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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 185

From जैनकोष



सिद्धांतोऽयमुदात्तचित्तचरितैर्मोक्षार्थिभि: सेव्यतां

शुद्धं चिन्मयमेकमेव परमं ज्योति: सदैवास्म्यहम् ।

एते ये तु समुल्लसंति विविधा भावा: पृथग्लक्षणा-

स्तेऽहं नास्मि यतोऽत्र ते मम परद्रव्यं समग्रा अपि ॥185॥

1534- उदात्तचित्त मोक्षार्थियों को अपरिवर्त्य एक सिद्धांत की सेवा का आदेश-

जिनका चित्त और चरित्र उदात्त है, श्रेष्ठ है ऐसे मोक्ष चाहने वाले पुरुषों को एक चिन्मात्र अंतस्तत्त्व की ही सेवा करना चाहिए। जिनका चित्त उदात्त है उनको संबोधा गया है, उनके लिए आचार्यदेव ने निर्देश किया, क्योंकि जिनके चित्त में श्रेष्ठता नहीं, जिनका चित्त माया (कपट) से उलझा हुआ है, मोह-ममता की वासना से जिनका चित्त अनुवासित है ऐसे चित्त वालों को समझाने के मायने जैसे अहाने में कहते हैं कि भैंस के आगे बीन बजाना। होगा कोई ऐसा आदमी, साँप के आगे तो बहुत बीन बजाते मगर कोई भैंस के आगे बजाने लगे तो उसे कुछ भान नहीं होता, तो ऐसे ही पात्र को संबोधा है, और इससे यह शिक्षा लेना है कि अपना पहला काम है अपने हृदय की सफाई रखना। जिसके चित्त में उदात्तता नहीं उनको धर्म में प्रगति का कोई मौका नहीं। जब संसार छोड़ने का हम प्रोग्राम बनाते हैं, मुक्ति में जाना चाहते हैं तो मोक्ष जाने का तो हम मन में भाव रखें और यहाँ संसारी जीवों में मेरा-तेरा, अच्छा-बुरा अथवा किसी भी प्रकार का ईर्ष्या, विरोध, मात्सर्य कुछ भी चित्त में चलें तो भला इतना तो सोचना चाहिए कि हम सदा कि लिए इस संसार को छोड़कर जाने के प्रोग्राम में लगे हैं या मोक्ष जाने के। तो जिनको हम छोड़कर जा रहे उनमें हम निग्रह-विग्रह क्यों करें, मायने उनमें हम माया, कपट की बात क्यों बनायें? सबको एक समान निरखें, अपने नाना प्रकार के सुकर्तव्यों से चित्त को श्रेष्ठ बनाना हमारा पहला कर्तव्य है। चित्त श्रेष्ठ बनेगा मिथ्यात्व के दूर होने से और क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों के मंद होने से। कषाय सब दूर हो गए तब तो और भी उत्कृष्ट है, मगर इस समय हम आपकी कषायें दूर हो जायें यह जरा संभावित नहीं है इसलिए इन कषायों को मंद तो कर लिया जावे और यह संभावना है कि हम मिथ्यात्व को मूल से उखाड़ दें, क्षायिक सम्यक्त्व आज नहीं है मगर क्षायोपशमिक सम्यक्त्व तो होता है, औपशमिक सम्यक्त्व तो होता है। यों एक बार अपने अंदर विराजमान उस चिन्मात्र तत्त्व के दर्शन तो कर लीजिए। अब तक जगत में बहुत से पदार्थों को शरण मानते आये, मगर ज्यों-ज्यों उन्हें शरण मानते गये त्यों-त्यों वे असहाय बने और शरण की मान्यता छोड़ दी तो अब यह शरण मिल जायगा अपने आपका। बाह्य पदार्थों में शरण की मान्यता करना अपने आपको अशरण बनाना है। चित्त में उदात्तता आये, कषायें मंद हों, मिथ्यात्व दूर हो।

1535- उदात्तचरित्र मोक्षार्थियों को अपरिवर्त्य हितकारी एक सिद्धांत की सेवा का आदेश-

उदात्त चित्त की तरह जिनका चारित्र भी उदात्त है, श्रेष्ठ है, व्यसनों से रहित है, पापवासना से रहित है, ऐसे मोक्षार्थी पुरुषों को आचार्य महाराज संबोध रहे हैं, कि एक चिन्मय तत्त्व की सेवा करो। देखिये, कुछ अपना चारित्र उत्तम न हो, योग्य न हो तो वहाँ सम्यक्त्व की पात्रता नहीं होती, भले ही संयमासंयम सम्यक्त्व के बाद या साथ होता है, उसकी बात नहीं कह रहे, मगर पहले ही अज्ञान अवस्था में भी यदि कोई सप्त व्यसनों का सेवन करने वाला है, जुआ, मदिरा, मांस, वेश्या-सेवन आदि में आसक्त है वह पुरुष आत्मा की सुध लेने का पात्र कैसे हो सकता है? बहुत दिनों तक तो यह रिवाज था कि जो सप्तव्यसन वाला हो वह भगवान की पूजा नहीं कर सकता, जब पुराने बड़े लोग थे तो वहाँ कुछ कायदे थे, जो वेश्यागामी हो, परस्त्रीसेवन करने वाला हो, मांस-भक्षी हो, शराब पीता हो उसको पूजा करने की मनाही थी। जो पुराने लोग होंगे उन्हें ख्याल होगा, तो कुछ चरित्र ऐसे हैं जो प्रारंभिक होते हैं, जिन्हें कहते हैं पाक्षिक, याने जैन-दर्शन का अगर पक्ष हैं कि मैं जैन हूँ, मुझे कुछ करना चाहिए वह प्रतिमाधारी नहीं हो, किंतु पाक्षिक तो है, उसका भी चारित्र उज्ज्वल होता है। तो जिनका चित्त और चारित्र उज्ज्वल है ऐसे मोक्षार्थी पुरुषों को एक इस चिन्मय अंतस्तत्त्व की भावना करना चाहिए, क्योंकि यह मैं एक परम ज्योतिमात्र हूँ। मैं कौन हूँ? इसके उत्तर में अगर यह बात आये कि मैं मिट जाने वाला हूँ, मैं वह हूँ जो मिट जाता हूँ, ऐसा तो कोई उत्तर देगा भी नहीं, चाहे वह कितना ही बरबाद हो मगर वह भीतर में चाह न करेगा कि मैं वह हूँ जो मिट जाने वाला हूँ। हर एक कोई अपने को ध्रुव चाहता है और क्रियाकलापों में देख लो, किसी को अगर कहा जाय कि भाई तुम खोंचा फेरते हो 50) की अपनी पूंजी से तुम दिन-भर अपना उपाय करते हो, हम तुमको दिन-भर के लिए पूरा राज्य सौंपे देते हैं मगर एक शर्त है कि परसों के दिन तुमसे हम सब कुछ छुडा़ लेंगे, और तुम्हारे पास जो 50) की पूंजी है उसको भी छुड़ा लेंगे, तो क्या वह इस बात को पसंद करेगा? न करेगा। अरे ! वह तो यह कहेगा कि हमको तो वह खोंचा ही अच्छा है, जो सदा निभता रहे वही स्थिति मैं चाहता हूँ। यह जीव इन लौकिक प्रसंगों में भी कभी न चाहेगा कि मैं एक वर्ष को बड़ा बन जाऊँ और दूसरे वर्ष में सब गिर जाय। चाहे गिर जाय यह उदय की बात है मगर किसी को यह प्रतीक्षा नहीं। अपने आपके बारे में ध्रुव रहने की आकांक्षा है। सो भाई यही तो कहा जा रहा है कि जो ध्रुव है उसे मानो कि यह मैं हूँ तब तो बात बनेगी और अध्रुव का संग्रह करे और अपने में चाहे कि मैं ध्रुव रहूँ, सो कैसे बने। ध्रुव का आश्रय लो, तुम ध्रुव ही तो हो। ध्रुव तत्त्व है एक चैतन्यमात्र स्वरूप।

1536- चिन्मय ध्रुव तत्त्व की सेवा का ही एकमात्र सिद्धांत-

एक बात और समझें, हमारा उपयोग किसी तत्त्व का आश्रय करता है, उस पर उपयोग टिकता नहीं है। किसी एक बात पर यह उपयोग जमकर रहता नहीं है यह गलती है हमारी कि हमारा उपयोग जमता नहीं है तो इस ओर से कमी आयी कि नहीं? और उपयोग उसको विषय करे जो विषय खुद टिकता नहीं है, तो अब यहाँ दोनों ओर से आफत आ गई। जैसे ये बाहरी दृश्यमान पदार्थ अध्रुव हैं, विनाशीक हैं, जिन पर हमारा अधिकार नहीं उनको हम जानते हैं, सोचते हैं, उपयोग उनको विषय करता है, उनका आश्रय लेता है तो पहले तो यह उपयोग ही चंचल है और फिर जिसका आश्रय किया वह भी चंचल है, अब यहाँ से ये विषयभूत पदार्थ खिसके कि लो अब उपयोग को आश्रय क्या रहा तो उपयोग भी खिसका, उपयोग भी मिटा। यह उपयोग खुद हटने का आदत बनाये हुए हैं। तो इस वक्त कम से कम इतनी तो गुंजाइश बनावें कि हमारा उपयोग अगर हटता है, नहीं टिकता तो एक ओर से गलती है, सो रहे पर विषय की तो गलती न करें, विषय तो ध्रुव पदार्थ का करें और अपने स्वरूप में करें वहाँ केवल एक ओर से ही तो चंचलता चलेगी। इसमें इस ध्रुव तत्त्व की ओर से, इस अंत:स्वभाव की ओर से धोखा तो न होगा कि यह यहाँ से खिसक जायगा। इसलिए आश्रय करें तो उस ध्रुव चैतन्य स्वरूप का आश्रय लें, और यह बहुत संभावना है कि ध्रुव से आश्रय लें तो यह उपयोग भी कभी सतत् धारा में अच्छी तरह से ध्रुव बन जायगा। यह नया-नया बनता है, यह ध्रुव नहीं होता, मगर एक धारा में ज्ञान चले तो वह ध्रुवज्ञानी ही है। तो हम आपको एक निर्णय रखना है जिंदगी में कि हमारा शरण, हमारा रक्षक, हमारा आश्रेय, मेरे में ही विराजमान जो सहज स्वरूप है बस उसका सहारा लेना है। अन्यभाव, अन्य पदार्थ आश्रय के योग्य नहीं है, यह अपना निर्णय करें फिर परिस्थितिवश हमको यह ही रहे कि मेरा जो एक सहज स्वरूप है बस वही मेरा सत्य है, वही मेरा शरण है, वही स्पष्ट है, स्वाधीन है, निरपेक्ष है, निज की बात है, इसके अतिरिक्त जो विभाव आते हैं वे अध्रुव हैं तो यह है सिद्धांत।

1537- मुख्यसिद्धांतसाधक सिद्धांतों की मुख्यसिद्धांतसाधना के लिये कदाचित् प्रयोजनवत्ता-

हम कौनसा सिद्धांत लेकर जीवन में चलें? ऐसा कोई प्रश्न करे कि एकमात्र जिसकी बदल न हो वह बतलाओ। तो वह है यह सिद्धांत कि अपना जो एक सहज चैतन्यस्वरूप है वहाँ दृष्टि दें कि मैं यह हूँ, यह घूमने वाला, यह शरीर वाला, यह कषाय वाला, यह कर्मबंध वाला, यह मैं नहीं; हालांकि परिस्थिति ऐसी चल रही है मगर स्वरूप मेरा यह नहीं, मैं स्वरूपमात्र हूँ। बीते, यह बात अलग है, मैं एक परम ज्योतिस्वरूप हूँ, अन्य भाव सब मेरे से पृथक् हैं, यह है सिद्धांत, जिसके अनुसार हमको चलना है। इसके अतिरिक्त और भी सिद्धांत बनते हैं मगर वे बदल जाते हैं, जैसे किसी पुरुष को समझाया कि भाई ! देखो, तुम देवदर्शन किया करो और इसके बिना जीवन बेकार है, तो उस काल में वह उपादेय है, करना, मगर देवदर्शन या अन्य-अन्य बातें यही करते रहना है क्या अनंतकाल तक, इसका तो उत्तर दीजिए।

1538- चिन्मयतत्त्वसेवातिरिक्त अन्य भाव की ससीम उपासनीयता का एक उदाहरण-

एक छंद है ‘तवपादौमम हृदये, मम हृदयं तव पद्द्वयेलीनं तिष्ठतुजिनेंद्र ताक्द्यावन्निर्वाणसंप्राप्ति:’। इसी का एक अनुवाद है- तुवपद मेरे हिय में, मम हिय तेरे पुनीत चरणों में। जब शुरू शुरू में हम सागर विद्यालय पहुँचे, उस समय हमारी उम्र कोई पौने आठ वर्ष की थी, तो वहाँ गुरू गणेशप्रसाद वर्णीजी हमारी परीक्षा लेने लगे- एक संस्कृत का छंद पढ़वाया। वह था ‘तव पादौमम हृदये मम हृदयं तव पद्द्वयेलीनं, तिष्ठतु जिनेंद्र तावद्यावन्निर्वाण संप्राप्ति:’। और कहा इसका अर्थ करो। अब हमने संस्कृत तो पढ़ा न था पर हिंदी में ऐसा ही सुन रखा था, घर पर चाचा पूजा पढ़ाया करते थे सो कहा ऐसा ही हिंदी में भी तो कहा है ‘‘तुव पद मेरे हिय में मम हिय तेरे पुनीत चरणन में।’’ तो वहाँ सही उत्तर पाकर गुरूजी हम पर प्रसन्न हुए और झट पास कर दिया और छठी कक्षा में हमको भर्ती कर लिया। हिंदी में ऐसा है ना तुव पद मेरे हिय में, कि हे प्रभो ! तुम्हारे चरण मेरे हृदय में रहें और मेरा हृदय तुम्हारे चरणों में रहे। क्या अनंताकाल तक के लिए आप चाहते हो कि प्रभु के चरण मेरे हृदय में रहें? देखो, इस ज्ञानी पुरुष को भगवान की मुँहजोरी करने में जरा भी लाज नहीं आयी। यह बोला कि तब तक रहें प्रभु के चरण मेरे हृदय में तब तक कि मेरे को मोक्षपद की प्राप्ति न हो, भला किसी धनी से थोड़ा ऐसा भी तो कहो कि हम आपकी तब तक सेवा करते हैं तब तक कि हम आपसे अपना स्वार्थ न सिद्ध कर लें। ऐसा सुनकर वह धनी कुछ भला मानेगा क्या? अरे ! उसे तो यह बात सुनकर बुरा लगेगा, पर भगवान किसी की बात सुनकर बुरा नहीं मानते कि यह ज्ञानी मुझको यह कह रहा जानकर, और इस ज्ञानी को कुछ संकोच नहीं। जब एक सिद्धांत, एक रास्ता, एक मार्ग प्रभुत्व का मिला, तब वहाँ संकोच की कुछ बात नहीं, भगवान दूर नहीं हैं भक्त से, जो बहुत दूर हो उससे डर लगता है, जो दूर नहीं रहता है उससे डर मिट जाता है। भगवान भक्त से दूर नहीं है, भगवान के निकट है भक्त, इस कारण एकदम साफ कह रहा है कि ‘‘तुव पद मेरे हिय में, मम हिय तेरे पुनीत चरणों में, तव लौ लीन रहे प्रभु......जव लौ प्राप्ति न मुक्ति पद की हो। प्रभु तत्त्वस्वरूप है, यह तत्त्व प्रेमी है, वहाँ संकोच की बात नहीं है।

1539- विभावों से लगाव हटने पर आश्रयभूत पदार्थों से हटाव की स्वयंनिष्पन्नता-

तो एक चैतन्यमात्र तत्त्व की उपासना के अलावा जितने भी भाव हैं- शुभोपयोग के हों, अशुभोपयोग के हों, ये सभी परभाव हैं और ये मेरे स्वरूप नहीं हैं, मेरे स्वरूप से पृथक् लक्षण वाले हैं, वे सब भाव मैं नहीं हूँ। अब देखिये, अपनी जिंदगी में जहाँ कर्तव्य यह है कि अपने में उठने वाले जो औदयिक भाव हैं ये औदयिक भाव याने कर्मविपाक के उदय काल में जो इस जीव के प्रतिफलन और विकल्प जगे हैं वे सारे भाव मेरे नहीं हैं तो फिर और मेरे क्या होंगे? इन भावों में से, ममता हट जाय तो बाह्य सारे पदार्थों में ममता करेगा कौन? जब अपने आपमें उत्पन्न हुए इन औपाधिक भावों को भी अपनाया नहीं और उसकी विभिन्नता स्पष्ट नजर आ जाय तब फिर बाह्य विषयों में ममता करेगा ही किस तरह से? जैसे एक बच्चों की कहानी है कि किसी गीदड़नी ने (स्यालिनी ने) एक शेर की गुफा में बच्चों को जन्म दिया। अब स्याल ने सोचा कि इसमें तो शेर आयगा तो बच्चे खा जायगा, सो उससे बचने का एक उपाय रचा। क्या किया कि स्यालिनी को तो सीखा दिया कि यहाँ जब शेर आवे तो तुम बच्चों को रुला देना, जब हम पूछे कि ये बच्चे क्यों रोते हैं तो कहना कि ये बच्चे शेर का मांस खाने को माँगते हैं... बस हम काम बना लेंगे।...ठीक है। अब वह स्याल तो वही ऊपर किसी टीले पर बैठ गया, जब कभी शेर आये तो स्यालिनी नीचे से बच्चों को रुलावे, ऊपर से स्याल बच्चों के रोने का कारण पूछे, स्यालिनी बोले कि ये बच्चे शेर का मांस खाने को माँगते हैं तो झट शेर डर के मारे दूर भाग खड़े हों। यों अनेक शेर तंग आ गए। एक दिन कई शेरों ने सलाह की कि देखो यह जो ऊपर टीले पर स्याल बैठा है इसकी सब बदमाशी मालूम होती है, चलो अपन सब चलकर उसको पकड़ कर मार दें।...ठीक है। आखिर आ तो गए मारने, पर उस टीले पर चढ़े कैसे? सो सलाह हुई कि एक शेर पर एक, यों सब चढ़कर ऊपर पहुँचे और मार दें।...पर नीचे कौन शेर खड़ा हो?...यह लँगड़ा शेर, क्योंकि यह ऊपर नहीं चढ़ सकेगा। अब नीचे तो लँगड़ा शेर खड़ा हुआ और उसके ऊपर एक पर एक चढ़ गए। जब ऊपर पहुँचने ही वाले थे कि स्यालिनी ने झट बच्चों को रुला दिया, स्याल ने पूछा ये बच्चे क्यों रोते हैं? तो स्यालिनी बोली, ये बच्चे लंगड़े शेर का मांस खाने को माँगते हैं। तो यह बात सुनकर लँगड़ा शेर डरा, नीचे से खिसका तो सारे के सारे शेर भद-भदकर गिरे और भगे। तो ऐसे ही इन औदयिक भावों को लँगड़ा शेर जैसा समझो, ये मजबूत नहीं हैं, आत्मा के स्वभाव से ये नहीं हुए, आत्मा उन्हें अंगीकार नहीं करता और कर्मों की यह परिणति नहीं। हुए कर्मों के उदयकाल में और कर्मों का निमित्त पाकर ही हुए मगर कर्म की वह परिणति नहीं, और कर्म की भी परिणति हो, जो कर्म में है तो वह भी तो अध्रुव है। इसका पाया मजबूत नहीं है, यदि ऐसा यह लँगड़ा शेर यहाँ से अलग निकल जाय तो हम आप पर जो ये बाह्य पदार्थों के संबंध के उपद्रव बन रहे हैं वे सब शांत हो जावें।

1540- चिन्मयभावातिरिक्त अन्य भावों की परभावरूपता का दिग्दर्शन-

देखो- यह मैं आत्मा एक शुद्ध चैतन्यमात्र हूँ। शेष जो अन्य भाव हैं ये सब मेरे से पृथक् लक्षण वाले हैं, मेरे स्वरूप नहीं है। कौन-कौनसे भाव? तो ये ही भाव सब मार्गणा हैं, गुणस्थान हैं। जो-जो भी बातें चल रही हैं ये सब पृथक् लक्षण वाले हैं। आप कहेंगे कि गुणस्थान के कैसे पृथक् लक्षण हैं, ये तो बड़े अच्छे हैं। अब 12 वाँ गुणस्थान हो गया, अब 13 वाँ गुणस्थान हो गया। देखो 13 वें गुणस्थान तक आस्रव है। 11, 12, 13 गुणस्थान में ईर्यापथास्रय है, यहाँ स्थिति न बनेगी। आया राग और गया। आप देखो समयसार में बताया कि मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग ये चार आश्रव हैं, और उसके भेद हैं 13, पहले गुणस्थान से 13 वें गुणस्थान तक। अच्छा, तो किस विधि से देखना? उन गुणस्थानों में जो विकास है वह विकास तो है मगर उसकी मुख्यता से न देखना, किंतु वहाँ जो कमी है केवल उस पर विचार करना। भगवान हो गए, योग है, एक ही ढंग की बात कही। तो जो कमी रह गई है उस कमी से आस्रव कहा गया है, वह स्वभावरूप तो नहीं है और वह गुणस्थान बना ही उस कमी के कारण। इतना विकास होने के बावजूद जो कमी रह गई उस कमी ने गुणस्थान का नाम धराया, रूप बनाया और वह अंश आस्रवरूप है। तो एक चैतन्यमात्र अंतस्तत्त्व के अतिरिक्त अन्य जितने भी भाव हैं वे भाव प्रतिकूल लक्षण वाले हैं। मैं हूँ चैतन्यस्वरूप और क्रोधादिक भाव ये हैं विभावरूप। ऐसा अपने में और परभावों में भेद जानकर अपने को ग्रहण करें, ग्रहण करने के मायने उस रूप अपने को अनुभवन करें और शेष परभावों का परित्याग करें याने उनकी उपेक्षा करना।

1541- समग्र परभावों की परद्रव्यता के रूप में दर्शन-

ये परभाव क्या हैं? ये समग्र भाव परभाव हैं, अरे ! जिससे मुख मोड़ना है, जिसकी उपेक्षा करना है उसको तो भले प्रकार अतिशय करके अतिरेक करके, भी एक परतत्त्व के निर्णय में ले चलें ऐसा लोग करते ही हैं। अभी कोई स्वर्ण बेचने वाला आया और उस स्वर्ण को किसी जौहरी ने लेकर अपनी कसौटी पर कसा, उस जौहरी को रुचि थी शुद्ध स्वर्ण का व्यापार करने की, सो उसने जब कसौटी पर कसकर देखा तो उसमें कोई दो तीन आने भी खोट थी सो वह झिल्लाकर बोला- अरे तू क्या पीतल लाया? अब भला बतलाओ वह पीतल थी क्या? था तो स्वर्ण, बस जरा-सी खोट थी, लेकिन वह तो जौहरी के एक मुड की बात थी सो वैसा कहा, उस समय उसकी वैसी ही दृष्टि थी, शुद्ध स्वर्ण निरखने की उसकी रुचि थी, ऐसी दृष्टि में अशुद्ध पदार्थ उसके लिए परद्रव्य हो गया। याने जिस परद्रव्य का निमित्त पाकर ये परभाव हुए उनको उस खतौनी में डाला इस ज्ञानी ने। जानो, तुम परद्रव्य स्वरूप नहीं हो, अपने आपको अति विशुद्ध चैतन्यमात्र निरखने के मुड में यह ज्ञानी पुरुष निर्णय दे रहा है कि वे सारे भाव समग्र परद्रव्य हैं, उससे मेरी कोई रुचि नहीं। एक चैतन्यमात्र तत्त्व को निरखना यह है सिद्धांत, जो अकाट्य है, जो जीवन में बदलने के काबिल नहीं। बढ़ते चले जावो, यह ही बात मिलेगी अंत तक कि यह चिन्मय, जब शरीरादि निगाह में नहीं रहता तब केवल एक वह चिन्मय चैतन्यमात्र तत्त्व की दृष्टि में रहता। बस इस सिद्धांत का सेवन करना चाहिए कि मैं चैतन्यमात्र ही हूँ, अन्य भावरूप नहीं, भावना बने, ध्यान करें, कोई समय निकालें, बार-बार ऐसा भीतर सोचें या कहीं पड़े हुए भी किसी भी जगह सोचें। आत्म चिंतन चलना चाहिए अन्यथा यह माया यह सब मिट जायगी, मरण हो ही जायगा और इस अमूल्य मानव जीवन का फिर लाभ जो मिल सकता था वह न पा सके तो आगे क्या भवितव्य होगा, सो यह संसार जो दिख रहा है, दुर्दशा के लिये यह ही प्रमाणभूत है कि ऐसा ही भवितव्य होगा।


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