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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 184

From जैनकोष



एकश्चितश्चिन्मय एव भावो भावा: परे ये किल ते परेषाम् ।

ग्राह्यस्ततश्चिन्मय एव भावो भावा: परे सर्वत एव हेया: ॥184॥

1525- स्व के चिन्मय भाव की स्वभावरूपता व पर के भावों की पररूपता-

चेतन में तो एक चिन्मय भाव हैऔर परपदार्थ के जो भाव हैं वे पर ही हैं, उनमें से चिन्मय भाव तो ग्रहण करने योग्य है और बाकी सर्व परभाव सर्व तरह से हेय ही हैं। प्रकरण यह चल रहा है कि मोक्ष कैसे होता है। उसका एक ही साधन है। अपने सहज निरपेक्ष चैतन्यस्वभाव का आश्रय, उसमें अहं का अनुभव होना, यह मैं हूँ और विकल्प रहित होकर उस ही ज्ञानतत्त्व का स्वाद लेना, इसमें आश्रय किसका हुआ? चैतन्यमात्र भाव का, चिन्मयभाव का, केवल चेतन ही चेतन का । चेतन से ही जो रचा गया है मायने जो चैतन्यमात्र है उसे कहते हैं चिन्मयभाव। कभी देखा होगा कि जब कोई चिड़िया का छोटा बच्चा, जिसके अभी पैर नहीं निकले, जमीन पर पड़ा है, पंख नहीं निकले, चल भी नहीं पा रहा, उसे क्या कहते हैं लोग? चेनुवा। अभी तो यह चेनुवा है। इस चेनुवा का अर्थ क्या है? यह शब्द कहाँ से निकला? तो पहले लोग ज्ञानी होते होंगे, उन्होंने देखा कि यह शरीर तो अभी बना ही नहीं है, मानों शरीर है ही नहीं। जब तक शरीर अच्छा न बने तब तक उनकी निगाह में शरीर है ही नहीं, ऐसा कई बातों में बोलते। जैसे कोई स्वर्ण बेचने को लाये और शुद्ध स्वर्ण का रुचिया सर्राफ उसे कसौटी पर कसे और उसमें बहुत हल्की खोट निकले, कोई दो चार आने भर, फिर भी वह कहता- अरे ! यह सोना है क्या? क्यों पीतल ले आये। तो देखो पीतल तो न थी वह, बस जरा-सी खोट थी, मगर व्यवहार में ऐसा कह दिया जाता है, तो ऐसे ही जब वहाँ देखा कि इसके तो शरीर ही नहीं हैं मायने बना ही नहीं तो शरीर पर दृष्टि ही नहीं गई और चिन्मय पर दृष्टि गई। चैतन्यमात्र है, और दो हैं ना वहाँ, चेतन और शरीर। शरीर तो बना पूरा नहीं, सो वहाँ एकदम ऐसी दृष्टि बना ली कि है ही नहीं शरीर। ऐसा होता है। बात पूरी नहीं है, तो कहते हैं कि है ही नहीं। है नहीं, तो क्या रह गया? वह चिन्मय याने चेतन रह गया। लो चिन्मय से बिगड़कर बन गया चेनुवा। उसकी दृष्टि में शरीर नहीं है। सब यहाँ दिख रहा कि चेतन ही चेतन है। अच्छा, तो अपने इस शरीर को तो बहुत देख रहे, मगर अपने इस चेनुवा को भी तो देखो- अपने भीतर विराजमान जो चिन्मात्र है उसकी कोई खबर नहीं करते, बस शरीर ही शरीर।

1526- कल-कल की नातेदारी का तथ्य–

लोग कहते हैं अरे ! कल-कल क्यों करते, पर कल-कल न करें तो क्या करें? कल के मायने है शरीर। यहाँ ये जो हजारों लोग बैठे हैं वे कल-कल न करें तो फिर क्या करें? तो कल-कल मायने शरीर-शरीर। उस पर तो है लोगों की दृष्टि बहुत और जितना व्यवहार है वह सब शरीर से चल रहा है। यह मेरी नानी, यह मेरी माँ, यह मेरा पिता, यह मेरा ससुर, यह मेरी सास आदिक ये सब शरीर के नाते हैं। भाई किसे कहते हैं? यह शरीर जहाँ से पैदा हुआ वहीं से जो और शरीर निकला हो उसका नाम है भाई। बाप किसे कहते? जिस शरीर से यह शरीर बना उसका नाम है बाप। पुत्र किसे कहते? इस शरीर से जो शरीर बना उसका नाम है बेटा। याने ये शरीर-शरीर के नाते तो दिखे। स्त्री किसे कहते हैं? इस शरीर को रमाने के लिए जो दूसरा शरीर हो उसे कहते हैं स्त्री। कोई-सा भी तो नाता बताओ, सभी नाते इस शरीर के नाते से निकले। आत्मा का नाता किसी से न बनेगा और इसीलिए लोग बिल्कुल सत्य बोल रहे हैं- हमारी इससे नातेदारी है, दारी मायने संबंध, ना मायने नहीं, ते मायने तुम्हारा याने वे तेरे कोई संबंधी नहीं ऐसी मेरी इनसे नातेदारी है। ये हमारे कुछ नहीं है बस यह ही संबंध है। लोग बोलते तो बहुत सत्य हैं, पर उस पर डटते नहीं। तो ये बाहर में जितने भी पदार्थ हैं, उपाधि जन्य कष्ट हैं, जितने भी भाव हैं वे सब परभाव हैं, ये मेरे स्वरूप नहीं हैं।

1527- स्वरूप स्वाश्रित धर्म उपयुक्त होने की नि:शंकता की उमंग-

मैं तो केवल एक चिन्मात्र हूँ, तब क्या करना? अपने को चिन्मात्र-स्वरूप जानकर उसको ग्रहण करना मायने उस पर ही अधिक दृष्टि रखें, मैं चिन्मात्र हूँ, चैतन्यस्वरूप मात्र हूँ। देखो, जो बात अनंत काल तक रहेगी, क्या रहेगी, इस चैतन्यस्वरूप में मग्न होना यह अनंत काल तक रहेगा, तो जो बात अनंत काल तक रहेगी उसके यहाँ थोड़ी देर भी करने बैठते तो उसमें घबराहट क्यों होती? कुछ ठनगन सा क्यों आता, जैसे लड़की को तो ससुराल में जीवनभर रहना है, मगर पहली बार या कुछ कई बार जाती तो वह ठनबन खूब करती, जाने में दु:ख प्रकट करती व रोती है। अरे ! रहना तो जिंदगीभर है मगर एक दो बार ठनगन चलता है, ऐसे ही इस आत्मा को अनंत काल तक चैतन्यस्वरूप में रहना है मगर जब तक चैतन्यस्वरूप से इसका एक संबंध बना तो शुरू-शुरू में यह रहने में ठनगन कर रहा, नहीं रह पाता, उचट जाता; कहीं प्रदेश से बाहर भागता नहीं, जहाँ यह रहा अनादि से, जिस घर में रहा आया उस घर की बराबर प्रतीति तो न रही, पर एक बार उसकी मानों याद-सी जरूर कर लेता। पूर्व का यह संस्कार बना है। भैया, ऐसी एक हिम्मत बनायें कि इस चैतन्यस्वरूप में तो अनंत काल तक मग्न रहना ही है, फिर अब उसमें घबराहट क्यों होवे? इसका शरण ही यह है, इसका पूरा ही यहाँ से पड़ेगा, ऐसा जानकर इस चैतन्यमात्र भाव को ग्रहण करना चाहिए, और जो अन्य भाव है उनका परित्याग करें। ज्ञानी पुरुष ऐसा करता है। ज्ञानी किसे कहते हैं? जिसको ज्ञान का ज्ञान है उसका नाम है ज्ञानी। अच्छा, उपयोग को देख लो, और जिसको बाहर ही बाहर बाहरी चीजों का ज्ञान है वे बाहरी चीजें हैं उपयोग में, वह ज्ञानी नहीं है। जैसे बतलाया धर्मास्तिकाय, जिसके चित्त में विकल्प है धर्मद्रव्य के बारे में, उपयोग से वहाँ धर्मास्तिकाय है। जड़ को जो सर्वस्व मान रहा है उसे कहते हैं जड़, जीव की बात कह रहे, वह स्वरूप से जड़ नहीं हुआ, मगर करतूत से जड़ है। जो ज्ञान को जान रहा वह है ज्ञानी। कौन बना ज्ञानी? जिसने आत्मस्वभाव और अनात्मतत्त्व इनका जुदा-जुदा लक्षण जाना है और उन लक्षणों के विभाग पर जिसने अपनी प्रज्ञा छेनी पटकी है, दो टूक किया और विवेक किया मैं यह नहीं, मैं हूँ यह।

1528- सर्व परीक्षणों में स्वभावाश्रय का उद्देश्य-

देखो, प्रभु के उपदेश से अपना काम बना लें। स्वभाव और परभाव का भेद ज्ञात करने में निमित्त-नैमित्तिक योग का सही परिचय वह बहुत सहयोग देता है। ये क्रोधादिक भाव परभाव हैं, यह सिद्ध करने में हमें इन्हीं उपायों से बल मिलता है, इसी कारण बंधाधिकार के अंत में इन उपायों को बताकर अधिकार पूरा किया कि विचार करते रहो और परभाव को त्यागकर स्वरूप को जानते रहो। निमित्त-नैमित्तिक शब्द ही यह बतलाता है कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का त्रिकाल भी कर्ता नहीं, उसी शब्द में, उसी योग में यह बात पड़ी हुई है। वस्तु का स्वरूप है कि वह स्वयं परिणमा करे, उसे दूसरा न परिणमायेगा। 6 साधारण गुणों से ही सारी व्यवस्था बन गई। अब असाधारण गुण तो इसके लिए है कि बता दिया कि यह पदार्थ अपने में अपने स्वरूप से परिणमता, मगर वह स्वरूप क्या है? उसकी तो सुध नहीं साधारण गुणों में, तो असाधारण गुण बताया और विशेष स्पष्ट समझने के लिए साधारण गुण के परिचय ने मदद की सो उपादान की कला को निरखिये कि यह योग्य उपादान, किस-किस द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के बीच उपस्थित हुआ, उपादान किस रूप से अपना परिणमन कर लेता है, तो विचार रूप जो परिणमता है सो वहाँ किसी एक वातावरण में, एक विशिष्ट सान्निध्य में उसके यह बात बनी इससे यह समझ में आया, आत्मा में आत्मा के स्वभाव से ऐसा विकार बनने की गुंजाइश नहीं। यह तो एक चैतन्य प्रकाशमात्र है। जब यह उद्देश्य बन जाता है ज्ञानी का कि स्वभाव का आश्रय किए बिना हमारा उद्धार नहीं है, तो वह सर्व उपदेशों से यही ग्रहण करता कि जिससे स्वभाव का परिचय मिले।

1529- विभावरमण के रोगी को रोगी के नुक्शा की ओषधि-

जिसने स्वभावाश्रय का उद्देश्य नहीं बनाया, बल्कि ज्ञान ही नहीं कि हमें क्या करना स्वभाव के आश्रय से तो ऐसे उन निरुद्दिष्ट पुरुषों में विचित्र चर्चायें चलती हैं, अजी वह क्या करे उपादान, निमित्त ने ही परिणति कर दी, वह निमित्त के कर्तृत्व पर उतर आया। जिसको अपने स्वभाव की रुचि नहीं, स्वाभावाश्रय का उद्देश्य नहीं बनाया, उसने ऐसा ही देखा कि देखो जीव ही तो राग कर रहा है, उसका ही तो परिणमन चल रहा है। अरे, उसे दूसरे ने नहीं किया, दूसरा कोई निमित्त भी नहीं, यह तो अपने आप अपने में राग बनाता चला जा रहा है। यद्यपि यह भी एक अशुद्ध निश्चयनय का विषय है, मगर जब कोई बीमारी होती है तो जो कुशल वैद्य है वह इस तरह से चिकित्सा करता है कि कहीं ऐसी प्रतिकूल तेज चिकित्सा न हो जाय कि बजाय फायदे के और खराबी कर जाय। तब ही तो वैद्य चार-छह दवाइयाँ एक साथ मिला लेता। जैसे कोई है तो शीत का रोगी और उसे खूब तेज गरम दवा दी जाय तो शीत तो उसकी मिट जायगी मगर गर्मी बढ़ जायगी जिससे उसका रोग असाध्य बन जायगा, या किसी को गर्मी का रोग हो और उसे शीत दवा दे दी जाय तो वह भी उसके लिए हानिकारक होगी। इसलिए होशियार वैद्य शीत उष्ण दवाओं का मिश्रण करके दवा देता है जिससे उस रोगी का रोग दूर हो जाता है और वह स्वस्थता को प्राप्त हो जाता है। यहाँ स्वस्थता है स्वभावदृष्टि, और रोगी वह है जो परभावों में विश्राम कर रहा। अब परभावों के विश्राम करने वाले रोगी की गुरुजनों ने चिकित्सा की और वह चिकित्सा है नयों का नुक्शा। जैसे एक नुक्शा देने के लिए नुक्शा की कई चीजें लिखी जाती। तो नयों का नुक्शा दिया गुरुजनों ने। अब उस नुक्शा को मिलाकर पियो, जानो, प्रमाण से जाने गए पदार्थ में विवक्षावश, प्रयोजनवश एक किसी अंश को बताना सो नय कहलाता है। जानो, किसी ने यह जाना कि जीव में विकार तो होते ही नहीं, वह है अविकारी। यह एकांतत: माना, कि उसे इन विकारों को कर्म ने कर डाला ऐसी तेज दवा पिला दी, निमित्त ने किया, यह खुद क्या करेगा? लो, उसे रोग को मेटना था, स्वस्थता को लाना था, और निमित्तकर्तृत्व की दवा दे दी। वहाँ यह नहीं समझ पाया कि बात यों बन रही है कि ऐसे ऐसे अनुकूल निमित्त के सान्निध्य में यह प्रयोगी अपने आपमें ऐसा प्रभाव बनाया करता है। अच्छा तो निमित्तकर्तृत्व का रोग जब आया तो उसे मेटना चाहिए। एक रोग को मिटाने की ऐसी तेज दवा मिल गई कि दूसरा रोग खड़ा हो गया था। अब इस रोग को दूर करने के लिए ऐसी दवा दी इस रोगी को कि बस यह जीव अपने में अपने से अपनी योग्यता से बस विकार करता चला जा रहा, यह इसका स्वभाव ही है, ऐसा ही इसने अपने में निर्णय बनाया कि मैं ऐसा-ऐसा करता ही रहूँगा, तो अब यहाँ निमित्त-नैमित्तिक योग को छोड़ दिया सो यहाँ दूसरा रोग आया। जब मैं विकार करता ही रहता हूँ अपने ही कारण से, अपनी ही योग्यता से, अपने ही स्वभाव से, तो वह कैसे मिटेगा?

1530- आत्मा के स्वास्थ्य के लिये संतुलित चिकित्सा का आधार-

नयों का यथावसर योग्य प्रयोग करना, यह एक बहुत बड़ा संतुलित काम है। कैसे समझना? कुछ कठिन नहीं है, केवल एक लक्ष्य बना लें कि मेरे को तो अपने सहज चैतन्यस्वभाव का आश्रय लेना है। एक लक्ष्य बन जाने पर फिर ज्ञानकला सहज आ जाती। आपको कोई अधिक मेहनत न पड़ेगी, न विचार का श्रम करना होगा विशेष। किसी से पूछने की भी अधिक आवश्यकता नहीं। स्वयं ही तो यह ज्ञानवान है। सब ज्ञान की बातें निकलती जायेंगी एक लक्ष्य को सही बना लेने पर। भैया, जितने विवाद होते हैं उनमें अगर कोई लक्ष्य वाला है, अपने आत्मा पर करुणा रखने वाला है कि मेरे को कषाय न चाहिए, स्वभाव का आश्रय चाहिए, स्वभावदृष्टि रहे, ऐसा अगर लक्ष्य वाला है तो उसको कहीं अड़चन नहीं आ सकती। सबका वह अर्थ सही समझ लेगा। तो स्वभाव का आश्रय करना और उसका लक्ष्य बनाना यह सबसे बड़ा मुख्य काम है? वह स्वभाव क्या? चिन्मात्र, चैतन्यमात्र। सो ऐसा जो चिन्मात्र स्वरूप है वह तो ग्राह्य है और शेषभाव वे सब हेय हैं। क्यों हेय हैं? क्योंकि वे सब परकीय भाव हैं।

1531- निमित्तनैमित्तिक योग के यथार्थ परिचय से विभाव की परभावता व चित्स्वरूप की स्वकीयता का सुगम परिचय-

परकीयभाव जानने में देखिये, करणानुयोग की यह बात बड़ी मदद दे रही कि जो निमित्तभूत कर्मविपाक हैं, इन विपाकी कर्मों में सब पूरे अपने स्वरूप में प्रकृति, प्रदेश, स्थिति, अनुभाग सब उनमें पड़े हुए हैं। जिस समय बाँधा था तब ही ये पड़ गए थे। उनकी स्थिति पूरी होती है और वे अपने विपाक में आते हैं। जैसे किसी दुष्ट को घर में ठहरा लेवे तो जितनी देर वह घर में ठहरा है वह भले ही दबा हुआ है और घर से निकलता हुआ अपनी कला का परिचय देता हुआ जायगा ऐसे ही ये अनेक प्रकार के अनुभव वाले कर्म जब तक आत्मा में ठहरे हैं तब तक ये दबे-से पड़े हैं, जिस समय ये कर्म इस घर से निकलते हैं तब ये अपना विपाक बरसाते हैं। उदय के मायने क्या? निकलना, जैसे सूर्य का उदय हो रहा, अपने स्थान को छोड़ रहा ऐसे ही कर्म के उदय के मायने क्या? वे कर्म अब यहाँ से निकल रहे, तब ही तो एक दिन कहा था कि पुण्य के उदय से वैभव मिला इसका अर्थ है पुण्य के निकलने से वैभव मिला, और चूंकि वे पुण्यकर्म निरंतर निकलते रहते हैं, उनके निकलने का ताँता लगा हुआ है इसलिए पुण्य-वैभव भी बना हुआ है। कोई कष्ट होता है तो यह पाप के उदय से हुआ, मायने जो पापकर्म की सत्ता थी उनका निकलना चल रहा और पापकर्म के निकलने से यह कष्ट हो रहा है। अब पापकर्म के निकलने से का ताँता-सा लगा हुआ है इसलिए बहुत काल तक कष्ट रहता है। तो जब कर्मविपाक उदित होता है तो कर्म में कर्म का अनुभाग खिलता है। वस्तु के स्वरूप का ऐसा निश्चय रखें कि किसी भी समय, किसी भी परिस्थिति में, किसी भी घटना में एक पदार्थ दूसरे पदार्थ की परिणति को नहीं कर सकता, मगर विकार जब जब भी होते हैं तो उपादान ऐसी योग्यता वाला है, इस प्रकार की वह पर्याय योग्यता है कि वह उपादान किस निमित्त-प्रसंग में वह अपना कैसा रंग बदल लेता है, बस यह ही सर्वत्र नजर आ रहा है। तो वहाँ कर्म में कर्म का विपाक जगा तो यों समझिये कि ठीक जो दर्पण के आगे लाल कपड़ा किया तो वह लाल, लाल कपड़ा है, उसके सान्निध्य में दर्पण की स्वच्छता का, विकाररूप लाल रंग है, ऐसे ही हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि से सब कर्म में पड़े हैं, कर्म में उदित हो रहे हैं, कर्म का स्वरूप रंग-ढंग है यह सब कर्म के हिसाब का, पर के सान्निध्य में इस जीव की स्वच्छता का ऐसा विकार हुआ, वह विकार ही हमको यह ज्ञान कराता कि ऐसे-ऐसे कर्म का उदय है, निमित्त का ज्ञान नैमित्तिक कराता है? तो निमित्त का ज्ञान तो नैमित्तिक के ज्ञान से बना कि अहो ऐसा निमित्त है, पर वह नैमित्तिक निमित्त-सन्निधान में हुआ इस कारण से नैमित्तिक कहलाता, तो इस विधि से जो जान रहा है उसको समझने में कषाय परभाव है, यह भली-भाँति घर कर जाता, परभाव है, इससे मेरा क्या मतलब? मैं तो एक चैतन्यमात्र तत्त्व हूँ।

1532- परभावों के वैचित्र्य का दिग्दर्शन-

ज्ञानी चाहता है कि मैं चिन्मय भावमात्र हूँ और ये सब औदयिक भाव परभाव हैं। ऐसा जानता हुआ कोई ज्ञानी किस परभाव को कह सकेगा कि यह मेरा है? जैसे यहाँ लोग दूसरे के लड़के को कब कहते हैं कि यह मेरा है? कभी खुद के लड़के का और पड़ोस के लड़के का झगड़ा हो जाय और उसमें यह अपने लड़के को डाटे और मारे और दूसरे लड़के को कुछ न कहे तो क्या आप यह जान रहे हैं कि इसको उस दूसरे लड़के से प्रेम उत्पन्न हुआ है इस कारण दूसरे के लड़के को यह कुछ नहीं कह रहा। अपने लड़के से प्रेम है तेज इस कारण अपने लड़के को मार रहा है। भीतरी बात देखो, भले ही देखने में ऐसा लग रहा कि यह बड़ा निष्पक्ष है, इसको कुछ भी ममता नहीं है अपने लड़के से, तो देखो यह अपने लड़के को मार रहा और उसे बड़ा पक्ष है अपने लड़के का, उससे बड़ी ममता है सो मार रहा। वह एक लौकिक नीति की विधि है, परिणाम तो भीतर के भीतर है, कुछ बाहरी चेष्टा से क्या अंदाज कर सकते? कोई लड़का छत की मुँड़ेर पर खड़ा, जरा-सा झुक रहा है माँ ने देखा तो वह झट उठती है यह कहते हुए कि अरे ! मर जा और लड़के को जोर से अपने पैरों में या गोद में या यों ही वहीं छत में पटक देती है। अब बताओ क्या उसके द्वेष है उस बालक से? अरे ! उसे बड़ा राग उत्पन्न हुआ, बड़ी तेज ममता है इसलिए वह मारती है उस लड़के को, तो यह बाहरी प्रवृत्ति है, इसमें हम क्या निर्णय बनायें? कोई पुरुष द्वेषी है, सुहाता नहीं, परिस्थिति कुछ और है तो वह बड़ी अच्छी बात कहता है, बड़े प्रेम की बात बोलता, मगर उसका कुछ निर्णय है क्योंकि वह सुहाता नहीं है? माँ ने मरना कहा तो भी द्वेष सिद्ध नहीं हो रहा, एक मायावी जीव ने प्रेम की बात भी कही तो भी उससे प्रीति सिद्ध नहीं होती, बाहरी चेष्टाओं से हम क्या जानें?

1533- निमित्तसान्निध्य व स्वच्छताविकार का बोध और निष्पादन-

ये परभाव जो भीतर उत्पन्न हो रहे, जितनी तरह के होते हैं, जीव के उतनी तरह के कर्म के विपाक हैं। यहाँ कार्य को देखकर कारण का अनुमान होता, पर कार्य से कारण हो सो बात नहीं। काम में तो कारण से कार्य हुआ, मगर कार्य के ज्ञान से हुआ कारण का अनुमान। अगर नदी में पूर आ गया तो पूर देखकर यह ज्ञान करते कि ऊपर बड़ी तेज वर्षा हुई, तो क्या वहाँ यह कहेंगे कि पूर आने से तेज वर्षा हुई है, यह तो न बोला जायगा। पूर देखने में ऊपर वर्षा हुई है इसका ज्ञान तो हुआ मगर इधर वर्षा हुई है इसलिए पूर आया, यों चलेगी क्या बात? तो ये परभाव इसी प्रकार तो है कि उस जाति के कर्मविपाक हुए, उस सान्निध्य में इस जीव ने अपनी स्वच्छता में विकार बना लिया। ऐसा रोज देखते ही है कि दर्पण के आगे हाथ किया तो दर्पण में उस प्रकार का स्वच्छता विकार बना, दर्पण के उस विकार को देखकर यह तो ज्ञान बनेगा कि पीछे उस लड़के ने हाथ उठाया मगर यह न कहा जायगा कि दर्पण के फोटो वाले हाथ से लड़के का हाथ बना, किंतु बच्चे का हाथ सामने आया उसका निमित्त-नैमित्तिक का प्रयोग निमित्त-नैमित्तिक ढंग से ही होगा। नैमित्तिक के ज्ञान से निमित्त का ज्ञान हुआ किंतु निमित्त के सान्निध्य में नैमित्तिक कार्य हुआ यही विधान निष्पत्ति का है। जाना, ये परभाव हैं, अब यह ज्ञानी उन परभावों को क्यों ग्रहण करेगा? वह जानता है कि इसमें मेरा स्वत्व नहीं है। मैं तो एक परम ज्योति चिन्मय मात्र हूँ।


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