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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 169

From जैनकोष



अज्ञानमेतदधिगम्य परात्परस्य

पश्यंति ये मरणजीवितदु:खसौख्यम् ।

कर्माण्यहंकृतिरसेन चिकिर्षवस्ते

मिथ्यादृशो नियतमात्महनो भवंति ॥169॥

1340- सर्वत्र आयुकर्म की स्वोपभोग से क्षीयमाणता-

अज्ञानी जीव दूसरे पदार्थों के प्रति, दूसरे जीवों के प्रति कुछ करने का अहंकार रख रहे हैं। मैं इनको यों करूँगा, सुधार दूँगा, बिगाड़ दूँगा, मार दूँगा, जियाऊँगा, दु:खी करूँगा, यह सब है कर्मराग, कर्म में अहंकार। यह भाव मिथ्या है, स्वार्थक्रियाकारी नहीं है। विकल्प में जो बात सोची वैसा इसका विकल्प करने से हो जाय ऐसा नहीं है, तब फिर वह सार्थक नहीं। पहले बतलाया था- मरण का अध्यवसाय। मैं इन-इन जीवों की हिंसा करता हूँ, मारता हूँ, यह अध्यवसाय मिथ्या क्योंकि मरना दूसरे के हाथ की बात नहीं है किंतु आयु के क्षय के निमित्त से होने वाली बात है। देखिये, प्रसंग में प्रयोजनभूत जितनी बातें होती हैं उन पर तो ज्यादह मनन करना चाहिए और उससे लगी हुई और भी बातें होती हैं जो विशेष प्रयोजनभूत नहीं है वह विशेष चर्चा में ऐसा न होना चाहिए कि जिसकी कुछ उलझन बने। यहाँ मूल में यह बात कही जा रही है कि आयु का क्षय दूसरा कर नहीं सकता और मरण आयु के क्षय से होता है इस कारण यह अध्यवसाय मिथ्या है कि मैं इसको मारता हूँ। अब एक बात दूसरी है कि आयु का क्षय दो पद्धतियों से होता है- एक तो पूरी स्थिति पाकर, दूसरा स्थितिपूर्वनिर्जरण से, जिसको अकालमृत्यु कहते हैं। उसका दूसरा नाम यह रखें तो करणानुयोग की बात जल्दी समझ में आयगी- स्थितिपूर्वनिर्जरण। जिसकी जो स्थिति बंधी है उससे पहले उसका खिर जाना स्थितिपूर्वनिर्जरण है। स्थितिपूर्वनिर्जरण मात्र आयु कर्म में ही हो, ऐसा नहीं, किंतु प्राय: सभी कर्मों में स्थितिपूर्वनिर्जरण होता है। 148 प्रकार की कर्मप्रकृतियाँ हैं, सभी में प्राय: स्थितिपूर्वनिर्जरण है याने बँधी हुई स्थिति से पहले निर्जरा हो जाना। करणानुयोग में बड़ी स्पष्टता से बताया है और ऐसा चारित्रमोह में होता है उसका तो बड़ा आदर करते। निर्जरातत्त्व में उसकी महिमा बताई है।

1341- स्थितिपूर्वनिर्जरण की उपयोगिता-

यदि स्थितिपूर्वनिर्जरण न हो तो बताओ, सम्यग्दर्शन हुए बाद कितने कर्म रहते हैं? कुछ कम एक कोड़ा कोड़ी सागर। सम्यक्त्व हो गया जिस जीव को फिर भी उसके पास कितना स्थितिसत्त्व है कुछ कम एक कोड़ा कोड़ी सागर। कितना होता एक कोड़ा कोड़ी सागर? तो उसको पहले पल्य से लीजिए। मान लो, उपमा प्रभाव से बता रहे हैं। ऐसा कोई कर सकता नहीं, किंतु उपमा से जाने। कोई 2 हजार कोश का लंबा चौड़ा गहरा गड्ढा हो, उसमें मेंढ़े के बच्चे के कोमल बालों के इतने इतने छोटे टुकड़े भर दिये जायें कि जिनका दूसरा हिस्सा न हो सके, साथ ही उस पर हाथी फिराकर खूब ठसाठस कर दिया जाय। अब प्रत्येक सौ वर्ष में उसमें से एक-एक टुकड़ा निकाला जाय। अब उन सारे टुकड़ों के निकलने में जितना समय लगे उतने वर्षों का नाम तो है व्यवहारपल्य, उससे अनगिनते गुणे वर्ष लगे इसका नाम है उद्धारपल्य और उससे अनगिनते वर्ष लगे उसका नाम है अद्धापल्य। एक करोड़ अद्धापल्य में एक करोड़ अद्धापल्य का गुणा करने से जो काल आवे उसका नाम है एक कोड़ा कोड़ी अद्धापल्य। ऐसे 10 कोड़ा कोड़ी अद्धापल्य का एक सागर, और एक करोड़ सागर में एक करोड़ सागर का गुणा करें तो उसे कहते हैं एक कोड़ा कोड़ी सागर। कुछ कम एक कोड़ा कोड़ी सागर रहते हैं सम्यक्त्व के होने पर भी, मगर पूरी स्थिति पाकर वे कर्म झड़ें तो उसका भला हो गया? कितने दिन तक यह सम्यग्दृष्टि संसार में रहेगा? और देखा तो यह जाता कि कोई घंटे भर में मोक्ष चला जाता, कोई और ज्यादह काल में सम्यक्त्व हो जाने के बाद। उन सबके स्थितिपूर्वनिर्जरण चलता ही है। तभी तो गुणश्रेणी निर्जरा आदि होते हैं। तो सबमें स्थितिपूर्वनिर्जरा ही होती है, तो आयुकर्म में भी स्थितिपूर्वनिर्जरण चलता है, केवल देव, नारकी, भोगभूमिज तिर्यंच और...चरमशरीरी इनको छोड़कर शेष जीवों की आयुकर्म की स्थितिपूर्वनिर्जरा चल सकती है।

1342- आयुकर्म के स्थितिपूर्वनिर्जरण का दिग्दर्शन-

जैसे आयुकर्म की स्थिति 100 वर्ष की है तो उसके मायने है कि 100 वर्ष में जितने समय हैं उतने निषेक बंध गए। एक-एक समय में एक-एक निषेक खिरते, 40 वर्ष के समय में अगर आगामी 60 वर्ष के निषेक खिर जाते हैं तो यहाँ यह जानना प्रकृत में कि वहाँ 60 वर्ष के बाकी जो निषेक हैं वे भी अंतर्मुहूर्त में उपभोग द्वारा क्षीयमाण हो गए। जैसे पूरी स्थिति में उपभोग क्षीयमाण हुआ ऐसे ही बाकी 60 वर्ष के निषेक जो 40 वर्ष में उपभोग द्वारा क्षीयमाण हुए। ऐसा समझना कि निषेक की ओर से तो अकाल मरण रहा और, अब ज्ञप्ति की ओर दृष्टि चलती है तो कैसा हो रहा? प्रभु ने जो जाना, विशिष्ट ज्ञानी ने जाना। जिस समय हुआ उस समय मरण हुआ, जब होना जाना गया तब ही मरण हुआ। यद्यपि जाना गया तब ही, जब इस तरह हुआ तब ही तो जाना गया, किंतु जानने की ओर से देखो तो यह समझ में आयगा कि समय पर हुआ सब, जिस समय का होना जाना उस समय हुआ ऐसा। और करणानुयोग की विधि से देखें तो उसका नाम है स्थितिपूर्वनिर्जरण। दोनों बात में दृष्टियाँ दो हैं, दोनों समझों में विरोध नहीं। वहाँ से देखो तो यों विदित हुआ, यहाँ से देखो तो यों विदित हुआ। ऐसी एक बार की घटना है। हम अपने विद्यार्थी जीवन में उस समय रत्नकरंडश्रावकाचार पढ़ते थे, करीब 9-10 वर्ष के थे। 17 वर्ष की उम्र में राजवार्तिक, 16 में पंचास्तिकाय, 15 में कर्मकांड, 14 वर्ष की आयु में जीवकांड, 13 में सर्वाथसिद्धि, 12 वर्षायु में सागारधर्मामृत, 11 वर्षायु में द्रव्यसंग्रहजैनसिद्धांतप्रवेशिका, 10 वर्षायु में मोक्षशास्त्र, हाँ 9 वर्षायु में रत्नकरंडश्रावकाचार पढ़ा करते थे सागर विद्यालय में। वहाँ सुबह व विद्यालय समाप्ति बाद शहर से बाहर निपटने जाया करते थे। एक दिन ऐसा मन में आया कि कहते हैं जो भगवान ने जाना सो होता है। उस समय हम रोज धर्मासी जाते थे। अचानक मन में आया कि आज तो हम वेदांती के रास्ते से जायेंगे, रास्ता हमने पकड़ा, फिर सोचा कि भगवान ने अगर यह ही जाना हो तो फिर हम वेदांती की ओर क्यों जायें? हम तो धर्मासी जायेंगे, सो रास्ता बदल कर फिर लौट गये, फिर सोचा कि अगर ऐसा ही जाना हो तो हम वेदांती की गली से क्यों न जायें? यों दो तीन बार अदल-बदल किया, और बाद में जहाँ जाना था सो चले गये। अब चले तो गये मगर थोड़ी देर बाद मन में विकल्प आया कि ओह ! भगवान ने यही जाना था कि यह दो तीन बार बदलेगा। अब देखो काम तो हुआ वह करने से, अन्य के ज्ञान से नहीं हुआ, वह तो मैंने ही किया, मैंने ही विकल्प किया। यहाँ गये, वहाँ गये, हो तो रहा, करने से काम मगर करते हुये जब आगे करेंगे तो वह ही ज्ञात हो गया।

1343- निमित्तनैमित्तिक योग की प्रतिनियत व्यवस्था में होते हुए का विशिष्ट ज्ञानियों द्वारा ज्ञान हो जाने की दृष्टि में कार्य के निश्चित समय का बोध-

कोई-कोई लोग कहते हैं कि सर्वज्ञ को क्या पता? वे जानते कि नहीं, और जानते हैं तो और ढंग से। अच्छा सर्वज्ञ को छोड़ो। अवधिज्ञानी तो जानते, सर्वावधि तो जानते। जानना तो निश्चित हो गया। होने वाली बात को कोई जान तो लेता है। अब जानने की ओर से देखो तो यह बात आती कि ‘‘जो-जो देखी वीतराग ने सो-सो हो सी वीरारे’’, मगर निष्पत्ति की ओर से देखें तो निमित्तनैमित्तिक योग और यह विधान, यह यथावत नियत है। तब ही तो लिखा है कि कर्मोदय से मरण जीवन आदिक होते हैं, यह नियत योग है याने ऐसा होता है। सब जानते हैं कि आग का निमित्त पाकर रोटी सिकती है, सब जानते हैं वह नियत निमित्त-नैमित्तिक व्यवस्था है, मगर सोचना वहाँ यह है कि रोटी में ही रोटी का ही काम हुआ, महिला ने रोटी बेली, रोटी बना दी, सब लोग जानते हैं कि ऐसे-ऐसे व्यापार का सन्निधान पाकर अगली-अगली दशायें बनती हैं। सब जानते हैं, मगर महिला का काम महिला के हाथ में ही रहा, रोटी का परिणमन उस आटे में ही चला। तो स्वयं में भी यह ही निरखना है, निमित्त-नैमित्तिक योग में मेरी प्रत्येक दशा अपने आपकी परिणति से परिणमती, अन्य की परिणति से नहीं परिणमती, किंतु विकार

-परिणाम अनुकूल वातावरण के अभाव में न हो सके, निमित्त-सन्निधान के अभाव में न हो सके, इतनी बात तो विकार के लिए है, मगर वहाँ निरखें यह कि प्रत्येक द्रव्य अपने में अपनी ही क्रिया से परिणमा। रंच भी विरोध नहीं है किसी जगह में निमित्त- नैमित्तिकभाव का और वस्तु-स्वातंत्र्य का।

1344- अज्ञानवश हुये कर्मराग की व्यग्रता-

प्रकरण में यह बताया जा रहा कि यह जीव अज्ञान से इस क्रिया में लिपट गया, कर्म में राग कर बैठा और यह भूल गया कि मेरा काम तो जाननमात्र का है, इसके आगे मेरा काम नहीं, यह औपाधिक योग है, हुआ है ऐसा, उसका हमें ज्ञाता रहना चाहिए, यों बन गया, परंतु मैं इन सबका करने वाला नहीं हूँ। स्वतंत्र: कर्ता मैं स्वयं ही निरपेक्षरूप से कर सकूँ विकार, ऐसी बात नहीं, मैं स्वयं जानने का काम करता हूँ। किंतु अज्ञान को पाकर जीव दूसरे से दूसरे का मरण –जीवन, दु:ख-सुख निरखता है और यह मिथ्यादृष्टि जीव, अहंकाररस से, मैं करने वाला हूँ ऐसा मानता है। देखो घर-घर में जो लड़ाई चलती है वह किस बात की है? सब कर्मराग की लड़ाई चलती है। कर्मराग केवल शरीर की क्रिया के प्रति नहीं, बल्कि विचार के प्रति। मेरा विचार, मेरा ज्ञान, मेरी बुद्धि, मेरा काम, कैसा मैं मेरा मेरा यह जीव लगा रहा है, तो क्या कर रहा वह जीव? दूसरे का तो करेगा क्या? वह अपने आपका हनन कर रहा है। जब अज्ञान बसा हुआ है, बाहरी प्रवृत्तियों में उपयोग फँसा हुआ है, बाहरी पदार्थों में उपयोग जमा हुआ है, वैसा ही भाव है तो अंत: जो चैतन्यस्वरूप है, प्राण है, उसकी इसको सुध ही कहाँ है? हालांकि यह चेतन से अलग नहीं होता, लेकिन उपयोग में तो अलग बन बैठा। यहाँ किसी के हाथ की मुट्ठी में अंगूठी रखी हो और अचानक ही उसका ख्याल न रहा तो वह उसकी तलाश यत्र-तत्र करता फिरता, कहाँ गई? क्या हुई? देखो है खुद की मुट्ठी में ही, पर ज्ञान में तो नहीं है। ज्ञान में नहीं है, उसका फल मिल रहा। हर एक बात का फल ज्ञान में है या नहीं, इसके प्रभाव में चला करता है, तो अज्ञानी जीव स्वयं चैतन्यस्वरूप तो है मगर उसको सुध नहीं है अपने आपकी। जो वह अजीव, जड़ बनाता फिर रहा है उपयोग द्वारा, वस्तुत: वह बन नहीं सकता जड़। तो अब अपने आपकी सुध नहीं है तो यह बाहर-बाहर में काम करता है। जब आत्मा में संतोष नहीं है तो बाहर के पदार्थों में रमकर संतोष पाने की कोशिश करता है। होता नहीं है संतोष बाहर, वास्तविक संतोष तो आत्मा में ही होता है। मगर आत्म संतोष तो मिला ही नहीं, सो बाहर ही बाहर यह भटकता फिरता है बंधाधिकार में यह बात बतलायी जा रही है कि बाहरी बातों में बंध नहीं, किंतु कर्मराग से बंध है। यह ही प्रकरण प्रारंभ में था उसी के समर्थन में यह प्रकरण चल रहा है।

1345- अध्यवसाय दूर करने की प्रकरण से शिक्षा-

यहाँ शिक्षा यह लेना कि भाई कर्मराग क्यों करता? मैं इसको दु:खी कर दूँ, ऐसा भाव होने से क्या वह दु:खी होता। उसका ही कर्मोदय हो उस अनुकूल तो वह दु:खी होगा, पर उसके विकल्प से न होगा, इसलिए यह विकल्प, यह अध्यवसाय स्वार्थक्रियाकारी नहीं। आश्रयभूत निमित्त की बात कही जा रही है कि आश्रय कर-करके अहंकार किया जा रहा है वह बात मिथ्या है, निमित्त-नैमित्तिक योग की बात यहाँ नहीं है, कि वह मिथ्या है, वह तो एक नियत शब्द में बोला। ‘सर्वं सदैव नियतं’। यहाँ तो अहंकाररस छुटाना है कि किसी भी क्रिया में अहंकार न रखें तो इस प्रकार से समझाया गया है कि तेरे सोचने से कुछ होता नहीं, तू अध्यवसाय क्यों कर रहा है? तो यह जीव अहंकाररस से कर्मों को करने की इच्छा करते हुए वह निरंतर क्या कर रहा है? वह अपने आपका हनन कर रहा है, आत्महत्या कर रहा है। आत्महत्या क्या है? लोग तो प्राण चले जाने को आत्महत्या बोल देते, पर वह आत्महत्या नहीं, वह तो भवहत्या है। आत्महत्या तो यह है कि जो अपनी सुध नहीं है और बाहर में हत्या का अहंकार बना हुआ है, बाहरी तत्त्व में मैं यह हूँ, इस प्रकार की आस्था बनी है और अपने स्वभाव की सुध नहीं कि मैं अपने स्वरूप मात्र हूँ। बस स्व में ही परिणमन उठते रहते हैं। इनकी ही तरंग चलती रहती है। यह तरंग विकाररूप हो तो निमित्त-सान्निध्य में होगी, एक वातावरण में होगी तो भी इसकी तरंग करने वाला कोर्इ दूसरा नहीं है। स्वयं अपने आपमें से अपनी तरंग उठाता हुआ यह अपनी कालयात्रा कर रहा है। ऐसे ही प्रत्येक पदार्थ अपने-अपने में अपनी यात्रा करते हुये चले जा रहे हैं।


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