 41 कर्मप्रकृतियों का बंध अब नहीं है। चाहे वह किसी प्रसंग में लगा हो, यह भीतर की बात है? मैं ज्ञानमात्र हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ, इस ओर उसकी दृष्टि चल रही है और बाहर में कर्मविपाकवश चेष्टायें चल रही, मगर उसका सम्मान कहाँ है? अंतरंग कहाँ है? यह देखिये- उसी का ही प्रताप है कि मिथ्यात्व और अनंतानुबंधी कर्म के उदय से जितने प्रकार का बंध हो जाता था, सो अब यहाँ नहीं चल रहा। है ही नहीं कुछ। तो बंध का कारण है रागादिक विकारों में अपने को लगा देना, एकमेक कर लेना। एकमेक के मायने वह भ्रम कर रहा है और जान रहा है कि मैं यह हूँ।

1306- सकल संकटों का मूल रागद्वेष मोह-

स्नेह, रागद्वेष, मोह ये भाव सारी विपत्तियों की जड़ हैं। आज मनुष्य हैं, मरण करके मानो अच्छी जिंदगी न गुजारें तो कीड़ा बन गए, स्थावर बन गए। अब वहाँ कौन पूछे? यहाँ तो स्वयं जैसा कष्ट है सो पा रहा है। इतनी बड़ी विपत्ति का कारण क्या है? रागद्वेष, मोह, अज्ञान। तो जो बात आज बहुत सस्ती सी जँच रही है, कर लो राग, आखिर घर का ही तो बेटा है, घर के ही तो लोग हैं, अपनी ही तो संपत्ति है। निरख-निरखकर खूब हृदय भर लो, ऐसी जो यहाँ एक स्वच्छंदता है, रागभाव है सो यह बहुत सस्ता लग रहा- हमारा ही घर है, खूब मौज से रहो, खूब मौज मानो, यह सस्ता तो लग रहा मगर इसका परिणाम बहुत महँगा पड़ता है। किस गति में जाय, कहाँ जन्म ले, क्या बात बने? तो जो बात आज है, पुण्योदय है, चीजें मिली हैं, मन स्वच्छंद है, खूब रम रहे हैं, रागद्वेष बढ़ाये जा रहे हैं और मन में एक हठ बनाये जा रहे हैं ये सब बातें आज सुगम सी लग रही हैं, क्योंकि ऐसी बहुत योग्यता मिली, मगर यह ध्यान में रखें कि अपने स्वभाव से चिगकर किसी भी बाह्य विकार प्रसंग में अपने उपयोग को उलझा लेना इतना बड़ा पाप है कि जिसका फल संसार-परिभ्रमण है। क्यों, क्या पाप कर दिया है? इसने तो अपने अंदर ही एक भावना की है। एक दूसरे से प्रेम ही तो किया, किसी पर अन्याय किया क्या? घर है मेरा, कुटुंब है मेरा, इनमें राग रखता हूँ, इसमें कौनसी अन्याय की बात है? और, क्यों इतना विकट फल मिल रहा है कि संसार में घूमें? उसका समाधान देखो- अपना यह आत्मस्वरूप, यह भगवान आत्मा, यह जैसा सिद्ध का स्वरूप वैसा अपना स्वरूप। इस भगवान पर हम अन्याय कर रहे, इतनी बात तो है कि यह दूसरे पर अन्याय नहीं है, मान लो थोड़ी देर को। मगर हम एक इस भगवान आत्मा पर इतना विकट अन्याय कर रहे हैं। इसके विकास को तोड़-मरोड़ कर दिया है हमारे विभावों ने, इसकी सुध नहीं है, इसने विभावों को ढक दिया है, यों समझो, जैसा कि यहीं दिख रहा है, इन विभाव मल्लों ने मिलकर इस स्वभाव को दृढ़ता से दबा रखा है, इतना बड़ा अन्याय यहाँ किया जा रहा है, तो भला किसी एक व्यक्ति पर अन्याय करे तो दो चार लट्ठ मारे और हम जब भगवान पर ही अन्याय कर बैठे तो उसे क्या कठोर फल न मिलना चाहिए? मिलना ही चाहिये कठोर दंड, तो यह समझ लो कि यह कठोर दंड यही संसार का परिभ्रमण है। यह ही इसका खोटा फल है। इस भगवान आत्मतत्त्व की रक्षा इसमें है कि इसका जो निरपेक्ष स्वरूप अपना सहजभाव है वह दृष्टि में आये, यह है असली बात, परमार्थ स्वरूप। यह हूँ मैं इस तरह का परमार्थ स्वरूप में अनुभव हो। मैं अपने में अहं प्रत्यय वेद्य हूँ, उसमें एकता करें, स्वरूप में एकता करें तब तो बंध न होगा और विकार में एकता मचायें तो उसका फल है बंध। तो जिन्हें बंध न चाहिए उनको यह ही पौरुष करना है कि अपने सहज स्वभाव की परख करें और उस रूप अपने आपका अनुभव बने। एतदर्थ उपाय तो तत्त्वज्ञान है। जो-जो तत्त्वज्ञान-स्वभाव का आश्रय करा सकें वे सब आगमवर्णित हैं। वस्तुस्वातंत्र्य, निमित्तनैमित्तिकयोग, जीवदशायें, निरपेक्ष सहजस्वरूप, सप्त तत्त्व, पदार्थस्वरूप, उपादानोपादेयभाव, अभिन्नकारकत्व आदि विषयों का यथार्थ परिचय विकारों से उपेक्षा कराकर स्वभाव की अभिमुखता कराते हैं।


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