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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 168

From जैनकोष



जानाति य: स न करोति करोति यस्तु

जानात्ययं न खलु तत्किल कर्मराग: ।

रागं त्वबोधमयमध्यवसायमाहु-

र्मिथ्यादृश: स नियतं स च बंधहेतु: ॥167॥

1328- कर्मराग की संसारबंधहेतुता तथा मिथ्याध्यवसायरूपता-

इससे पहले कलश में यह बताया था कि जीव को बंध होता है तो कर्मराग के कारण बंध होता है। कर्मराग क्या चीज कहलाती? शब्दों से देखो तो कर्म में राग होना- यह है कर्मराग, कर्म के मायने क्रिया, क्रिया में राग होना। मैं कर्ता हूँ, मैंने किया, मैं कर दूँगा। अनेक प्रकार के कामों में राग होने का नाम है कर्मराग। जैसे कोई ऐसी कल्पना करे कि मैं दूसरे जीवों को मारता हूँ तो उसने कर्मराग किया ना? मैं इसको मारता हूँ। उसने उससे ऐसा लगाव लगाया कि मैं मारता हूँ। मैं करता हूँ। उस क्रिया में जो राग लगाया वह है कर्मराग और, देखो कर्मराग कितने हैं वे सब तथ्य के विपरीत होते हैं। मैं इसको मारता हूँ यह तथ्य के विपरीत कैसे? तो जिनेंद्र भगवान ने बतलाया कि आयु के क्षय से ही जीवों का मरण है। और आयु कोई किसी की हर सकता क्या? बाह्यसाधन होना और बात है और निमित्त-नैमित्तिक योग होना और बात है। यह बात जरा ध्यान से सुनो- किसी ने किसी को तलवार मार दी, अब उसके अलग-अलग क्या विशेषण किए जायें, उसमें तो लंबा समय लगेगा। उपचारभाषा बिना गुजारा न चलेगा। वह तो बोलना ही पड़ेगा, और न बोलोगे तो इतनी लंबी चर्चा बनाओ कि उसमें उतना समय लग जाय कि जितने समय में उसका मूड ही खतम हो जाय, उपचार भाषा होती है संक्षिप्त (Short) भाषा। हम थोड़े में अपनी बात पा सकें वह भाषा है उपचार भाषा। किसी ने तलवार मार दी- यह उपचार भाषा में बोल रहे, क्योंकि यह भी कर्मराग का ही हिस्सा है। वहाँ तलवार से कोई अंग अलग हो गया, उस प्रसंग में उसका मरण हो गया तो वह आयु के क्षय का निमित्त पाकर हुआ। इसे कहते हैं निमित्त-नैमित्तिक योग। निमित्त-नैमित्तिक योग मरण उस शस्त्रमारक मनुष्य के साथ नहीं है किंतु आयु क्षय के साथ है। आयु क्षय होने से मरण है।

1329- बुद्धिपूर्वक विकार के प्रसंग में उपादान, निमित्त व आश्रयभूत साधन का परिचय-

ध्यान दीजिए- आपने किसी की निंदा की तो उसे दु:ख हो गया। तो उसके दु:खी होने में असाता वेदनीय का उदय यह निमित्त है, वह दूसरा आदमी निमित्त नहीं है। वह है बाह्यसाधन। आप करणों को तीन हिस्सों में विभक्त करें- उपादान, निमित्त और आश्रयभूत। आश्रयभूत कहो या बहिरंग कारण कहो या बाह्य साधन कहो, सब एक बात है। बाह्य साधन का उस नैमित्तिक कार्य के साथ निमित्त-नैमित्तिक योग नहीं, किंतु कर्मदशा का नैमित्तिक कार्य के साथ निमित्त-नैमित्तिक योग है। मायने असाता वेदनीय का उदय, मोहनीय का उदय यह है उस जीव के दु:खी होने में निमित्त कारण। निमित्त कारण का आलाप नहीं होता, क्योंकि वह तो नियत अवस्था है। आचार्यदेव यहाँ स्वयं कलश में कह रहे हैं, अपने अपने कर्म उदय से जैसी सारी बातें होती हैं, वह है नियत अवस्था। आग पर या संताप पर रोटी सिकती है, वह नियत अवस्था है। रोटी सिकने में निमित्त कारण वह गैस है। निमित्त-नैमित्तिक भाव को तो खूब अच्छी प्रकार कहो। उसके बिना मार्ग न मिलेगा, मगर निरखना यह होगा कि आग नहीं सिक गई, सिकी रोटी ही है, यह बात यहाँ निरखना है। निमित्त-नैमित्तिक योग तो होते ही हैं विकार में। कोई भी विकार निमित्त के अभाव में हो ही नहीं सकता। लेकिन साथ में यह निरखना होगा कि निमित्त-सन्निधान में उपादान अपनी ही परिणति से अपना प्रभाव बनाये है। निमित्त ने उसकी परिणति नहीं की। इसी बात को एक अध्यात्मसूत्र पुस्तक है, जिसमें 10 अध्याय बने हैं, बहुत छोटे-छोटे सूत्र हैं, व्यवस्थापूर्वक एक-एक अध्याय में प्रकरणबद्ध किया है। एक सूत्र आया है ‘‘निमित्तं प्राप्योपादानं स्वप्रभाववत्’’...उसका अर्थ है कि निमित्त को पाकर उपादान अपने स्वभाव वाला होता है। उसका यह शुद्ध अर्थ है, निमित्तसान्निध्य है एक वातावरण। उस वातावरण के अभाव में उपादान विकार नहीं कर सकता, मगर विकाररूप जो परिणमा है वह उपादान परिणमा है, निमित्त नहीं परिणमा।

1330- निर्विवाद प्रगतिमार्ग पर चलने का अनुरोध-

देखो, किसी बातचीत में भी किसी के कोई विवाद नहीं। सब लोग हैं, सबके ज्ञान है, सब लोग ज्ञान से बोलते हैं, गलत कोई नहीं बोलता, मगर फर्क क्या पड़ गया? एक तो फर्क यह पड़ जाता कि शब्द के अर्थ अनेक होते हैं सो कोई किसी धर्म को लेकर उस शब्द का भाव चलाता है, कोई किसी को कहकर चलाता। विवाद का कारण एक तो यह हो सकता, दूसरे कषाय विवाद का कारण हो सकती। याने हृदय मान रहा है कि बात ऐसी नहीं हैं, बात ऐसी है, लेकिन चूंकि एक नाम पड़ गया है कि मैं अगर जानी हुई की तरह कह दूँ तो मेरी शान न रहेगी, दूसरा कारण यह भी हो सकता। मगर कुंजी को अपनाकर चलें। अपना-अपना हित करना है सबको। अपने मार्ग का दीपक यह बनाओ- प्रतिपक्षनय का विरोध न करके प्रयोजनवश विवक्षितनय की प्रधानता से ऐसा मनन करना, जिससे कि स्वभाव का आश्रय मिले। यह नीति अपनायेंगे तो कहीं धोखा न होगा। हाँ कर्मराग की बात चल रही है। एक जीव ने दूसरे जीव को गाली दी तो दूसरा यह माने कि मुझे गाली दी गई व मुझको इसने दु:खी कर दिया, तो यह बात अध्यवसाय हैं। यह उपचार में तो आया, पर व्यवहार में और निश्चय में नहीं आया। निश्चयनय होता है स्वाश्रित। स्व में स्व का वर्णन करना। व्यवहारनय होता है पराश्रित। घटना, पर की बात, परभाव, सब प्रकार का यथार्थ सही-सही वर्णन करना और उपचार होता है पर का स्वामित्व और पर का कर्तृत्व जिससे जाहिर हो, ऐसी भाषा का प्रयोग करना। जैसे हमको इसने दु:खी किया, यह उपचार कथन है, वह तो निमित्त भी नहीं है। वे तो बाह्यसाधन है। आश्रयभूत पदार्थ हैं। निमित्त तो कर्मोदय है। सो कर्मोदय के अभाव में कोई जीव दु:खी हो पाया हो, ऐसा कोई दृष्टांत मिलेगा क्या? उस मनुष्य के अभाव में याने वह नहीं है तो भी दु:खी हो सकता। आप कहेंगे कि और कोई होगा। चलो वह भी न हो, कोई आश्रय न हो और कर्मोदय है तो अबुद्धिपूर्वक दु:ख तो होगा। बुद्धिपूर्वक आश्रयभूत साधन में होता है। अबुद्धिपूर्वक साधन के अभाव में भी चलता ही है।

1331- मिथ्याध्यवसाय की संसारबंधनरूपता व बंधहेतुता-

यहाँ जो एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के प्रति यह भाव रखता है कि मैंने इसे मारा, मैंने इसे दु:खी किया, यह अध्यवसाय मिथ्या है, क्योंकि उसने तथ्य को त्याग दिया कि दु:ख-सुख वगैरह ये सब मेरे कर्म के अनुसार होते हैं। तो आयु का क्षय हो तो मरण है। आयु क्षय को दूसरा कर सकता नहीं। भले ही बाह्य साधन बन गए, मगर साक्षात् कर्ता की बात कह रहे। जैसे मानो कोई इंजन चल रहा है, मानो रेलगाड़ी चल रही है, उसमें बहुत से डिब्बे एक दूसरे से फँसे हैं तो परंपरा निमित्त हो जाता सारा डिब्बों को खींचने वाला इंजन, मगर साक्षात् तो पहला डिब्बा दूसरे डिब्बे के खींचने का निमित्त है, दूसरा तीसरे के खींचने का निमित्त है, मगर उनमें निमित्तपना तब ही तो आ पाया जब कि इंजन में इस प्रकार की बात बन रही है। इस कारण परंपरया निमित्त की बात आती है। मगर साक्षात् बात जहाँ दिखती है वहाँ का निर्णय वह तत्काल वाला निर्णय है, उसी समय वाला निर्णय है। उसी समय के मायने जिसका निमित्त पाकर जहाँ जो बात हो पा रही हो तो मरण में आयुक्षय निमित्त है। मनुष्य निमित्त नहीं। तो ये मनुष्य व्यर्थ में एक अपना अभिमान बनाये हैं कि मैं मार दूँगा, मैं मार डालूँगा, मैं ऐसा कर दूँगा...तो यह अध्यवसान मिथ्या है। यह बंध का कारण है। और, इतना ही क्या, कोई जीवन के लिए अहंकार बनाये- मैं इसको जिंदा करता हूँ...देखिये- दया की बात तो इस पद में योग्य है, उचित है, जो जिस पदवी में है। मगर यह अहंकार रखना कि मैंने इसको बचाया, मैंने इसे जिलाया...। अरे ! उसका उदय था, आयु का उदय चल रहा था। आयु का उदय निमित्त है उसके जीवित रहने में। मैं तो बाह्यसाधनमात्र हूँ। ये अध्यवसाय हटाना योग्य है। क्योंकि आयु का क्षय उसके उपभोग से ही होगा, किसी जीव के करने से नहीं।

1332- अकालमृत्यु में भी आयु की उपभोग से क्षीयमाणता-

देखो, इस प्रसंग में एक बात और समझना। जैसे कहते हैं अकालमृत्यु, तो उस अकालमृत्यु का अर्थ क्या है, यह करणानुयोग के ज्ञान से ही विदित होगा। किसी जीव ने परभव में इस भव के लिए मानो 100 वर्ष की आयु बाँधी, उस 100 वर्ष की आयु बँधने का अर्थ क्या है कि उस आयुकर्म में इतने निषेक बने कि एक-एक निषेक एक-एक समय में उदित होवे तो 100 वर्ष तक इस भव में यह जीव रहेगा, याने 100 वर्ष के जितने समय होते हैं उतने उसकी आयु के निषेक होते हैं। अब यह बात तो वहाँ बंध गई। अब इस भव में जन्म लिया। 40 वर्ष की आयु हो गई है, तो निषेक 40 वर्ष तक ईमानदारी से खिरते रहे। अब 40 वर्ष की उम्र में किसी ने शस्त्र मार दिया या कोई योग बन गया ऐसे बाह्यसाधन मिल गए तो उसके शेष 60 वर्ष के समय परिणाम बराबर जो निषेक हैं वे उसके अंतर्मुहूर्त में खिर जाते हैं। जैसे किसी ने मोटर में, ट्रक में या स्कूटर में पेट्रोल की टंकी को भर दिया पेट्रोल से, मानो उतने पेट्रोल से वह 40 मील तक जा सकती है। तैयार होकर तो चला मगर रास्ते में कोई 10 मील की दूरी पर ही किसी पेड़ से टक्कर लग गई, पेट्रोल की टंकी फट गई और सारा पेट्रोल वही बह गया, बस गाड़ी वहीं रुक गई। तो ऐसे ही आयु के निषेक 100 वर्ष के थे मगर 40 वर्ष की उम्र में ऐसे साधन मिल गए कि जिससे 60 वर्ष के निषेक खिर गए, इसका नाम है अकालमृत्यु। अब कोई यों देखे कि अकालमृत्यु भी हो तो भी अवधिज्ञानी ने तो ऐसा देख लिया है ठीक है। अकालमृत्यु इस ढंग से हुई सो जान गया है ज्ञानी। तो जानने की ओर से तो हम कहेंगे कि भाई अब जान गए, जिस समय जो बात बतायी गई सो हुई। किंतु जब जान लिया गया सो वही तो होगा, होता है। यह बात ज्ञप्ति की दृष्टि से ठीक ही है। निष्पत्ति की दृष्टि से देखेंगे तो यह ढंग बना, इस इस तरह निषेक था, यों यों बाह्यसाधन बने, वहाँ खिरे हैं बाकी 60 वर्ष के निषेक, यह अकाल मरण है। ज्ञानी के ज्ञान में आ गया सो उस दृष्टि से जिस समय मरण था उसी समय हुआ। प्रत्येक तत्त्व के जितने भी उपदेश हैं उन सबमें यथार्थता है। अगर नहीं होता है अकालमरण तो फिर अकालमरण शब्द कहा ही क्यों गया? जो नहीं है वह कोश में शब्द कैसे आ सकता? तो वहाँ एक जो अकालमृत्यु हुई है तो वहाँ भी आयु का उपयोग हुआ। यह बात बताने के लिए यहाँ यह प्रसंग कह रहे, अगर अपने काल पर प्रति समय के एक-एक निषेक खिर-खिरकर आयु दूर हुई तो वह भी उपयोग से दूर हुई, इसी अकालमृत्यु में चाहे अकालमरण भी हो वे सब आयुकर्म के प्रदेश उपयोग से क्षीण होते हैं और हुआ करते हैं। इसमें दूसरे जीव क्या करें?

1333- बहिरंगसाधनों में अन्य के प्रति अकर्तृत्व व निमित्तित्त्वाभाव-

देखिये- बाह्य साधन तो बन रहे हैं इसके अन्य पदार्थ, मगर साक्षात् निमित्त की बात कही जा रही, और उस निमित्त-नैमित्तिक में भी अगर उपादान-उपादेय के कर्तृत्व की जैसी बुद्धि लादे तो वहाँ वह भी अध्यवसान किए हुए हैं। जैसे यह ज्ञान हुआ कि कर्म ने ही विकार पैदा किये। यह जीव विकाररूप नहीं परिणम रहा, नहीं परिणमना चाहिये था, नहीं परिणम रहा है। यह तो कर्म ही विकाररूप कर रहा है, ऐसी जहाँ दृष्टि हुई वहाँ कर्तृत्वबुद्धि आ गई। निमित्त-नैमित्तिक योग का इतना ही अर्थ है कि अनुकूल निमित्त के सन्निधान में उपादान ने अपनी परिणति की है। वह सान्निध्य न हो तो ऐसी स्थिति में उपादान अपनी परिणति नहीं करता। अब यहाँ कोई ज्ञानदृष्टि से यह कहे कि कैसे नहीं? जब प्रभु ने देखा तब होता है। कैसे न होगा निमित्त। कैसे न होगी बात? तो यह बात एक ज्ञानी द्वारा ज्ञान होने की नियत व्यवस्था है। निमित्तनैमित्तिक योग में भी एक नियत व्यवस्था है। वह युक्तिगम्य है कि अगर ऐसा नहीं है तो ऐसा हो नहीं सकता। जैसे कि अग्नि नहीं है तो धूम हो नहीं सकता, अग्नि का ताप न मिले तो रोटी आदिक नहीं सिक सकती। यह युक्तियों से व्यवस्था बनती है। और उस आधार पर यह नियत निमित्त-नैमित्तिक योग व्यवस्था है। मरण-जीवन आदिक में है तो निमित्त- नैमित्तिक योग की व्यवस्था, लेकिन अज्ञानी जीव मानता है कि मैंने किया। क्या यह अज्ञान नहीं है?

1334- सर्व संसारियों की सुख-दु:ख आदि की कर्मविपाकप्रभवता-

इस कलश में यह कह रहे हैं कि सभी जीवों का सदाकाल ऐसा ही नियत है कि अपने-अपने कर्मोदय से ही मरण, जीवन, दु:ख और सुख होते हैं। यह बात तो यथार्थ है मगर अज्ञान वह है जो ऐसी मान्यता है कि दूसरा पुरुष दूसरे पुरुष का मरण, जीवन, दु:ख, सुख करता है ऐसी जो मान्यता पड़ी है अज्ञान की याने आश्रयभूत कारण को कर्ता मान लेने की, निमित्त मान लेने की वह अध्यवसान है और संसारबंध का हेतु है। बाह्यसाधनों को कर्ता मान लेना यह भी अज्ञान है और निमित्त को उपादान भाव से कर्ता मान लेना, यह भी अज्ञान है, क्योंकि बाह्यसाधन निमित्त नहीं होता, आश्रयभूत है और निमित्त अपनी परिणति से उपादान को नहीं परिणमाता।

1335- अचेतनविकार में उपादान-निमित्त का प्रसंग व बुद्धिपूर्वक चेतनविकार में उपादान निमित्त व आश्रयभूत साधन का प्रसंग-

इस प्रसंग में एक बात और जानें कि जहाँ अचेतन के विकार बढ़ने का प्रसंग है वहाँ दो ही कारण चलते- निमित्त कारण और उपादान कारण। वायु का वेग हुआ, पत्ता उड़ा, वायु का प्रसंग हुआ, लहर उठी, ये दो ही कारण बने- निमित्त कारण, उपादान कारण, मगर जीव का जो कार्य है विकाररूप उन विकाररूप कार्य में तीन कारण बने, (1) उपदान, (2) निमित्त और (3) आश्रयभूत। जो बुद्धिपूर्वक विकार है जैसे कि किसी मनुष्य को किसी नौकर आदिक को देखकर गुस्सा आ गई तो उसको गुस्सा में निमित्त कारण है क्रोध प्रकृति का उदय, और आश्रयभूत कारण है उस नौकर आदिक का दिखना। उसकी कुछ व्यापाररूप परिणति का दिखना। तो आश्रयभूत कारण का गुस्सा के साथ निमित्त- नैमित्तिक योग नहीं है। वहाँ तो इस मनुष्य ने उस आश्रयभूत वस्तु के परिणमने में अपना उपयोग दिया, वहाँ उपयोग जोड़ा, कल्पनायें उठायी। इस तरह से ही तो वे बाह्य कारण बने। मगर क्रोध प्रकृति का उदय हम जानें तो, न जानें तो, हो रहा है उदय। तो उस प्रकार का प्रतिफलन हो रहा है। उसके साथ विकार का निमित्त-नैमित्तिक योग है, बाह्यसाधन का जीवविकार के साथ निमित्त-नैमित्तिक योग नहीं है।

1336- अज्ञानी जनों का मिथ्याध्यवसाय-

ये अज्ञानीजन जीवविकार कार्यों के लिए इन बाहरी पदार्थों को कारण समझते हैं। जैसे मैंने इसे मारा और मैं इसके द्वारा मारा गया, मुझे इसने मारा। इन दोनों मान्यताओं में ही अध्यवसाय है, कर्मराग है, उस क्रिया में लगाव है ऐसी मान्यता होने से वहाँ बंध का हेतु बन जाता है याने संसार-परंपरा बढ़े, ऐसा कर्मबंध का कारण बन जाता है, हाँ जैसे मरण की बात में कोई लगाये- मैं मारने वाला, ऐसे ही जीवन की बात में भी लगाया जिलाने वाला, दु:ख की बात में लगाया दु:खी करने वाला। मैं दु:खी करने वाला, मैंने इसे दु:ख दिया, यह भी एक अध्यवसाय है क्योंकि जिनेंद्रदेव ने बताया है कि कर्मोदय से ही इस जीव को दु:ख-सुख होते, मायने उस-उस प्रकार के कर्मोदय का सन्निधान पाकर जीव में ऐसी-ऐसी बुद्धियाँ, विकल्पजाल और दु:ख होते हैं। तो यहाँ जो कोई पुरुष ऐसा माने कि मैं इसे दु:खी कर दूँगा, दु:खी कर सकता हूँ, दु:खी किया है वह सब एक अध्यवसाय है, क्योंकि असाता का उदय न हो, उस प्रकार के मोह का उदय न हो और कोई जीव दु:खी कर दे, ऐसा कोई कर सकता है क्या?

1337- मिथ्याध्यवसाय का एक दृष्टांत-

धवलसेठ ने श्रीपाल को बड़े भारी विकट समुद्र में गिरा दिया, समुद्र के बीच की जगह थी। सेठ ने सोचा था कि यह श्रीपाल मर जायगा और उसकी स्त्री हमें मिल जायगी। इस दुर्भावना से तो गिराया था। हुआ क्या कि श्रीपाल की आयु का उदय था और असाता का समय थोड़ा जितना भी रहा, न रहा, तिरकर निकला। समुद्र के किनारे पर आया, वहीं वह सोया हुआ था। वहाँ एक राजा आया जिसकी यह प्रतिज्ञा थी कि जो इस समुद्र को पार करके आयगा उसके साथ हमारी लड़की का विवाह होगा। आखिर उस राजा को श्रीपाल दिख गए, अपनी कन्या का विवाह किया, आधा राज्य दिया। जब धवलसेठ ने श्रीपाल को उस स्थिति में देखा तो फिर उसका अनर्थ करना विचारा। क्या अन्याय किया कि कुछ मित्रों को भाँड का रूपक दे दिया और यह समझा दिया कि तुम सब राजा के सामने ऐसा प्रदर्शन करके दिखा दो जिससे कि राजा जान जाय कि यह भाँड का पुत्र है। सो वैसा ही रूपक करके दिखाया गया, जैसे अरे बेटा ! तुम यहाँ से चलो अपने घर, अरे भैया ! अरे फूफा ! अरे दद्दा ! चलो अपने घर। वहाँ राजा को भी यह समझ आ गई कि सचमुच यह भाँडपुत्र है, सो क्रोध में आकर श्रीपाल को फाँसी का हुक्म भी दे दिया। अच्छा इतने पर भी आगे क्या हाल होता है, घटना सही आती है उसकी रक्षा होती है, फाँसी छूट जाती है। राजा समझ लेता कि यह तो क्षत्रियपुत्र है। मैनासुंदरी श्रीपाल को मिल जाती है और, और भी अनेक प्रकरण बने। तो कोई कितना ही किसी पर उपद्रव डाले, मगर उसके ही पापकर्म का उदय नहीं है तो उसे कोई संकट दे सकता क्या? नहीं दे सकता, फिर भी यह भाव रखना कि मैं इस पर ऐसा संकट डाल दूँ, अरे !यह अध्यवसाय का परिणाम, यह भीतरी परिणाम, यह आत्मा के दर्शन में बाधक है।

1338- कर्मराग की मिथ्याध्यवसायरूपता का समर्थन-

संसारी जीवों को सुख-दु:ख आदिक उन उनके कर्मोदय का निमित्त पाकर हुआ करते हैं। कोई जीव किसी दूसरे को सुख-दु:ख देने में समर्थ नहीं है। हाँ उदय ही ऐसा खोटा हो तो उसमें दूसरा बाह्यसाधन बन जाता है। तो वहाँ कर्मराग नहीं रखना- मैंने यह किया, दूसरे पदार्थ का मैं कुछ कर देता हूँ इस प्रकार का कर्मराग यह संसार परंपरा बढ़ाने वाला बंध का हेतुभूत है, सही-सही जानें। हाँ, अच्छा ये कर्म मिथ्या क्यों हैं, कर्मराग मिथ्या क्यों हैं? ऐसा सोचना कि मैं दूसरे को मारता हूँ, दु:खी करता हूँ, यह मिथ्या यों है कि इसकी ओर से देखें तो इसका तो वह भाव कर्मरूप है, इस कारण वे बंध के कारण हैं। और, मिथ्या वे यों हैं कि बात ऐसी है नहीं। एक जीव का दूसरे जीव के किसी कार्य के साथ कर्तृत्व नहीं, निमित्त-नैमित्तिक योग भी नहीं है, किंतु कर्मदशा का ही जीवभाव के साथ निमित्त-नैमित्तिक योग है। निमित्त-नैमित्तिक योग एक तरफ से ही तो नहीं है। जब यह जीव अपने विशुद्ध परिणाम में होता तो वहाँ कर्म में भी बड़ी खलबली चलती है। वहाँ कर्म कैसे झड़े, कैसे निर्जरण होता, क्या होता, वहाँ भी उनमें उनकी ही परिणति से स्वयं हो रहा है, मगर जीव के विशुद्ध परिणाम के सान्निध्य से हो रहा, ऐसे ही जब कर्म की कोई दशा है तो उस दशा का सान्निध्य पाकर जीव में विकार होता। होता है तो हो मगर यह दूसरा जीव उसमें अपनी टाँग अड़ाता है- मैंने कर दिया यह...तो ये सब अध्यवसाय मिथ्या हैं क्योंकि ये अध्यवसाय अज्ञान से पैदा होते हैं। उसने वस्तु के स्वातंत्र्य को नहीं जाना है, इसका सब कुछ इसके साथ है, अपनी ही परिणति से अपना परिणमन कर रहा है। मैं इसका कुछ नहीं करता, यह तथ्य उसके चित्त से हट गया और अपने को कर्ता मान लिया, इस कारण से वह दु:खी होता है।

1339- कष्टरूप अज्ञानमयभाव को दूर हटाने का संदेश-

अज्ञान स्वयं कष्टमय भाव है। जहाँ अज्ञान है वहाँ सहज आह्लाद हो ही नहीं सकता। वह स्वयं कहाँ पड़ा हुआ हैं। और, संसार-परंपरा में वह बढ़ रहा है। इस छंद में यह बतला रहे हैं कि जीव के जो-जो भी मरण, जीवन, दु:ख, सुख होते हैं वे सदा ही ऐसे ही नियत हैं कि वे अपने-अपने ही कर्मोदय के निमित्त पाकर होते हैं। इस प्रसंग में यह अज्ञान है कि ऐसी कोई मान्यता करे कि दूसरा आदमी दूसरे का जीवन, मरण, दु:ख और सुख को करता है। तो यह अध्यवसान हटाना है। मैं अपने परिणाम को ही करता हूँ, मैं दूसरे जीव का कुछ काम नहीं करता, यह तथ्य समझना होगा। और कोई बाह्य पदार्थ का लक्ष्य रखकर लक्ष्य बना हो तो यह उसके दु:ख के लिए है, और में अपने आपमें अपना ही एक आश्रय रखता हुआ लक्ष्य करके अपने में अपने परिणाम बनाता हूँ तो वह मेरी प्रगति के लिए है। बस यह ही तो निर्णय रखना है। ऐसा निर्णय रख करके हम आप इस भाव को छोड़ दें कि मैं दूसरे जीवों को सुख-दु:ख दिया करता हूँ, मैं सर्वत्र अपने परिणामों को करता हूँ और उस करतूत के अनुसार ही मैं अपने फल को भोगता रहता हूँ।


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